भक्ति योग
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पाठ-संदर्भ
बारहवाँ अध्याय भक्ति-योग है, बीस श्लोक। यह सबसे छोटा अध्याय है, मगर भक्ति-परम्परा का मूल पाठ। श्लोक पन्द्रह से बीस तक, भक्त के लक्षण बताए जाते हैं, अद्वेष्टा, मैत्र, करुण, निर्मम, निरहंकार, सम-दुःख-सुख। रामानुजाचार्य ने इसी अध्याय को अपनी विशिष्टाद्वैत-दर्शन का केन्द्र-बिन्दु बनाया, और बारहवीं सदी के बाद का दक्षिण-भारतीय भक्ति-आन्दोलन इसी पर खड़ा है।
अध्याय का सार
अर्जुन का सीधा सवाल: ‘कौन सा भक्त ज़्यादा निपुण है? जो आप जैसे साकार को भजता है, या जो निराकार ब्रह्म को?’

कृष्ण का जवाब बहुत व्यावहारिक है: ‘दोनों मेरे पास आते हैं। मगर निराकार का रास्ता बहुत कठिन है। साधारण मनुष्य के लिए रूप-समेत भक्ति आसान है।’

फिर वो उन गुणों की सूची देते हैं जो भक्त को प्रिय बनाते हैं। सब प्राणियों से वैर नहीं, मित्रता, करुणा, ममता-अहंकार से मुक्त, सुख-दुख में समान, क्षमाशील, संतुष्ट, हमेशा युक्त, दृढ़-निश्चयी।

गीता के अध्यायों में यह सबसे छोटा है, मगर इसकी एक-एक पंक्ति याद रखने लायक है। संक्षेप में भक्त के स्वभाव का पूरा चित्र।

मुख्य श्लोक
श्लोक 12.13-14
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
श्लोक 12.15
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥
दूसरे लोग आपसे कैसा महसूस करते हैं, यह भी आपकी भक्ति का सबूत है। अंतर-व्यक्तिक शान्ति।
दो श्लोक मिलकर भक्त के स्वभाव का एक पूरा चित्र। नौ गुण गिनाते हैं। इन्हें रोज़ पढ़ें, याद रखें।