Lulla Family

भ्रमर-गीत

कथा 64 · भागवतम् की कथाएँ

भ्रमर-गीत

A Bee Comes, and All the Longing Spills Over
स्कन्ध 10, अध्याय 46-47
Painterly classical-Indian color illustration on the bank of the Ganga in late afternoon light: the young crowned King Parikshit sitting pensively beside the white-bearded sage Shukadeva in ascetic robes under a tree, river flowing behind them, warm dusk hues, the king turning to ask the seated muni a question.

गंगा के तट पर दोपहर ढल चुकी थी। परीक्षित् कुछ देर अपने ही भीतर खोए रहे, फिर मुनिवर शुकदेव की ओर मुड़े। ”भगवन्, कल आपने वह कथा कही, जब अक्रूर का रथ गोकुल से चला और गोपियाँ पीछे रह गईं। एक बात तब से मन में अटकी है। श्रीकृष्ण मथुरा पहुँचकर राजा हुए, कंस मारा गया, सब काम सध गए। पर जो ग्वालिनें वहीं रह गईं, जिनके पास न कोई विधि थी, न कोई शास्त्र, न उन्हें वापस बुलाने का कोई वचन भी, उनका क्या हुआ? क्या भगवान् ने उन्हें भुला दिया? और यदि नहीं भुलाया, तो विरह की उस आग में जलते हुए उनके पास कौन-सा सहारा पहुँचा?”

शुकदेव के होंठों पर एक मन्द-सी आभा आई। ”राजन्, श्रीहरि भूले नहीं थे। उन्होंने अपने परम प्रिय और सब में बुद्धिमान सखा को भेजा, इसी सोच से कि कुछ ज्ञान की बात सुनाकर वे ग्वालिनों का ताप हर लाएँगे। पर वहाँ जो हुआ, उसकी कल्पना न श्रीकृष्ण के उस दूत ने की थी, न शायद किसी और ने। सुनिए।”


मथुरा के दरबार में वृष्णिवंशियों के बीच एक पुरुष ऐसा था जिसकी बुद्धि के आगे बड़े-बड़े सिर झुकाते थे। नाम उद्धव। साक्षात् बृहस्पति का शिष्य, और श्रीकृष्ण का प्यारा सखा। उनकी आकृति ऐसी कि कोई दूर से देखे तो ठहर जाए, क्योंकि घुटनों तक झूलती लंबी भुजाएँ, खिले कमल-से नेत्र, पीताम्बर, श्रीकृष्ण से इतनी मिलती-जुलती थी।

Painterly classical-Indian color scene in the Mathura palace: dark-blue Krishna in yellow pitambara and peacock crown tenderly clasping the hand of his dear friend Uddhava, who closely resembles him with long arms, lotus eyes and yellow garment, Krishna affectionately giving instructions to send him to Vraja, jewelled courtly hall.

एक दिन श्रीकृष्ण ने उद्धव का हाथ अपने हाथ में लिया। यह उनका तरीक़ा था, अपने अनन्य भक्त से बात करने का, हाथ थामकर। ”सौम्य उद्धव,” वे बोले, ”आप व्रज जाइए। वहाँ मेरे पिता नन्द और मैया यशोदा हैं, उन्हें आनन्दित कीजिए। और वे गोपियाँ, जो मेरे विरह की व्याधि से दुखी हो रही हैं, उन्हें मेरा सन्देश सुनाकर उस वेदना से छुड़ाइए। उनका मन रात-दिन मुझी में लगा है। उन्होंने मेरे लिये पति, पुत्र, सब छोड़ रखा है। मैं ही उनका जीवन हूँ, उद्धव। मैंने कहा था, मैं आऊँगा। वही वचन उनकी साँस का सहारा बना हुआ है।”

उद्धव बड़े आदर से अपने स्वामी का सन्देश लेकर रथ पर चढ़े और नन्दगाँव की ओर चल पड़े। मन में सन्तोष था, कुछ गर्व भी, कि वे श्रीकृष्ण-तत्त्व जानते हैं, और इन भोली ग्वालिनों को आत्मा का ज्ञान सुनाकर उनका मोह छुड़ा देंगे।

Painterly classical-Indian color illustration of sunset arrival in Vraja: Uddhava's golden chariot half-veiled in dust as cows return from the forest, rutting bulls bellowing, heavy-uddered cows running to their calves, lamps and incense smoke rising from flower-decked cottage courtyards, golden-orange evening sky over the cowherd village.

सूर्यास्त के समय उनका रथ व्रज में पहुँचा। उसी वक़्त जंगल से गौएँ लौट रही थीं। उनके खुरों से इतनी धूल उड़ी कि रथ ढक-सा गया। मतवाले साँड़ आपस में लड़ रहे थे, उनकी गर्जना से सारा व्रज गूँज उठा। थनों के भार से दबी गौएँ अपने-अपने बछड़ों की ओर दौड़ रही थीं। हर घर के आँगन से गाय दुहने की ‘घर-घर’ आवाज़ आ रही थी, और उसी के साथ कहीं दूर से किसी की बाँसुरी की टेर। उद्धव ने देखा कि घरों में अग्नि, अतिथि और पितरों की पूजा हो चुकी है, धूप की सुगन्ध हवा में तैर रही है, दीपक जल उठे हैं। फूलों से सजे उन घरों के बीच से वे श्रीकृष्ण के पिता के द्वार पर उतरे।

Painterly classical-Indian color scene inside Nanda's home: the elderly cowherd-chief Nanda rising joyfully to embrace Uddhava as though Krishna himself had come, mother Yashoda seated nearby with tears on her cheeks, lamps lit, warm domestic interior of Vraja, deep parental affection on the old faces.

नन्दबाबा उद्धव को देखकर इतने प्रसन्न हुए कि उठकर गले लगा लिया, मानो स्वयं श्रीकृष्ण ही आ गए हों। उत्तम भोजन कराया, थके पाँव दबवाए, और फिर पास बिठाकर पूछने लगे। ”परम भाग्यवान् उद्धवजी, अब हमारे सखा वसुदेव जेल से छूट गए। उनके स्वजन उनके साथ हैं। सब कुशल से तो हैं?”

एक साँस लेकर बाबा का स्वर धीमा हुआ। ”श्रीकृष्ण कभी हम लोगों को भी याद करते हैं? वे हमारे लाला हैं। यह सारा व्रज जिसे अपना सर्वस्व मानता है, ये गौएँ, यह वृन्दावन, यह गिरिराज, क्या वे कभी इनका स्मरण करते हैं?”

बाबा बोलते गए, और बोलते-बोलते उनकी आँखों के आगे एक-एक लीला घूम गई। ”उद्धवजी, उनका हृदय कितना उदार है। दावानल में, आँधी-पानी में, बार-बार उन्होंने हमें बचाया। खेल-खेल में ही उन्होंने उस पापी कंस को मार डाला, उसके अजेय पहलवानों को, उस मतवाले हाथी कुवलयापीड को। तीन ताल लंबे उस धनुष को ऐसे तोड़ डाला जैसे कोई छड़ी हो। और गिरिराज को तो एक हाथ पर सात दिन उठाए रखा था।” कहते-कहते उनका गला रुँध गया। प्रेम की बाढ़ ऐसी उमड़ी कि वे चुप हो गए।

पास ही बैठी यशोदा बाबा की एक-एक बात सुन रही थीं। श्रीकृष्ण की हर लीला के नाम पर उनकी आँखों से आँसू बहते जाते, और पुत्र-स्नेह की वही पुरानी बाढ़ उठती कि उनके स्तनों से दूध की धारा बह निकलती। वे कुछ बोलीं नहीं। बस सुनती रहीं, और भीगती रहीं।

उद्धव यह देखकर हैरान थे। यह कैसा प्रेम है जो शब्द नहीं, दूध बहाता है। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, ”हे मानद, आप दोनों समस्त शरीरधारियों में अत्यन्त धन्य हैं। जो समस्त चराचर को रचने वाले हैं, उनके प्रति आपके हृदय में यह वात्सल्य उपजा है। बलराम और श्रीकृष्ण सारे संसार के आदि-कारण हैं। वे थोड़े ही दिनों में व्रज आएँगे, और आप माँ-बाप को आनन्दित करेंगे। खेद न करें। जैसे काठ में अग्नि सदा व्यापक रहती है, वैसे ही वे सब प्राणियों के हृदय में सर्वदा विराजमान हैं।” इसी प्रकार आपस में बातें करते वह रात बीत गई।

Painterly classical-Indian color illustration of pre-dawn Vraja: gopis risen in the last of night, lit lamps placed on swept thresholds for worship, then seated churning curd, bangles and earrings swaying as they pull the churning ropes, one singing Krishna's auspicious deeds while the others join, song rising into the dark sky.

कुछ रात शेष थी जब गोपियाँ उठीं। दीपक जलाकर उन्होंने घर की देहली पर वासुदेव की पूजा की, आँगन झाड़-बुहारकर साफ़ किया, और दही मथने बैठ गईं। रस्सी खींचते समय उनके कंगन झनकते, गले के हार और कानों के कुण्डल हिलते। दही मथने की ‘घर-घर’ ध्वनि में किसी ने श्रीकृष्ण के मंगलमय चरित्रों का गान छेड़ दिया, और बाक़ी सब उसी सुर में मिल गईं। वह गीत मथने की ध्वनि से मिलकर ऐसा बन गया कि स्वर-लहरी आकाश तक जा पहुँची, और चारों दिशाओं का अमंगल मिटा गई।

भोर हुई। सूर्य निकला। तभी ग्वालिनों ने देखा कि नन्दबाबा के द्वार पर एक सोने का रथ खड़ा है। एक-दूसरे से पूछने लगीं, ”यह किसका रथ है?” किसी ने कहा, ”कंस का काम सिद्ध करने वाला अक्रूर ही तो फिर नहीं आ गया, जो प्यारे श्यामसुन्दर को यहाँ से मथुरा ले गया था?” किसी और ने रुँधे स्वर में कहा, ”अब वह हमें ले जाकर अपने मरे स्वामी कंस का पिण्डदान कराएगा क्या? अब यहाँ उसके आने का और क्या प्रयोजन हो सकता है?” इसी प्रकार आपस में बातें कर रही थीं कि नित्यकर्म से निवृत्त होकर उद्धव बाहर आ पहुँचे।

घुटनों तक झूलती लंबी भुजाएँ, नूतन कमल-दल-से कोमल नेत्र, पीताम्बर, गले में कमल-पुष्पों की माला, कानों में मणिजटित कुण्डल, और मुख ऐसा खिला हुआ। गोपियों ने पहले तो ठहरकर देखा। फिर आपस में फुसफुसाईं, ”यह पुरुष देखने में तो बहुत मनोहर है। पर है कौन? कहाँ से आया? किसका दूत है? इसने श्रीकृष्ण-जैसी वेषभूषा क्यों धारण कर रखी है?” और फिर, उनका परिचय पाने की उत्सुकता में, बहुत-सी ग्वालिनें श्रीकृष्ण के इस सखा को चारों ओर से घेरकर खड़ी हो गईं।

जब समझ आया कि ये रमारमण भगवान् के सन्देश-वाहक हैं, तब वे विनय से झुकीं, सलज्ज हँसीं, और एकान्त में आसन पर बिठाकर कहने लगीं, ”उद्धवजी, हम जानती हैं, आप यदुनाथ के पार्षद हैं। उन्हीं का सन्देश लेकर पधारे हैं। आपके स्वामी ने अपने माँ-बाप को सुख देने के लिये आपको भेजा होगा। हम तो अब इस नन्दगाँव में उनके स्मरण योग्य कोई वस्तु ही नहीं पाती। माँ-बाप का स्नेह-बन्धन तो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी छोड़ नहीं पाते। पर दूसरों के साथ जो प्रेम-सम्बन्ध का स्वाँग रचा जाता है, वह तो किसी न किसी स्वार्थ के लिये ही होता है। भौंरों का फूलों से, और पुरुषों का स्त्रियों से, ऐसा ही स्वार्थ का नाता होता है।”

उद्धव की तत्त्व-भरी बात उनके होंठ तक आते-आते रुक गई। गोपियों के मन, वाणी और शरीर श्रीकृष्ण में ही तल्लीन थे। श्रीकृष्ण के दूत से बात करते-करते यह भूल ही गया कि कौन-सी बात किसके सामने कही जा रही है। बचपन से किशोरावस्था तक की एक-एक लीला याद कर-करके वे गाने लगीं, और आत्मविस्मृत होकर, स्त्री-सुलभ लज्जा को भी भुलाकर, फूट-फूटकर रोने लगीं।

Painterly classical-Indian color scene: a single gopi seated with half-closed eyes lost in memory of Krishna, a black bumblebee humming and hovering near her feet, she gazing at it through half-open eyes about to address it with mingled love and reproach, soft Vraja garden setting at dawn.

उन्हीं में से एक गोपी थी, जिसे उस घड़ी श्रीकृष्ण के मिलन की कोई पुरानी लीला घेर रही थी। आँखें मुँदी थीं, मन कहीं और था। तभी पास ही एक भौंरा गुनगुनाता हुआ आ बैठा, उसके पाँव के पास मँडराने लगा। आधे खुले नेत्रों से उसने उसे देखा और भीतर कुछ खौल उठा। उसने समझा, यह भौंरा कोई और नहीं, श्रीकृष्ण ने ही इसे दूत बनाकर भेजा है, मुझे रूठी जानकर मनाने को। और फिर वह उस भौंरे से बातें करने लगी, आधा प्रेम और आधा उलाहना भरकर।

”रे मधुप, आप उस कपटी के सखा हैं, इसलिये आप भी कपटी हैं। हमारे पाँव मत छुइए। झूठे प्रणाम करके हमसे अनुनय-विनय मत कीजिए। हम देख रही हैं, श्रीकृष्ण की जो वनमाला हमारी सौतों के वक्ष से मसली हुई है, उसका पीला-पीला कुंकुम आपकी मूँछों पर भी लगा है। आप स्वयं भी तो किसी एक फूल से प्रेम नहीं करते, यहाँ-से-वहाँ उड़ते फिरते हैं। जैसे आपके स्वामी, वैसे ही आप। वह कुंकुम-भरा प्रसाद, जो यदुवंशियों की सभा में उपहास के योग्य है, अपने ही पास रखिए। उसे हमारे लिये यहाँ क्यों भेजा है?”

भौंरा फिर भी मँडराता रहा, जैसे कुछ कहना चाहता हो। गोपी का स्वर और तीखा हुआ, पर उस तीखेपन के नीचे एक गीली-सी टीस थी। ”भौंरे, हमने उन्हें केवल एक बार, हाँ केवल एक बार अपनी वह तनिक-सी मोहिनी और मादक अधर-सुधा पिलाई थी, और फिर वे हमें भोली-भाली छोड़कर वहाँ चले गए। पता नहीं, सुकुमारी लक्ष्मी उनके चरण-कमलों की सेवा कैसे करती होंगी, क्योंकि वे छैल-छबीले श्रीकृष्ण की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ ही गई होंगी। उनके ‘उत्तमश्लोक’ नाम का गान बड़े-बड़े लोग करते हैं, पर उसकी सार्थकता तो तभी है जब वे दीनों पर दया करें। नहीं तो वह नाम झूठा पड़ जाता है।”

”अरे मधुकर, मेरे पाँव पर सिर मत टेकिए। मैं जानती हूँ, आप अनुनय-विनय में, क्षमा माँगने में बड़े निपुण हैं, क्योंकि आपने यह सब अपने स्वामी से ही सीखा है। पर समझ लीजिए, यहाँ आपकी दाल नहीं गलने की। हमने उन्हीं के लिये अपने पति, पुत्र और सब छोड़ दिया, और वे ऐसे निर्मोही निकले कि हमें छोड़कर चलते बने। अब बताइए, ऐसे कृतघ्न के साथ हम क्या सन्धि करें? क्या आप अब भी कहते हैं कि उन पर विश्वास करना चाहिये?”

थोड़ी देर वह रुकी। भौंरा उड़कर एक पत्ते पर जा बैठा, फिर लौट आया। गोपी की आँखों में अब कुछ और उतर आया था, क्रोध की राख के नीचे की वही न बुझने वाली आग। ”भौंरे, आप पूछते हैं, ऐसा है तो हम उनकी चर्चा क्यों करती हैं? हम सच कहती हैं, एक बार जिसे उसका चसका लग जाता है, वह उसे छोड़ नहीं सकता। श्रीकृष्ण की लीला-रूप अमृत की एक बूँद भी जिसने चख ली, उसके राग-द्वेष, सुख-दुख, सब छूट जाते हैं। हम भोली हिरनियों-सी उस छलिया के मीठे गान पर विश्वास कर बैठीं, और बार-बार उसी जाल में फँसती रहीं। इसीलिये, श्रीकृष्ण के दूत भौंरे, अब इस विषय में और कुछ मत कहिए। कहना ही हो तो कोई दूसरी बात कहिए।”

उसका स्वर अब काँपने लगा था। ”प्यारे भौंरे, क्या वह मथुरावासियों के बीच कभी हम दासियों की भी कोई चर्चा चलाता है? और कभी अपनी अगर-जैसी सुगन्ध वाली भुजा हमारे सिर पर रखेगा? क्या हमारे जीवन में कभी ऐसा शुभ अवसर भी आएगा?” इतना कहकर वह चुप हो गई। भौंरा गुनगुनाता रहा, और चारों ओर बैठी बाक़ी ग्वालिनें सिसकती रहीं।

उद्धव यह सब सुनते रहे। जो ज्ञान वे सिखाने आए थे, वह उनके भीतर ही ठहर गया। उन्होंने जीवन भर शास्त्र पढ़े थे, समाधि साधी थी, और स्वयं श्रीकृष्ण के मुख से तत्त्व सुना था। पर यह जो उनके सामने बह रहा था, यह किसी शास्त्र में लिखा नहीं मिलता। एक मूक भौंरे से बातें करती हुई इस ग्वालिन के विरह में, उन्हें वह दीख गया जिसके पीछे योगी जन्म-जन्म दौड़ते हैं।

Painterly classical-Indian color illustration: Uddhava with folded hands and humbled expression gently delivering Krishna's message to a circle of seated gopis, the women listening with calmed faces and folded hands, their grief easing as they realize Krishna pervades all, serene daytime Vraja courtyard.

उन्होंने धीरे से, बड़े आदर से, श्रीकृष्ण का सन्देश सुनाया। ”हे गोपियो, आप तो परम भाग्यवती हैं। दान, व्रत, तप, होम, जप, इन सब साधनों से जो भगवद्भक्ति बड़े-बड़े मुनियों को भी दुर्लभ है, वह आपने विरह मात्र से पा ली है।” फिर उन्होंने श्रीकृष्ण की कही बात दोहराई। ”भगवान् कहते हैं, मुझसे आपका कभी वियोग नहीं हो सकता। जैसे आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी, ये पाँचों भूत सब वस्तुओं में व्याप्त हैं, वैसे ही मैं मन, प्राण, इन्द्रिय और सब के भीतर बसा हूँ। मैं आपसे इसलिये दूर हूँ कि आपका मन निरन्तर मुझ में लगा रहे। जैसे परदेशी प्रियतम में स्त्रियों का चित्त जितना लगता है, उतना सामने रहने वाले में नहीं लगता।”

सन्देश सुनकर ग्वालिनों के विरह की व्यथा कुछ शान्त हुई। वे समझ गईं कि उनके श्यामसुन्दर सब के आत्मा हैं, सर्वत्र हैं, उनसे कहीं दूर नहीं। अब वे बड़े प्रेम और आदर से उद्धव का सत्कार करने लगीं।

उद्धव व्रज में कुछ महीने रुके। गोपियों का ताप मिटाने के लिये वे श्रीकृष्ण की अनेक लीलाएँ सुना-सुनाकर व्रजवासियों को आनन्दित करते रहे। जितने दिन वे वहाँ रहे, उतने दिन श्रीकृष्ण की चर्चा होती रही, और व्रजवासियों को ऐसा लगा मानो अभी एक ही क्षण बीता हो। वे कभी नदी के तट पर जाते, कभी गिरिराज की घाटियों में, और पूछ-पूछकर कि यहाँ श्रीकृष्ण ने कौन-सी लीला की थी, सबको उन्हीं के स्मरण में डुबा देते।

पर भीतर ही भीतर वे बदल चुके थे। जो दरबारी पुरुष ज्ञान का गर्व लेकर आया था, वह अब इन वनचारी ग्वालिनों के चरणों की धूल अपने सिर पर चढ़ाने को तरसता था। चलते समय, व्रज की सीमा पर खड़े होकर, उन्होंने हाथ जोड़े और गोपियों को नमस्कार करते हुए मन ही मन गाया, ”इस पृथ्वी पर इन्हीं का शरीर धारण करना सफल है। प्रेम की यह ऊँची-से-ऊँची स्थिति बड़े-बड़े मुनियों के लिये भी अब तक वाञ्छनीय ही है। मुझे तो यही वर मिले कि मैं इस वृन्दावन धाम में कोई झाड़ी, लता या ओषधि बन जाऊँ, ताकि इन ग्वालिनों की चरण-धूलि मुझ पर निरन्तर पड़ती रहे।”


शुकदेव चुप हुए। गंगा की लहरें तट से टकरा रही थीं। परीक्षित् कुछ देर कुछ न बोले।

फिर धीरे से कहा, ”भगवन्, श्रीकृष्ण ने उद्धव को सिखाने भेजा था, और वही सीखकर लौटे। बृहस्पति का शिष्य उन ग्वालिनों के आगे, जिन्हें न विधि आती थी न शास्त्र।”

”हाँ, राजन्,” शुकदेव बोले। ”उद्धव शास्त्र की वह पूँजी लेकर गए थे जो जन्मों में जमती है। पर विरह की एक रात गोपियों के पास जो जमा था, वह उससे ऊँचा निकला। उन्होंने भगवान् को दूर भेजकर ही पास रखा था, क्योंकि जो सामने रहता है उसे मन इतना नहीं टटोलता जितना उस परदेशी को, जो हर साँस में बसा हो। एक भौंरे से रूठती हुई वह ग्वालिन भगवान् को ही पुकार रही थी। यही प्रेम साधन का अन्त है, राजन्। इससे आगे कुछ पाने को बचता नहीं।”

परीक्षित् ने गंगा की ओर देखा। एक भौंरा कहीं से आया, जल के ऊपर थोड़ी देर मँडराया, और किनारे के किसी फूल पर जा बैठा। पाँच दिन रह गए थे।

मन्थन

भ्रमर-गीत भागवतम् के विरह-शिखर की कथा है। यहाँ भक्ति न उत्सव है, न मिलन, न कोई ऊँचा रस-समारोह। यहाँ भक्ति वह जलन है जो प्रियतम के चले जाने पर ही जागती है, और जो किसी मिलन से कहीं गहरी उतरती है।

उद्धव ज्ञान लेकर आए थे। वे यह सिद्ध करने आए थे कि आत्मा एक है, वियोग मिथ्या है, मन को विषयों से समेट लेना चाहिए। पर एक ग्वालिन, एक मूक भौंरे से उलाहने और प्रेम में डूबी हुई, उन्हें वह दिखा गई जो उनके सारे शास्त्रों से परे था। ज्ञान वहाँ हार गया, जहाँ प्रेम बिना शर्त बहा।

गोपी भौंरे को कोसती है, पर हर ताने के नीचे वही एक प्यास है, कि वह भुजा कभी सिर पर रखेगी या नहीं। यही भागवतम् की चतुराई है, कि जो प्रेम अत्यन्त गहरा होता है, वह सीधे नहीं कहा जाता, उलाहने में छिपकर कहा जाता है।

और कथा अपने गहनतम मोड़ पर वहाँ पहुँचती है, जहाँ सिखाने आया हुआ स्वयं शिष्य बन जाता है। उद्धव लौटे तो यह वर माँगते हुए कि वृन्दावन की एक लता बन जाएँ, ताकि उन ग्वालिनों के पाँवों की धूल उन पर पड़ती रहे। जिसके पास सब उत्तर थे, वह उनके सामने झुक गया जिनके पास केवल पुकार थी।

साहित्यिक-संदर्भ

भ्रमर-गीत की यह कथा श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध, अध्याय 46 और 47 में आती है। अध्याय 46 में उद्धव की व्रज-यात्रा और नन्द-यशोदा का शोक-निवारण है, और अध्याय 47 में गोपियों का भौंरे से सम्बोधन तथा श्रीकृष्ण का सन्देश। यह भागवतम् का विरह-शिखर है, जहाँ गोपी-प्रेम को मुनियों के ज्ञान और योग से भी ऊँचा कहा गया (10.47.58)। भागवतम् इस प्रसंग में किसी गोपी का नाम नहीं लेता; भौंरे से बात करने वाली गोपी अनाम ही रहती है।