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नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 1: भक्ति का स्वरूप

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नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 1

भक्ति का स्वरूप

भक्ति का स्वरूप · सूत्र 1-14

नारद यहाँ भक्ति की परिभाषा गढ़ते हैं। हर सूत्र इस प्रेम का एक नया पहलू खोलता है, और चौदह सूत्रों में मिल कर एक पूरा स्वरूप उभर आता है।

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

सा त्वस्मिन् परम-प्रेम-रूपा ॥

वह उस (ईश्वर) में परम-प्रेम-रूप है।

नारद भक्ति सूत्र 2

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नारद वीणा थामे बैठे हैं, और बात की शुरुआत वहीं से करते हैं जहाँ से हर गम्भीर शास्त्र शुरू होता है। पहला शब्द ही “अब” है, और वह “अब” बहुत कुछ अपने भीतर समेटे है। यह उस श्रोता के लिए है जो पहले से कुछ साध चुका है, जिसका मन तैयार है। फिर वे सीधे भक्ति की जड़ पर हाथ रखते हैं। भक्ति कोई साधारण लगाव नहीं, वह ईश्वर के प्रति परम प्रेम का रूप है, सबसे ऊँचा प्रेम, जो किसी बदले की आस नहीं रखता। और यह प्रेम अमृत-स्वरूप है, जो मरता नहीं और जिसे पाने वाला भी अमर हो जाता है।

सूत्र 1 · 2 · 3

अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः॥

सा त्वस्मिन् परम-प्रेम-रूपा॥

अमृत-स्वरूपा च॥

अब नारद बताते हैं कि इस प्रेम को पा लेने पर मनुष्य के भीतर क्या घटता है। जिसे पा कर वह सिद्ध हो जाता है, अमर हो जाता है, और भीतर तक तृप्त हो जाता है। फिर उसके मन में न कोई कामना उठती, न शोक, न द्वेष, न विषय-रति; और चौंकाने वाली बात यह कि उत्साह तक शेष नहीं रहता। यहाँ धार्मिक उमंग का वह उबाल भी थम जाता है, और बस एक शान्त भक्ति रह जाती है। जिसे जान कर वह मतवाला हो उठता है, स्तब्ध रह जाता है, और अपने ही भीतर रमने लगता है।

सूत्र 4 · 5 · 6

यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति॥

यत्प्राप्य न किञ्चिद् वाञ्छति, न शोचति, न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति॥

यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति॥

अब नारद इस प्रेम को एक और दिशा से छूते हैं। यह भक्ति कोई कामना नहीं, क्योंकि इसका स्वरूप ही निरोध का है। और निरोध से उनका अर्थ क्या है, यह वे तुरंत खोल देते हैं। निरोध यानी लोक और वेद, दोनों के व्यापारों का त्याग, सांसारिक भाग-दौड़ भी और वैदिक कर्मकाण्ड भी। साथ ही उस एक में ऐसी अनन्यता कि उसके सिवा कोई आश्रय न बचे, और जो उससे विमुख करे उन सब में उदासीनता।

सूत्र 7 · 8 · 9

सा न कामयमाना निरोध-रूपत्वात्॥

निरोधस्तु लोक-वेद-व्यापार-न्यासः॥

तस्मिन् अनन्यता तद्-विरोधिषु उदासीनता च॥

अनन्यता का अर्थ नारद और साफ़ कर देते हैं। दूसरे सब आश्रयों को छोड़ देना, उसी एक के सहारे रह जाना, यही अनन्यता है। पर इसके साथ एक सन्तुलन भी है। लोक और वेद के बीच रहते हुए जो उसके अनुकूल हो वही आचरण करना, और जो उसके विरोध में हो उससे उदासीन रह जाना। और यहाँ नारद एक व्यावहारिक चेतावनी जोड़ते हैं। निश्चय दृढ़ हो जाने के बाद भी शास्त्र का पालन बना रहे।

सूत्र 10 · 11 · 12

अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता॥

लोक-वेदेषु तद्-अनुकूल-आचरणं तद्-विरोधिषु उदासीनता॥

भवतु निश्चय-दार्ढ्याद् ऊर्ध्वं शास्त्र-रक्षणम्॥

शास्त्र क्यों न छोड़े, इसका कारण भी नारद बताते हैं। अन्यथा पतन की शंका बनी रहती है, क्योंकि भीतर से ऊपर उठ चुका भक्त भी जब बाहरी मर्यादा तोड़ता दिखे, तो उसे देख कर औरों के मन में ग़लत निष्कर्ष जन्म ले लेते हैं। फिर अध्याय का अन्तिम सूत्र इसी व्यावहारिक स्वर पर ठहरता है। लोक-व्यवहार भी उतना ही छोड़ने योग्य है, पर एक छूट के साथ। भोजन आदि जो काम शरीर को धारण किए रखने के लिए आवश्यक हैं, वे शरीर के रहने तक चलते रहेंगे, वे इस त्याग के दायरे से बाहर हैं।

सूत्र 13 · 14

अन्यथा पातित्य-शङ्कया॥

लोकोऽपि तावदेव, किन्तु भोजनादि-व्यापारस्त्व आ-शरीर-धारणावधि॥

॥ भक्ति का स्वरूप ॥

विस्तार: यह अध्याय और गहरा

“भक्ति” क्या है, नारद के अनुसार: “सा त्वस्मिन् परम-प्रेम-रूपा”। यानी, ईश्वर के लिए परम प्रेम। यह एक विशेष प्रकार का प्रेम है, साधारण लगाव नहीं। नारद इसी की परिभाषा गढ़ रहे हैं, बाक़ी 80 सूत्र इसी परिभाषा का विस्तार हैं।

“परम” का सोच-समझ कर रखा गया शब्द: नारद ने “परम” कह कर इसे साधारण प्रेम से अलग कर दिया। माँ का बच्चे को प्रेम, पति का पत्नी को, मित्र का मित्र को, ये सब “प्रेम” हैं, मगर “परम-प्रेम” नहीं। “परम-प्रेम” में बदले की कोई आस नहीं होती। ईश्वर के लिए प्रेम लौटे या न लौटे, भक्त को फ़र्क़ नहीं पड़ता।

एक कठिनाई: यह परिभाषा आज के बहुत-से पाठकों को कठिन लगती है, क्योंकि हमारे सब रिश्ते लेन-देन वाले हैं, “मैं इतना देता हूँ, बदले में उतना चाहता हूँ”। नारद कहते हैं, भक्ति वह रिश्ता है जो केवल देता है, बिना किसी आशा के कि कुछ लौटेगा।

“अमृत-स्वरूपा च”: भक्ति अमर-स्वरूप है। यानी, मरती नहीं। पाने वाला भी नहीं मरता। यह सूत्र अमरता की एक विशेष परिभाषा दे रहा है, देह का बचे रहना नहीं, बल्कि भक्ति का अटूट बने रहना।

आज के जीवन में: किसी मन्दिर या सत्संग में किसी सेवक का सच्चा प्रेम लीजिए, जो भोर से दिया जलाता है, फूल चढ़ाता है, और किसी से कुछ नहीं चाहता। न कोई आशा, न कोई सौदा। नारद की “परम-प्रेम” वाली परिभाषा ठीक इसी को पकड़ती है। बहुत-से लोग चुपचाप सेवा में लगे रहते हैं, बिना इसके कि कोई देखे, बिना कोई दाम माँगे। वे “परम-प्रेम” को ही जीते हैं।

एक संकेत: नारद कहते हैं, भक्ति की परिभाषा फ़िलहाल इतनी ही है। अगले अध्याय में इसकी “महिमा” का वर्णन करेंगे। उसके बाद “साधन” यानी इसे साधने की विधि, और फिर “प्रेम के रूप” यानी भक्ति किन-किन रूपों में फूटती है।