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अध्याय 30 · भाग 2 · रावण की दिग्विजय और हनुमान का बालचरित

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वाल्मीकि रामायण · उत्तरकाण्ड
रावण-कुल का पूर्वचरित्र, पुलस्त्य से वंश, कुबेर और रावण का जन्म, रावण की दिग्विजय और तपस्या, और वेदवती तथा नलकूबर के शाप जो आगे उसके अन्त के बीज बने।

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अनरण्य का शाप: इक्ष्वाकु-कुल का बीज बोलता है

मरुत्त को जीतकर युद्ध का प्यासा दशानन (दस मुखोंवाला रावण), राक्षसों का अधिपति, अब राजाओं की नगरियों की ओर बढ़ा। महेन्द्र और वरुण के समान बलवान राजाओं के पास पहुँचकर वह यही कहता, “हमें युद्ध दीजिए, अथवा कह दीजिए कि आप पराजित हैं। यही हमारा निश्चय है। जो ऐसा न करेगा, उसके लिए कोई बचाव नहीं।”

आपस में मन्त्रणा करके वे राजा, यद्यपि निर्भय, बुद्धिमान, अत्यन्त बलशाली और धर्म में दृढ़ थे, शत्रु का वरदान-जनित बल पहचानकर पराजय स्वीकार कर गए। दुष्यन्त, सुरथ, गाधि, गय और राजा पुरूरवा, हे राम, इन सबने कहा, “हम हार गए।” फिर अयोध्या पहुँचकर, जिसकी रक्षा अनरण्य वैसे ही कर रहे थे जैसे इन्द्र अमरावती की, रावण ने उस नरश्रेष्ठ के पास जाकर कहा, “युद्ध दीजिए, अथवा कहिए, ‘मैं पराजित हूँ।’”

उस पापात्मा के वचन सुनकर अयोध्यापति अनरण्य क्रोध से भर उठे और बोले, “हे राक्षसराज, हम आपको द्वन्द्वयुद्ध (दो योद्धाओं का आमने-सामने का युद्ध) की अनुमति देते हैं। थोड़ा रुकिए, तैयार हो लीजिए; हम भी तैयार हो रहे हैं।” अनरण्य के पास पहले से समाचार था, अतः उन्होंने विशाल सेना जुटा रखी थी। दस हजार हाथी, एक लाख घोड़े, हजारों रथ और पैदल सैनिक भूमि को ढककर निकल पड़े। फिर अनरण्य और रावण के बीच घोर युद्ध छिड़ा। रावण की सेना से टकराकर, बहुत देर तक लड़कर, राजा की सारी सेना ऐसे भस्म हो गई जैसे अग्नि में डाली हुई आहुति, और जैसे आग में पतंगे।

अपनी महाबली सेना को नष्ट होते देखकर, मानो सौ नदियाँ समुद्र में पहुँचकर लुप्त हो गई हों, राजा अनरण्य स्वयं क्रोध में मूर्छित-से होकर, इन्द्रधनुष-सा अपना धनुष टंकारते हुए रावण के पास आ पहुँचे। मारीच, शुक, सारण और प्रहस्त उनसे पिटकर मृगों की भाँति भागे। तब अनरण्य ने उस राक्षसराज के मस्तक पर आठ सौ बाण बरसाए, पर वे बाण पर्वत-शिखर पर गिरती जल-धाराओं की तरह कोई चोट न कर सके। तब क्रुद्ध रावण ने हथेली से उनके सिर पर ऐसा प्रहार किया कि वे रथ से गिर पड़े, मानो वज्र से दग्ध साल-वृक्ष वन में गिरा हो।

रावण ने हँसते हुए कहा, “इक्ष्वाकु-वंश के राजन, मुझसे भिड़कर आपने क्या पाया? तीनों लोकों में कोई नहीं जो मुझसे युद्ध कर सके। भोगों में लिप्त रहकर आपने मेरे बल की चर्चा नहीं सुनी होगी।” मरते हुए राजा ने उत्तर दिया, “मैं आपसे पराजित नहीं हुआ हूँ, हे आत्म-प्रशंसा करनेवाले राक्षस; मैं तो काल से ही नष्ट हुआ हूँ, और आप उसके निमित्तमात्र हैं। प्राण जाते समय मैं क्या कर सकता हूँ? मैं युद्ध से विमुख नहीं हुआ, लड़ते हुए ही मारा गया हूँ।”

“आपने इक्ष्वाकु-कुल का अपमान किया है, अतः हम शाप देते हैं,” अनरण्य बोले। “यदि हमने दान दिया हो, हवन किया हो, तप किया हो और प्रजा की भली-भाँति रक्षा की हो, तो हमारा वचन सत्य हो। इसी इक्ष्वाकु-कुल में दशरथ के पुत्र राम नाम से एक महात्मा उत्पन्न होंगे; वही आपके प्राण हरेंगे।” यह शाप उच्चारित होते ही देवों की दुन्दुभि गरजी और आकाश से पुष्प-वृष्टि हुई। राजा अनरण्य स्वर्ग को सिधार गए, और राक्षस वहाँ से चल पड़ा।

समझने की कुंजी (नाम): अनरण्य राम के पूर्वज, इक्ष्वाकु-कुल के राजा हैं। यह शाप उत्तरकाण्ड का वह बीज है जो स्वयं राम के हाथों रावण-वध की भविष्यवाणी करता है। वाल्मीकि यहाँ बार-बार दिखाते हैं कि रावण का अन्त मनुष्य के हाथों होना ही उसके वरदान की सीमा थी।

सार: मरुत्त के बाद रावण पृथ्वी के राजाओं को ललकारता फिरा। अयोध्या के राजा अनरण्य ने अकेले लड़कर वीरगति पाई, और मरते-मरते यह शाप दे गए कि दशरथ-पुत्र राम उसके प्राण हरेंगे, जो आगे रावण के अन्त का बीज बना।

नारद की चेतावनी और यम की ओर प्रस्थान

मर्त्यलोक के मनुष्यों को त्रास देता हुआ रावण एक दिन मेघों के बीच आकाश में देवर्षि नारद से मिला। दशग्रीव ने उन्हें प्रणाम किया, कुशल पूछी, और आगमन का कारण जानना चाहा। पुष्पक में बैठे रावण से, मेघ की पीठ पर सवार अपरिमित तेजवाले नारद बोले, “हे विश्रवा के पुत्र, हे सौम्य, रुकिए। हम आपके पराक्रमों से प्रसन्न हैं। जैसे विष्णु ने दैत्यों का संहार किया, वैसे ही आपने गन्धर्वों और नागों को परास्त किया, और इससे हम अत्यन्त सन्तुष्ट हैं।

“पर हे तात, एक बात कहते हैं, सुनिए। आप, जिन्हें देव भी नहीं मार सकते, यह मर्त्यलोक क्यों नष्ट कर रहे हैं? यह लोक तो वैसे ही मृत्यु के वश में पड़ा हुआ, मानो मरा ही हुआ है। देव-दानव-दैत्य, यक्ष-गन्धर्व-राक्षस तक जिसे न मार सकें, वह मानव-लोक आपके योग्य ही नहीं। जो प्राणी सैकड़ों रोगों और बुढ़ापे से ग्रस्त, सुख-दुख से मोहित हैं, उन्हें मारकर क्या मिलेगा? यह लोक तो आपने जीत ही लिया, इसमें सन्देह नहीं।

“सब प्राणियों को अन्ततः यमसदन जाना ही है। तो हे पुलस्त्य के वंशज, हे परपुरंजय (शत्रुओं की नगरियाँ जीतनेवाले), यम को ही जीत लीजिए। उसे जीत लिया तो सब जीत लिया, इसमें सन्देह नहीं।” यह सुनकर लंकेश हँसते हुए, नारद को प्रणाम करके बोले, “हे महर्षि, जो देव-गन्धर्व के विहार और समर के प्रेमी हैं, हम तो विजय हेतु रसातल जाने को उद्यत थे, फिर तीनों लोक जीतकर, नागों और देवों को वश में करके, अमृत के लिए समुद्र मथने को।”

नारद ने पूछा, “तो आप दूसरे मार्ग से कहाँ जा रहे हैं? यह दुर्गम मार्ग तो यम की नगरी को जाता है।” शरद-मेघ-सी गर्जना के साथ हँसकर रावण बोले, “यह तो हुआ ही समझिए। हे ब्राह्मण, यम का काम तमाम करने को ठान चुके हैं, इसी से दक्षिण दिशा को, जहाँ सूर्यपुत्र यम का निवास है, चले हैं। क्रोध में प्रतिज्ञा की है कि चारों लोकपालों को जीतेंगे। पितृराज की नगरी की ओर प्रस्थान कर चुके हैं; प्राणियों के क्लेश के कर्ता को मृत्यु से जोड़ देंगे।” यह कहकर, मुनि को प्रणाम करके, मन्त्रियों सहित रावण दक्षिण को चल पड़े।

नारद कुछ देर ध्यानमग्न होकर, धूमरहित अग्नि-से तेजस्वी, सोचने लगे: काल को रावण कैसे जीतेगा, जिससे चराचर तीनों लोक और इन्द्र तक धर्मानुसार आयु क्षीण होने पर डरते हैं? जो द्वितीय अग्नि-सा है, जो सबके दान और कर्म जानता है, जिसके तेज से समस्त प्राणी चेतना और गति पाते हैं, उसे रावण स्वयं कैसे आ पकड़ेगा? और यदि यम को वश में कर भी ले, तो आगे कौन-सी नई व्यवस्था बनाएगा? कौतूहल से भरकर नारद ने स्वयं यमसदन जाने का निश्चय किया, ताकि इन दोनों, यम और राक्षस, का युद्ध देख सकें।

समझने की कुंजी (अवधारणा): नारद यहाँ केवल चुगलखोर नहीं; घटनाओं को गति देनेवाली प्रेरक-शक्ति हैं। वे रावण को यम की ओर भेजकर एक असम्भव-सा प्रश्न उठाते हैं: क्या कोई जीव काल को ही जीत सकता है? यही प्रश्न आगे के सर्गों की धुरी है।

सार: नारद ने रावण को समझाया कि मर्त्यलोक तो काल के वश में पहले ही है, अतः यम को ही जीते। रावण क्रोध में दक्षिण दिशा को, यमसदन की ओर चल पड़ा, और कौतूहलवश नारद भी यम के युद्ध को देखने वहाँ पहुँच गए।

यमलोक में नरक-दर्शन और यम की सेना का संहार

नारद शीघ्रगति से यम के सदन को पहुँचे, ताकि घटना ज्यों-की-त्यों कह सकें। वहाँ उन्होंने देखा कि यम सर्वसाक्षी अग्नि को सम्मुख रखे, प्रत्येक प्राणी को उसके कर्मानुसार न्याय दे रहे हैं। नारद को आया देख यम ने धर्म-विधि से अर्घ्य देकर, उन्हें सुख से बैठाकर कुशल पूछी। नारद बोले, “हे देवर्षि-पूजित यम, सब कुशल तो है? धर्म तो नष्ट नहीं हो रहा? आपके आने का प्रयोजन क्या?… सुनिए, अपना प्रयोजन कहते हैं, और आप उपाय कीजिए। दशग्रीव नाम का निशाचर पराक्रम से आपको वश में करने आ रहा है। इसी कारण हम शीघ्र आए हैं; अब आप, जो दण्ड को शस्त्र बनाए हैं, क्या करेंगे?”

इसी बीच उन्होंने दूर से रावण का पुष्पक उगते सूर्य-सा चमकता हुआ आता देखा। पुष्पक की प्रभा से उस दिशा का अन्धकार मिटाकर महाबली रावण निकट आ पहुँचे। तब दशग्रीव ने इधर-उधर देखा: प्राणी अपने पुण्य-पाप भोग रहे थे। यम के अनुचर भयंकर, घोर रूपवाले पुरुष प्राणियों को मार-कूट रहे थे, और वे तीव्र चीत्कार कर रहे थे।

मार्ग में रावण ने सैकड़ों-हजारों प्राणी देखे: कुछ कीड़ों और भयानक कुत्तों से खाए जाते, कुछ रक्त बहानेवाली वैतरणी नदी बार-बार पार कराए जाते, कुछ तपी हुई बालू पर चलते, कुछ असिपत्र-वन में तलवार-से पत्तों से चीरे जाते, कुछ खारे जल और छुरे की धार पर चलाए जाते, कुछ प्यास-भूख से जल माँगते, और कुछ शव-से दुर्बल, मलिन, बाल बिखेरे इधर-उधर भागते। साथ ही उसने पुण्यात्माओं को भी देखा जो अपने सत्कर्मों के फल से उत्तम भवनों में गीत-वाद्य के बीच आनन्द मना रहे थे: गो-दानियों को दूध पीते, अन्न-दानियों को अन्न खाते, गृह-दानियों को घरों में रहते, और स्वर्ण-मणि-मुक्ता से सजे धर्मात्मा युवतियों के संग शोभायमान।

तब बलशाली रावण ने अपने पराक्रम से उन सब प्राणियों को बलपूर्वक मुक्त कर दिया जो अपने पापकर्मों से पीड़ित थे। मुक्त किए हुए प्रेत कुछ क्षण अप्रत्याशित सुख पा गए। यह देख यम के प्रेतगोप क्रुद्ध होकर राक्षसराज पर टूट पड़े; चारों दिशाओं से हलहला शब्द उठा। प्रास, परिघ, शूल, मूसल, शक्ति और तोमर लिए सैकड़ों-हजारों वीरों ने पुष्पक के आसन, प्रासाद, वेदिकाएँ और तोरण भौंरों-से तोड़ डाले, पर ब्रह्मा की शक्ति से वह देवनिर्मित विमान अक्षय बना रहा।

रावण के मन्त्री, सर्वांग रक्त से लथपथ, घोर युद्ध करने लगे। यम के योद्धा मन्त्रियों को छोड़कर शूल-वर्षा से स्वयं रावण पर टूट पड़े; प्रहारों से जर्जर, रक्त-रंजित रावण पुष्पक में खिले अशोक-सा दिखने लगा। तब उसने मुसल, शिला, वृक्ष, शक्ति, तोमर और बाण अस्त्र-बल से बरसाए जो यम की धरती पर खड़ी सेना पर गिरे; पर उन्होंने सब शस्त्र छिन्न कर अस्त्र भी हर लिया और उस अकेले राक्षस पर लाखों होकर प्रहार किया, भिन्दिपाल और शूलों से उसका दम घोंटने लगे। कवच कटने और रक्त-धाराओं में नहाने पर रावण पुष्पक छोड़कर भूमि पर खड़ा हो गया। थोड़ी देर में चेत पाकर, धनुष-बाण लिए, काल-सा क्रुद्ध होकर उसने पाशुपत-अस्त्र चढ़ाया और “ठहरो, ठहरो” कहकर, जैसे शंकर ने त्रिपुर पर, वैसे ही उसे छोड़ा। धूम और ज्वालाओं से घिरा वह बाण ग्रीष्म के दावानल-सा रणभूमि में दौड़ा; यम की सेना भस्म होकर महेन्द्र की ध्वजाओं-सी गिर पड़ी। तब भीमपराक्रमी रावण ने मन्त्रियों सहित ऐसी गर्जना की मानो धरती काँप उठी हो।

समझने की कुंजी (स्थान): वैतरणी रक्तमयी नरक-नदी है, और असिपत्र-वन वह कल्पना-स्थल है जहाँ पत्ते तलवार-से चीरते हैं। वाल्मीकि का यह नरक-वर्णन परवर्ती पुराण-नरकों का आदि-रूप है; ध्यान दीजिए कि वही यमलोक पुण्यात्माओं के लिए सुख-भवनों से भी भरा है, अर्थात कर्म ही गति निश्चित करता है।

सार: यमलोक में रावण ने नरक की यातनाएँ और स्वर्ग-सुख दोनों देखे, और पापियों को बलपूर्वक मुक्त कर दिया। यम के प्रेतगोपों से घोर युद्ध हुआ; रक्त-रंजित होकर भी रावण ने पाशुपत-अस्त्र से यम की सेना भस्म कर डाली।

यम और रावण का द्वन्द्व: ब्रह्मा कालदण्ड रोकते हैं

रावण की महागर्जना सुनकर सूर्यपुत्र यम ने समझ लिया कि शत्रु जीत गया और अपनी सेना नष्ट हो गई। क्रोध से रक्तनयन होकर उन्होंने सारथि से कहा, “मेरा रथ लाया जाए।” सारथि दिव्य महारथ ले आया; महातेजस्वी यम उस पर चढ़े। हाथ में प्रास और मुद्गर लिए मृत्यु उनके आगे खड़ी हुई, जिससे ये अव्यय तीनों लोक संक्षिप्त होते हैं। यम के पार्श्व में मूर्तिमान कालदण्ड अग्नि-सा जाज्वल्यमान खड़ा था, जिसके चारों ओर बिना छिद्र के कालपाश और अग्नि-स्पर्श-सा मुद्गर मूर्त रूप में स्थित थे।

सर्वलोक-भयकारी काल को क्रुद्ध देखकर तीनों लोक क्षुब्ध हुए और देवता काँप उठे। सारथि ने इन्द्र-अश्वों-से तेज घोड़े हाँके और भयानक नाद से रथ वहाँ पहुँचा जहाँ युद्ध हो रहा था। उस विकट, मृत्यु-सहित रथ को देख रावण के मन्त्री सहसा भाग खड़े हुए; भय से संज्ञा खोकर “हम यहाँ लड़ने में समर्थ नहीं” कहते हुए दिशाओं में बिखर गए। पर ऐसा रथ देखकर भी दशग्रीव न तो क्षुब्ध हुआ, न उसके मन में भय आया।

यम ने रावण के निकट आकर शक्ति और तोमर फेंके और उसके मर्म छेद डाले; पर स्वस्थ रावण ने यम के रथ पर बाण-वर्षा की, मानो मेघ जल बरसाता हो। सैकड़ों महाशक्तियाँ छाती पर गिरने से शल्य-पीड़ित होकर वह कुछ समय हाथ न चला सका। इस प्रकार नाना शस्त्रों से सात रात तक निरन्तर युद्ध चला, और अन्ततः यम ने शत्रु को विसंज्ञ और विमुख कर दिया। दोनों योद्धा, जय के अभिलाषी और रण से न हटनेवाले, घोर युद्ध करते रहे। तब प्रजापति को आगे रखकर देव, गन्धर्व, सिद्ध और परम ऋषि उस रणक्षेत्र में आ जुटे।

क्रुद्ध यम के मुख से ज्वालाओं और धूम-सहित क्रोधाग्नि निकलने लगी। देव-दानवों के समक्ष यह अद्भुत दृश्य देखकर मृत्यु और काल हर्षित होकर युद्ध को उत्सुक हुए। तब अति-क्रुद्ध मृत्यु ने यम से कहा, “मुझे छोड़ दीजिए, जब तक मैं इस पापी राक्षस का अन्त कर दूँ। आज यह राक्षस जीवित न बचेगा; यही प्रकृति का नियम है। हिरण्यकशिपु, नमुचि, शम्बर, निसन्दि, धूमकेतु, बलि, शम्भु, वृत्र, बाण, राजर्षि, गन्धर्व, नाग, ऋषि, दैत्य, यक्ष, अप्सराएँ, यहाँ तक कि समुद्र-पर्वत-नदी-वृक्ष-सहित यह पृथ्वी, हे महाराज, युगान्त में मैंने ही नष्ट की। ये और अनेक दुर्जय वीर मेरे देखते ही नष्ट हुए, फिर यह निशाचर क्या? मुझे छोड़िए, हे धर्मज्ञ, जिसे मैं देख लूँ वह क्षणभर भी न जिए।”

यम बोले, “आप ठहरिए, इसे हम ही मारेंगे।” क्रोध से रक्तनयन यम ने वह अमोघ कालदण्ड हाथ में उठाया, जिसके दर्शनमात्र से प्राणियों के प्राण निकल जाते, फिर स्पर्श या प्रहार की तो बात ही क्या। ज्वालाओं से घिरा वह महाअस्त्र राक्षस को भस्म करने-सा स्फुरित हुआ; भयभीत राक्षस भागे, और दण्ड उठाए यम को देख देव भी क्षुब्ध हुए।

जब यम दण्ड से रावण पर प्रहार करने को हुए, तब स्वयं पितामह ब्रह्मा प्रकट होकर बोले, “हे महाबाहु वैवस्वत, हे अमित-पराक्रम सूर्यपुत्र, इस निशाचर को इस दण्ड से न मारिए। हमने इसे वर दिया है, अतः हमारा वचन मिथ्या न हो। देव हो या मनुष्य, जो हमें मिथ्यावादी सिद्ध करे, उससे तीनों लोक मिथ्या हो जाएँ। क्रोध में छोड़ा गया यह घोर अस्त्र प्रिय-अप्रिय में भेद किए बिना समस्त प्रजा का संहार कर देगा। यह कालदण्ड सब प्राणियों के लिए अमोघ है, इसे हमने पूर्वकाल में मृत्यु-सहित रचा था। यदि यह रावण के मस्तक पर पड़ा और वह न मरा, अथवा मर गया, तो दोनों ही दशाओं में हमारा वर मिथ्या होगा। अतः इसे लंकेश के मस्तक से लौटा लीजिए, और यदि लोकों का हित चाहते हैं तो हमें सत्य कीजिए।”

यह सुनकर धर्मात्मा यम बोले, “दण्ड लौटा लिया, क्योंकि आप ही हमारे स्वामी हैं। जब इसे आपके वर ने सुरक्षित कर रखा है तो हम रणभूमि में रहकर क्या करें? इस राक्षस के सामने से हम अन्तर्धान होते हैं।” यह कहकर रथ-अश्व-सहित यम वहीं अन्तर्धान हो गए। दशग्रीव ने यम को जीतकर, अपना नाम उद्घोषित कर, पुनः पुष्पक पर चढ़कर यमसदन से प्रस्थान किया। ब्रह्मा को आगे रखे देवों और महामुनि नारद के साथ यम हर्षित होकर स्वर्ग को लौट गए।

एक उप-कथा: ध्यान दीजिए, रावण यम को नहीं जीतता; जीतता वह ब्रह्मा के वरदान के बल पर है। यम का दण्ड लौटाना रावण की वीरता नहीं; ब्रह्मा की प्रतिष्ठा की रक्षा है। वाल्मीकि सूक्ष्मता से दिखाते हैं कि रावण की हर “विजय” किसी न किसी वरदान या व्यवस्था की छाया में ही है, स्वयं उसके बल से नहीं।

सार: यम स्वयं कालदण्ड लिए मृत्यु-सहित रण में उतरे, और सात दिन के युद्ध में रावण को विसंज्ञ कर दिया। जब यम वध को उद्यत हुए तो ब्रह्मा ने अपना वरदान बचाने हेतु दण्ड रुकवाया, और यम अन्तर्धान हो गए; रावण इसे अपनी विजय मानकर लौट चला।

रसातल में निवातकवचों से मैत्री और वरुण-पुत्रों पर विजय

यम को जीतकर रणश्लाघी रावण ने अपने सहयोगियों को देखा। रक्त से लथपथ, प्रहारों से जर्जर रावण को देख राक्षस विस्मित हुए। मारीच आदि मन्त्रियों ने उसकी विजय पर बधाई दी और सान्त्वना पाकर सब पुष्पक पर चढ़े। फिर रसातल पहुँचने को राक्षस ने वह समुद्र-निधि में प्रवेश किया जो दैत्यों-नागों से भरा और वरुण से सुरक्षित था। भोगवती नगरी में, जो वासुकि से पालित थी, नागों को वश में करके वह हर्षित होकर मणिमयी नगरी को गया।

वहाँ निवातकवच नाम के दैत्य रहते थे, जिन्होंने ब्रह्मा से वर पाए थे। रावण ने उन्हें युद्ध को ललकारा। वे महाबली, युद्ध में उन्मत्त दैत्य हर्षित होकर भिड़े। शूल, त्रिशूल, कुलिश, पट्टिश, असि और परशु से राक्षस और दानव एक-दूसरे को बेधने लगे। एक वर्ष से अधिक युद्ध चला, पर किसी की न जय हुई, न क्षय। तब त्रैलोक्य-गति, अव्यय देव ब्रह्मा श्रेष्ठ विमान पर शीघ्र वहाँ आए। निवातकवचों का युद्ध रोककर वृद्ध पितामह ने स्पष्ट कहा, “इस रावण को देव-असुर मिलकर भी युद्ध में नहीं जीत सकते, और न देव-दानव सहित आपको कोई समाप्त कर सकता है। अतः इस राक्षस से आपकी मैत्री हमें रुचती है; मित्रों में सब अर्थ अविभक्त रहते हैं।”

तब रावण ने अग्नि को साक्षी बनाकर निवातकवचों से मैत्री की और प्रसन्न हुआ। यथान्याय आदर पाकर वह वहाँ एक वर्ष रहा और अपने नगर-सा सुख भोगा। वहाँ उसने सौ माया-विद्याएँ सीखीं, फिर वरुण की नगरी खोजता हुआ रसातल में घूमा। फिर अश्मनगर पहुँचकर, जहाँ बलमत्त कालकेय रहते थे, उन्हें मारकर रावण ने अपने बहनोई विद्युज्जिह्व का, शूर्पणखा के पति का, तलवार से वध कर डाला, जो उसे समर में जीभ से चाटने को बढ़ा था; उसे जीतकर एक मुहूर्त में चार सौ दैत्य संहार दिए।

तब उसने श्वेत-मेघ-सा, कैलास-सा चमकता वरुण का दिव्य आलय देखा। वहाँ उसने दूध बहानेवाली सुरभि गौ को देखा, जो श्रेष्ठ गोवृषेन्द्र की माता है, जिसके दूध के प्रवाह से क्षीरोद-सागर बनता है, जिससे शीतकिरण चन्द्र उत्पन्न होते हैं, और जिस पर फेन-पान करनेवाले परम ऋषि निर्भर हैं, जहाँ देवों का अमृत और पितरों की स्वधा उत्पन्न होती है, जिसे लोक में सुरभि नाम से जानते हैं। उसकी प्रदक्षिणा करके रावण नाना सेनाओं से रक्षित वरुण के घोर क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ।

वरुण के सेनापतियों को मारकर रावण ने योद्धाओं से कहा, “अपने स्वामी को शीघ्र सूचित कीजिए: युद्धार्थी रावण द्वार पर आया है; उसे युद्ध दीजिए, अथवा हाथ जोड़कर कहिए, ‘मैं पराजित हूँ।’” इसी बीच महात्मा वरुण के पुत्र-पौत्र और उनके दो सेनापति गौ और पुष्कर क्रुद्ध होकर निकले। कामगामी, उगते सूर्य-से रथों पर सवार, गुणवान वे सेनाओं सहित रणक्षेत्र में आए। फिर वरुण-पुत्रों और बुद्धिमान रावण के बीच रोमहर्षक युद्ध हुआ। दशग्रीव के महावीर्य मन्त्रियों ने वरुण की सारी सेना क्षणभर में गिरा दी। शर-जाल से पीड़ित वरुण-पुत्र रण से लौटे, पर पुष्पक में बैठे रावण को देख पुनः शीघ्र रथों पर आकाश में चढ़ आए; तब देव-दानव-सा तुमुल आकाश-युद्ध हुआ।

उन्होंने अग्नि-से बाणों से रावण को विमुख कर हर्ष-नाद किए। तब क्रुद्ध महोदर ने राजा को धर्षित देख, मृत्यु-भय त्यागकर युद्ध खोजा; गदा से वरुण-पुत्रों के पवन-से घोड़ों को धरती पर गिरा दिया, योद्धा मारे, और रथहीन देख महानाद किया। वरुण-पुत्र वीरतावश आकाश में टिक गए, पुनः धनुष चढ़ाकर, महोदर को बेधकर, सब मिलकर रावण को घेरने लगे; क्रोध में मेघों-से उस पर अधमर्षक बाण बरसाए। तब कालाग्नि-से मूर्छित रावण ने उनके मर्मों पर घोर शर-वर्षा की; सब विमुख होकर भूमि पर गिरे, और अपने पुरुषों द्वारा शीघ्र घरों में पहुँचा दिए गए।

रावण ने कहा, “हमारी उपस्थिति वरुण को बताई जाए।” तब वरुण का मन्त्री प्रहास बोला, “महाराज वरुण तो गन्धर्वों का गान सुनने ब्रह्मलोक गए हैं। हे वीर, जब राजा बाहर हैं तो व्यर्थ क्यों श्रम करते हैं? जो वीर पुत्र उपस्थित थे, वे आपसे पराजित हो ही चुके।” यह सुनकर राक्षसराज ने अपना नाम उद्घोषित कर, हर्ष-नाद छोड़ते हुए वरुणालय से निकास किया। जिस मार्ग से आया था उसी से लौटकर लंका की ओर आकाशमार्ग से चल दिया।

समझने की कुंजी (नाम): सुरभि “कामधेनु” का यहाँ का रूप है; उसके दूध से क्षीरसागर और फिर चन्द्र की उत्पत्ति बताकर वाल्मीकि एक प्राचीन सृष्टि-परम्परा झलकाते हैं। विद्युज्जिह्व शूर्पणखा का पति है, जिसका वध रावण के हाथों होता है, यही अगले सर्ग के शोक का कारण बनता है।

सार: रसातल में रावण ने निवातकवचों से ब्रह्मा की प्रेरणा पर अग्नि-साक्षी मैत्री की और सौ मायाएँ सीखीं। कालकेयों और अपने बहनोई विद्युज्जिह्व का वध किया, फिर वरुण-पुत्रों को परास्त कर, स्वयं वरुण के अनुपस्थित होने पर लंका लौट चला।

अपहृत स्त्रियों का शाप और शूर्पणखा को सान्त्वना

हर्षित लौटते हुए दुरात्मा रावण ने मार्ग में राजाओं, ऋषियों, देवों और दानवों की कुमारियों का हरण किया। जो भी सुन्दरी कन्या या स्त्री दिखती, उसके बन्धुजनों को मारकर वह उसे विमान में बन्द कर लेता। इस प्रकार नाग, राक्षस, असुर, मानव, यक्ष और दानव-कन्याएँ उसने विमान में चढ़ाईं। शोक और भय से वे सब एक साथ आँसू बहाने लगीं, जो अग्नि-कणों-से जलते थे।

लम्बी अलकों, पूर्णचन्द्र-से मुखों, सुन्दर अंगों, स्वर्ण-सी कान्तिवाली वे सुन्दरियाँ शोक-भय से व्याकुल थीं; उनके निःश्वासों से पुष्पक मानो आहुति-अग्नि-सा प्रज्वलित दिखता था। रावण के वश में पड़ीं वे सिंह के पंजे में फँसी मृगियों-सी थीं। कोई सोचती, “क्या यह मुझे खा जाएगा?”, कोई “क्या यह मुझे मार डालेगा?”। माता, पिता, पति और भाइयों को स्मरण करके वे साथ-साथ विलाप करतीं, “मेरे बिना मेरा पुत्र कैसे रहेगा? मेरी माता, मेरा भाई शोक-सागर में डूबे; उस पति के बिना मैं क्या करूँगी? हे मृत्यु, हम आपको प्रसन्न करती हैं, हमें ले चलिए। पूर्वजन्म में हमने ऐसा कौन-सा दुष्कर्म किया था कि सब शोक-सागर में डूबीं? अब अपने दुख का अन्त नहीं दीखता।

“धिक्कार है इस मानव-लोक को; इससे विला कोई नहीं। हमारे दुर्बल पतियों को इस बलवान रावण ने वैसे ही नष्ट किया जैसे उदय होता सूर्य नक्षत्रों को। अहो, यह अति-बलवान राक्षस वध के उपायों में आनन्द लेता है। दुर्वृत्ति में रहकर भी अपने से घृणा नहीं करता; इस दुरात्मा का पराक्रम सर्वथा इसके अनुरूप ही है। पर-स्त्रियों को छूना तो इसके योग्य नहीं। चूँकि यह राक्षसाधम पर-स्त्रियों में रमता है, अतः यह दुर्मति स्त्री-निमित्त से ही वध को प्राप्त होगा।” जब सती, श्रेष्ठ नारियों ने ऐसा शाप दिया, तब आकाश में दुन्दुभि बजी, पुष्प बरसे; पतिव्रता साध्वियों के शाप से रावण मानो तेजहीन और विमन-सा हो गया। उनका विलाप सुनता हुआ, निशाचरों से पूजित रावण लंका में गहरे प्रविष्ट हुआ।

इसी बीच कामरूपिणी घोर राक्षसी, रावण की बहन, सहसा आकर भूमि पर गिर पड़ी। उसे उठाकर रावण ने सान्त्वना देते हुए कहा, “हे भद्रे, यह क्या? जो कहना है शीघ्र कहिए।” अश्रु और क्रोध से रक्तनेत्र होकर वह बोली, “हे राजन, आप बलवान होकर बलपूर्वक मुझे विधवा कर गए। चौदह हजार कालकेय दैत्य आपने पराक्रम से रण में मारे; उनमें मेरा महाबली पति, जो मुझे प्राणों से प्रिय था, भी आपने मारा, हे तात, उसी शत्रु ने जो भाई के नाते का था। आप जैसे बन्धु से ही मैं नष्ट हो गई।

“हे राजन, आपका दिया वैधव्य-शब्द मैं भोगूँगी। क्या समर में भी जामाता आपके रक्षा-योग्य नहीं था? उसे आपने स्वयं मारा, और लज्जित भी नहीं होते।” रोती-कूकती बहन को सान्त्वना देते हुए रावण ने साम-पूर्वक कहा, “बस कीजिए, वत्से, मत रोइए; आपको किसी से भयभीत नहीं होना। दान, मान और प्रसाद से मैं आपको यत्नपूर्वक सन्तुष्ट करूँगा। युद्ध में उन्मत्त, जय का अभिलाषी मैं अपने-पराए का भेद न कर सका; युद्धदुर्मद होकर जामाता को न पहचान सका, इसी से आपका पति मारा गया। पर इस समय जो हित होगा, वह करूँगा।

“भाई के ऐश्वर्य से युक्त खर के पास रहिए। आपका यह भाई चौदह हजार राक्षसों को भेजने और भरण करने में समर्थ होगा; आपकी मौसी का पुत्र खर सदा आपकी आज्ञा मानेगा। यह वीर शीघ्र दण्डकवन की रक्षा को जाए। महाबली दूषण उसका सेनापति होगा; वहाँ रहकर खर सदा आपकी बात मानेगा। वह कामरूपी राक्षसों का स्वामी होगा।” यह कहकर दशग्रीव ने चौदह हजार वीर राक्षस खर की सेना बनने का आदेश दिया। उन घोरदर्शन राक्षसों से घिरा निर्भय खर शीघ्र दण्डकवन पहुँचा और वहाँ निष्कण्टक राज्य किया। शूर्पणखा भी उसी दण्डकवन में रहने लगी।

समझने की कुंजी (अवधारणा): अपहृत सती स्त्रियों का शाप “स्त्री-निमित्त से वध” स्वयं सीता-हरण और रावण-वध की पूर्वसूचना है। साथ ही खर-दूषण का दण्डकवन में स्थापित होना अरण्यकाण्ड की भूमिका रचता है, अर्थात उत्तरकाण्ड की ये कथाएँ रामकथा की जड़ें खोलती हैं।

सार: लौटते रावण ने अनेक कन्याएँ हर लीं; अपहृत सती स्त्रियों ने शाप दिया कि वह स्त्री-निमित्त से ही मारा जाएगा। अपने हाथों विधवा हुई बहन शूर्पणखा को सान्त्वना देकर रावण ने खर को चौदह हजार राक्षसों सहित दण्डकवन भेजा।

मेघनाद की सिद्धि, विभीषण की चेतावनी, और मधु से सन्धि

खर को सेना सौंपकर और बहन को सान्त्वना देकर रावण स्वस्थ और हर्षित हुआ। फिर लंका के उत्तम उपवन निकुम्भिला में अनुचरों सहित प्रविष्ट हुआ। वहाँ सैकड़ों यूपों से युक्त, सौम्य चैत्य से शोभित, श्री से प्रज्वलित-सा यज्ञ-स्थल देखा; और कृष्णमृगचर्म धारण किए, शिखा-ध्वज और कमण्डलु लिए, भयानक रूपवाले अपने पुत्र मेघनाद को देखा। आलिंगन कर रावण ने पूछा, “वत्स, यह क्या कर रहे हैं? सच कहिए।”

तब यज्ञ की सिद्धि बनाए रखने को (कहीं मौन-व्रत भंग न हो) द्विजश्रेष्ठ महातपस्वी उशना (शुक्राचार्य) बोले, “हे राजन, सब बताते हैं। आपके पुत्र ने सात विस्तृत यज्ञ किए हैं: अग्निष्टोम, अश्वमेध, बहुसुवर्णक, राजसूय, गोमेध और वैष्णव। मनुष्यों के लिए दुर्लभ माहेश्वर-यज्ञ आरम्भ होने पर आपके पुत्र ने यहीं साक्षात पशुपति शिव से वर पाए: कामग दिव्य रथ जो आकाश में चलता है, और तामसी नाम की माया जिससे शत्रु-दल में अन्धकार छा जाता और जिसका मार्ग देव-असुर भी नहीं जान पाते। साथ ही अक्षय बाणों के दो तरकश, दुर्जय धनुष, और शत्रुओं का विध्वंस करनेवाला बलवान अस्त्र। ये सब वर पाकर आपका पुत्र यज्ञ-समाप्ति पर आपके दर्शन को उत्सुक है, और मैं भी।”

तब दशग्रीव बोला, “यह अच्छा नहीं हुआ; इन्द्र-प्रमुख मेरे शत्रु ही द्रव्यों से पूजे गए। पर जो हुआ, वह भला ही हुआ; अब आइए, सौम्य, अपने भवन को लौटें।” फिर पुत्र और विभीषण सहित रावण ने अश्रुगद्गद उन सब स्त्रियों को पुष्पक से उतारा जो देव-दानव-राक्षस-स्त्रियों में रत्न-सी थीं। रावण का उन पर अभिप्राय जानकर धर्मात्मा विभीषण बोला, “ऐसे आचरणों से, जो यश और कुल का नाश करते हैं, आप जानबूझकर प्राणियों के प्रति अपराध करते हैं। पर हे राजन, मधु राक्षस आपको लाँघकर हमारी बहन कुम्भीनसी को हर ले गया।”

रावण ने पूछा, “यह कैसे? यह मधु कौन है?” विभीषण ने कहा, “हमारे मातामह सुमाली के ज्येष्ठ भ्राता माल्यवान, हमारी माता कैकसी के बड़े मामा, वृद्ध-प्रज्ञ निशाचर हैं। उनकी पुत्री की पुत्री कुम्भीनसी, हमारी मौसी अनला की कन्या, धर्मतः हम भाइयों की बहन है। जब आपका पुत्र यज्ञ में लगा था, मैं जल में तप करता था, और कुम्भकर्ण निद्रा भोग रहा था, तब बलवान मधु राक्षस हमारे सम्मानित मन्त्रियों को मारकर उसे हर ले गया। आपके अन्तःपुर में सुरक्षित होने पर भी उसे धर्षित करके हर लिया गया। सुनकर भी हमने सहन कर लिया, उसे मारा नहीं, क्योंकि कन्या तो भाइयों द्वारा पति को दी ही जानी थी। यही आपके पाप-कर्म और दुर्मति का फल इसी जन्म में प्राप्त हुआ है।”

विभीषण का वचन सुनकर रावण क्रोध से रक्तनेत्र, तप्त-जल-से क्षुब्ध समुद्र-सा होकर बोला, “मेरा रथ शीघ्र सजाया जाए; हमारे शूर तैयार हों; मेरा भाई कुम्भकर्ण और मुख्य निशाचर वाहनों पर चढ़ें। आज समर में मधु को, जो रावण से भी निर्भय है, मारकर मित्रों सहित युद्ध की इच्छा से सुरलोक जाऊँगा।” चार हजार अग्रगण्य अक्षौहिणी राक्षस निकल पड़े; इन्द्रजित सेना के आगे, रावण मध्य में, कुम्भकर्ण पीछे चला; धर्मात्मा विभीषण लंका में रहकर धर्माचरण करता रहा। शेष महाभाग खर, ऊँट, घोड़े, शिशुमार और महानागों पर सवार होकर मधुपुर की ओर चले, और देव-वैरी दैत्य सैकड़ों होकर पीछे लगे।

मधुपुर पहुँचकर रावण ने बहन को तो देखा, पर मधु को नहीं पाया। भयभीत कुम्भीनसी हाथ जोड़े, सिर से चरण छूकर गिर पड़ी। “मत डरिए” कहकर रावण ने उसे उठाया, “आपके लिए क्या करूँ?” वह बोली, “हे महाभुज, यदि प्रसन्न हैं तो आज मेरे पति को न मारिए, हे मानद। कुलस्त्रियों के लिए पति की मृत्यु-सा भय कुछ नहीं। सब भयों में वैधव्य महान दुख है। सत्यवादी होइए, राजेन्द्र; मुझ याचना करती पर दृष्टि कीजिए।”

हर्षित रावण बोला, “आपने स्वयं ‘मत डरिए’ सुना है। प्रिय और सेवा करनेवाले के अर्थ की योजना उचित ही है। बताइए, आपका पति कहाँ है? उसके साथ विजय हेतु सुरलोक जाऊँगा।” तब सोते निशाचर को जगाकर हर्षित कुम्भीनसी ने कहा, “यह मेरा महाबली भाई दशग्रीव आया है; सुरलोक जीतने को आपका साथ चाहता है। अतः बन्धुओं सहित सहायता को चलिए।” मधु ने “तथास्तु” कहा, उठकर यथान्याय रावण की पूजा की। आदर पाकर एक रात ठहरकर रावण प्रस्थान को तैयार हुआ। फिर विश्रवा-पुत्र कुबेर के आलय कैलास पहुँचकर महेन्द्र-सा रावण ने वहाँ सेना का पड़ाव डाला।

एक उप-कथा: मेघनाद को जो “इन्द्रजित” नाम आगे मिलेगा, उसका मूल इसी निकुम्भिला-यज्ञ में है; और निकुम्भिला-यज्ञ ही वह स्थान है जहाँ युद्धकाण्ड में लक्ष्मण उसका वध करते हैं। माहेश्वर-यज्ञ से पाया कामग रथ ही उसका वह कवच है जिसके भीतर वह अवध्य रहता है। यहाँ वाल्मीकि उसकी अमरता की शर्त की नींव रखते हैं।

सार: मेघनाद ने सात यज्ञों और माहेश्वर-यज्ञ से शिव के दिव्य रथ, तामसी माया और अस्त्र पाए। विभीषण ने पर-स्त्री-हरण के दुष्परिणाम बताए और बहन कुम्भीनसी के मधु द्वारा हरण की बात कही; रावण ने कुम्भीनसी की प्रार्थना पर मधु को बख्शा, उसे मित्र बनाकर कैलास पहुँचा।

रम्भा पर बलात्कार और नलकूबर का घातक शाप

सूर्यास्त होने पर महाबली दशग्रीव ने सेना सहित वहीं निवास चुना। निर्मल विशाल चन्द्र उगने पर नाना अस्त्रोंवाली सेना सो गई। शैल-शिखर पर बैठे महावीर्य रावण ने चन्द्र और वृक्षों से उद्भासित पर्वत के सौन्दर्य को निहारा। कर्णिकार, कदम्ब, वकुल, चम्पक, अशोक, पुन्नाग, मन्दार, आम, पाटल, लोध्र, प्रियंगु, अर्जुन, केतक, तगर, नारिकेल, प्रियाल, पनस आदि वृक्षों से वन-प्रदेश दीप्त था; कामार्त, मधुर-कण्ठ किन्नर मन-तुष्टि बढ़ानेवाले गीत गा रहे थे। मदोन्मत्त विद्याधर अपनी संगिनियों सहित क्रीड़ा कर रहे थे; कुबेर के भवन में अप्सरा-समूहों का गान घण्टा-नाद-सा सुनाई देता था। मधु-माधव की गन्धवाले वृक्ष पुष्प बरसाकर पर्वत को सुगन्धित कर रहे थे, और रावण के काम को बढ़ानेवाली सुखद वायु बही।

संगीत, पुष्प-समृद्धि, वायु की शीतलता, पर्वत के सौन्दर्य और चन्द्रोदय से रात आरम्भ होते ही महावीर्य रावण काम के वश में आ गया; बार-बार निःश्वास भरता चन्द्र को देखता रहा। इसी बीच वहाँ दिव्याभरण-भूषिता रम्भा प्रकट हुई, सब अप्सराओं में श्रेष्ठ, पूर्णचन्द्र-से मुखवाली, दिव्य चन्दन-लिप्त, मन्दार-पुष्पों से सजी अलकोंवाली, दिव्य उत्सव की ओर जाती हुई, मन-मोहक नेत्रों और पीन जघन पर मेखला धारण किए, छह ऋतुओं के पुष्पों के आर्द्र आभूषणों और कान्ति से दूसरी श्री-सी शोभायमान, नील-मेघ-से वस्त्र में लिपटी। उसे सेना के बीच से जाती देख रावण ने उठकर, हाथ पकड़कर, लज्जित होती उस पर मुस्कराते हुए कहा, “हे वरारोहे, कहाँ जा रही हैं? किसका काम सिद्ध करने स्वयं चली हैं? किसका सौभाग्य-काल है जो आपको भोगेगा? आपके अधर-रस का, सुधा-अमृत-से, आज कौन तृप्ति पाएगा? स्वर्ण-कलश-से आपके स्तन किसके वक्ष को स्पर्श देंगे, हे भीरु? आपके स्वर्ण-चक्र-से जघन को कौन भोगेगा? मुझसे श्रेष्ठ पुरुष आज कौन है, चाहे इन्द्र हो, विष्णु हो या अश्विनीकुमार? आपका मुझे लाँघकर जाना उचित नहीं।”

“विश्राम कीजिए इस सुन्दर शिला पर, हे पृथुश्रोणि; तीनों लोकों का स्वामी मुझसे अन्य कोई नहीं। तीनों लोकों के स्वामियों का स्वामी और धाता, यह दशानन हाथ जोड़े नम्र होकर आपसे याचना करता है; अतः मुझे स्वीकार कीजिए।” काँपती हुई रम्भा ने हाथ जोड़कर कहा, “प्रसन्न होइए; आप ऐसा कहने के योग्य नहीं, क्योंकि आप मेरे गुरु हैं। धर्मतः मैं आपकी पुत्रवधू हूँ; यह सत्य कहती हूँ। अतः मैं आपके द्वारा अन्यों से भी रक्षणीय हूँ, यदि मुझ पर कोई बलात्कार करे।” रावण ने पूछा, “यदि आप मेरे पुत्र की भार्या हैं तभी तो पुत्रवधू हैं।” रम्भा ने उत्तर दिया, “हाँ, हे राक्षसपुंगव, धर्मतः मैं आपके पुत्र की भार्या हूँ; वह आपके भाई वैश्रवण का पुत्र, प्राणों से प्रिय, तीनों लोकों में नलकूबर नाम से विख्यात है, जो धर्मतः ब्राह्मण और पराक्रम से क्षत्रिय, क्रोध में अग्नि और क्षमा में पृथ्वी-समान है। उसी लोकपाल-पुत्र से मेरा संकेत हुआ है। यह सब शृंगार उसी के लिए किया है; जैसे उसका मन मुझ पर अन्य किसी पर नहीं, वैसे ही मेरा भी मन उसी पर है। उस सत्य के आधार पर, हे राजन, मुझे छोड़ दीजिए। वह धर्मात्मा मेरी प्रतीक्षा में उत्सुक खड़ा है। उसके इस प्रयोजन में विघ्न मत डालिए; मुझे छोड़िए। सत्पुरुषों के मार्ग पर चलिए, हे राक्षसपुंगव। आप मेरे माननीय हैं, और मैं आपकी पालनीय।”

यह सुनकर दशग्रीव विनयी-सा होकर बोला, “आपने जो कहा कि ‘मैं पुत्रवधू हूँ’, वह क्रम तो उन पर लागू है जिनके एक ही पति हो। अप्सराओं का कोई पति नहीं, न देव एक स्त्री से बँधे हैं; देवलोक की यही शाश्वत स्थिति मानी गई है।” यह कहकर, शिला पर लिटाकर, काम-भोग में आसक्त राक्षस ने उसके साथ बलात्कार किया। आलिंगन में उसके पुष्प-आभूषण गिर गए; रम्भा गजेन्द्र की क्रीड़ा से क्षुब्ध नदी-सी व्याकुल हो गई, फिर छोड़ दी गई। बिखरी अलकों, काँपते कर-पल्लवोंवाली वह वायु से झकोरी पुष्प-लता-सी थी। काँपती, लज्जित, भयभीत, हाथ जोड़े वह नलकूबर के चरणों में गिर पड़ी।

उस दशा में देख महात्मा नलकूबर ने पूछा, “हे भद्रे, यह क्या? मेरे चरणों में क्यों गिरीं?” निःश्वास भरती, काँपती, हाथ जोड़े उसने ज्यों-का-त्यों सब कहा, “हे देव, दशग्रीव त्रिविष्टप जाते हुए सेना सहित यहाँ रात बिताकर रुका था। आपके पास आते मुझे उसने देखा, पकड़कर पूछा कि मैं किसकी हूँ; मैंने सब सत्य बता दिया। पर काम-मोह से अभिभूत उसने मेरी बात न सुनी; ‘मैं आपकी पुत्रवधू हूँ’ कहती मुझ पर उसने बलात्कार किया। हे सुव्रत, इस अपराध को क्षमा कीजिए; स्त्री और पुरुष का बल समान नहीं होता।”

यह सुनकर वैश्रवण-पुत्र क्रुद्ध हुए, ध्यानमग्न होकर सत्य की जाँच की, और रावण का कर्म जानकर क्रोध से ताम्रनेत्र होकर बाएँ हाथ में जल लिया; यथाविधि आचमन कर रावण को घोर शाप दिया: “हे भद्रे, चूँकि उसने आपको अनिच्छा से बलपूर्वक धर्षित किया, अतः वह किसी अनिच्छुक युवती के पास बलात मैथुन के लिए न जा सकेगा। यदि कामार्त होकर किसी अनिच्छुक स्त्री पर बल करेगा, तो उसी क्षण उसका मस्तक सात टुकड़ों में फट जाएगा।” यह शाप उच्चारित होते ही देवों की दुन्दुभि बजी, आकाश से पुष्प बरसे, और ब्रह्मा-प्रमुख सब देव हर्षित हुए। लोक की गति और राक्षस की मृत्यु जानकर ऋषि और पितर परम प्रसन्न हुए। यह रोमहर्षक शाप सुनकर रावण ने अनिच्छुक नारियों के प्रति मैथुन-भाव त्याग दिया, और उसकी हरी हुई सब पतिव्रता स्त्रियाँ मन-भावन शाप सुनकर प्रसन्न हुईं।

समझने की कुंजी (अवधारणा): नलकूबर का यह शाप रामकथा का एक मूक रक्षक है: इसी कारण रावण अशोकवाटिका में सीता पर बल नहीं कर पाता। वाल्मीकि के लिए यह घटना केवल अपराध की कथा नहीं; वह कारण है जिससे सीता की पवित्रता अक्षत रहती है। यहाँ कथा कल्पित अन्तरंगता में नहीं; शाप के परिणाम में है।

सार: कैलास पर रावण ने अप्सरा रम्भा पर, जो उसके पुत्र नलकूबर की वाग्दत्ता थी, बलात्कार किया। नलकूबर ने शाप दिया कि किसी अनिच्छुक स्त्री पर बल करते ही रावण का मस्तक सात टुकड़ों में फट जाएगा, जो आगे सीता की रक्षा का अदृश्य कवच बना।

इन्द्रलोक पर आक्रमण और सुमाली का वध

कैलास लाँघकर सेना-बल-वाहन सहित महातेजस्वी दशानन इन्द्रलोक पहुँचा। चारों ओर से बढ़ती राक्षस-सेना का शब्द देवलोक में मथे जाते समुद्र-सा गूँजा। रावण को आया सुन इन्द्र आसन से चलित हो उठे और एकत्र देवों, आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, साध्यों और मरुद्गणों से बोले, “दुरात्मा रावण से युद्ध के लिए तैयार हो जाइए।” इन्द्र-समान देव कवच धारण कर युद्ध-श्रद्धा से भर उठे। पर भयभीत, दीन इन्द्र विष्णु के पास जाकर बोले, “हे विष्णु, इस राक्षस से कैसे निपटूँ? यह अति-बलवान राक्षस युद्ध हेतु द्वार पर है। वरदान से ही यह बलवान हुआ है, अन्य किसी कारण से नहीं; ब्रह्मा का वचन तो सत्य करना ही है। हे देवदेव मधुसूदन, चराचर तीनों लोकों में आपके सिवा अन्य कोई गति-परायण नहीं। आप ही सनातन श्रीमान नारायण, पद्मनाभ हैं; आपने ही ये लोक और मुझ इन्द्र को स्थापित किया। युगान्त में सब आप में ही प्रवेश करते हैं। अतः स्वयं बताइए कि विजय कैसे हो, अथवा क्या आप असि-चक्र लेकर रावण से युद्ध करेंगे?”

नारायण बोले, “भयभीत न होइए; मेरी बात सुनिए। यह दुष्टात्मा देव-असुरों से अजेय है, और वरदान से दुर्जय होने के कारण इसे सम्मुख पाकर मारना भी नहीं हो सकता। पुत्र सहित यह बलोन्मत्त राक्षस सर्वथा महान कर्म करेगा, यह मैंने स्वभावतः देख लिया है। आपने जो ‘युद्ध कीजिए’ कहा, सो मैं इस रावण से अभी युद्ध न करूँगा; पर विष्णु शत्रु को मारे बिना नहीं लौटते, और वरदान-रक्षित रावण पर आज विजय दुर्लभ है। हे देवेन्द्र, आपके समक्ष प्रतिज्ञा करता हूँ कि समय आने पर मैं ही इस राक्षस की मृत्यु का कारण बनूँगा; पुरःसरों सहित रावण को मैं ही मारूँगा, और काल आया जान देवताओं को प्रसन्न करूँगा। हे शचीपते देवराज, यही तत्त्व बताया; निर्भय होकर देवों सहित युद्ध कीजिए।”

तब रुद्र, आदित्य, वसु, मरुत और अश्विनीकुमार कवच धारण कर राक्षसों की ओर नगर से निकल पड़े। रात के अन्त में रावण की राक्षस-सेना का नाद चारों ओर सुनाई दिया, जिसकी युद्ध-शैली देवों से श्रेष्ठ थी। जाग्रत होकर महावीर्य राक्षस हर्ष से संग्राम की ओर बढ़े। देव-सेना में संक्षोभ हुआ; उस अक्षय महासेना को रणाग्र में देख देवों में महान भय फैला। फिर देव और दानव-राक्षसों के बीच घोर, तुमुल, नाना अस्त्रोंवाला युद्ध छिड़ा।

इसी बीच रावण के घोरदर्शन शूर मन्त्री युद्ध को आ जुटे: मारीच, प्रहस्त, महापार्श्व, महोदर, अकम्पन, निकुम्भ, शुक, सारण, संह्राद, धूमकेतु, महादंष्ट्र, घटोदर, जम्बुमाली, महाह्राद, विरूपाक्ष, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, दुर्मुख, दूषण, खर, त्रिशिरा, करवीराक्ष, सूर्यशत्रु, महाकाय, अतिकाय, देवान्तक और नरान्तक। इन महावीर्य राक्षसों से घिरा महाबली सुमाली, रावण का मातामह, रण में प्रविष्ट हुआ। क्रुद्ध होकर उसने पैने अस्त्रों से देवगणों को वैसे बिखेर दिया जैसे वायु मेघों को। निशाचरों से पिटती देव-सेना सिंह से भगाए मृगों-सी सब दिशाओं में भागी।

इसी बीच वसुओं में आठवाँ, सावित्र नाम से विख्यात शूर वसु, हर्षित सेना से घिरा, शत्रु-दल में त्रास भरता रणाग्र में आया। दो महावीर्य आदित्य, त्वष्टा और पूषा भी सेना सहित निर्भय रण में उतरे। फिर समर से न हटनेवाले क्रुद्ध राक्षसों और देवों का युद्ध हुआ। राक्षस लाखों होकर देवों को घोर अस्त्रों से मारने लगे, और देव निर्मल शस्त्रों से घोर राक्षसों को यमसदन भेजने लगे। क्रुद्ध सुमाली ने नाना अस्त्रों से देव-सेना पर धावा बोला और आँधी-सा सबको बिखेर डाला। महाबाण-वर्षा, शूल और प्रास से पीड़ित देव संगठित न रह सके।

देवों को भगाते सुमाली के सम्मुख आठवाँ वसु सावित्र दृढ़ खड़ा रहा। अपनी सेना से घिरे, महातेज वसु ने पराक्रम से उस प्रहार करते निशाचर को रोका। फिर सुमाली और वसु में रोमहर्षक महायुद्ध हुआ। वसु के महाबाणों से सुमाली का सर्प-रथ क्षणभर में नष्ट होकर गिरा। सौ बाणों से जड़ा रथ नष्ट कर वसु ने राक्षस-वध हेतु हाथ में गदा ली। काल-दण्ड-सी दीप्ताग्र गदा से सावित्र ने सुमाली के मस्तक पर प्रहार किया। उल्का-सी गिरती वह गदा, इन्द्र के पर्वत पर पटके महावज्र-सी गरजी; भस्म हुए सुमाली की न हड्डी, न सिर, न मांस रणभूमि में दीखा। उसे मारा गया देख सब राक्षस एक-दूसरे को पुकारते सब दिशाओं में भागे, और वसु से भगाए वे टिक न सके।

समझने की कुंजी (नाम): इस युद्ध-सूची में मारीच, प्रहस्त, खर, दूषण, त्रिशिरा, देवान्तक, नरान्तक, अतिकाय जैसे नाम आगे युद्धकाण्ड के प्रमुख योद्धा बनेंगे। सुमाली रावण का मातामह है; उसका वध दिखाता है कि देव-पक्ष में भी ऐसे योद्धा हैं जो वरदान-रहित राक्षसों को क्षणभर में भस्म कर सकते हैं।

सार: रावण ने इन्द्रलोक पर चढ़ाई की; भयभीत इन्द्र को विष्णु ने आश्वासन और रावण-वध की प्रतिज्ञा दी। घोर युद्ध में रावण के मातामह सुमाली को आठवें वसु सावित्र ने गदा से भस्म कर डाला, जिससे राक्षस-सेना भाग खड़ी हुई।

मेघनाद और जयन्त का द्वन्द्व; इन्द्र-रावण का युद्ध

सुमाली को वसु द्वारा भस्म हुआ और अपनी सेना को देवों से पिटकर भागती देख, क्रुद्ध रावण-पुत्र मेघनाद ने सब राक्षसों को लौटाकर रणभूमि में दृढ़ स्थिति ली। अग्नि-वर्ण कामग रथ पर सवार वह महारथ देव-सेना पर वैसे टूटा जैसे प्रज्वलित अग्नि वनों पर। उसके दर्शनमात्र से देव सब दिशाओं में भागे; उसके सम्मुख कोई न ठहर सका। तब इन्द्र ने भयभीत देवों को धिक्कारकर कहा, “मत डरिए, मत भागिए; लौटिए, हे देवो। यह मेरा अपराजित पुत्र युद्ध को जा रहा है।” तभी जयन्त नाम से विख्यात शचीपुत्र अद्भुत रथ पर संग्राम में आया।

देवों ने शचीपुत्र को घेरकर रावण-पुत्र पर प्रहार किया। देव-राक्षसों, और इन्द्र-पुत्र तथा रावण-पुत्र का समान युद्ध हुआ। रावणि ने इन्द्र-सारथि मातलि के पुत्र गोमुख पर स्वर्ण-भूषित बाण बरसाए; जयन्त ने मेघनाद के सारथि को बेधा, और क्रुद्ध रावणि ने जयन्त को चारों ओर से बेध डाला। क्रोध से भरा, विस्फारित-नेत्र वह बली रावणि शचीपुत्र को शर-वर्षा से ढक गया, और हजारों पैने अस्त्र देव-सेनाओं पर बरसाए; शतघ्नी, मुसल, प्रास, गदा, खड्ग, परशु और महान गिरि-शिखर भी फेंके। शत्रु-सेना का संहार करते रावण-पुत्र की माया से चारों ओर अन्धकार छा गया, और लोक संत्रस्त हुए।

शर-पीड़ित देव-सेना अनेक प्रकार से असुखी हुई। मेघनाद और देवों का घोर अन्धकार-युद्ध छिड़ा; न कोई किसी को पहचाने, राक्षस-देव सब भ्रान्त होकर इधर-उधर दौड़ने लगे, देव देवों को और राक्षस राक्षसों को मारते रहे। इसी बीच पुलोमा नाम का वीर्यवान दैत्येन्द्र, जो जयन्त की माता शची का पिता और जयन्त का मातामह था, अपने दौहित्र को पकड़कर समुद्र में चला गया। जयन्त का अन्तर्धान जान देव विमन होकर भागे। तब क्रुद्ध रावणि ने महानाद करते हुए उन पर धावा बोला।

पुत्र का अन्तर्धान और देवों का भागना देख देवेश इन्द्र ने मातलि से कहा, “मेरा रथ निकट लाया जाए।” मातलि से चालित दिव्य, महाभीम, महाजव रथ निकट आ खड़ा हुआ; उसके आगे वायु-चपल मेघ बिजली से गरजे। गन्धर्वों ने नाना वाद्य बजाए, अप्सराएँ नाचीं। रुद्रों, वसुओं, आदित्यों, मरुद्गणों और अश्विनीकुमारों से घिरा देवेन्द्र निकल पड़ा। निकलते ही परुष वायु बही, सूर्य निष्प्रभ हुआ और महान उल्काएँ गिरीं।

इसी बीच विश्वकर्मा-निर्मित दिव्य रथ पर, जिसे महानागों ने वेष्टित कर रखा था और जिसके निःश्वास-वायु से वह रण में प्रज्वलित-सा दिखता था, शूर प्रतापी दशग्रीव चढ़ा। दैत्यों-निशाचरों से घिरा वह दिव्य रथ रणाभिमुख होकर महेन्द्र के सम्मुख आ खड़ा हुआ। रावण ने पुत्र को रोककर स्वयं युद्ध में दृढ़ स्थिति ली, और रावणि रण से निकलकर रथ में शान्त बैठ गया। फिर मरुद्गणों के साथ देवों और राक्षस-सेना का युद्ध मेघों-सी अस्त्र-वर्षा के बीच फिर छिड़ा। दुष्टात्मा कुम्भकर्ण नाना अस्त्र उठाए, यह न जानता हुआ कि किससे लड़ रहा है, जिस-तिस को दाँत, पैर, भुजा, हाथ, शक्ति, तोमर और मुद्गर से मारने लगा। शस्त्रों से छिदा, रक्त बहाता कुम्भकर्ण विद्युत-गर्जन-सहित जल बरसाते मेघ-सा शोभित हुआ।

रुद्रों के समीप आकर निशाचर शस्त्रों से सर्वांग बेधा गया। मरुद्गण-सहित देवों ने राक्षस-सेना को रण में बिखेर दिया; कुछ मारे गए, कुछ कटकर लोटे, कुछ अपने वाहनों से चिपके रहे। रावण ने अपनी सारी सेना देवों से नष्ट देखी; तब क्रुद्ध होकर इन्द्र पर धावा बोला, सेना-सागर में घुसकर देवों को मारते हुए इन्द्र तक पहुँचा। इन्द्र ने महाधनुष टंकारा जिसकी प्रत्यंचा-निर्घोष से दसों दिशाएँ गूँजीं, और रावण के मस्तक पर अग्नि-सूर्य-से तेज बाण बरसाए; महाबाहु दशग्रीव ने भी इन्द्र को धनुष-बाणों से ढक दिया। दोनों के घोर युद्ध में चारों ओर बाण-वर्षा से अन्धकार छा गया और कुछ न दीखा।

एक उप-कथा: मेघनाद की “तामसी माया” का यहाँ पहला प्रयोग दिखता है, वही अन्धकार-अस्त्र जो आगे युद्धकाण्ड में लक्ष्मण को मूर्छित करेगा। ध्यान दीजिए कि जयन्त को उसका मातामह पुलोमा बचा ले जाता है; वाल्मीकि बार-बार दिखाते हैं कि देव-पक्ष में भी अपनों की रक्षा पारिवारिक बल से होती है।

सार: मेघनाद ने तामसी माया से अन्धकार रचकर देव-सेना को त्रस्त किया; जयन्त को उसका मातामह पुलोमा समुद्र में ले गया। इन्द्र स्वयं रथ पर रण में उतरे, और रावण-इन्द्र का घोर बाण-युद्ध छिड़ा, जिसमें चारों ओर अन्धकार छा गया।

मेघनाद द्वारा इन्द्र का बन्दीकरण और लंका-विजय

अन्धकार छाने पर सब देव-राक्षस बलोन्मत्त होकर एक-दूसरे को मारते लड़ते रहे। राक्षसों की विशाल सेना का केवल दसवाँ भाग ही रण में बचा रहा, शेष देवों ने यमसदन भेज दिया। उस तामस-युद्ध में कोई किसी को न पहचाने; केवल इन्द्र, रावण और महाबली मेघनाद, ये तीन ही मोह में न पड़े। अपनी सारी सेना क्षणभर में नष्ट देख रावण तीव्र क्रोध से भरकर महानाद कर उठा और दुर्धर्ष रावण ने रथ पर खड़े सारथि से कहा, “क्रोध में मुझे शत्रु-सेना के बीच से उस छोर तक ले चलिए जहाँ दूसरा सिरा है। आज मैं स्वयं इन सब देवों को नाना अस्त्रों की महावर्षा से यमसदन भेजूँगा। इन्द्र, कुबेर, वरुण और यम को मारकर, देवों का संहार कर, स्वयं ऊपर अधिष्ठित हो जाऊँगा। विषाद मत कीजिए; शीघ्र रथ हाँकिए। दो बार कहता हूँ, मुझे सेना के उस छोर तक ले चलिए। जहाँ हम खड़े हैं वह इन्द्र का नन्दनवन का प्रदेश है; मुझे आज वहाँ ले चलिए जहाँ उदयपर्वत है।”

रावण का आदेश सुन सारथि ने मनोवेगवान घोड़े शत्रु-सेना के मध्य से दौड़ाए। रावण का यह निश्चय जान देवेश इन्द्र ने रण में स्थित देवों से कहा, “हे देवो, मेरी बात सुनिए; मुझे यही रुचता है कि इस दशग्रीव को जीवित ही बन्दी कर लिया जाए। यह अति-बलवान वायु-वेग रथ से पूर्णिमा के समुद्र-सी उमड़ती सेना को चीर देगा। वरदान से यह आज अत्यन्त निर्भय है, अतः इसे मारा नहीं जा सकता; इसी से हम राक्षस को बन्दी करेंगे, इसके लिए सावधान रहिए। जैसे बलि को बाँधने से तीनों लोक मैं भोगता हूँ, वैसे ही इस पापी का बन्धन मुझे रुचता है।”

दशग्रीव ने उत्तर दिशा से और इन्द्र ने दक्षिण दिशा से राक्षस-सेना में प्रवेश किया। सौ योजन भीतर घुसकर राक्षसराज ने देव-सेना को शर-वर्षा से ढक दिया। अपनी सेना नष्ट देख अविचलित इन्द्र ने रावण को घेरकर लौटने पर विवश कर दिया। इन्द्र से ग्रस्त रावण को देख दानव-राक्षसों ने “हाय, हम मारे गए” का नाद किया। तब क्रोध-मूर्छित मेघनाद रथ पर चढ़कर घोर देव-सेना में गहरे घुस गया; पूर्वकाल में पशुपति शिव से पाई महामाया ओढ़कर, क्रुद्ध होकर देव-सेना को बिखेर डाला।

सब देवों को छोड़कर वह इन्द्र पर ही टूटा, पर महातेज इन्द्र शत्रु-पुत्र को देख न सके। कवच गिर जाने और महावीर्य देवों से पिटने पर भी रावणि ने तनिक भय न किया। आते मातलि को श्रेष्ठ बाणों से ताड़कर उसने महेन्द्र पर बाण-वर्षा की। माया-बल से अदृश्य, अन्तरिक्षगामी मेघनाद ने इन्द्र को माया से घेरकर बाण बरसाए। इन्द्र रथ और सारथि छोड़कर ऐरावत पर चढ़े और रावणि को खोजने लगे। फिर जब रावणि ने इन्द्र को थका हुआ जाना, तब माया से बाँधकर अपनी सेना के पास ले गया। महायुद्ध से बलपूर्वक ले जाते देख सब देव “अब क्या होगा?” सोचते रहे; कहने लगे, “जिस मायावी समितिंजय इन्द्रजित ने विद्यावान इन्द्र को भी माया से बलात हर लिया, वह दिखता ही नहीं।”

इसी बीच क्रुद्ध देवगणों ने रावण को विमुख कर शर-वर्षा से ढक दिया; आदित्यों और वसुओं से घिरा रावण, शत्रुओं से पीड़ित, युद्ध न कर सका। पिता को प्रहारों से जर्जर देख अदृश्य खड़ा रावणि बोला, “आइए तात, चलें; युद्ध समाप्त हो। हमारी विजय आप जान लें; स्वस्थ और निश्चिन्त हो जाइए।” पुत्र के प्रिय वचन का आदर कर रावण रण से निवृत्त हुआ और पुत्र से बोला, “हे प्रभावशाली पुत्र, आप मेरे कुलवंश के वर्धक हैं, क्योंकि आज अपने अतुल बल के योग्य पराक्रम से आपने अतुलबल इन्द्र और देवों को जीत लिया। इन्द्र को रथ में बैठाकर सेना से घिरे आप लंका चलिए; मैं भी मन्त्रियों सहित हर्षित होकर पीछे आता हूँ।” महाबली रावणि इन्द्र को लेकर, सेना-वाहन सहित अपने भवन पहुँचकर, युद्ध करनेवाले राक्षसों को विदा कर गया।

समझने की कुंजी (अवधारणा): इन्द्र को बन्दी करने से ही मेघनाद को “इन्द्रजित” नाम मिलेगा (अगला सर्ग)। ध्यान दीजिए कि इन्द्र स्वयं चाहते हैं कि रावण को मारा न जाए; बन्दी किया जाए, क्योंकि वरदान से वह अवध्य है; पर माया से बँधते स्वयं इन्द्र ही हैं। वाल्मीकि यहाँ अहंकार और छल के पलटाव को दिखाते हैं।

सार: रावण ने इन्द्रलोक चीरकर देव-सेना नष्ट कर दी, पर इन्द्र ने उसे लौटने पर विवश किया। तब मेघनाद ने शिव-दत्त माया से अदृश्य होकर थके इन्द्र को बाँध लिया और पिता-सहित विजयी होकर लंका लौट आया।

ब्रह्मा का इन्द्रजित को वरदान और इन्द्र की मुक्ति: अहल्या-प्रसंग

अति-बलवान महेन्द्र को रावण-पुत्र द्वारा जीता गया देख देव प्रजापति ब्रह्मा को आगे रखकर लंका पहुँचे। पुत्रों-भाइयों से घिरे रावण के पास, आकाश में स्थित होकर प्रजापति साम-पूर्वक बोले, “वत्स रावण, हम आपके पुत्र के रण-आचरण से प्रसन्न हैं; अहो, इसके पराक्रम की महानता! यह आपके तुल्य या अधिक भी है। आपके ही तेज से तीनों लोक जीते गए और आपकी प्रतिज्ञा सफल हुई; मैं आपसे और आपके पुत्र से प्रसन्न हूँ। हे रावण, यह अति-बलवान पुत्र अब जगत में ‘इन्द्रजित’ नाम से विख्यात होगा। जिस राक्षस के आश्रय से, हे राजन, आपने देवों को वश में किया, वह निश्चय ही बलवान और दुर्जय होगा। अतः महेन्द्र, पाकशासन, को मुक्त किया जाए। उसकी मुक्ति के बदले देव आपको क्या दें?”

तब महातेज समितिंजय इन्द्रजित बोला, “हे देव, यदि यह मुक्त किया जाए तो मैं अमरत्व चाहता हूँ।” ब्रह्मा ने कहा, “भूतल पर किसी भी प्राणी को, चाहे पक्षी हो या चतुष्पद या अन्य महाबली, सर्वथा अमरत्व नहीं मिलता।” तब इन्द्रजित ने वहीं स्थित ब्रह्मा से कहा, “तो शतक्रतु इन्द्र की मुक्ति के बदले जो सिद्धि मुझे रुचे, वह सुनिए। जब भी शत्रुओं की पराजय चाहकर, मन्त्रों से हव्य द्वारा अग्नि की पूजा कर युद्ध को उद्यत होऊँ, तब अग्नि से अश्व-युक्त रथ मेरे सामने प्रकट हो; उस पर बैठे रहने तक मुझे मृत्यु न हो, यही मेरा निश्चित वर है। यदि उस अग्नि में जप-होम पूरा होने से पहले युद्ध करूँ, तो उसी समय मेरा विनाश हो। हर पुरुष तप से अमरत्व चाहता है, पर मैंने यह अमरत्व पराक्रम से चलाया है।” ब्रह्मा ने “ऐसा ही हो” कहा; इन्द्र इन्द्रजित से मुक्त हुए और देव स्वर्ग लौटे।

इसी बीच, हे राम, दीन, अमर-कान्ति से रहित इन्द्र चिन्ता में डूबकर ध्यानमग्न हो गए। उस दशा में देख ब्रह्मा बोले, “हे शतक्रतु, आपने पूर्व में कौन-सा महान दुष्कर्म किया था? हे अमरेन्द्र, हे प्रभो, मैंने बुद्धिपूर्वक प्रजा रची थी, जो सर्वथा एक वर्ण, एक भाषा और एक रूप की थी; दर्शन या लक्षण में उनमें कोई भेद न था। तब एकाग्र मन से मैंने सोचा कि इनमें भेद कैसे लाया जाए। उन प्रजाओं में जो-जो अंग विशिष्ट था, उसे लेकर मैंने एक स्त्री रची। रूप-गुणों से वह स्त्री अहल्या बनी: ‘हल’ यहाँ कुरूपता है, और उससे उत्पन्न निन्दा ‘हल्य’; जिसमें हल्य नहीं, वही ‘अहल्या’ विख्यात हुई, और यही नाम मैंने रखा।

“उस नारी के रचे जाने पर, हे देवेन्द्र, मुझे चिन्ता हुई कि यह किसकी हो। हे पुरंदर, आपने मन में सोचा, ‘स्थान की अधिकता से यह मेरी पत्नी हो।’ पर मैंने उसे न्यासरूप में महात्मा गौतम के पास रखा; अनेक वर्षों बाद उन्होंने लौटा दी। गौतम की अत्यन्त स्थैर्य और तप की सिद्धि जानकर मैंने पत्नी-रूप में उन्हें दे दी। वे धर्मात्मा महामुनि उसके साथ सुख से रहने लगे; गौतम को दे दिए जाने पर देव निराश हुए। तब हे देवेन्द्र, कामात्मा होकर आप उस मुनि के आश्रम में गए, और अग्नि-शिखा-सी दीप्त उस स्त्री को देखकर, कामार्त और क्रुद्ध होकर आपने उसे धर्षित किया। परम तेजस्वी ऋषि ने आपको आश्रम में देख लिया, और क्रोध में शाप दिया कि आपको दशा का विपर्यय भोगना पड़ा।

“उन्होंने कहा, ‘हे वासव, चूँकि आपने निर्भय होकर मेरी पत्नी धर्षित की, अतः हे इन्द्र, आप युद्ध में शत्रु के हाथ पड़ेंगे। हे दुर्बुद्धि, जो आचरण आपने यहाँ चलाया, वह मनुष्य-लोकों में भी फैलेगा, इसमें सन्देह नहीं। ऐसा करनेवाले के पाप का आधा भाग आप पर पड़ेगा; आपका स्थान स्थिर न रहेगा। जो-जो इन्द्र होगा, वह ध्रुव न रहेगा। यही मेरा शाप है।’ यही उन्होंने तब आपसे कहा था। फिर अपनी पत्नी को भर्त्सना कर महातपस्वी ने कहा, ‘हे दुर्विनीते, मेरे आश्रम के समीप अदृश्य रहकर रहिए। चूँकि आप रूप-यौवन-सम्पन्न होकर भी अस्थिर निकलीं, अतः अब आप लोक में एकमात्र रूपवती न रहेंगी; आपका रूप सब प्रजा में बँट जाएगा।’

“तब अहल्या ने गौतम को प्रसन्न करते हुए कहा, ‘हे विप्र, अज्ञानवश आपके रूप में आए देव से मैं धर्षित हुई, अपनी इच्छा से नहीं; हे विप्रर्षि, प्रसन्न होइए।’ गौतम बोले, ‘इक्ष्वाकु-वंश में राम नाम से एक महातेज महारथ उत्पन्न होंगे; वे ब्राह्मण (विश्वामित्र) के निमित्त वन जाएँगे; वे ही मानुष-रूप में विष्णु हैं। जब आप उन्हें देखेंगी, हे भद्रे, तब पवित्र हो जाएँगी; वही आपके दुष्कृत को मिटा सकते हैं। उनका आतिथ्य करके आप मेरे पास लौटेंगी; तभी, हे वरवर्णिनी, आप मेरे साथ रहेंगी।’ यह कहकर विप्रर्षि अपने आश्रम लौट गए, और वह ब्रह्मवादी की पत्नी महान तप करने लगी।

“यह सब उस मुनि के शाप के कारण हुआ। हे महाबाहु, अपना किया दुष्कृत स्मरण कीजिए; उसी शाप से आप शत्रु के हाथ पड़े, अन्य किसी कारण से नहीं। अतः शीघ्र सुसमाहित होकर वैष्णव यज्ञ कीजिए; उस यज्ञ से पवित्र होकर वहीं से स्वर्ग जाएँगे। और हे देवेन्द्र, आपका पुत्र महायुद्ध में नष्ट नहीं हुआ; उसके मातामह पुलोमा उसे महासमुद्र में ले गए हैं और अपने पास रखे हैं।” यह सुनकर महेन्द्र ने वैष्णव यज्ञ करके पुनः स्वर्ग जाकर देवराज-शासन किया।

“हे राम, यही इन्द्रजित का बल है जो मैंने वर्णित किया,” अगस्त्य बोले। “इस प्रकार लोक-कण्टक रावण उत्पन्न हुआ, जिसने पुत्र-सहित संग्राम में सुरेश्वर इन्द्र को जीता। जिसने देवेन्द्र तक को जीता, उसके लिए अन्य प्राणी क्या? यह सुनकर राम-लक्ष्मण और उपस्थित वानर-राक्षस “आश्चर्य!” कह उठे। राम के पास बैठे विभीषण बोले, “हे प्रभो, आज मुझे वह पुरातन आश्चर्य स्मरण हो आया जो मैंने देखा था।” राम ने अगस्त्य से कहा, “यह सत्य है; यह मैंने पहले भी सुना था।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): यह सर्ग दो धागे एक साथ बुनता है: इन्द्रजित का वही वरदान, जिसकी शर्त (अग्नि-यज्ञ की समाप्ति से पहले युद्ध करने पर मृत्यु) आगे युद्धकाण्ड में लक्ष्मण के हाथों उसके वध का सूत्र बनती है; और अहल्या-प्रसंग, जो बाहर से असम्बद्ध लगता है पर इन्द्र के बन्दी होने का कर्म-मूल बताता है। यह अहल्या-कथा का वाल्मीकीय रूप है (बालकाण्ड के रूप से कुछ भिन्न)।

सार: ब्रह्मा ने मेघनाद को “इन्द्रजित” नाम और अग्नि-यज्ञ-आधारित सशर्त अवध्यता का वर देकर इन्द्र को मुक्त कराया। इन्द्र की पराजय का मूल अहल्या-धर्षण का शाप बताकर ब्रह्मा ने उन्हें वैष्णव यज्ञ का आदेश दिया, जिससे इन्द्र पुनः स्वर्ग-शासन को लौटे।

माहिष्मती में अर्जुन की खोज: रावण का नर्मदा-पूजन

विस्मय से भरकर महातेज राम ने पुनः नतमस्तक होकर ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्य से कहा, “हे भगवन, जब से वह क्रूर राक्षस पृथ्वी पर विचरने लगा, क्या तब लोक पुरुषार्थ-हीन थे, हे द्विजोत्तम? क्या उस समय कोई राजा या राजसमान शासक न था, जिससे राक्षसेश्वर रावण को कहीं पराभव न मिला? अथवा वे पृथ्वी-शासक वीर्यहीन थे, या श्रेष्ठ अस्त्रों से रहित, जिससे अनेक राजा उससे पराजित हुए?” यह सुनकर भगवान ऋषि अगस्त्य हँसते हुए राम से वैसे बोले जैसे ब्रह्मा शिव से।

“रावण कुछ काल यों ही राजाओं को त्रास देता पृथ्वी पर विचरा, हे पृथ्वीपते। फिर वह अमरावती-सी प्रभावाली माहिष्मती नगरी पहुँचा, जहाँ वसु (अग्नि) की सदा उपस्थिति थी। वहाँ अग्नि के तेज से अग्नि-समान राजा अर्जुन राज्य करते थे, जिनके यहाँ अग्नि सदा कुश-आच्छादित कुण्ड में प्रतिष्ठित रहती। उसी दिन हैहयाधिपति बलवान अर्जुन अपनी स्त्रियों सहित नर्मदा में क्रीड़ा करने गए थे। उसी दिन रावण भी वहाँ आया और राक्षसेन्द्र ने अर्जुन के मन्त्रियों से कहा, ‘राजा अर्जुन कहाँ है? शीघ्र ठीक-ठीक बताइए। मैं रावण नरश्रेष्ठ अर्जुन से युद्ध की इच्छा से आया हूँ। मेरा आगमन उसे पहले सूचित कर दीजिए।’ वे बुद्धिमान मन्त्री बोले कि राजा नगर से अनुपस्थित हैं।

“नागरिकों से अर्जुन के नगर से बाहर जाने की बात सुन रावण विन्ध्य पर्वत की ओर गया, जो हिमालय-सा ऊँचा था, सहस्र शिखरोंवाला, जिसकी कन्दराओं में सिंह बसते थे, जो प्रपातों से गिरते शीतल जल से मानो अट्टहास करता था, देव-दानव-गन्धर्व-अप्सरा-किन्नरों से और अपनी स्त्रियों सहित क्रीड़ा करनेवालों से स्वर्ग-सा बना था, और स्फटिक-से जल की नदियों से शेषनाग-सा प्रतीत होता था। उसे निहारता रावण नर्मदा को गया, जो चलते पत्थरों और जल से युक्त, पुण्यसलिला, पश्चिम-समुद्र की ओर बहती थी।

“महिष, सृमर, सिंह, व्याघ्र, भालू और श्रेष्ठ गजों से, जो ताप-तृषा से क्षुब्ध थे, उसके जलाशय आन्दोलित थे; चक्रवाक, कारण्डव, हंस, जल-कुक्कुट और सारस उसमें कूज रहे थे। खिले वृक्षों का मुकुट, चक्रवाक-युगल-से स्तन, विस्तृत पुलिन-से नितम्ब, हंस-पंक्ति-सी मेखला, पुष्प-पराग से लिप्त अंग, जल-फेन-से निर्मल वस्त्र, और खिले कमलों-से शुभ नेत्रोंवाली वह नदी एक श्रेष्ठ नारी-सी थी, जिसमें दशानन ने डुबकी लगाई और सचिवों सहित नाना मुनियों से सेवित रम्य पुलिन पर बैठा।

“नर्मदा को ‘गंगा’ कहकर सराहते रावण को उसके दर्शन से हर्ष हुआ। उसने सचिवों और शुक-सारण से सलीला कहा, ‘देखिए, सहस्र किरणों से जगत को स्वर्णिम कर देनेवाला, मध्य-आकाश में तीव्र ताप देनेवाला यह सूर्य मुझे यहाँ बैठा जानकर ही चन्द्र-सा शीतल हो गया है। नर्मदा-जल से शीतल, सुगन्धित, श्रम-नाशक यह पवन मेरे भय से सुसमाहित होकर मन्द बह रहा है। मर्म-वर्धिनी यह श्रेष्ठ नर्मदा, जो लहरों पर नक्र-मीन-पक्षी धारे है, सभय अंगनावत खड़ी है। इन्द्र-समान राजाओं ने युद्ध में जिन्हें शस्त्रों से बेधा, वे रक्त से ऐसे रंजित हो, मानो लाल चन्दन के रस से सिंचे हों।’

“‘अतः आप इस शर्मदा, शुभ नर्मदा में वैसे ही डुबकी लगाइए जैसे सार्वभौम आदि मत्त गजेन्द्र गंगा में। इस महानदी में स्नान कर पाप से मुक्त हो जाएँगे। मैं भी आज शरद-चन्द्र-सी प्रभावाले इस पुलिन पर शिव को धीरे-धीरे पुष्पांजलि अर्पित करूँगा।’ यह आदेश पाकर प्रहस्त, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्ष ने नर्मदा में डुबकी लगाई। उन गजेन्द्र-से राक्षसों से नर्मदा वैसे आन्दोलित हुई जैसे वामन, अंजन, पद्म आदि महागजों से गंगा। स्नान कर वे रावण की शिव-पूजा हेतु पुष्प लाए, और श्वेत-मेघ-से रम्य पुलिन पर मुहूर्तभर में पुष्पों का पर्वत खड़ा कर दिया।

“जब इस प्रकार पुष्प एकत्र हुए, तब राक्षसराज रावण नदी में वैसे उतरा जैसे महागज गंगा में। यथाविधि स्नान कर श्रेष्ठ गायत्री-जप करके वह नर्मदा-जल से बाहर निकला; आर्द्र वस्त्र त्यागकर श्वेत वस्त्र धारण किया। हाथ जोड़े पुष्पांजलि को जाते रावण के पीछे सब राक्षस उसकी गति से झूमते मूर्तिमान पर्वतों-से चले। जहाँ-जहाँ रावण जाता, वहाँ जाम्बूनद-स्वर्ण का शिवलिंग ले जाया जाता। बालू-वेदी के मध्य उस लिंग को स्थापित कर रावण ने अमृत-गन्धवाले गन्ध और पुष्पों से उसकी अर्चना की। सतों की पीड़ा हरनेवाले, वरप्रद, चन्द्र-मयूख-भूषित परम शिव की पूजा कर निशाचर ने गाया, और हाथ फैलाकर उनके सामने आनन्द से नृत्य किया।

समझने की कुंजी (नाम): यह अर्जुन वही कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) हैं, जिनका वध परशुराम के हाथों होता है; हैहय उनका वंश है, और माहिष्मती राजधानी। रावण का शिव-भक्त-रूप यहाँ स्पष्ट है: वही रावण, जो देवों को त्रास देता है, स्वर्ण-लिंग साथ रखता और शिव के सामने नाचता है। वाल्मीकि उसके चरित्र की यह जटिलता बिना टीका के दिखाते हैं।

सार: राम के प्रश्न पर अगस्त्य ने माहिष्मती के राजा कार्तवीर्य अर्जुन की कथा आरम्भ की। अर्जुन को नगर में न पाकर रावण नर्मदा-तट पर पहुँचा, स्नान-गायत्री-जप कर पुलिन पर स्वर्ण-शिवलिंग की पुष्प-पूजा करने और शिव के सम्मुख नृत्य करने लगा।

सहस्रबाहु अर्जुन रावण को बन्दी बनाते हैं

“जहाँ नर्मदा-पुलिन पर वह दारुण राक्षसराज पुष्पांजलि कर रहा था, उससे थोड़ी ही दूर माहिष्मती-पति, जयश्रेष्ठ, प्रभु अर्जुन नर्मदा-जल में अपनी स्त्रियों सहित क्रीड़ा कर रहे थे। उनके बीच राजा अर्जुन सहस्र हथिनियों के मध्य गजराज-से शोभित थे। अपने सहस्र भुजाओं का परम बल जानने को उत्सुक अर्जुन ने अनेक भुजाओं से नर्मदा का प्रवाह रोक दिया। मीन-नक्र-मकर और पुष्प-कुश-संस्तर सहित रुका नर्मदा-वेग वर्षा-काल-सा प्रतीत हुआ। कार्तवीर्य की भुजाओं से रुका वह निर्मल जल, तट को डुबाता हुआ, प्रतिस्रोत में दौड़ पड़ा, और रावण की समस्त पुष्पांजलि बहा ले गया।

“आधी पूजा अधूरी छोड़कर रावण ने नर्मदा को वैसे देखा जैसे कोई रुष्ट प्रिया को। पश्चिम से समुद्र-उद्गार-से बढ़ते जल-वेग को, जो पूर्व में घुसकर ज्वार-सा उमड़ा, और पक्षियों के अनुद्भ्रान्त होने से नदी को उसके स्वाभाविक रूप में देख, रावण ने इसका कारण जानने को बिना मुख से शब्द किए, दाहिने हाथ की अँगुली से शुक-सारण को आदेश दिया। दोनों भाई पश्चिम-मुख होकर आकाश-मार्ग से चले। आधा योजन जाकर उन्होंने जल में स्त्रियों सहित क्रीड़ा करते एक बृहत्-साल-से पुरुष को देखा, जिसके बाल जल में बिखरे, मद से नेत्र-कोण लाल, चित्त मत्त, जो सहस्र भुजाओं से नदी को वैसे रोके था जैसे कोई पर्वत सहस्र पादों से धरती को, और सहस्र श्रेष्ठ नारियों से घिरा सहस्र हथिनियों के बीच गजराज-सा था।

“उस अद्भुत पुरुष को देख शुक-सारण लौटकर रावण से बोले, ‘हे राक्षसेश्वर, कोई बृहत्-साल-सा अज्ञात पुरुष नर्मदा को बाँध-सा रोककर स्त्रियों को क्रीड़ा करा रहा है। सहस्र भुजाओं से रुका जल बार-बार समुद्र-उद्गार-से उद्गार छोड़ रहा है।’ यह सुन रावण ‘अर्जुन ही है’ कहकर युद्ध-लालसा से चल पड़ा। रावण के अर्जुन-अभिमुख होते ही प्रचण्ड पवन शब्द और धूल सहित बहा, मेघों ने रक्त-बूँदों के साथ एक बार गर्जना की। महोदर, महापार्श्व, धूम्राक्ष, शुक-सारण से घिरा राक्षसेन्द्र वहाँ पहुँचा जहाँ अर्जुन था। अंजन-से रावण ने वासिता-गजों के बीच मत्त गज-से, स्त्रियों से घिरे अर्जुन को देखा।

“रोष से रक्तनेत्र, बलोद्धत रावण ने गम्भीर वाणी से अर्जुन के मन्त्रियों से कहा, ‘शीघ्र हैहय-राजा को बताइए कि रावण नाम का योद्धा युद्ध को आया है।’ सुनकर मन्त्री सशस्त्र उठ खड़े हुए और बोले, ‘धन्य हैं, रावण! युद्ध का उत्तम समय जानते हैं, जो स्त्रियों के बीच मद्यपायी राजा से लड़ने को उत्सुक हैं, मानो व्याघ्र हथिनियों के बीच मत्त गज से। आज क्षमा कीजिए, हे दशग्रीव; रात यहीं बिताइए; युद्ध-श्रद्धा हो तो कल अर्जुन से लड़िएगा। और यदि युद्ध-तृष्णा से शीघ्रता हो, तो पहले हमें रण में गिराकर ही अर्जुन तक पहुँचेंगे।’ तब रावण के मन्त्रियों ने अर्जुन के मन्त्रियों को मारकर भूखे होकर खा डाला।

“नर्मदा-तट पर अर्जुन के अनुचरों और रावण के मन्त्रियों में हलहला-शब्द उठा। अर्जुन के मन्त्री बाण, तोमर, प्रास, त्रिशूल और वज्र-से चर्म-छेदक अस्त्रों से चारों ओर से रावण-दल पर टूटे; उनका वेग नक्र-मीन-मकर-भरे समुद्र-नाद-सा दारुण था। रावण के मन्त्री प्रहस्त, शुक, सारण क्रुद्ध होकर अपने तेज से अर्जुन की सेना का संहार करने लगे। भयभीत पुरुषों ने यह क्रीड़ारत अर्जुन को बताया। ‘मत डरिए’ कहकर अर्जुन गंगा से अंजन-गज-से नर्मदा-जल से निकले। क्रोध से नेत्र लाल किए वे युगान्त-अग्नि-से प्रज्वलित हुए। श्रेष्ठ स्वर्ण-अंगदधारी अर्जुन गदा लेकर सूर्य के तम-नाश-से राक्षसों पर टूटे, गरुड-वेग से दौड़े।

“उनका मार्ग रोककर प्रहस्त मूसल लिए विन्ध्य-से अकम्प्य खड़ा हुआ, जैसे विन्ध्य ने सूर्य का मार्ग रोका हो। मदोद्धत प्रहस्त ने लोहबद्ध घोर मूसल अर्जुन पर फेंका और काल-सा गरजा; प्रहस्त के हाथ से छूटे उस मूसल का अग्र अशोक-पुष्प-सा अग्नि-शिखा छोड़ने लगा, मानो लक्ष्य को भस्म कर देगा। अविचल अर्जुन ने वेग से आते मूसल को गदा से कुशलता-पूर्वक रोक दिया। फिर गदा सहित हैहयाधिपति, पाँच सौ भुजाओं से उठाई भारी गदा घुमाते, प्रहस्त पर टूटे; अति-वेग से मारे प्रहस्त वज्र से बिंधे पर्वत-से धराशायी हुए। प्रहस्त को गिरा देख मारीच, शुक, सारण, महोदर, धूम्राक्ष रण से खिसक गए।

“मन्त्रियों के भाग जाने और प्रहस्त के गिरने पर रावण शीघ्र नरश्रेष्ठ अर्जुन पर टूटा। सहस्रबाहु और बीस-भुजावाले के बीच रोमहर्षक दारुण युद्ध छिड़ा। दोनों, मानो क्षुब्ध समुद्र, चलमूल पर्वत, तेजोयुक्त दो सूर्य, दो प्रज्वलित अग्नि, मदोद्धत दो गज, वासिता-हेतु लड़ते दो वृषभ, गरजते दो मेघ, बलोत्कट दो सिंह, क्रुद्ध रुद्र और काल-से, गदा लेकर परस्पर घोर प्रहार करने लगे। जैसे पर्वत वज्र-प्रहार सहते हैं, वैसे ही नर-राक्षस ने एक-दूसरे की गदा सही। उनकी गदाओं के टकराव से, वज्र-प्रतिध्वनि-सी, सब दिशाएँ गूँजीं। अर्जुन की गदा शत्रु-वक्ष पर पड़ते आकाश को विद्युत-सी स्वर्णिम करती; वैसे ही रावण की गदा अर्जुन-वक्ष पर महागिरि पर गिरती उल्का-सी चमकती। न अर्जुन थके, न राक्षसगणेश्वर; पूर्व के बलि-इन्द्र-सा उनका समान युद्ध हुआ। वे वृषभों-से सींगों और गजों-से दाँतों-सा परस्पर प्रहार करते रहे।

“तब क्रुद्ध अर्जुन ने सर्वबल से वह गदा रावण के विशाल वक्ष के स्तनों के बीच फेंकी। पर वरदान-रक्षित रावण-वक्ष पर वह गदा, दुर्बल-सी, वेग के अनुसार दो टुकड़े होकर धरती पर गिर पड़ी। अर्जुन-प्रयुक्त उस गदा-घात से रावण धनुष-भर पीछे हटकर कराहता बैठ गया। दशग्रीव को व्याकुल देख अर्जुन सहसा उछलकर उसे ऐसे पकड़ बैठे जैसे गरुड सर्प को। सहस्र भुजाओं से बलपूर्वक दशानन को पकड़कर बलवान राजा ने उसे वैसे बाँध लिया जैसे नारायण (वामन-रूप में) ने बलि को। रावण के बँधते सिद्ध, चारण और देव ‘साधु’ कहते अर्जुन के मस्तक पर पुष्प बरसाने लगे। जैसे व्याघ्र मृग या सिंह गज को पकड़े, वैसे रावण को पकड़कर हैहय-राजा बार-बार मेघ-सा गरजे।

“रावण को बँधा देख चेत पाकर क्रुद्ध प्रहस्त सहसा अर्जुन पर टूटा; ग्रीष्म-अन्त के मेघों-से राक्षसों का वेग बढ़ा। ‘फेंको, फेंको’, ‘ठहरो, ठहरो’ कहते वे टूटे, और प्रहस्त ने मूसल-शूल बरसाए। अभ्रान्त अर्जुन ने उन शस्त्रों को पहुँचने से पहले ही पकड़ लिया, और उन्हीं दुर्धर श्रेष्ठ अस्त्रों से राक्षसों को बेधकर वायु-से मेघों-सा बिखेर दिया। व्याघ्र-से मृग और मृगराज-से गज को लेकर, रावण को पकड़े, मित्रों से घिरे अर्जुन नगर में प्रविष्ट हुए। द्विजों-नागरिकों द्वारा पुष्प-अक्षत से अभिषिक्त, इन्द्र-से अर्जुन, बलि को पकड़े सहस्रनेत्र इन्द्र-से, अपनी नगरी में प्रविष्ट हुए।

एक उप-कथा: ध्यान दीजिए, अर्जुन की गदा रावण के वक्ष पर दो टुकड़े हो जाती है, क्योंकि वही वक्ष ब्रह्मा के वरदान से रक्षित है। तब भी सहस्रबाहु अर्जुन उसे केवल बाहुबल से पकड़कर बलि-से बाँध लेते हैं। वाल्मीकि का यह दृष्टान्त उत्तरकाण्ड की धुरी है: रावण अवध्य भले हो, अपराजेय नहीं; मनुष्य-वीर तक उसे बन्दी कर सकता है।

सार: कार्तवीर्य अर्जुन ने सहस्र भुजाओं से नर्मदा रोककर रावण की पूजा बहा दी। घोर गदा-युद्ध में प्रहस्त गिरे, और अर्जुन ने वरदान-रक्षित रावण को बाहुबल से पकड़कर, बलि-से बाँधकर, बन्दी रूप में अपनी नगरी ले गए।

पुलस्त्य रावण को छुड़ाते हैं

“वायु को पकड़ लेने-सी रावण की उस बन्दी-कथा को पुलस्त्य ने स्वर्ग में देवों द्वारा कही जाती सुना। पुत्र-स्नेह से काँपते हुए, यद्यपि महाधृति, वह महर्षि माहिष्मती-पति को देखने चले। वायु-मार्ग से, वायु-तुल्य गति से, मनःसम्पात-वेग से वे माहिष्मती पहुँचे। ब्रह्मा के अमरावती-प्रवेश-से वे हर्ष-पुष्ट जनों से भरी उस नगरी में प्रविष्ट हुए। उगते सूर्य-से, अति-दुर्दर्श आते ऋषि को पहचानकर अर्जुन के मन्त्रियों ने आगमन सूचित किया; ‘पुलस्त्य हैं’ जानकर हैहयाधिपति सिर पर अंजलि रखे तपस्वी की अगवानी को आगे बढ़े।

“पुरोहित अर्घ्य और मधुपर्क लिए राजा के आगे वैसे चले जैसे इन्द्र के आगे बृहस्पति। उगते सूर्य-से आते ऋषि को देख अर्जुन सम्भ्रान्त होकर, इन्द्र के परम-ब्रह्म-वन्दन-से, झुक गए। मधुपर्क, गौ, पाद्य और अर्घ्य निवेदित कर राजेन्द्र हर्ष-गद्गद वाणी से पुलस्त्य से बोले, ‘आज मेरा कुशल है, हे देव; आज मेरा व्रत सफल; आज मेरा जन्म सफल; आज मेरा तप सफल, कि देव-वन्द्य आपके चरण वन्दता हूँ। यह राज्य, ये पुत्र, ये दार, यहाँ तक कि हम स्वयं आपके हैं। हम क्या करें? आज्ञा दीजिए।’

“धर्म-अग्नि-पुत्रों का कुशल पूछकर पुलस्त्य हैहय-राजा अर्जुन से बोले, ‘हे कमल-दल-नेत्र, पूर्णचन्द्र-मुख नरेन्द्र, अतुल है आपका बल, जिससे आपने दशग्रीव को जीता। मेरा वही पौत्र, रण में दुर्जय, जिसके भय से समुद्र और वायु निश्चल खड़े रहते थे, आपने रण में बाँध लिया। मेरे पुत्र का यश आपने पी लिया और अपना नाम विख्यात किया। मेरे वचन से अब, हे वत्स, दशानन को छोड़ दीजिए।’ पुलस्त्य की आज्ञा शिरोधार्य कर अर्जुन ने बिना कुछ कहे हर्ष से राक्षसेन्द्र को मुक्त कर दिया।

“त्रिदशारि को छोड़कर, दिव्य आभूषण-माला-वस्त्र से सत्कार कर, अग्नि-साक्षी अहिंसक मैत्री करके, ब्रह्म-पुत्र पुलस्त्य को प्रणाम कर अर्जुन अपने भवन को गए। निःशर्त मुक्त, आतिथ्य-सत्कृत, मातामह से सस्नेह आलिंगित होकर भी विजित रावण लज्जित था। दशग्रीव को मुक्त कराकर मुनिपुंगव पुलस्त्य भी ब्रह्मलोक लौट गए। इस प्रकार, हे रघुनन्दन, बलवानों से भी बलवान योद्धा होते हैं; अतः जो अपना कल्याण चाहे, वह शत्रु की अवज्ञा न करे। पुलस्त्य के वचन से पुनः मुक्त वह महाबली रावण, अर्जुन की मैत्री पाकर, फिर राजाओं का संहार और दर्प से सारी पृथ्वी का विचरण करने लगा।

समझने की कुंजी (नाम): पुलस्त्य रावण के पितामह हैं (विश्रवा के पिता), अतः रावण उनका पौत्र है, अर्थात पुत्र का पुत्र। इस सर्ग का सार-वाक्य, “बलवानों से भी बलवान होते हैं, शत्रु की अवज्ञा न करें”, पूरे उत्तरकाण्ड का नैतिक केन्द्र है।

सार: पुलस्त्य ने आकर अर्जुन से रावण को छुड़ाया; अर्जुन ने सत्कार और अग्नि-साक्षी मैत्री कर उसे मुक्त किया। विजित होने की लज्जा लिए रावण फिर दर्प से पृथ्वी पर राजाओं का संहार करने निकल पड़ा, यही पाठ देता हुआ कि बलवान को भी शत्रु की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए।

वाली के हाथों रावण का पराभव और मैत्री

“अर्जुन से मुक्त राक्षसाधिपति रावण, अब निर्विघ्न होकर, सारी पृथ्वी पर विचरने लगा। जिस किसी राक्षस या मनुष्य को बलाधिक सुनता, उसी के पास जाकर दर्प से युद्ध को ललकारता। एक दिन वाली से शासित किष्किन्धा नगरी जाकर उसने स्वर्ण-मालाधारी वाली को द्वन्द्व के लिए ललकारा। तब वानर-मन्त्री तार, सुषेण, अंगद और सुग्रीव युद्ध-इच्छु आए रावण से बोले, ‘हे राक्षसेन्द्र, जो आपका प्रतिबल हो, वह वाली तो बाहर गए हैं। आपके सामने और कौन वानर खड़ा हो सकता है? चारों समुद्रों पर सन्ध्या-वन्दन कर वाली इसी मुहूर्त में लौट आएँगे; क्षणभर ठहरिए। ये देखिए शंख-से श्वेत अस्थि-राशियाँ, उन योद्धाओं की जो वाली से युद्ध माँगकर वानराधिपति के तेज से चूर हुए। अथवा, हे रावण, यदि अमृत-रस भी पी रखा हो, तब भी वाली से भिड़ते ही आपका जीवन अन्त पाएगा।

“‘अभी जगत का यह चित्र देखिए, हे विश्रवा-पुत्र; इस मुहूर्त ठहरिए, आपका जीवन दुर्लभ हो जाएगा। अथवा शीघ्र मरने को उत्सुक हैं, तो दक्षिण-समुद्र जाइए; वहाँ भूमि पर अग्नि-से वाली को देखेंगे।’ तार को धिक्कारकर लोक-रावण रावण पुष्पक पर चढ़कर दक्षिण-समुद्र को उड़ चला। वहाँ हेमगिरि-से, तरुण-सूर्य-से मुखवाले, सन्ध्योपासन में लीन वाली को देखकर अंजन-से रावण पुष्पक से उतरा और उन्हें पकड़ने को नीरव पगों से चला।

“संयोगवश वाली ने भी पाप-अभिप्राय रावण को देख लिया, पर सम्भ्रम न किया, मानो सिंह खरगोश को या गरुड सर्प को देखे। (वाली ने मन में सोचा:) ‘पकड़ने आते इस पापी रावण को बगल में दबाकर, लटकाए हुए, मैं शेष तीनों समुद्र भी देख आऊँगा। गरुड के पंजे के सर्प-से, जाँघ-हाथ-वस्त्र लटकाए, मेरी बगल में लटके दशग्रीव को लोग देखेंगे।’ ऐसा निश्चय कर वाली मौन रहकर वैदिक मन्त्र जपते पर्वतराज-से खड़े रहे।

“परस्पर पकड़ने को उत्सुक हरि और राक्षस, बल के दर्प से, उस कार्य के लिए यत्न करने लगे। पगों के शब्द से रावण को पकड़ने को उद्यत जान, पीठ फेरे हुए भी वाली ने उसे वैसे पकड़ लिया जैसे अण्डज (गरुड) सर्प को। बगल में दबाकर वेग से वाली आकाश में उछले और रावण को पवन-से मेघ-सा हर ले गए, यद्यपि रावण नखों से बार-बार वाली को कोंचता रहा। रावण के हरे जाते राक्षस-मन्त्री उसे छुड़ाने को चीखते हुए दौड़े, पर वाली की भुजाओं-जाँघों के वेग से थककर रुक गए। मेघ-समूह से अनुगत आकाश-स्थ सूर्य-से वाली शोभित हुए। पर्वतराज तक वाली के मार्ग से हट गए, फिर मांस-रक्त के शरीरवाला जीने का इच्छुक क्या? पक्षियों के झुण्ड भी न पहुँच सकें ऐसे चारों समुद्रों पर क्रमशः सन्ध्या-वन्दन करते वाली, रावण को बगल में दबाए, पश्चिम, उत्तर और पूर्व समुद्र होते किष्किन्धा लौट आए।

“रावण को ढोकर थके वाली किष्किन्धा के उपवन में उतरे और रावण को बगल से छोड़ते हुए हँसते हुए बार-बार पूछा, ‘कहाँ से आए हैं?’ महाविस्मय और श्रम से नेत्र घुमाते राक्षसेन्द्र बोले, ‘हे महेन्द्र-से वानरेन्द्र, मैं राक्षसेन्द्र रावण हूँ, युद्ध-इच्छा से आया था, और आज आपने मुझे पकड़ लिया। अहो, आपका बल, वीर्य और गाम्भीर्य, कि पशु-सा पकड़कर चारों समुद्र घुमा लाए! इतना अश्रान्त, इतना शीघ्र मुझे ढोनेवाला कौन अन्य वीर होगा? ऐसी गति केवल तीन में है, हे प्लवंगम: मन, वायु और गरुड में, और आप में भी, इसमें सन्देह नहीं। आपका बल देखकर, हे हरिपुंगव, अग्नि के सामने आपसे चिर, स्निग्ध मैत्री चाहता हूँ। हे हरीश्वर, हमारे दार, पुत्र, नगर, राष्ट्र, भोग, वस्त्र और भोजन, सब अविभक्त रहेंगे।’

“तब अग्नि प्रज्वलित कर, परस्पर आलिंगन कर, हरि और राक्षस भ्रातृत्व को प्राप्त हुए। हाथ जोड़े वे दोनों, हरि और राक्षस, हर्षित होकर किष्किन्धा में वैसे प्रविष्ट हुए जैसे दो सिंह गिरि-गुहा में। रावण वहाँ एक मास सुग्रीव-सा रहा, फिर त्रैलोक्य-संहार के अभिलाषी अपने मन्त्रियों द्वारा ले जाया गया। हे प्रभो (राम), यही पूर्व में हुआ था, कि वाली ने रावण को परास्त किया और अग्नि-साक्षी भाई बनाया। हे राम, वाली का बल अतुल और उत्तम था; वही वाली आपके हाथों पतंगे-सा भस्म हो गया।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): अगस्त्य इस कथा से दो बातें जोड़ते हैं: रावण इतना बलवान कि अर्जुन और वाली तक उसे पकड़ लेते हैं, और फिर भी वाली को राम ने एक बाण से मार डाला। यह तुलना राम की महिमा का अप्रत्यक्ष उद्घोष है, जिसे आगे हनुमान-प्रसंग और बढ़ाएगा।

सार: किष्किन्धा पहुँचे रावण को सन्ध्या-रत वाली ने बगल में दबाकर चारों समुद्र घुमा डाला। चमत्कृत रावण ने अग्नि-साक्षी मैत्री माँगी, और वाली से भाईचारा कर एक मास किष्किन्धा रहा; अगस्त्य ने जोड़ा कि वही अतुलबल वाली राम के एक बाण से भस्म हुआ।

हनुमान का बालचरित: सूर्य की ओर छलांग और वायु का कोप

समुद्र देखकर सीदती वानर-सेना को निहारकर राम ने दक्षिण-दिशावासी मुनि से हाथ जोड़े विनयपूर्वक पूछा, “वाली और रावण का यह अतुल बल था; पर मेरी समझ में इन दोनों का बल हनुमान के समान नहीं। शौर्य, दाक्ष्य, बल, धैर्य, प्राज्ञता, नय, विक्रम और प्रभाव, सब हनुमान में बसे हैं। समुद्र-दर्शन से सीदती सेना को आश्वस्त कर महाबाहु हनुमान सौ योजन कूद गए। लंका को धर्षित कर, रावण के अन्तःपुर में सीता को देखकर, बात कर, आश्वासन देकर लौटे। सेना-अग्रगों, मन्त्री-पुत्रों, किंकरों और रावण-पुत्र अक्ष को हनुमान ने अकेले गिरा दिया। फिर बन्धन से छूटकर रावण से बात कर, लंका को प्रलयाग्नि-सी भस्म कर दिया।

“जो कर्म युद्ध में हनुमान ने किए, वैसे न काल ने, न इन्द्र ने, न विष्णु ने, न कुबेर ने किए। इनके बाहुबल से ही मैंने लंका, सीता, लक्ष्मण, विजय, राज्य, मित्र और बान्धव पाए। यदि सुग्रीव-सखा हनुमान मेरे साथ न होते, तो जानकी का समाचार कौन ला सकता था? आश्चर्य है कि सुग्रीव-वाली के वैर के समय हनुमान ने सुग्रीव-प्रिय हेतु वाली को क्यों न भस्म कर दिया। मुझे लगता है, हनुमान अपना बल नहीं जानते थे, इसी से क्लेश पाते वानराधिपति को केवल देखते रहे। हे भगवन, हे महामुनि, हे अमर-पूजित, हनुमान का यह सब विस्तार से ठीक-ठीक बताइए।”

राम का हेतुयुक्त वचन सुन ऋषि अगस्त्य ने हनुमान के समक्ष ही कहा, “हे रघुश्रेष्ठ, सत्य है; बल, गति या मति में इनके तुल्य अन्य कोई नहीं। पर पूर्व में अमोघ-शाप मुनियों ने इन्हें शाप दिया कि बलवान होकर भी ये अपना सारा बल न जानेंगे। बाल्यकाल में इन्होंने जो कर्म किया, वह वर्णन के अयोग्य है; बालस्वभाव से ये अपना बल भूल गए। यदि सुनने की इच्छा हो, हे राघव, तो एकाग्र होकर सुनिए, मैं कहता हूँ।

“सूर्य के वरदान से स्वर्ण-वर्ण सुमेरु नाम पर्वत है, जहाँ हनुमान के पिता केसरी राज्य करते थे। उनकी इष्ट भार्या अंजना से वायु ने उत्तम पुत्र उत्पन्न किया। शालि-शूक-से आभावाले उस पुत्र को जनकर अंजना फल लाने वन गई। माता के वियोग और भूख से पीड़ित शिशु शरवन में कार्तिकेय-से जोर से रोया। उसी क्षण जपा-पुष्प-राशि-से उगते सूर्य को फल समझकर वह पकड़ने को आकाश में उछल पड़ा। बालार्क-अभिमुख, बालार्क-से मूर्तिमान वह बालक सूर्य को पकड़ने आकाश में कूदता गया। शिशु-रूप हनुमान को यों कूदते देख देव-दानव-यक्ष परम विस्मित हुए: ‘न वायु, न गरुड, न मन इतना वेगवान, जितना यह वायु-पुत्र उत्तम आकाश में जाता है। शिशु में जब ऐसी गति-शक्ति है, तो यौवन और बल पाने पर वेग कैसा होगा?’

“सूर्य-दाह के भय से तुषार-सा शीतल वायु अपने कूदते पुत्र के पीछे चला, उसकी रक्षा करता। पिता के बल और बालस्वभाव से अनेक सहस्र योजन उड़कर वह सूर्य के निकट पहुँचा। यह अबोध शिशु है, और इससे महान कार्य (राम का) सधना है, यह जानकर सूर्य ने उसे भस्म न किया। जिस दिन यह सूर्य को पकड़ने उछला, उसी दिन राहु भी सूर्य को ग्रसने आया था। सूर्य-रथ पर हनुमान को देख चन्द्र-सूर्य-मर्दन राहु डरकर खिसक गया। इन्द्र के भवन जाकर क्रुद्ध सिंहिका-पुत्र राहु भृकुटि तानकर बोला, ‘हे वासव, हे बल-वृत्र-हन, चन्द्र-सूर्य मुझे भूख-शान्ति को दिए थे; मेरा भाग आपने अन्य को क्यों दे दिया? आज पर्वकाल में सूर्य को पकड़ने आया, तो दूसरे राहु ने सहसा सूर्य को पकड़ लिया।’

“राहु का वचन सुन सम्भ्रान्त इन्द्र आसन छोड़, स्वर्ण-माला उठाए उठ खड़े हुए। कैलास-शिखर-से, चतुर्दन्त, मद-स्रावी, स्वर्ण-घण्टा के अट्टहास-से ऐरावत पर चढ़कर, राहु को आगे कर इन्द्र वहाँ चले जहाँ सूर्य हनुमान-सहित थे। तभी इन्द्र को छोड़कर राहु आगे बढ़ा और शैल-शिखर-से दौड़ता हनुमान को दीखा। तब सूर्य को छोड़, राहु को फल समझकर हनुमान सिंहिका-पुत्र को पकड़ने पुनः आकाश में उछले। उस छोड़े सूर्य और दौड़ते प्लवंगम को देख विशालकाय राहु, जिसका केवल मुख-शेष है, मुँह फेरकर उल्टा भागा। ‘इन्द्र, इन्द्र’ पुकारता राहु त्रास से बार-बार चीखा। उसका परिचित स्वर सुन इन्द्र बोले, ‘मत डरिए, इसका अभी अन्त करता हूँ।’

“फिर ऐरावत को देखकर, उसे भी ‘बड़ा फल’ समझकर मारुति उस गजराज पर टूटे। ऐरावत को पकड़ने दौड़ते हनुमान का रूप क्षणभर इन्द्र-अग्नि-से घोर और दीप्त हो उठा। यों दौड़ते हनुमान को अति-क्रुद्ध न होकर भी शचीपति इन्द्र ने हाथ से छूटे वज्र से प्रहार किया। इन्द्र-वज्र से ताड़ित हनुमान पर्वत पर गिरे, और गिरते समय उनकी बाईं हनु (ठुड्डी) टूट गई। वज्र-घात से व्याकुल, गिरे पुत्र को देख वायु प्रजा के अहित हेतु इन्द्र पर क्रुद्ध हुए। प्राणियों में अन्तर्गत प्रचार (श्वास) रोककर वायु अपने शिशु-पुत्र को लेकर गुहा में प्रविष्ट हो गए। मल-मूत्राशय रोककर प्रजा को परम पीड़ा देते वायु ने सब प्राणियों को वैसे रोक दिया जैसे इन्द्र वर्षा को। वायु-कोप से प्राणी निरुच्छ्वास होकर, सन्धियाँ टूटने से काठ-से हो गए। स्वाध्याय-वषट्कार-निष्क्रिय-धर्म-हीन तीनों लोक नरक-से हो गए।

“तब गन्धर्व, देव, असुर, मानव सहित दुखी प्रजा सुख की इच्छा से प्रजापति के पास दौड़ी। महोदर (जलोदर) रोगियों-से फूले पेटवाले देव हाथ जोड़े बोले, ‘हे भगवन, हे नाथ, आपने ही चार प्रकार की प्रजा रची; आपने ही वायु को हमारी आयु का स्वामी दिया। तो हे सत्तम, प्राणेश्वर होकर भी इसने आज हमें अन्तःपुर की स्त्रियों-सा क्यों रोक रखा है? वायु से उपहत हम आपकी शरण आए हैं; हे दुःख-हन, वायु-संरोध-जनित यह दुख दूर कीजिए।’

“यह सुनकर प्रजानाथ प्रजापति बोले, ‘यह किसी कारण से हुआ; सुनिए। राहु के कहने पर वायु-पुत्र को आज इन्द्र ने गिराया, इसी से वायु क्रुद्ध हुआ। अशरीर होकर भी वायु सब शरीरों में संचरण कर उनका पालन करता है। शरीर में वायु बिना वह काठ-सा हो जाता है। वायु ही प्राण, वायु ही सुख, वायु ही यह सारा जगत है। वायु से त्यक्त जगत सुख नहीं पाता; आज ही आयुरूप वायु ने जगत को छोड़ दिया। ये सब निरुच्छ्वास, काठ-दीवार-से खड़े हैं। अतः जहाँ वायु है वहीं चलें, हे आदित्य-पुत्रो; इन्हें प्रसन्न किए बिना हम नष्ट न हों।’ यह सुन गन्धर्व, सर्प, गुह्यकों और देवों सहित प्रजापति वहाँ गए जहाँ वायु, इन्द्र से गिराए अपने पुत्र को लिए बैठे थे। सूर्य-अग्नि-स्वर्ण-से दीप्त उस पुत्र को गोद में देख देव-गन्धर्व-ऋषि-यक्ष-राक्षसों सहित चतुर्मुख ब्रह्मा ने शिशु पर कृपा की।

समझने की कुंजी (नाम): “हनु” अर्थात ठुड्डी; इन्द्र के वज्र से बाईं हनु टूटने पर ही “हनुमान” नाम पड़ा (अगला सर्ग)।

सार: राम के पूछने पर अगस्त्य ने हनुमान का बालचरित आरम्भ किया: सूर्य को फल समझकर शिशु हनुमान आकाश में उछले, राहु और ऐरावत पर टूटे, और इन्द्र के वज्र से उनकी हनु टूटी; क्रुद्ध वायु ने श्वास रोककर सृष्टि घोंट दी, तब ब्रह्मा-प्रमुख देव उसे मनाने पहुँचे।

हनुमान का पुनर्जीवन, वरदान, और ऋषि-शाप

“पितामह को देख पुत्र-वध से पीड़ित वायु शिशु को लिए धाता के सामने खड़े हुए। चलते कुण्डल, मुकुट-माला और स्वर्ण-आभूषणों से सुशोभित वायु तीन बार नतमस्तक होकर ब्रह्मा के चरणों में गिरे। वेदविद् ब्रह्मा ने वायु को उठाकर अपने दीर्घ, अलंकृत हाथ से उस शिशु को सहलाया। ब्रह्मा के स्पर्शमात्र से हनुमान सिंचित फसल-से पुनर्जीवित हो उठे। हनुमान को सजीव देख प्राणवाहक वायु प्रसन्न होकर पूर्ववत सब प्राणियों में संचरण करने लगा। वायु-संरोध से मुक्त प्रजा वैसे प्रसन्न हुई जैसे शीत-पवन से मुक्त कमल-सरोवर।

“तब तीन-युग्म दिव्य गुणोंवाले, तीन रूपोंवाले, तीनों लोकों में आश्रित, देव-पूजित ब्रह्मा वायु को प्रसन्न करने हेतु देवों से बोले, ‘हे महेन्द्र, अग्नि, वरुण, महेश्वर और धनेश्वर, यद्यपि आप सब जानते हैं, फिर भी हित कहता हूँ, सुनिए। इस शिशु से आपका कार्य सधेगा। अतः वायु को सन्तुष्ट करने हेतु सब इसे वर दीजिए।’ तब प्रीतियुक्त, शुभ-मुख सहस्रनेत्र इन्द्र ने कमल-माला हनुमान के गले में डालकर कहा, ‘मेरे हाथ से छूटे वज्र से इसकी हनु टूटी, अतः यह कपिश्रेष्ठ “हनुमान” नाम से विख्यात होगा। मैं इसे परम अद्भुत वर देता हूँ: आज से यह मेरे वज्र से अवध्य होगा।’

“तिमिर-नाशक भगवान सूर्य ने कहा, ‘अपने तेज का सौवाँ भाग इसे देता हूँ। और जब इसमें शास्त्र पढ़ने की शक्ति आएगी, तब मैं इसे शास्त्र दूँगा, जिससे यह वाग्मी होगा; शास्त्र-ज्ञान में इसके तुल्य कोई न होगा।’ वरुण ने वर दिया कि सौ-सौ हजार वर्षों में भी मेरे पाश या जल से इसकी मृत्यु न होगी। यम ने अपने दण्ड से अवध्यता और आरोग्य दिया। पीले एक नेत्रवाले कुबेर ने कहा, ‘सन्तुष्ट होकर वर देता हूँ कि युद्धों में मेरी गदा इसकी मृत्यु न करेगी, और युद्ध में इसे अविषाद हो।’ शंकर ने परम वर दिया कि ‘यह मुझसे और मेरे आयुधों से अवध्य होगा।’ बालसूर्य-से शिशु को देख महामति शिल्पिश्रेष्ठ विश्वकर्मा ने वर दिया, ‘मेरे रचे और मन में स्थित जो दिव्य अस्त्र हैं, उनसे यह अवध्य होकर चिरजीवी होगा।’

“ब्रह्मा ने वर दिया कि ‘यह दीर्घायु, महात्मा, और ब्रह्म-सम्बन्धी सब दण्डों तथा ब्राह्मणों के शापों से अवध्य होगा। हे वायु, आपका यह पुत्र शत्रुओं को भयकर, मित्रों को अभयकर, और अजेय होगा। यह कामरूपी, कामचारी, कामग, श्रेष्ठ प्लवंग होगा; इसकी गति अव्याहत रहेगी और यह कीर्तिमान होगा। युद्ध में यह रावण-उच्छेदन के, राम को प्रिय, रोमहर्षक कर्म करेगा।’ यह कहकर वायु से विदा लेकर ब्रह्मा-प्रमुख सब देव यथागत लौट गए। वायु भी पुत्र को लेकर घर ले आए और अंजना को वरदानों की बात बताकर चले गए।

“देवों के वरदानों से बल पाकर, हे राम, अपनी सहज गति में पूर्ण समुद्र-से हनुमान शोभित हुए। वेग से भरते वह वानरपुंगव निर्भय होकर महर्षियों के आश्रमों में अपराध करने लगे: स्रुक्-भाण्ड, अग्निहोत्र और वल्कल-राशियाँ तोड़ते-छिन्न करते-नष्ट करते। ब्राह्मणों के सब शापों से ब्रह्मा द्वारा अवध्य जान, ऋषि वरदानों की शक्ति से सहते रहे। केसरी और वायु के मना करने पर भी अंजना-पुत्र मर्यादा लाँघते रहे। तब भृगु और अंगिरा-वंशज महर्षि, यद्यपि अति-क्रुद्ध या अति-कुपित नहीं, शाप दे बैठे, हे रघुश्रेष्ठ: ‘जिस बल के आश्रय से, हे वानर, आप हमें त्रास देते हैं, हमारे शाप से उसे आप चिरकाल तक न जानेंगे। जब कोई आपकी कीर्ति स्मरण कराएगा, तब आपका बल बढ़ेगा।’ महर्षियों के शाप-तेज से अपने तेज-वीर्य का ज्ञान खोकर हनुमान उन्हीं आश्रमों में मृदु-भाव से विचरने लगे।

“उन्हीं दिनों वाली-सुग्रीव के पिता ऋक्षरजा, सूर्य-से तेजस्वी, सब वानरों के राजा थे। चिरकाल राज्य कर ऋक्षरजा काल-धर्म को प्राप्त हुए, तब मन्त्रियों ने वाली को पिता-पद पर और सुग्रीव को वाली के पद (युवराज) पर बैठाया। बाल्य से ही वाली-सुग्रीव में वायु-अग्नि-सी अद्वैध, अछिद्र मैत्री रही। उसी शाप के कारण हनुमान अपना बल न जानते थे। हे राम, जब वाली-सुग्रीव में वैर उठा, तब वाली से भगाए जाते सुग्रीव, न ही हनुमान, अपना बल जानते थे। ऋषि-शाप से बल भूले हनुमान वाली के युद्ध में सुग्रीव के पास गज से रुके सिंह-से खड़े रहे।

“पराक्रम, उत्साह, प्रताप, सौशील्य, माधुर्य, नय-अनय, गाम्भीर्य, चातुर्य, वीर्य और धैर्य में हनुमान से अधिक लोक में कौन है? व्याकरण ग्रहण करने को, सूर्य की ओर मुख किए और उनसे प्रश्न पूछने को उत्सुक यह अमेय कपीन्द्र उस महान ग्रन्थ को हृदय में धारण करता उदयाचल से अस्ताचल तक गया। सूत्र-वृत्ति-अर्थपद-संग्रह सहित कपीन्द्र को सिद्धि है; शास्त्र में, छन्द-गति में इनके तुल्य कोई नहीं। सब विद्याओं और तप-विधान में यह सुराचार्य बृहस्पति से स्पर्धा करता है। नव-व्याकरणार्थ का ज्ञाता यह हनुमान आपकी कृपा से ब्रह्मा-सा होगा। समुद्र-से लोक-नाशक, अग्नि-से लोक-दाहक, अन्तक-से लोक-संहारक हनुमान के सम्मुख कौन ठहरेगा?

“इनके समान अन्य महाकपीन्द्र: सुग्रीव, मैन्द, द्विविद, नील, तार, अंगद, नल, रम्भ, और भालू गज, गवाक्ष, गवय, सुदंष्ट्र, मैन्द, प्रभ, ज्योतिर्मुख, नल, हे राम, ये सब आपके निमित्त देवों ने रचे। यही सब, जो आपने पूछा, मैंने कहा; हनुमान के बाल-कर्म भी मैंने वर्णित किए।” अगस्त्य की कथा सुनकर राम-लक्ष्मण और वानर-राक्षस परम विस्मित हुए।

अगस्त्य ने राम से कहा, “यह सब आपने सुना; हमें देख और बात कर लिया, हे राम; अब हम जाते हैं।” उग्रतेज अगस्त्य का वचन सुन राघव हाथ जोड़े, नतमस्तक होकर बोले, “आज मेरे देवता, पितर, प्रपितामह प्रसन्न हैं; आपके दर्शन से हम बान्धवों सहित सदा सन्तुष्ट हैं। एक बात निवेदन योग्य है, जो स्पृहा से कहता हूँ; अनुकम्पा से वह मेरे लिए कीजिए। पौर-जानपदों को उनके कार्यों में स्थापित कर, वन से लौटकर, मैं आप सन्तों के प्रभाव से यज्ञ करूँगा। आप महावीर्य सदा मेरे यज्ञों में सदस्य बनिए, मेरे अनुग्रह के अभिलाषी; आप तप से निष्पाप हैं, आप पर निर्भर होकर मैं पितरों से अनुगृहीत और सुख पाऊँगा। अतः यज्ञ-आरम्भ पर आप सब मिलकर अवश्य यहाँ आइए।” यह सुन संशितव्रत अगस्त्य आदि ऋषि “ऐसा ही हो” कहकर जाने लगे, और यथागत लौट गए। राघव भी उसी यज्ञ-विषय का विस्मय से चिन्तन करने लगे। सूर्यास्त होने पर राजाओं-वानरों को विदा कर, यथाविधि सन्ध्या-उपासना कर, रात आरम्भ होने पर नरश्रेष्ठ राम अन्तःपुर में प्रविष्ट हुए।

एक उप-कथा: हनुमान के “अपना बल भूल जाने” का यह ऋषि-शाप ही वह कथा-यन्त्र है जिससे किष्किन्धाकाण्ड में जाम्बवान उन्हें उनकी शक्ति का स्मरण कराते हैं, और तब वे समुद्र लाँघते हैं। ध्यान दीजिए, देवों के वरदानों में राम का प्रयोजन (रावण-उच्छेदन, राम को प्रियकर कर्म) पहले से अंकित है, अर्थात हनुमान का जन्म ही रामकथा के निमित्त है।

सार: ब्रह्मा के स्पर्श से हनुमान पुनर्जीवित हुए, और सब देवों ने उन्हें “हनुमान” नाम तथा अनेक अवध्यता-वर दिए, जिनमें राम-कार्य पहले से अंकित था। उद्दण्डता पर ऋषियों ने शाप दिया कि वे स्मरण कराए जाने तक अपना बल भूले रहेंगे; कथा सुनाकर अगस्त्य ने राम से अपने यज्ञों में आने का वचन लेकर विदा ली।

मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, उत्तरकाण्ड, सर्ग 1-36; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।

आधार: वाल्मीकि रामायण (गीता प्रेस, गोरखपुर)