नारद भक्ति सूत्र · अध्याय 1
भक्ति का स्वरूप
The Nature of Devotion · सूत्र 1-14
नारद अब भक्ति की परिभाषा देते हैं। हर सूत्र bhakti का एक angle खोलता है।
सूत्र 1
अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः॥
athāto bhaktiṁ vyākhyāsyāmaḥ
अर्थ“अब अतः भक्ति की व्याख्या करते हैं।”
सन्दर्भ“अथ” यानी “अब”। यह pre-requisites assume करता है। श्रोता पहले से कुछ तैयार है।
सूत्र 2
सा त्वस्मिन् परम-प्रेम-रूपा॥
sā tv asmin parama-prema-rūpā
अर्थ“वह उस (ईश्वर) में परम-प्रेम-रूप है।”
सन्दर्भभक्ति की core definition। “परम-प्रेम”। यानी सबसे ऊँचा प्रेम, और ईश्वर के लिए।
सूत्र 3
अमृत-स्वरूपा च॥
amṛta-svarūpā ca
अर्थ“और अमृत-स्वरूप है।”
सन्दर्भभक्ति “अमर”। मरती नहीं। पाने वाला भी।
सूत्र 4
यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति॥
yal labdhvā pumān siddho bhavati, amṛto bhavati, tṛpto bhavati
अर्थ“जिसे पा कर मनुष्य सिद्ध होता है, अमर होता है, तृप्त होता है।”
सूत्र 5
यत्प्राप्य न किञ्चिद् वाञ्छति, न शोचति, न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साही भवति॥
yat prāpya na kiñcid vāñchati, na śocati, na dveṣṭi, na ramate, notsāhī bhavati
अर्थ“जिसे पा कर कुछ चाहता नहीं, शोक नहीं, द्वेष नहीं, रति नहीं, उत्साह भी नहीं।”
सन्दर्भपाँच negations। मगर “उत्साही भी नहीं” चौंकाता है। यानी “religious enthusiasm” भी drop। बस calm devotion।
सूत्र 6
यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति, स्तब्धो भवति, आत्मारामो भवति॥
yaj jñātvā matto bhavati, stabdho bhavati, ātmārāmo bhavati
अर्थ“जिसे जान कर मत्त (intoxicated) हो जाता, स्तब्ध हो जाता, आत्म-राम (self-ravelling) हो जाता।”
सूत्र 7
सा न कामयमाना निरोध-रूपत्वात्॥
sā na kāmayamānā nirodha-rūpatvāt
अर्थ“वह काम (इच्छा) नहीं है, क्योंकि निरोध-रूप है।”
सन्दर्भ“निरोध”। यह योग-सूत्र का शब्द है। भक्ति desire-driven नहीं, desire-restraint है।
सूत्र 8
निरोधस्तु लोक-वेद-व्यापार-न्यासः॥
nirodhas tu loka-veda-vyāpāra-nyāsaḥ
अर्थ“निरोध, यानी लोक और वेद के व्यापारों का त्याग।”
सन्दर्भदो छोड़ने योग्य: सांसारिक काम, और वैदिक रिचुअल। दोनों।
सूत्र 9
तस्मिन् अनन्यता तद्-विरोधिषु उदासीनता च॥
tasmin ananyatā tad-virodhiṣu udāsīnatā ca
अर्थ“उसमें अनन्यता, और उसके विरोधियों में उदासीनता।”
सूत्र 10
अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता॥
anyāśrayāṇāṁ tyāgo’nanyatā
अर्थ“अन्य आश्रयों का त्याग, यह अनन्यता।”
सन्दर्भ“अनन्य” यानी “उसके सिवा कोई नहीं”। यह exclusive devotion है।
सूत्र 11
लोक-वेदेषु तद्-अनुकूल-आचरणं तद्-विरोधिषु उदासीनता॥
loka-vedeṣu tad-anukūla-ācaraṇaṁ tad-virodhiṣu udāsīnatā
अर्थ“लोक और वेद में, उसके अनुकूल आचरण, उसके विरोधियों में उदासीनता।”
सूत्र 12
भवतु निश्चय-दार्ढ्याद् ऊर्ध्वं शास्त्र-रक्षणम्॥
bhavatu niścaya-dārḍhyād ūrdhvaṁ śāstra-rakṣaṇam
अर्थ“निश्चय की दृढ़ता के बाद भी, शास्त्र का पालन रहे।”
सन्दर्भpractical सलाह। निश्चय हो गया, फिर भी societal norms का पालन। क्योंकि नीचे का सूत्र explains।
सूत्र 13
अन्यथा पातित्य-शङ्कया॥
anyathā pātitya-śaṅkayā
अर्थ“अन्यथा पतन की शंका रहे।”
सन्दर्भ“पतन” से बचने के लिए। यानी अगर ज्ञानी “ऊपर” है, फिर भी छोटे लोग देख कर wrong conclusions निकालेंगे।
सूत्र 14
लोकोऽपि तावदेव, किन्तु भोजनादि-व्यापारस्त्व आ-शरीर-धारणावधि॥
loko’pi tāvad eva, kintu bhojanādi-vyāpāras tv ā-śarīra-dhāraṇāvadhi
अर्थ“लोक-व्यवहार भी उतना ही (छोड़ने योग्य)। मगर भोजन आदि व्यापार, शरीर के रहने तक।”
सन्दर्भpractical। शरीर है, तो भोजन तो करना ही है। यह “त्याग” से बाहर।
॥ भक्ति का स्वरूप ॥