Chapter 12: भक्ति योग

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अध्याय 12

भक्ति योग

भक्ति का मार्ग
अर्जुन पूछता है, ”भगवान को रूप-समेत मानें या निराकार?” कृष्ण कहते हैं: ”दोनों से मिल सकते हैं, पर साधारण इंसान के लिए रूप-वाला रास्ता आसान है।”
20 श्लोक · पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट

अगर इस अध्याय का सिर्फ़ एक श्लोक याद रखना हो, तो वह यह है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥

जो किसी से द्वेष नहीं करता, सब भूतों का मित्र है, करुणामय है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुख में सम है, क्षमाशील है।

गीता 12.13

Chapter 12 panel 1

पाठ-संदर्भ

बारहवाँ अध्याय भक्ति-योग है, बीस श्लोक। यह सबसे छोटा अध्याय है, मगर भक्ति-परम्परा का मूल पाठ। श्लोक पन्द्रह से बीस तक, भक्त के लक्षण बताए जाते हैं, अद्वेष्टा, मैत्र, करुण, निर्मम, निरहंकार, सम-दुःख-सुख। रामानुजाचार्य ने इसी अध्याय को अपनी विशिष्टाद्वैत-दर्शन का केन्द्र-बिन्दु बनाया, और बारहवीं सदी के बाद का दक्षिण-भारतीय भक्ति-आन्दोलन इसी पर खड़ा है।

अध्याय का सार

अर्जुन का सीधा सवाल: ‘कौन सा भक्त ज़्यादा निपुण है? जो आप जैसे साकार को भजता है, या जो निराकार ब्रह्म को?’

Chapter 12 panel 2

कृष्ण का जवाब बहुत व्यावहारिक है: ‘दोनों मेरे पास आते हैं। मगर निराकार का रास्ता बहुत कठिन है। साधारण मनुष्य के लिए रूप-समेत भक्ति आसान है।’

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फिर वो उन गुणों की सूची देते हैं जो भक्त को प्रिय बनाते हैं। सब प्राणियों से वैर नहीं, मित्रता, करुणा, ममता-अहंकार से मुक्त, सुख-दुख में समान, क्षमाशील, संतुष्ट, हमेशा युक्त, दृढ़-निश्चयी।

Chapter 12 panel 4

गीता के अध्यायों में यह सबसे छोटा है, मगर इसकी एक-एक पंक्ति याद रखने लायक है। संक्षेप में भक्त के स्वभाव का पूरा चित्र।

Chapter 12 panel 5

मुख्य श्लोक

श्लोक 12.13-14

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
साधारण अनुवाद‘जो सब प्राणियों से बैर नहीं रखता, मित्रवत् और करुण है, ममता-अहंकार से मुक्त, सुख-दुख में समान, क्षमा-शील, हमेशा संतुष्ट, संयमित, दृढ़ निश्चय वाला, अपना मन-बुद्धि मुझे अर्पित किए हुए, वो भक्त मुझे प्रिय है।’

दो श्लोक मिलकर भक्त के स्वभाव का एक पूरा चित्र। नौ गुण गिनाते हैं। इन्हें रोज़ पढ़ें, याद रखें।

Chapter 12 panel 6

श्लोक 12.15

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥
साधारण अनुवाद‘जिससे लोग दुखी नहीं होते, और लोगों से जो दुखी नहीं होता, जो हर्ष, क्रोध, भय, उद्वेग, इन सब से मुक्त है, वो मुझे प्रिय है।’

दूसरे लोग आपसे कैसा महसूस करते हैं, यह भी आपकी भक्ति का सबूत है। अंतर-व्यक्तिक शान्ति।

सारएक वाक्य में: भक्ति का रास्ता आसान है क्योंकि उसमें ख़ुद को छोड़ना है, समझना नहीं। और भक्त वही जो किसी को दुखी न करे, और ख़ुद किसी से दुखी न हो।