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महाभारतधर्म की कठिन भूमि

अध्याय 34 · भाग 4 · आपद्-धर्म: संकट-काल का धर्म

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महाभारत · शान्ति पर्व
शर-शय्या पर लेटे भीष्म का युधिष्ठिर को राज-धर्म का विस्तृत उपदेश, राजा का कर्तव्य, दण्ड-नीति, मन्त्र-रक्षा, कोष और प्रजा-पालन का धर्म, और बीच-बीच में आती दृष्टान्त-कथाएँ।

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साधनहीन राजा का आचरण: सूक्ष्म धर्म का प्रश्न

युधिष्ठिर ने कहा, “हे भरत, उस राजा का आचरण कैसा हो जो मित्रहीन हो, जिसके अनेक शत्रु हों, कोष रिक्त हो और सेना न हो? और तब क्या करे जब वह दुष्ट मन्त्रियों से घिरा हो, उसके मन्त्र फूट जाएँ, मार्ग सूझे नहीं, वह दूसरे राज्य पर चढ़ाई करे, किसी शत्रु-राज्य को पीस रहा हो, और दुर्बल होकर भी बलवान् से युद्ध में उलझा हो? उस राजा का क्या आचरण हो जिसके राज्य के कार्य बिगड़े हों, जो देश-काल की उपेक्षा करे, जो अपने उत्पीड़न के कारण न शान्ति ला सके न शत्रुओं में फूट डाल सके? क्या वह बुरे साधनों से धन कमाए, अथवा बिना धन खोजे प्राण त्याग दे?”

भीष्म ने कहा, “हे भरतश्रेष्ठ, कर्तव्यज्ञ होकर भी आपने (कर्तव्यों से जुड़ा) एक गूढ़ रहस्य का प्रश्न पूछा है। बिना पूछे, हे युधिष्ठिर, मैं इस धर्म पर उपदेश देने का साहस न करता। धर्म अति सूक्ष्म है; उसे, हे भरतश्रेष्ठ, शास्त्र-वचनों की सहायता से ही समझा जाता है। सुने हुए को स्मरण कर और सत्कर्मों का अभ्यास कर, कोई किसी स्थान पर धर्मात्मा बन जाता है।”

समझने की कुंजी (आपद्-धर्म): यह प्रश्न “आपद्-धर्म”, अर्थात् संकट-काल का धर्म, की भूमिका है: साधनहीन, घिरे हुए राजा को किन सीमाओं तक अनुचित साधन क्षम्य हैं। भीष्म इसे “गूढ़ रहस्य” कहकर सावधानी से आरम्भ करते हैं; धर्म इतना सूक्ष्म है कि शास्त्र, स्मृति और सत्कर्म-अभ्यास से ही उसका मार्ग खुलता है। इसका विस्तार आगे के खण्ड में आता है।

सार: संकट में पड़े, साधनहीन राजा का धर्म “सूक्ष्म” है। भीष्म स्वीकारते हैं कि बिना पूछे यह रहस्य कहना उचित न था; धर्म का मार्ग शास्त्र-श्रवण, स्मरण और सत्कर्म-अभ्यास से ही प्रकट होता है।

बिल्ली और चूहे की कथा का अन्त, और भीष्म का सूत्र

शर-शय्या (बाणों की वह सेज जिस पर भीष्म पितामह लेटे थे) से पितामह ने युधिष्ठिर को अभी-अभी पलित नामक चूहे और लोमश नामक बिल्ली की कथा सुनाई थी। वह कथा अपने अन्तिम मोड़ पर थी। बिल्ली जाल में फँसी थी, चूहे ने उसकी डोरियाँ काटीं, और संकट टलते ही दोनों अपनी-अपनी राह चले गए। पेड़ की डाल पर बैठी बिल्ली ने चूहे को मीठे वचनों से फिर बुलाया, पर पलित ने पास नहीं आना स्वीकार किया। उसने कहा कि जिस मित्रता का मूल भय हो, उसे साँप के दाँत से हाथ बचाने जैसी सावधानी से ही निभाना चाहिए।

पलित का तर्क सुनिए, क्योंकि यही आगे के सारे उपदेश का बीज है। उसने कहा, “कोई किसी का मित्र नहीं, कोई किसी का शत्रु नहीं। प्रयोजन (स्वार्थ, मतलब) ही मित्र और शत्रु बनाता है। जैसे पालतू हाथी जंगली हाथियों को फँसा लाते हैं, वैसे ही एक स्वार्थ दूसरे स्वार्थ को खींच लाता है। काम पूरा हो जाने पर करने वाले की कोई गिनती नहीं रहती। इसी कारण हर काम ऐसे करना चाहिए कि कुछ-न-कुछ करना बाकी बचा रहे।” फिर उसने यह भी कहा कि पिता, माता, पुत्र, मामा, बहन का बेटा, सब सम्बन्ध लाभ और प्रयोजन से बँधे हैं। पतित हो जाने पर माता-पिता तक पुत्र को त्याग देते हैं। सब अपने-अपने को ही बचाते हैं।

बिल्ली ने बहुत आरजू-मिन्नत की, पर चूहा अडिग रहा। उसने अन्तिम वचन कहा, “नीति के सब ग्रन्थों का परम सत्य यही है, अविश्वास। दुर्बल भी यदि शत्रु पर अविश्वास बनाए रखे, तो बलवान शत्रु भी उसे वश में नहीं कर पाता। हे बिल्ली, मुझ जैसे को आप जैसों से सदा अपने प्राण बचाने चाहिए। और आप भी उस क्रोधी चाण्डाल (बहेलिये) से अपना जीवन बचाइए।” यह कहते ही शिकारी का नाम सुनकर बिल्ली भयभीत होकर डाल छोड़कर भाग गई, और पलित दूसरे बिल में घुस गया।

भीष्म ने कथा समेटी, “इस प्रकार दुर्बल और अकेला पलित अपनी बुद्धि से अनेक बलवान शत्रुओं को मात देकर बच निकला। जब दो पुराने शत्रु संधि करते हैं, तो प्रत्येक के मन में दूसरे को छलने की इच्छा रहती है। बुद्धिमान अपनी समझ से दूसरे को मात दे देता है, और जो बुद्धिहीन है वह अपनी असावधानी के कारण मात खा जाता है। इसलिए, हे युधिष्ठिर, भय में रहते हुए भी निर्भय दिखना चाहिए, और भीतर अविश्वास रखते हुए भी ऊपर से विश्वासपात्र दिखना चाहिए। भय का कारण आने से पहले ही, मानो भयभीत हो, वैसे सावधान रहना चाहिए, और शत्रु से संधि कर लेनी चाहिए।”

समझने की कुंजी (राज-धर्म): यह “राज-धर्म” का वह भाग है जिसे आपद्-धर्म और नीति कहते हैं, अर्थात् संकट और शत्रुता के बीच राजा कैसे टिके। यहाँ का केन्द्रीय सूत्र है अविश्वास (किसी पर आँख मूँदकर भरोसा न करना), और संधि-विग्रह (समय देखकर संधि, समय देखकर युद्ध)। भीष्म इसे सपाट सदाचार के रूप में नहीं, जीवित बचे रहने की कला के रूप में रख रहे हैं। महाभारत की नैतिक जटिलता यहीं है, धर्म कभी एकरंगा नहीं रहता।

सार: चूहे-बिल्ली की कथा का सबक यह है कि स्वार्थ ही मित्रता और शत्रुता रचता है, और दुर्बल का परम कवच विवेकपूर्ण अविश्वास है। भीष्म इसी से राज-नीति का पहला सूत्र निकालते हैं, भीतर सतर्क, बाहर निर्भय।

युधिष्ठिर की शंका, और पुजनी की कथा का आरम्भ

युधिष्ठिर का मन उलझ गया। उन्होंने पूछा, “हे महाबाहु, आपने कह दिया कि शत्रु पर कभी भरोसा न करें। पर यदि राजा किसी पर विश्वास ही न करे, तो वह अपने को टिकाएगा कैसे? आपने कहा कि विश्वास से राजाओं को बड़ा भय उत्पन्न होता है। पर बिना किसी पर विश्वास किए राजा शत्रुओं को जीतेगा कैसे? हे पितामह, मेरी यह शंका दूर कीजिए। अविश्वास के विषय में आपकी बातें सुनकर मेरा मन भ्रमित हो गया है।”

भीष्म ने उत्तर दिया, “हे राजन, सुनिए, राजा ब्रह्मदत्त के घर क्या हुआ था, अर्थात् पुजनी पक्षी और राजा ब्रह्मदत्त का संवाद। काम्पिल्य नगर के राजमहल के भीतरी कक्षों में पुजनी नाम की एक चिड़िया बहुत समय से राजा ब्रह्मदत्त के साथ रहती थी। जीवजीवक पक्षी की तरह पुजनी सब पशुओं के स्वर की नकल कर सकती थी। जन्म से पक्षी होते हुए भी उसके पास बड़ा ज्ञान था और वह हर सत्य से परिचित थी।”

“वहीं रहते हुए उसने एक तेजस्वी बच्चे को जन्म दिया। उसी समय राजा को भी अपनी रानी से एक पुत्र हुआ। पुजनी राजा की छत के आश्रय के प्रति कृतज्ञ थी, इसलिए वह प्रतिदिन समुद्र के किनारे जाकर दो फल लाती, अपने बच्चे और राजकुमार के पोषण के लिए। एक फल वह अपने बच्चे को देती और दूसरा राजकुमार को। वे फल अमृत जैसे मीठे थे और बल तथा ओज बढ़ाने वाले थे। प्रतिदिन वह लाती और प्रतिदिन वैसे ही बाँट देती। राजकुमार पुजनी के दिए फल खाकर बड़ा बलवान होता गया।”

एक दिन राजकुमार, धाय की गोद में था, उसने पुजनी के छोटे बच्चे को देखा। धाय की बाँहों से उतरकर बालक उस चिड़िया के बच्चे की ओर दौड़ा, और बालसुलभ चपलता से उसके साथ खेलने लगा। खेल में मगन होकर, अन्त में उसने अपने ही समान आयु के उस पक्षी-शिशु को हाथों में उठाया और उसका कोमल प्राण निचोड़ डाला, फिर अपनी धाय के पास लौट आया।

पुजनी, जो रोज़ की भाँति फल खोजने बाहर गई थी, महल लौटी तो अपने बच्चे को राजकुमार के हाथों मरा हुआ ज़मीन पर पड़ा देखा। बेटे को प्राणहीन देखकर पुजनी के गालों पर आँसू बहने लगे और हृदय शोक से जलने लगा। वह फूट-फूटकर रोई और बोली, “किसी को क्षत्रिय के साथ नहीं रहना चाहिए, न उससे मित्रता करनी चाहिए, न उसके किसी संग में सुख मानना चाहिए। जब उन्हें कोई काम सिद्ध करना होता है तब वे शिष्टाचार दिखाते हैं। काम सिद्ध हो जाने पर वे साधन को फेंक देते हैं। क्षत्रिय सबके साथ बुरा करते हैं। उन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।”

फिर उसने स्वयं से कहा कि इस कृतघ्न विश्वासघाती से बदला अवश्य लेगी। “इसने तीन पाप एक साथ किए हैं, उसका वध जो इसके साथ एक ही दिन जन्मा, जो इसी स्थान पर साथ पल रहा था, जो इसके साथ खाता था, और जो रक्षा के लिए इसी पर निर्भर था।” यह कहकर पुजनी ने अपने पंजों से राजकुमार की आँखें फोड़ डालीं, और इस प्रतिशोध से कुछ शान्ति पाकर फिर बोली, “सोच-समझकर किया गया पाप करने वाले पर बिना देर लगाए टूट पड़ता है। पर जो अपने अपकार का बदला लेते हैं, उनका पुण्य ऐसे कर्म से नष्ट नहीं होता। यदि पाप का फल करने वाले में न दिखे, तो वह उसके पुत्रों, पौत्रों, या दौहित्रों में अवश्य दिखेगा।”

ब्रह्मदत्त ने अपने पुत्र को पुजनी द्वारा अन्धा हुआ देखा, पर इसे अपने बेटे के कर्म का उचित दण्ड मानकर पुजनी से बोले।

समझने की कुंजी (पात्र और स्थान): पुजनी एक बोलने वाली, ज्ञान-सम्पन्न चिड़िया है, जो दृष्टान्त-कथाओं की प्रथा के अनुसार मनुष्य-नीति की मुखपात्र बनती है। ब्रह्मदत्त काम्पिल्य (पांचाल देश की प्राचीन राजधानी) का राजा है। जीवजीवक एक पक्षी है जो दूसरों के स्वर की नकल करता है। ध्यान दीजिए, यहाँ अन्याय पहले राजकुमार की ओर से होता है (पक्षी-शिशु का वध), और पुजनी का प्रतिशोध (आँखें फोड़ना) भी हिंसा ही है। कथा इसे छिपाती नहीं, यही महाभारत का नैतिक खुरदरापन है।

सार: युधिष्ठिर की शंका यह है कि बिना भरोसे के राज्य चलेगा कैसे। उत्तर में भीष्म पुजनी-ब्रह्मदत्त की कथा छेड़ते हैं, जहाँ राजकुमार चिड़िया के बच्चे को मार देता है और चिड़िया बदले में राजकुमार की आँखें फोड़ देती है, अपकार के बदले अपकार।

पुजनी और ब्रह्मदत्त का संवाद: अपकार के बाद विश्वास क्यों नहीं

महल में बैठी बुद्धिमान पक्षी पुजनी सिंहासन पर बैठे राजा ब्रह्मदत्त से गम्भीरता से बात करती है, पास में बच्चों वाला घोंसला; दोनों के बीच टूटे भरोसे का तनाव

ब्रह्मदत्त ने कहा, “हमने आपका अपकार किया। आपने बदले में अपकार करके उसे चुका दिया। हिसाब बराबर हो गया। अपना यह घर छोड़कर मत जाइए। यहीं रहती रहिए, हे पुजनी।”

पुजनी ने उत्तर दिया, “जिसने किसी का अपकार किया हो और फिर उसी के साथ रहता रहे, विद्वान उसके आचरण की सराहना नहीं करते। ऐसी दशा में अपकार करने वाले के लिए सदा यही उत्तम है कि वह अपना पुराना स्थान छोड़ दे। अपकार सहे हुए पक्ष के दिए सान्त्वना-वचनों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। जो मूर्ख ऐसे आश्वासनों पर भरोसा करता है, वह शीघ्र ही नाश को प्राप्त होता है। शत्रुता जल्दी ठण्डी नहीं पड़ती। जिन्होंने परस्पर अपकार किया हो, उनके पुत्र और पौत्र तक उस झगड़े के विरासत-रूप में उतर आने से नष्ट हो जाते हैं।”

पुजनी ने आगे कहा, “जो विश्वास के योग्य नहीं, उस पर विश्वास न कीजिए। और जो विश्वास के योग्य है, उस पर भी अधिक विश्वास न कीजिए। आँख मूँदकर किए विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है, वह जड़ से नाश कर देता है। दूसरों के मन में अपने प्रति विश्वास जगाना चाहिए, पर स्वयं किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए। पिता और माता ही परम मित्र हैं। पत्नी केवल बीज धारण करने का पात्र है। पुत्र केवल अपना बीज है। भाई शत्रु है। मित्र वही टिका रहता है जिसकी हथेली पर तेल लगता रहे, अर्थात् जिसका हित सधता रहे। अपना सुख-दुख अपना ही आत्मा भोगता है।”

ब्रह्मदत्त ने जवाब दिया, “जो अपकार के बदले अपकार करता है, वह अपराधी नहीं माना जाता। बदला लेने वाला तो अपना हिसाब बराबर कर लेता है। इसलिए, हे पुजनी, यह स्थान छोड़े बिना यहीं रहती रहिए।”

पुजनी बोली, “अपकार करने वाले और बदले में अपकार करने वाले के बीच फिर से मित्रता नहीं जुड़ सकती। दोनों में से किसी का हृदय यह भूल नहीं सकता कि क्या हुआ था।”

ब्रह्मदत्त ने कहा, “अपकार करने वाले और बदला लेने वाले के बीच पुनर्मिलन आवश्यक है। ऐसे मिलन से परस्पर शत्रुता ठण्डी पड़ती देखी गई है। कोई नया अपकार भी फिर नहीं हुआ।”

पुजनी ने उत्तर दिया, “परस्पर अपकार से उठी शत्रुता कभी मरती नहीं। आहत व्यक्ति को कभी यह सोचकर शत्रु पर विश्वास नहीं करना चाहिए कि मुझे सद्भाव के आश्वासन से मना लिया गया है। इस संसार में मनुष्य प्रायः गलत विश्वास के कारण ही नाश को प्राप्त होते हैं। जो बल और तीखे शस्त्रों से भी वश में नहीं आते, उन्हें झूठी सान्त्वना से वैसे जीता जाता है जैसे जंगली हाथी को पालतू हथिनी से।”

ब्रह्मदत्त ने तर्क दिया, “साथ रहने से, चाहे एक दूसरे को घातक चोट ही क्यों न दे दे, उनमें स्वभावतः प्रेम और परस्पर विश्वास उत्पन्न हो जाता है, जैसे चाण्डाल और कुत्ते के बीच। साथ रहना शत्रुता की धार को कुन्द कर देता है। वह शत्रुता अधिक समय नहीं टिकती, कमल के पत्ते पर पड़े जल की तरह शीघ्र ढुलक जाती है।”

पुजनी ने तब शत्रुता के पाँच मूल बताए, “शत्रुता पाँच कारणों से उठती है, विद्वान इसे जानते हैं, स्त्री, भूमि, कठोर वचन, स्वाभाविक विरोध, और अपकार। शत्रुता की अग्नि लकड़ी में छिपी आग की तरह गुप्त रहती है। समुद्र के जल में छिपी और्व अग्नि की तरह, शत्रुता की आग न धन के दान से, न पराक्रम के प्रदर्शन से, न सान्त्वना से, न शास्त्र-ज्ञान से बुझती है। एक बार अपकार से सुलगी यह आग दोनों पक्षों में से एक को भस्म किए बिना नहीं बुझती।”

समझने की कुंजी (शत्रुता के पाँच मूल): पुजनी की गणना, (1) स्त्री, (2) भूमि (सम्पत्ति-भूमि), (3) कठोर वाणी, (4) स्वाभाविक विरोध (जन्मगत बैर, जैसे बिल्ली और चूहा), और (5) अपकार (किया हुआ नुकसान)। और्व अग्नि वह पौराणिक अग्नि है जो समुद्र की तह में जलती रहती है और जल से बुझती नहीं, यहाँ बैर की अमिट प्रकृति का प्रतीक। ध्यान दीजिए, पुजनी और ब्रह्मदत्त एक ही प्रश्न पर भिड़े हैं, “क्या अपकार के बाद विश्वास लौट सकता है?” राजा “हाँ” चाहता है, चिड़िया “नहीं” पर अड़ी है।

काल का तर्क, और पुजनी का खण्डन

ब्रह्मदत्त ने तब काल (समय) का गूढ़ तर्क रखा, “सब कुछ काल ही करता है। कर्म नाना प्रकार के हैं और सब काल से ही उत्पन्न होते हैं। तो कौन किसका अपकार करता है? जन्म और मृत्यु इसी प्रकार होते हैं। प्राणी काल के कारण ही जन्म लेते और जीते हैं, और काल के कारण ही जीना छोड़ देते हैं। कोई तत्काल मर जाता है, कोई एक-एक करके, कोई दीर्घकाल जीता है। जैसे अग्नि ईंधन को खाती है, वैसे काल सब प्राणियों को खा जाता है। इसलिए, हे भद्रे, न मैं आपके शोक का कारण हूँ, न आप मेरे शोक की। काल ही सदा देहधारियों के सुख-दुख को नियत करता है। जो आपने किया, वह मैंने क्षमा कर दिया। आप भी मुझे क्षमा कीजिए, हे पुजनी।”

पुजनी ने यह काल-वाद नहीं माना। उसने तीखे प्रश्नों से इसे काटा, “यदि आपके अनुसार काल ही सब कर्मों का कारण है, तो फिर पृथ्वी पर कोई किसी से बैर रख ही नहीं सकता। पर मैं पूछती हूँ, फिर मित्र और सम्बन्धी मारे गए की हत्या का बदला क्यों लेना चाहते हैं? पुराने दिनों में देवता और असुर युद्ध में एक दूसरे पर प्रहार क्यों करते थे? यदि काल ही सुख-दुख और जन्म-मरण रचता है, तो वैद्य रोगी को औषधि देने का यत्न क्यों करते हैं? यदि काल ही सब ढाल रहा है, तो औषधि की आवश्यकता ही क्या? यदि आपके अनुसार काल ही कर्मों का कारण है, तो धार्मिक कर्म करने वालों को धर्म-पुण्य कैसे मिलता है?”

फिर पुजनी ने अपनी स्थिति खोली, “आपके पुत्र ने मेरे बच्चे को मारा। मैंने उसके लिए उसका अपकार किया। इस कर्म से, हे राजन, मैं आपके हाथों मारे जाने योग्य हो गई हूँ। पुत्र-शोक से व्याकुल होकर मैंने आपके पुत्र का यह अपकार किया।” फिर उसने दुःख के अनेक रूप गिनाए, “वृद्धावस्था दुःख है। धन का नाश दुःख है। किसी अप्रिय या बुरी वस्तु का पास होना दुःख है। मित्रों और प्रिय वस्तुओं से वियोग दुःख है। मृत्यु और कैद से दुःख होता है। सन्तान की मृत्यु से उठा दुःख सब प्राणियों को घोर रूप से बदल देता और सताता है। कुछ मूर्ख कहते हैं कि दूसरे के दुःख में कोई दुःख नहीं। पर ऐसा वही कह सकता है जिसने स्वयं कभी दुःख न भोगा हो। जिसने हर प्रकार के दुःख का दंश सहा है, वह दूसरे के दुःख को अपना ही समझता है।”

उसने उशना (शुक्राचार्य) का वचन उद्धृत किया जो उन्होंने प्रह्लाद को सुनाया था, “जो शत्रु के वचनों पर, सच्चे हों या झूठे, विश्वास करता है, वह वैसे ही नाश को प्राप्त होता है जैसे सूखी घास से ढके गड्ढे में मधु खोजने वाला। शत्रुता शत्रुओं की मृत्यु को भी जी लेती है, क्योंकि लोग अपने मृत पिताओं के पुराने झगड़े उनकी जीवित सन्तानों के सामने कह सुनाते हैं। राजा सान्त्वना का आश्रय लेकर शत्रुता बुझाते हैं, पर अवसर आने पर अपने शत्रुओं को जल से भरे मिट्टी के घड़े की तरह पत्थर पर पटककर टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं।”

समझने की कुंजी (काल-वाद बनाम पुरुषार्थ): ब्रह्मदत्त काल-वाद (नियतिवाद, सब कुछ समय करता है, इसलिए कोई दोषी नहीं) से अपराध-बोध और बैर दोनों को घोलना चाहता है। पुजनी इसका पुरुषार्थ-पक्ष से खण्डन करती है, यदि सब काल ही करता तो वैद्य औषधि क्यों देते, धर्म-कर्म का फल कैसे मिलता, बदला क्यों लिया जाता? उशना = शुक्राचार्य, असुरों के गुरु और नीतिशास्त्र के आचार्य; उनका प्रह्लाद को दिया वचन यहाँ प्रमाण है।

सार: राजा काल-वाद से बैर को धोना चाहता है; चिड़िया इसे काटती है कि यदि सब नियति ही है तो वैद्य, धर्म और प्रतिशोध सब निरर्थक हो जाएँ। उसका निष्कर्ष, अपकार के बाद विश्वास घड़े के टूटे टुकड़ों की तरह फिर नहीं जुड़ता।

पुजनी का प्रस्थान-वचन: देश, राजा और प्रजा-पालन का धर्म

ब्रह्मदत्त ने अन्तिम तर्क दिया, “विश्वास रोककर कोई किसी वस्तु की सिद्धि नहीं पा सकता। भय पालते रहने से मनुष्य को सदा मरे हुए की तरह जीना पड़ता है।”

पुजनी ने उत्तर में जीवन का व्यावहारिक विवेक खोला, “जिसके पाँव में घाव हो, वह चलने को उठे तो कितनी भी सावधानी से चले, गिर ही पड़ता है। जो अपना बल जाने बिना बुरे मार्ग पर पाँव रखता और उस पर अड़ा रहता है, वह शीघ्र ही प्राण गँवा देता है। निष्क्रिय रहकर भाग्य के भरोसे बैठने वाले नपुंसक-समान हैं; उच्च आत्मा वाले तो भाग्य और पुरुषार्थ दोनों को साधते हैं। ज्ञान, साहस, चतुराई, बल और धैर्य, ये पाँच ही मनुष्य के स्वाभाविक मित्र हैं। बुद्धिमान इन पाँचों के सहारे संसार में जीवन काटते हैं। घर, बहुमूल्य धातु, भूमि, पत्नी और मित्र, ये गौण साधन कहे गए हैं; इन्हें तो मनुष्य कहीं भी पा लेता है।”

फिर उसने त्याग देने योग्य छह बुरी वस्तुएँ गिनाईं, “दूर से ही त्याग देना चाहिए, बुरी पत्नी, बुरा पुत्र, बुरा राजा, बुरा मित्र, बुरा सम्बन्ध, और बुरा देश। पत्नी वही है जो प्रिय बोले। पुत्र वही है जो पिता को सुखी करे। मित्र वही है जिस पर विश्वास किया जा सके। देश वही है जहाँ जीविका मिले। राजा वही उत्तम-नियम वाला है जो पीड़ा नहीं देता, जो निर्धनों का पालन करता है, और जिसके राज्य में कोई भय नहीं।”

यहीं से पुजनी का स्वर राज-धर्म के मर्म पर आ जाता है, “पत्नी, देश, मित्र, पुत्र, कुटुम्बी, सम्बन्धी, ये सब तभी मिलते हैं जब राजा गुणवान और धर्म-दृष्टि वाला हो। यदि राजा पापी हो, तो उसके अत्याचारों से प्रजा नष्ट हो जाती है। राजा ही मनुष्य के त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का मूल है। उसे सावधानी से प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। प्रजा से उनके धन का छठा भाग लेकर उसे सबकी रक्षा करनी चाहिए। जो राजा प्रजा की रक्षा नहीं करता, वह सच में चोर है। जो राजा रक्षा का आश्वासन देकर लोभवश उसे पूरा नहीं करता, वह पापी-आत्मा राजा अपनी सारी प्रजा के पाप सिर पर ले लेता है और अन्त में नरक में गिरता है।”

पुजनी ने मनु का वचन सुनाया कि राजा के सात रूप हैं, “सब प्राणियों के स्वामी मनु ने कहा है कि राजा में सात गुण हैं, वह माता है, पिता है, गुरु है, रक्षक है, अग्नि है, वैश्रवण (कुबेर) है, और यम है। प्रजा के प्रति करुणा से व्यवहार करने पर वह उनका पिता कहलाता है। उनका भला करके और निर्धनों का पालन करके वह माता बन जाता है। दुष्टों को झुलसाकर वह अग्नि कहलाता है, और पापियों को रोककर यम कहलाता है। प्रियजनों को धन देकर वह कुबेर, वर देने वाला कहलाता है। धर्म और सद्गुण की शिक्षा देकर गुरु बनता है, और रक्षा का कर्तव्य निभाकर रक्षक।”

उसने राज-धर्म का फल बताया, “जो राजा अपनी प्रजा का आदर करना जानता है, वह न यहाँ दुःख पाता है न परलोक में। जिस राजा की प्रजा सदा चिन्ता से ग्रस्त या करों से दबी और हर प्रकार की विपत्ति से अभिभूत रहती है, वह अपने शत्रुओं के हाथों पराजय पाता है। पर जिस राजा की प्रजा झील में बड़े कमल की तरह फूलती-फलती है, वह यहाँ हर पुरस्कार पाता और अन्त में स्वर्ग में सम्मान पाता है।” अन्त में, “बलवान से शत्रुता, हे राजन, कभी सराही नहीं जाती। जिस राजा ने अपने से अधिक बलवान की शत्रुता मोल ली, वह राज्य और सुख दोनों खो देता है।” इतना कहकर पुजनी ने राजा से विदा ली और अपने चुने हुए प्रदेश को चली गई। भीष्म ने कहा, “हे राजाओं में प्रमुख, मैंने आपको ब्रह्मदत्त और पुजनी का यह संवाद सुना दिया।”

समझने की कुंजी (छठा भाग, और राजा के सात रूप): राजा को प्रजा की उपज का छठा भाग कर के रूप में लेने का विधान है, और बदले में रक्षा का दायित्व, यही कर और रक्षा का परस्पर अनुबन्ध है (आधुनिक समतुल्य, कर के बदले राज्य की सुरक्षा-व्यवस्था)। मनु के अनुसार राजा के सात रूप, माता, पिता, गुरु, रक्षक, अग्नि (दुष्ट-दमन), वैश्रवण/कुबेर (दानशीलता), यम (दण्ड)। ध्यान दीजिए, यह कठोर अविश्वास का उपदेश देने वाली कथा अन्त में प्रजा-पालन के करुण धर्म पर टिकती है, राजा चोर है यदि वह रक्षा न करे।

सार: चिड़िया विदा लेते-लेते राज-धर्म का सार दे जाती है, छह बुरी वस्तुएँ त्याग दें; राजा त्रिवर्ग का मूल है, छठा भाग कर लेकर रक्षा का अनुबन्ध निभाए; मनु के अनुसार वह माता, पिता, गुरु, रक्षक, अग्नि, कुबेर और यम, सातों रूप एक साथ है; और बलवान से बैर सदा विनाश लाता है।

युग के ह्रास और दस्युओं के काल में राजा का धर्म: भरद्वाज और शत्रुंजय

युधिष्ठिर ने अगला प्रश्न रखा, “हे भारत, जब युग के क्रमिक ह्रास से धर्म और मनुष्य दोनों क्षीण होने लगें, और जब संसार दस्युओं (लुटेरों) से पीड़ित हो जाए, तब राजा कैसा आचरण करे?”

भीष्म ने कहा, “हे भारत, मैं आपको बताता हूँ कि ऐसे विकट समय में राजा को कौन-सी नीति अपनानी चाहिए, करुणा को एक ओर रखकर वह कैसे व्यवहार करे। इस सम्बन्ध में भरद्वाज और राजा शत्रुंजय का पुराना संवाद सुनाया जाता है। सौवीर देश में शत्रुंजय नाम का एक राजा था, बड़ा महारथी। भरद्वाज ऋषि के पास जाकर उसने अर्थशास्त्र के सत्य पूछे, अप्राप्त वस्तु कैसे प्राप्त की जाए? प्राप्त होने पर कैसे बढ़ाई जाए? बढ़ने पर कैसे रक्षित की जाए? और रक्षित होने पर कैसे काम में लाई जाए?”

भरद्वाज ऋषि ने उत्तर में दण्ड-नीति का पूरा सूत्र खोला, “राजा को सदा हाथ में दण्ड (चास्ती का सोंटा) उठाए खड़ा रहना चाहिए। उसे सदा अपना पराक्रम प्रकट करना चाहिए। स्वयं निर्दोष रहकर वह शत्रुओं के दोष ताकता रहे, उसकी आँखें सदा इसी काम में लगी रहें। जिस राजा का दण्ड सदा उठा रहता है, उसे देखकर हर कोई भय खाता है। इसी कारण राजा को दण्ड से ही सब प्राणियों पर शासन करना चाहिए। चार उपायों, साम (सान्त्वना), दान, भेद (फूट डालना), और दण्ड में से दण्ड ही परम कहा गया है।”

भरद्वाज ने शत्रु से व्यवहार की गूढ़ बातें बताईं, “जब शत्रु से सम्पर्क का अवसर आए, दूरदर्शी राजा संधि कर ले, पर उस पर आँख मूँदकर विश्वास न करे। काम बन जाने पर वह नए मित्र से शीघ्र मुँह फेर ले। वाणी में राजा नम्रता दिखाए, पर हृदय में उस्तरे की तरह तीखा रहे। समय प्रतिकूल हो तब तक शत्रु को कन्धे पर ढोता रहे; पर अवसर आते ही उसे पत्थर पर मिट्टी के घड़े की तरह चूर-चूर कर दे। राजा को कोयल, सूअर, मेरु पर्वत, खाली कमरे, नट और निष्ठावान मित्र, इन सबका अनुकरण करते हुए अपना हित साधना चाहिए।”

एक उप-कथा: भरद्वाज का “छह का अनुकरण” एक चित्रमय नीति-सूत्र है। राजा कोयल की तरह दूसरों से अपना काम करवाए (कोयल अपने अण्डे दूसरे के घोंसले में पलवाती है)। सूअर की तरह जड़ तक खोदकर निकाले। मेरु पर्वत की तरह अटल रहे। खाली कमरे की तरह नई प्राप्तियों के संचय के लिए सदा स्थान बचाए रखे। नट की तरह अनेक रूप धरे (कभी नम्र, कभी कठोर)। और निष्ठावान मित्र की तरह अपने पक्ष के प्रति सच्चा रहे।

भरद्वाज ने कच्छप और अन्य प्राणियों के दृष्टान्त दिए, “राजा कछुए की तरह अपने अंग समेट ले, अर्थात् अपनी कमज़ोरियाँ (छिद्र) सदा छिपाए। वित्त के सब विषयों पर बगुले की तरह एकाग्र होकर सोचे। सिंह की तरह पराक्रम दिखाए। भेड़िये की तरह घात में बैठे, और बाण की तरह शत्रुओं पर टूटकर बेध दे। मद्य, द्यूत (जुआ), स्त्री, आखेट (शिकार) और संगीत, इन्हें विवेक से ही भोगे, इनकी लत बुरा फल देती है।”

भरद्वाज ने भय और सावधानी का सूत्र दोहराया, “जब तक भय का कारण सचमुच न आ जाए, राजा हर प्रबन्ध ऐसे करे मानो भयभीत हो। पर जब भय सामने आ जाए, तब निर्भय होकर प्रहार करे। बिना संकट उठाए कोई भला नहीं पाता। राजा सब भावी संकटों का पता लगा ले; उपस्थित होने पर उन्हें जीते; और फिर से न उभरें, इसके लिए जीत लेने पर भी उन्हें अजेय मानकर सतर्क रहे।” फिर एक सशक्त उपमा, “जो राजा शत्रु से संधि करके सत्य के भरोसे चैन से सोता है, वह उस मनुष्य जैसा है जो पेड़ की फुनगी पर सोता है और गिरकर ही जागता है।”

समझने की कुंजी (दण्ड-नीति और चार उपाय): दण्ड-नीति = शासन की वह विद्या जिसमें दण्ड (चास्ती की शक्ति) ही व्यवस्था की रीढ़ है। राजनीति के चार उपाय, साम (मीठे वचन/समझाना), दान (देकर वश में करना), भेद (शत्रु-पक्ष में फूट डालना), और दण्ड (बल-प्रयोग)। भरद्वाज इनमें दण्ड को परम मानते हैं, पर साथ ही चेताते हैं कि दण्ड का प्रयोग समय और स्थान देखकर हो; प्रतिकूल समय में पराक्रम व्यर्थ जाता है।

मन्त्र-रक्षा, गुप्तचर और शत्रु-वध की कठोर नीति

भरद्वाज ने राजा को आत्म-गोपन और गुप्तचर-व्यवस्था सिखाई, “राजा ऐसा बरते कि शत्रु उसके छिद्र न पकड़ पाए, पर वह स्वयं शत्रु के छिद्र ताकता रहे। वह अपने शत्रुओं के शत्रुओं का सदा सम्मान करे। अपने गुप्तचरों को भी शत्रु द्वारा नियुक्त चर मानकर बरते, और ध्यान रखे कि उसके अपने गुप्तचर शत्रु द्वारा पहचाने न जाएँ। नास्तिकों और तपस्वियों के वेश में गुप्तचर बनाकर उन्हें शत्रु के प्रदेशों में भेजे।”

उन्होंने अपराधियों के दमन की बात की, “पापी चोर, जो धर्म के नियमों का उल्लंघन करते और हर किसी के पक्ष में काँटे हैं, बगीचों, मनोरंजन-स्थलों, प्याऊ-घरों, सरायों, मधुशालाओं, कुस्थानों, तीर्थों और सार्वजनिक सभाओं में घुसते हैं। इन्हें पहचानकर पकड़ना और दण्डित करना चाहिए।” फिर वही केन्द्रीय सूत्र, “राजा उस पर विश्वास न करे जो विश्वास के योग्य नहीं, और जो योग्य है उस पर भी अधिक विश्वास न करे। भय विश्वास से ही जन्मता है। परीक्षा किए बिना कभी विश्वास न रखे। प्रामाणिक कारणों से शत्रु के मन में विश्वास जगाकर, जब वह एक गलत कदम रखे, तभी राजा उस पर प्रहार करे।”

भरद्वाज ने भय के सूक्ष्म विवेक की बात की, “राजा उससे भी भय रखे जिससे भय का कारण न हो, और उनसे भी भय रखे जिनसे भय रखना ही चाहिए। निर्भय जान पड़ने वाले से जो भय उठता है, वह समूल नाश तक ले जा सकता है।” फिर कठोरतम वचन, “राजा यदि समृद्धि चाहता है, तो पुत्र, भाई, पिता या मित्र को भी मारने में संकोच न करे, यदि इनमें से कोई उसके उद्देश्यों में बाधा डाले। गुरु तक, यदि वह अहंकारी हो, कर्तव्य-अकर्तव्य से अनजान हो, और अधर्म के मार्ग पर चलता हो, तो दण्ड से रोके जाने योग्य है।”

उन्होंने मित्र और शत्रु की क्षणभंगुरता दोहराई, “शत्रु या मित्र नाम की कोई अलग प्रजाति नहीं होती। परिस्थितियों के बल से ही लोग मित्र या शत्रु बनते हैं। राजा शत्रु को उसके करुण विलाप पर भी न बचने दे। उसे इनसे विचलित नहीं होना चाहिए; उल्टे, जिसने अपकार किया उसे नष्ट करना उसका कर्तव्य है।” साथ ही प्रजा के प्रति सद्भाव की बात भी, “समृद्धि चाहने वाला राजा अधिक-से-अधिक मनुष्यों को अपने साथ जोड़े और उनका भला करे। प्रजा के प्रति वह द्वेष-रहित रहे। दुष्ट और असन्तुष्ट जनों को बड़ी सावधानी से रोके और जाँचे।”

भरद्वाज ने तीन अधूरी वस्तुओं का सूत्र दिया, “ऋण का बचा हुआ भाग, अग्नि का न बुझा हुआ अंश, और शत्रुओं का न मारा गया अवशेष, ये बार-बार बढ़ते और फैलते हैं। इसलिए इन तीनों को पूर्णतः बुझा और समूल नष्ट कर देना चाहिए। हर काम पूरी तरह करना चाहिए। काँटे जैसी छोटी वस्तु भी यदि बुरी तरह निकाली जाए, तो हठीला नासूर बना देती है।”

एक उप-कथा: भरद्वाज का “छह पशु-पक्षियों का अनुकरण”, राजा गिद्ध की तरह दूरदर्शी हो (ऊँचे से दूर तक देखे), बगुले की तरह निश्चल (धैर्य से घात लगाए), कुत्ते की तरह सतर्क (सोते में भी चौकन्ना), सिंह की तरह वीर, कौवे की तरह शंकालु (हर ओर भय की कल्पना करे), और साँप की तरह सहजता से बिना घबराए शत्रु के प्रदेश में पैठ जाए। यह वही नीति है जो राजा को एक साथ अनेक स्वभाव धारण करना सिखाती है।

भरद्वाज ने साम और दण्ड का सन्तुलन समझाया, “राजा वीर को हाथ जोड़कर जीते, कायर को भय दिखाकर, और लोभी को धन के दान से; पर बराबरी वाले से युद्ध करे। यदि राजा कोमल हो जाए, प्रजा उसकी अवहेलना करती है; यदि कठोर हो जाए, प्रजा उसे पीड़ा मानती है। नियम यह है कि अवसर कठोरता माँगे तब कठोर हो, और कोमलता माँगे तब कोमल। कोमलता से कोमल को काटा जा सकता है; कोमलता से ही उग्र वस्तु का भी नाश किया जा सकता है। ऐसा कुछ नहीं जो कोमलता न कर सके, इसी से कोमलता उग्रता से भी तीखी कही गई है।”

भरद्वाज ने अन्तिम चेतावनी और सीमा रखी, “ज्ञानी और बुद्धिमान पुरुष से शत्रुता मोल लेकर यह सोचकर निश्चिन्त न हो जाइए कि आप उससे दूर हैं। बुद्धिमान की भुजाएँ बहुत लम्बी होती हैं, जिनसे वह आहत होने पर आहत करता है। जो वस्तु सचमुच पार न की जा सके, उसे पार करने की चेष्टा न कीजिए। जिस वस्तु को शत्रु फिर छीन ले सके, उसे उससे न छीनिए। जहाँ खोदकर जड़ तक न पहुँच सकें, वहाँ खोदिए ही मत। जिसका सिर न काट सकें, उस पर प्रहार ही मत कीजिए।” और फिर वह सीमा-रेखा जो इस सारी कठोर नीति को आपद्-धर्म की कोटि में बाँध देती है, “राजा को सदा इस प्रकार आचरण नहीं करना चाहिए। मैंने जो यह आचरण बताया, वह केवल विपत्ति के समयों में अपनाने योग्य है। आपका भला करने की भावना से ही मैंने यह कहा, ताकि शत्रुओं से घिरने पर आप जान सकें कि कैसे आचरण करें।”

भीष्म ने कथा समेटी, “सौवीर देश के राजा शत्रुंजय ने उस ब्राह्मण के, अपने हित की इच्छा से कहे, इन वचनों को प्रसन्न मन से माना, और अपने कुटुम्बियों तथा मित्रों के साथ देदीप्यमान समृद्धि पाई।”

समझने की कुंजी (आपद्-धर्म की सीमा): यह सारी कठोर नीति, पुत्र-वध तक, गुरु-दण्ड तक, शत्रु पर निर्मम प्रहार तक, आपद्-धर्म है, अर्थात् विपत्ति-काल का धर्म, न कि सामान्य समय का। भरद्वाज स्वयं अन्त में रेखा खींच देते हैं, “राजा को सदा ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए।” यहीं महाभारत की नैतिक जटिलता स्पष्ट होती है, यह क्रूर राजनीति को धर्म ठहराकर नहीं छोड़ता; उसे संकट की सीमा में बाँध देता है। तीन अधूरी वस्तुओं (ऋण, अग्नि, शत्रु) को समूल नष्ट करने का सूत्र इसी कठोर तर्क से उपजा है।

सार: भरद्वाज शत्रुंजय को दण्ड-नीति का पूरा शास्त्र देते हैं, दण्ड चार उपायों में परम; मन्त्र (गुप्त-योजना) और छिद्र छिपाना; नास्तिक-तपस्वी वेश में गुप्तचर; परीक्षा बिना कोई विश्वास नहीं; ऋण-अग्नि-शत्रु को समूल मिटाना; साम-दण्ड का सन्तुलन। पर वे यह सब आपद्-धर्म की सीमा में बाँध देते हैं, “राजा को सदा ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए।” शत्रुंजय इसे मानकर समृद्ध हुआ।

विश्वामित्र और चाण्डाल: भीषण अकाल में जीवन-रक्षा का धर्म

अकाल से पीड़ित, दुबले और हताश विश्वामित्र सूने चाँदनी आकाश के नीचे एक सोते चाण्डाल की झोंपड़ी में रेंगकर घुसते हैं, ताकि प्राण बचाने के लिए कुत्ते के मांस की एक जाँघ उठा लें

युधिष्ठिर ने वह प्रश्न पूछा जो हर युग में लौटता है, “जब उत्तम धर्म क्षीण होकर सबके द्वारा लाँघ दिया जाए, जब अधर्म धर्म बन जाए और धर्म अपने उलटे रूप में आ जाए, जब सब अंकुश टूट जाएँ, जब प्रजा राजाओं और लुटेरों से पीड़ित हो, जब कोई किसी पर विश्वास न करे, जब घर जलाए जाएँ और बादल एक बूँद भी न बरसें, ऐसे घोर संकट के काल में वह ब्राह्मण कैसे जीवित रहे जो अपनी करुणा और अपने बच्चों को त्यागना नहीं चाहता? और राजा ऐसे समय में कैसे जिए कि धर्म और अर्थ दोनों से न गिरे?”

भीष्म ने कहा, “हे महाबाहु, प्रजा की शान्ति-समृद्धि, वर्षा की पर्याप्तता और समयानुकूलता, रोग, मृत्यु और अन्य भय, ये सब राजा पर निर्भर हैं, इसमें मुझे सन्देह नहीं। कृत, त्रेता, द्वापर और कलि, इनका आरम्भ भी राजा के आचरण पर निर्भर है। जब ऐसा दुःख-काल आ जाए, तब धर्मात्मा पुरुष को विवेक के सहारे जीवन टिकाना चाहिए। इस सम्बन्ध में विश्वामित्र और एक चाण्डाल का पुराना संवाद सुनाया जाता है।”

“त्रेता के अन्त और द्वापर के आरम्भ में, देवताओं के विधान से बारह वर्ष तक चलने वाला एक भयावह अकाल पड़ा। सहस्र-नेत्र इन्द्र ने एक बूँद भी न बरसाई। बृहस्पति ग्रह उल्टी चाल चलने लगा, और सोम अपनी कक्षा छोड़कर दक्षिण की ओर खिसक गया। बादलों की बात तो दूर, ओस की एक बूँद तक न दिखती थी। नदियाँ सिकुड़कर पतली धाराएँ रह गईं। झीलें, कुएँ और सोते सूख गए। जल दुर्लभ हो जाने से दान की प्याऊएँ उजड़ गईं। ब्राह्मणों ने यज्ञ और वेद-पाठ छोड़ दिए। खेती और पशु-पालन बन्द हो गए। हाट-बाज़ार सूने पड़ गए। चारों ओर हड्डियों के ढेर दिखते और हर स्थान हिंसक जीवों की चीख से गूँजता। नगर और गाँव खाली हो गए। भूख से लोग आपा खोकर एक दूसरे को खाने लगे। ऋषि तक अपने व्रत और अग्नि छोड़कर भोजन की खोज में भटकने लगे।”

“महान ऋषि विश्वामित्र, अपनी पत्नी और पुत्र को किसी आश्रय में छोड़कर, अग्निहीन और गृहहीन होकर, शुद्ध-अशुद्ध भोजन की परवाह छोड़कर भटक रहे थे। एक दिन वे वन के बीच एक ऐसी बस्ती में पहुँचे जहाँ क्रूर बहेलिए, जो जीव-वध के अभ्यस्त थे, रहते थे। वह छोटी बस्ती टूटे घड़ों-मटकों से भरी थी। जगह-जगह कुत्ते की खालें फैली थीं। सूअरों और गधों की हड्डियाँ और खोपड़ियाँ ढेर लगी थीं। मुर्दों से उतारे कपड़े पड़े थे, और झोंपड़ियाँ मुरझाए फूलों की मालाओं से सजी थीं।”

“कुशिक-पुत्र विश्वामित्र भूख से व्याकुल होकर उस बस्ती में घुसे और भोजन ढूँढ़ने का भरसक यत्न किया। बार-बार माँगने पर भी उन्हें न माँस मिला, न चावल, न फल, न कन्द, न कोई और भोजन। तब ‘हाय, मुझ पर घोर विपत्ति आ पड़ी!’ कहते हुए वे दुर्बलता से उसी बस्ती में गिर पड़े। ऋषि सोचने लगे, ‘अब मेरे लिए क्या उचित है?’ उन्होंने एक चाण्डाल की झोंपड़ी के फ़र्श पर शस्त्र से हाल ही में मारे गए कुत्ते का एक बड़ा माँस-खण्ड (जाँघ का टुकड़ा) फैला देखा। ऋषि ने विचार कर निश्चय किया कि वे यह माँस चुराएँगे।”

विश्वामित्र ने स्वयं से तर्क किया, “अब जीवन टिकाने का कोई उपाय नहीं रहा। विपत्ति-काल में चोरी श्रेष्ठ पुरुष के लिए भी विहित है, इससे उसकी कीर्ति घटती नहीं। ब्राह्मण भी प्राण-रक्षा के लिए यह कर सकता है, यह निश्चित है। पहले नीच से चुराना चाहिए; ऐसा न मिले तो समान से; वह भी न हो तो श्रेष्ठ और धर्मात्मा से भी। मेरा जीवन ही ढल रहा है, इस समय मैं यह माँस चुराऊँगा।” यह निश्चय कर वे वहीं सो गए। आधी रात गए, जब सारी बस्ती सो गई, ऋषि चुपके से उठकर उस झोंपड़ी में घुसे। पर उसका स्वामी चाण्डाल, आँखों में कीचड़ लिए, सोता-सा लेटा था, पर जाग रहा था। उसने कर्कश स्वर में पूछा, “कौन है जो साँकल खोल रहा है? सारी चाण्डाल-बस्ती सोई है, पर मैं जाग रहा हूँ। जो भी हो, आप मारे जाएँगे।”

लज्जा से लाल मुख और चोरी के प्रयत्न से व्याकुल हृदय लिए विश्वामित्र ने उत्तर दिया, “हे दीर्घायु, मैं विश्वामित्र हूँ। भूख की पीड़ा से यहाँ आया हूँ। हे धर्मबुद्धि वाले, यदि आपकी दृष्टि स्वच्छ हो, तो मुझे न मारिए।” चाण्डाल भय से उठा, ऋषि के पास आया, और हाथ जोड़कर, आँखों में आँसू भरकर बोला, “रात में आप यहाँ क्या खोज रहे हैं, हे ब्राह्मण?” विश्वामित्र ने कहा, “मैं अत्यन्त भूखा हूँ और भुखमरी से मरने को हूँ। मैं वह कुत्ते की जाँघ का माँस ले जाना चाहता हूँ। भूख ने मुझे पापी बना दिया है। भोजन का अभिलाषी निर्लज्ज हो जाता है। भूख ने मेरा वेद-ज्ञान नष्ट कर दिया है। मैं दुर्बल हूँ, सुध खो बैठा हूँ। शुद्ध-अशुद्ध का अब मुझे कोई विचार नहीं।”

तब उस चाण्डाल और ब्राह्मण के बीच धर्म पर एक विलक्षण विवाद छिड़ा, जहाँ नीच जाति का माना गया चाण्डाल धर्म-रक्षक की भूमिका में आ जाता है और श्रेष्ठ ऋषि नियम-भंग का पक्ष लेते हैं। चाण्डाल ने रोका, “सुनिए। ऐसा कीजिए कि आपका धार्मिक पुण्य नष्ट न हो। बुद्धिमान कहते हैं कि कुत्ता गीदड़ से भी अधिक अशुद्ध है, और कुत्ते की जाँघ उसके शरीर के अन्य भागों से भी बुरी। यह आपने ठीक नहीं सोचा। हे महर्षि, यह कर्म धर्म के विरुद्ध है, यह एक चाण्डाल की वस्तु की चोरी है, और वह भी अशुद्ध भोजन की चोरी। कृपया प्राण-रक्षा का कोई और उपाय खोजिए। कुत्ते के माँस की इस तीव्र इच्छा से अपनी तपस्या नष्ट न होने दीजिए।”

विश्वामित्र ने तर्क रखा, “बहुत समय बीत गया, मैंने कुछ नहीं खाया। प्राण बचाने का और कोई उपाय नहीं दिखता। मरते समय मनुष्य को हर सम्भव उपाय से, उसके भले-बुरे का विचार किए बिना, अपना जीवन बचाना चाहिए। बाद में, समर्थ होने पर, पुण्य की खोज करनी चाहिए। जीवन मृत्यु से श्रेष्ठ है। जीवित रहकर मनुष्य पुण्य कमा सकता है। वेद ही मेरा बल हैं। मैं इस अशुद्ध भोजन को भी भूख शान्त करने के लिए खाऊँगा। बाद में तप और ज्ञान से इस आचरण के दोष को वैसे ही नष्ट कर दूँगा जैसे आकाश के नक्षत्र घोर अन्धकार को।”

चाण्डाल ने अनेक बार रोका, “इस भोजन से न दीर्घ आयु मिलती है, न बल, न वह तृप्ति जो अमृत देता है। कोई और भिक्षा खोजिए। आपका मन कुत्ते का माँस खाने को न झुके। पाँच नखों वाले केवल पाँच प्रकार के पशु ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए शुद्ध भोजन कहे गए हैं, जैसा शास्त्रों में है। जो अशुद्ध है, उस पर मन न लगाइए।” विश्वामित्र ने उत्तर दिया कि महर्षि अगस्त्य ने भूख में वातापि असुर को खा लिया था, और कि वे विपत्ति में पड़े हैं, इसलिए यह माँस खाएँगे।

विवाद तीखा होता गया। चाण्डाल कहता रहा कि अशुद्ध की चोरी और भक्षण से ब्राह्मण अपने उच्च पद से गिर जाता है, और कि वह केवल मित्र-भाव से, उसके हित के लिए यह उपदेश दे रहा है। विश्वामित्र ने अन्ततः अपना अन्तिम तर्क रखा, “स्वीकार करने या खाने में पाप है, यह सच। पर जब किसी का जीवन संकट में हो, तब ऐसा दान लेने या ऐसा भोजन खाने में पाप नहीं। और अशुद्ध भोजन, जब उसमें वध और छल न हो और वह केवल हल्की निन्दा का कारण बने, तब अधिक गम्भीर बात नहीं।” चाण्डाल ने अन्त में कहा, “अपने वर्ण या जाति के कर्तव्यों के पालन में मनुष्य स्वयं ही अपना न्यायाधीश है। आप स्वयं जानते हैं कि इन दोनों में से कौन-सा कर्म पापमय है।” इतना कहकर चाण्डाल मौन हो गया।

“भीष्म ने आगे कहा, कुशिक-पुत्र विश्वामित्र ने तब वह कुत्ते की जाँघ का माँस उठा लिया। प्राण बचाने के लिए उसे लेकर वे वन में गए और पत्नी के साथ खाने का विचार किया। उन्होंने निश्चय किया कि पहले विधिपूर्वक देवताओं को तृप्त करके ही वे उसे खाएँगे। ब्रह्म-विधि से अग्नि प्रज्वलित कर, ऐन्द्राग्नेय नामक रीति से उन्होंने उस माँस को यज्ञ-चरु के रूप में पकाया। उन्होंने उसे शास्त्र के विधान अनुसार कई भागों में बाँटकर इन्द्र-आदि देवताओं और पितरों के सम्मान में आहुति देनी आरम्भ की।”

“इसी बीच, देवराज इन्द्र मूसलधार बरसने लगे। उन वर्षाओं से सब प्राणियों को पुनर्जीवित करते हुए उन्होंने पौधों और जड़ी-बूटियों को फिर उगा दिया। विश्वामित्र, देवताओं और पितरों के लिए विधि पूरी कर और उन्हें तृप्त कर, स्वयं वह माँस खाए। बाद में अपने तप से सब पापों को भस्म कर, बहुत काल पश्चात उस ऋषि ने परम विलक्षण तप-सिद्धि प्राप्त की। भीष्म ने सार दिया, इसी प्रकार, जब उद्देश्य जीवन की रक्षा ही हो, तब विद्या और उपाय जानने वाला उच्च-आत्मा पुरुष अपने को विपत्ति से अपने हर बल से उबार ले। जीवित रहने पर ही मनुष्य धर्म-पुण्य कमाता और सुख-समृद्धि भोगता है। इसी कारण, हे कुन्ती-पुत्र, ज्ञानी और शुद्ध-आत्मा पुरुष धर्म और अधर्म का विवेक करते हुए अपनी ही बुद्धि के सहारे इस संसार में जिए और कर्म करे।”

समझने की कुंजी (आपद्-धर्म और भक्ष्य-अभक्ष्य): यह कथा आपद्-धर्म का चरम उदाहरण है, जो सामान्यतः घोर पाप है (चोरी, और ब्राह्मण के लिए कुत्ते का माँस, परम अशुद्ध भोजन), वह बारह-वर्षीय अकाल जैसी विपत्ति में जीवन-रक्षा हेतु विहित हो जाता है। ध्यान दीजिए, महाभारत यहाँ वर्ण के सरल चित्र को उलट देता है, “नीच” चाण्डाल धर्म का पक्ष लेता है और महर्षि विश्वामित्र नियम तोड़ने का। पाँच-नखी पाँच पशुओं का नियम, और अगस्त्य द्वारा वातापि-भक्षण का दृष्टान्त, सब इसी भक्ष्य-अभक्ष्य के विवाद के अंग हैं। यह नैतिक खुरदरापन ही महाभारत का स्वर है, धर्म एक-रंगा नहीं।

एक उप-कथा: विवाद के बीच विश्वामित्र अगस्त्य और वातापि का दृष्टान्त उठाते हैं। वातापि नामक असुर अपने भाई इल्वल के साथ ब्राह्मणों को छलकर मारता था, इल्वल वातापि को मेढ़े का रूप देकर अतिथि को खिलाता और फिर पुकारता, जिससे वातापि पेट फाड़कर निकल आता। पर अगस्त्य ने भोजन के तुरन्त बाद वातापि को पचा डाला, “जीर्ण हो जाओ”, और वह फिर न उठ सका। विश्वामित्र इसे प्रमाण मानते हैं कि ऋषि का किया कर्म पाप नहीं बनता; चाण्डाल इसका उत्तर देता है कि अगस्त्य ने वह ब्राह्मणों के अनुरोध और धर्म-रक्षा के लिए किया था, इसलिए वह पाप नहीं था।

सार: बारह वर्ष के अकाल में भूख से मरते विश्वामित्र चाण्डाल की झोंपड़ी से कुत्ते का माँस चुराने को विवश होते हैं। चाण्डाल बार-बार रोकता है, ऋषि आपद्-धर्म का तर्क देते हैं। अन्त में वे माँस लेकर पहले देवताओं-पितरों को आहुति देते हैं, और तभी इन्द्र बरस पड़ते हैं और सृष्टि पुनर्जीवित हो जाती है। भीष्म का निष्कर्ष, संकट में जीवन-रक्षा के लिए ज्ञानी अपनी बुद्धि के सहारे धर्म-अधर्म का विवेक करे, क्योंकि जीवित रहकर ही पुण्य कमाया जाता है।

सत्य के तेरह रूप: युधिष्ठिर का प्रश्न और भीष्म का उत्तर

शर-शय्या पर लेटे पितामह भीष्म तप की महिमा कह चुके थे। युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा, “पितामह! ब्राह्मण, ऋषि, पितर और देवता, सभी सत्य के धर्म की प्रशंसा करते हैं। हम सत्य के विषय में सुनना चाहते हैं। उसके लक्षण क्या हैं? वह कैसे प्राप्त होता है? और उसके आचरण से क्या मिलता है? यह सब हमें बताइए।”

भीष्म शरशय्या से उँगली उठाकर उपदेश देते; युधिष्ठिर हाथ जोड़े घुटनों पर बैठे, कृष्ण पीछे खड़े देखते।

भीष्म बोले, “चारों वर्णों के धर्म का घालमेल कभी सराहा नहीं जाता। जिसे सत्य कहते हैं, वह इन चारों वर्णों में से प्रत्येक में शुद्ध और अमिश्रित रूप से सदा विद्यमान रहता है। साधु पुरुषों के लिए सत्य ही सनातन धर्म है। सत्य को नमन करना चाहिए। सत्य परम आश्रय है। सत्य ही धर्म है, सत्य ही तप है, सत्य ही योग है, और सत्य ही सनातन ब्रह्म है। सत्य को उच्च कोटि का यज्ञ कहा गया है। सब कुछ सत्य पर ही टिका है।

“हे भारत! जैसा सत्य इस संसार में रहता है, वह तेरह प्रकार का है। सत्य के जो रूप हैं वे ये हैं: समता (पक्षपात-रहित दृष्टि), आत्म-संयम, क्षमा, विनय (लज्जा), सहनशीलता, भलाई (साधुता), त्याग, चिन्तन (ध्यान), गरिमा, धैर्य, करुणा, और अहिंसा। हे महाराज! ये ही सत्य के तेरह रूप हैं। सत्य अचल है, शाश्वत है, और अपरिवर्तनीय है। इसे ऐसे आचरणों से पाया जा सकता है जो अन्य किसी सद्गुण से टकराते न हों, और योग के द्वारा भी।

“जब राग और द्वेष, तथा काम और क्रोध नष्ट हो जाते हैं, तब जिस गुण के कारण मनुष्य अपने और अपने शत्रु को, अपने भले और बुरे को, एक-सी अविचल दृष्टि से देख पाता है, वह समता कहलाती है। आत्म-संयम वह है जिसमें मनुष्य दूसरे की वस्तुओं की कभी कामना नहीं करता, गम्भीर और धैर्यवान रहता है, और अपने विषय में दूसरों के भय को शान्त कर पाता है। यह ज्ञान से प्राप्त होता है। उदारता के अभ्यास और सब कर्तव्यों के पालन को मनीषी सद्भाव कहते हैं। सत्य में निरन्तर लगे रहने से मनुष्य सर्वजन के प्रति सद्भाव पा लेता है।

“क्षमा वह गुण है जिससे एक श्रेष्ठ और साधु पुरुष प्रिय और अप्रिय, दोनों को सह जाता है। यह सत्य के अभ्यास से ही प्राप्त होती है। विनय वह गुण है जिसके कारण बुद्धिमान मनुष्य मन और वाणी में सन्तुष्ट रहकर अनेक भले काम करता है और दूसरों की निन्दा का पात्र कभी नहीं बनता; यह धर्म की सहायता से मिलता है। सहनशीलता वह है जो धर्म और लाभ के लिए क्षमा करती है; यह धैर्य से प्राप्त होती है और इसका प्रयोजन लोगों को अपने प्रति आकृष्ट करना है। स्नेह तथा सब सांसारिक सम्पत्तियों का परित्याग त्याग कहलाता है; त्याग उसी को मिलता है जो क्रोध और द्वेष से रहित हो।

“वह गुण जिसके कारण मनुष्य सावधानी और चिन्ता के साथ सब प्राणियों का भला करता है, साधुता कहलाता है; इसका कोई विशेष रूप नहीं, यह सब स्वार्थपूर्ण आसक्तियों के त्याग में है। वह गुण जिसके कारण मनुष्य सुख और दुःख में अविचल रहता है, धैर्य कहलाता है। जो बुद्धिमान अपना भला चाहता है वह सदा इस गुण का अभ्यास करता है। हे भारत! मन, वचन और कर्म से सब प्राणियों के प्रति अहिंसा, दया और दान, ये साधु पुरुषों के सनातन कर्तव्य हैं। ये तेरह गुण देखने में भिन्न जान पड़ते हैं, पर इन सबका एक ही रूप है, और वह है सत्य।

“सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं, और असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं। सत्य ही धर्म की नींव है। इसी से ब्राह्मण, पितर और देवता सत्य की प्रशंसा करते हैं। एक समय की बात है, एक हज़ार अश्वमेध यज्ञ और सत्य, इन दोनों को तराज़ू पर तौला गया। सत्य एक हज़ार अश्वमेध यज्ञों से भारी निकला।”

समझने की कुंजी (सत्य के तेरह रूप): भीष्म “सत्य” को केवल वाणी की सच्चाई तक सीमित नहीं रखते। उनके लिए सत्य एक नैतिक धुरी है जिसके तेरह व्यावहारिक रूप हैं: समता, आत्म-संयम, क्षमा, विनय, सहनशीलता, साधुता, त्याग, ध्यान, गरिमा, धैर्य, करुणा, अहिंसा (और मूल सद्भाव)। यानी सत्य = ब्रह्म से जुड़ा एक चरित्र, न कि बस झूठ न बोलना। अश्वमेध = प्राचीन राजसूय-कोटि का घोड़े का यज्ञ, जिसे महान पुण्य का मानक माना जाता था; एक हज़ार ऐसे यज्ञों से भी सत्य को भारी बताना उसकी परम प्रतिष्ठा दर्शाता है।

सार: भीष्म बताते हैं कि सत्य ही धर्म, तप, योग और ब्रह्म है। उसके तेरह रूप हैं, और उसे राग-द्वेष तथा काम-क्रोध के नाश से, सद्गुणों के अभ्यास से और योग से पाया जाता है। तराज़ू पर सत्य हज़ार अश्वमेधों से भारी है।

तेरह दोष: क्रोध, काम और उनके भाई-बन्धु

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे महाज्ञानी, भरतश्रेष्ठ! हमें वह सब बताइए जिससे क्रोध और काम उत्पन्न होते हैं, तथा शोक, बुद्धि-नाश, दूसरों का अनिष्ट करने की प्रवृत्ति, ईर्ष्या, द्वेष, अभिमान, डाह, निन्दा, दूसरों का भला न सह पाना, निर्दयता और भय। इन सबके विषय में सच-सच और विस्तार से कहिए।”

भीष्म बोले, “ये तेरह दोष सब प्राणियों के अत्यन्त बलवान शत्रु माने जाते हैं। हे राजन्! ये हर ओर से आकर मनुष्यों को ललचाते हैं। ये असावधान या जड़-बुद्धि मनुष्य पर ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे भेड़िये अपने शिकार पर। इन्हीं से सब प्रकार के शोक और सब प्रकार के पाप उपजते हैं। अब हम आपको इनके मूल, इनके आश्रय, और इनके नाश के उपाय बताते हैं।

“क्रोध लोभ से उत्पन्न होता है। दूसरों के दोषों से वह बढ़ता है। क्षमा से सोया रहता है, और क्षमा से ही नष्ट होता है। काम संकल्प से जन्म लेता है; भोग से बढ़ता है; जब बुद्धिमान दृढ़ता से उससे मुँह मोड़ लेता है, तब वह मर जाता है। दूसरों के प्रति डाह क्रोध और लोभ के बीच से उपजता है; करुणा और आत्म-ज्ञान से वह मिट जाता है। बुद्धि-नाश अज्ञान और बुरी आदतों से जन्मता है; जब मनुष्य ज्ञानियों की संगति में आनन्द लेने लगता है, तब यह दोष तुरन्त सिर छिपा लेता है।

“हे कुरुनन्दन! मनुष्य परस्पर-विरोधी शास्त्र देखते हैं, इसी से भाँति-भाँति के कर्मों की इच्छा उपजती है; सच्चा ज्ञान होने पर वह इच्छा शान्त हो जाती है। देहधारी का शोक वियोग से जागे हुए स्नेह से उपजता है; जब मनुष्य जान लेता है कि मरे हुए लौटते नहीं, तब वह शान्त हो जाता है। दूसरों का भला न सह पाना क्रोध और लोभ से उपजता है; सब प्राणियों पर दया और सांसारिक वस्तुओं के प्रति उपेक्षा से वह बुझ जाता है। द्वेष सत्य के त्याग और दुष्टता में रमने से उपजता है; साधु-संगति से वह नष्ट हो जाता है।

“मनुष्यों में अभिमान जन्म, विद्या और सम्पन्नता से उपजता है; जब इन तीनों का सच्चा स्वरूप जान लिया जाता है, तब वह दोष तुरन्त मिट जाता है। डाह काम और नीच लोगों में रुचि से उपजती है; ज्ञान से उसका नाश होता है। निन्दा अनुचित आचरण और द्वेषपूर्ण कटु वचनों से उपजती है; सारे संसार पर दृष्टि डालने से वह मिट जाती है। जब अपकार करने वाला बलवान हो और सताया हुआ बदला लेने में असमर्थ, तब घृणा प्रकट होती है; सौजन्य से वह शान्त होती है। संसार में भरे असहाय और दुखी लोगों को देखकर करुणा उपजती है; और जब मनुष्य धर्म के बल को समझ लेता है, तब वह भाव शान्त हो जाता है। लोभ अज्ञान से उपजता है; सब भोग्य वस्तुओं की अनित्यता देखने से उसका नाश होता है। कहा गया है कि केवल आत्मा की शान्ति ही इन तेरहों दोषों को वश में कर सकती है। ये तेरहों दोष धृतराष्ट्र-पुत्रों को कलंकित करते थे। आप, सदा सत्य के अभिलाषी, बड़ों के प्रति आदर के कारण इन सब दोषों को जीत चुके हैं।”

समझने की कुंजी (दोषों का वंश-वृक्ष): भीष्म दोषों को एक-दूसरे से उपजते दिखाते हैं। क्रोध ← लोभ; काम ← संकल्प; डाह ← क्रोध+लोभ; अभिमान ← जन्म+विद्या+धन। हर दोष की एक “औषधि” भी है (क्षमा, ज्ञान, करुणा, साधु-संगति)। और सबकी जड़ का एक ही इलाज है: आत्मा की शान्ति। यह नीति-शास्त्र का मनोवैज्ञानिक पक्ष है, राजा को पहले अपने भीतर के शत्रु जीतने हैं, तब बाहर के।

सार: क्रोध, काम और उनके ग्यारह संगी मनुष्य के भीतरी शत्रु हैं। प्रत्येक का मूल और उसकी काट जानकर, और अन्ततः आत्म-शान्ति पाकर, इन्हें जीता जाता है। युधिष्ठिर इन्हें पहले ही जीत चुके हैं, यही उनकी पात्रता है।

दुष्ट और कृतघ्न मनुष्य के लक्षण

युधिष्ठिर ने कहा, “हे भारत! साधु पुरुषों को देखकर हम सद्भाव को तो जानते हैं, पर दुष्टों को और उनके कर्मों के स्वरूप को नहीं जानते। लोग ऐसे क्रूरकर्मा दुष्टों से वैसे बचते हैं जैसे काँटों, गड्ढों और आग से। ऐसा मनुष्य निश्चय ही यहाँ और परलोक में दुःख से जलता है। इसलिए, हे कुरुनन्दन! ऐसे मनुष्य के कर्म वस्तुतः कैसे होते हैं, यह हमें बताइए।”

भीष्म बोले, “दुष्ट सदा बुरे कर्म करते हैं और उनके लिए दुर्निवार झुकाव रखते हैं। वे दूसरों की निन्दा करते हैं और स्वयं अपयश पाते हैं। वे सदा अपने को ठगा-सा अनुभव करते हैं। दुष्ट अपने दान-पुण्य की डींग हाँकता है। वह दूसरों को द्वेष-भरी आँखों से देखता है। वह अति नीच, छली और कपटी होता है। वह किसी का हक नहीं देता। वह अहंकारी होता है, बुरी संगति रखता है और सदा आत्म-प्रशंसा में लगा रहता है। जिनसे भी सम्पर्क हो, उन सब से डरता और सबको शक की दृष्टि से देखता है। वह मूढ़-बुद्धि होता है, कंजूसी करता है, अपने साथियों की चापलूसी करता है, और वनवासी संन्यासियों से अकारण द्वेष रखता है।

“वह दूसरों को सताने में आनन्द पाता है। दूसरों के गुण-दोष का विवेक उसमें नहीं। वह झूठ से भरा, असन्तुष्ट, अत्यन्त लोभी और सदा क्रूर रहता है। वह सद्गुणी और सुयोग्य पुरुष को भी कीट समझता है, और सबको अपने ही समान मानकर किसी पर विश्वास नहीं करता। वह दूसरों के दोष, चाहे वे कितने ही अनुमान से परे हों, सर्वत्र प्रकट करता है; पर अपने दोषों के समान दोषों को, अपने लाभ के लिए, छू तक नहीं देता। जो उसका भला करता है, उसे वह भोला समझता है जिसे उसने चतुराई से ठग लिया। वह इस बात के लिए पछताता है कि कभी उसने किसी उपकारी को भी धन दिया।

“उसे दुष्ट और पापी जानिए जो चुपके से, अकेला, उत्तम भोजन और पेय हड़प जाता है, जबकि पास खड़े लोग ललचाई आँखों से ताकते रहते हैं। और वह, जो पहला अंश ब्राह्मणों को अर्पित कर शेष को मित्रों और बन्धुओं में बाँटकर खाता है, परलोक में महान सुख और इस लोक में अनन्त आनन्द पाता है। हे भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान को ऐसे मनुष्य से सदा बचना चाहिए।”

सार: दुष्ट के लक्षण हैं: निन्दा, छल, अविश्वास, आत्म-प्रशंसा, उपकारी के प्रति भी कृतघ्नता, और अकेले भोग। उसकी पहचान कर बुद्धिमान को उससे दूरी रखनी चाहिए, क्योंकि वह यहाँ और परलोक, दोनों में जलता है।

दान, याजन और प्रायश्चित का धर्म

भीष्म ने आगे कहा, “जो ब्राह्मण पवित्र पर निर्धन हों, जिनका धन चोरों ने लूट लिया हो, जो यज्ञ करते हों, वेदों के पारंगत हों, धर्म-पुण्य के अभिलाषी हों, और गुरुजनों तथा पितरों के ऋण चुकाकर शास्त्रों के अध्ययन में दिन बिताना चाहते हों, उन्हें धन और विद्या देनी चाहिए। जो ब्राह्मण निर्धन नहीं, उन्हें केवल दक्षिणा देनी चाहिए। जो अपने पापकर्मों से ब्राह्मणत्व से गिर चुके हों, उन्हें यज्ञ-वेदी की सीमा के बाहर बिना पका अन्न देना चाहिए।

“राजा को चाहिए कि वह ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के बहुमूल्य धन का दान करे। जिस ब्राह्मण के पास तीन या अधिक वर्षों तक परिवार के भरण-पोषण की सामग्री हो, वही सोमपान का अधिकारी है। यदि विद्यमान धर्मात्मा राजा के रहते किसी ब्राह्मण का आरम्भ किया यज्ञ केवल चौथाई व्यय के अभाव में पूरा न हो पा रहा हो, तो राजा उस यज्ञ की पूर्ति के लिए किसी ऐसे वैश्य के बन्धुओं से धन ले ले जो विपुल गोधन रखता हो पर यज्ञ-विमुख और सोमपान से विरत हो। शूद्र को यज्ञ का अधिकार नहीं, अतः राजा हमारे किसी शूद्र-गृह से भी ऐसे प्रयोजन के लिए धन ले सकता है। जो सौ गायें रखकर भी यज्ञ न करे, अथवा हज़ार गायें रखकर भी यज्ञ से विरत रहे, राजा उसके बन्धुओं से बेखटके धन ले ले।

“अब फिर सुनिए। जिस ब्राह्मण को अभाव के कारण छह समय (तीन दिन) तक भोजन न मिला हो, वह बिना अनुमति, केवल आज की चिन्ता करने वाले की रीति से, एक बार के भोजन-भर की वस्तु धान कूटने के ओखल से, या खेत से, या बाग से, या किसी नीच पुरुष के स्थान से भी ले सकता है। पर उसे पूछे जाने पर या बिना पूछे, राजा को अपने इस कर्म की सूचना दे देनी चाहिए। यदि राजा धर्मज्ञ हो, तो वह ऐसे ब्राह्मण को दण्ड न दे; उसे स्मरण रहे कि ब्राह्मण भूख से क्षत्रिय (राजा) के दोष से ही पीड़ित होता है। ब्राह्मण की विद्या और आचरण जानकर राजा उसके लिए व्यवस्था करे, और उसे अपने औरस पुत्र की भाँति पाले।

“वेदज्ञ ब्राह्मण को राजा के समक्ष अपने तेज और ज्ञान का बखान कभी नहीं करना चाहिए; राजा का ही कर्तव्य है कि वह स्वयं उसे पहचाने। ब्राह्मण के तेज की तुलना राजा के तेज से करें तो ब्राह्मण ही श्रेष्ठ ठहरता है; इसीलिए राजा से ब्राह्मण का तेज सहा या रोका नहीं जा सकता। ब्राह्मण को सृष्टा, शासक, विधाता और देव कहा गया है। उसे कोई गाली या रूखी बात न कहे। क्षत्रिय अपने बाहुबल से अपनी कठिनाइयाँ पार करे; वैश्य और शूद्र धन से; और ब्राह्मण मन्त्र और होम से।

“इसके पश्चात भीष्म ने अनेक प्रायश्चितों का वर्णन किया। उन्होंने कहा, हँसी में बोला झूठ, स्त्री से कहा गया, विवाह के अवसर पर, गुरु के हित में, या अपने प्राण बचाने के लिए कहा गया झूठ, ये पाँच प्रकार के झूठ पाप नहीं माने जाते। नीच पुरुष से भी भक्ति और आदर के साथ उपयोगी ज्ञान लिया जा सकता है। अशुद्ध स्थान से भी बेखटके सोना उठाया जा सकता है। नीच कुल से भी स्त्री-रत्न ग्रहण की जा सकती है। विष से निकाला अमृत पिया जा सकता है; शास्त्र के अनुसार स्त्री, रत्न और जल कभी अशुद्ध नहीं होते।

“मद्यपान, ब्रह्म-हत्या, और गुरु-शय्या का दूषण, ये जान-बूझकर किए जाएँ तो इनका कोई प्रायश्चित नहीं; इनके लिए मृत्यु ही एकमात्र प्रायश्चित कही गई है। यही बात सोना चुराने और ब्राह्मण का धन चुराने के विषय में है। इन पाँच महापापों को छोड़कर शेष सब पापों के प्रायश्चित हैं। प्रायश्चित कर लेने पर मनुष्य को उन पापों में फिर नहीं पड़ना चाहिए। किसी चोर को चोर कहने से चोरी का पाप लगता है; और जो चोर नहीं उसे चोर कहने से चोरी का दुगुना पाप। ब्राह्मण की निन्दा या उस पर प्रहार करने वाला सौ वर्ष अपयश में डूबता है; ब्राह्मण-हत्या करने वाला हज़ार वर्ष नरक में गिरता है।

“फिर उन्होंने भिन्न-भिन्न पापों के लिए ब्रह्मचर्य-व्रत, चान्द्रायण, गो-दान, यज्ञ और कठोर तप के रूप में अनेक प्रायश्चित बताए। एक वर्ष के भीतर प्रायश्चित न करने वाला मूल पाप का दुगुना दोष पाता है। ये सब सनातन विधान उस ब्राह्मण के लिए हैं जिसने ये पाप अज्ञान और विवेक के अभाव से किए हों।”

समझने की कुंजी (आपद्धर्म और कोष-नीति): यह खण्ड आपद्धर्म (संकट-काल का धर्म) के पास है। राजा का कोष-धर्म यहाँ कठोर वर्ण-व्यवस्था से जुड़ा है: यज्ञ-विमुख धनिकों से बलपूर्वक धन लेकर भी राजा को याज्ञिक ब्राह्मण का अधूरा यज्ञ पूरा कराना है। दक्षिणा = यज्ञ/दान के अन्त में दी जाने वाली भेंट। सोमपान = सोम-यज्ञ का अधिकार, जो अन्न-संग्रह की एक न्यूनतम स्थिति पर निर्भर है। आधुनिक समतुल्य: “छह समय बिना भोजन” यानी लगभग तीन दिन का उपवास, जिसके बाद जीवन-रक्षा हेतु अन्न लेना अपवाद-धर्म बनता है। ध्यान दें: यह वर्णन अपने युग की सामाजिक संरचना को ज्यों-का-त्यों दर्ज करता है, उसके कठोर भेद और दण्ड समेत; महाभारत इसे न छिपाता है, न सरल बनाता है।

सार: राजा का धर्म है पात्र ब्राह्मणों को धन-विद्या देना और यज्ञ-धर्म की रक्षा करना, चाहे इसके लिए यज्ञ-विमुख धनिकों से कोष भरना पड़े। साथ ही भीष्म पाँच क्षम्य झूठ, पाँच अप्रायश्चित्य महापाप, और शेष पापों के प्रायश्चितों का विस्तृत विधान गिनाते हैं।

नकुल का प्रश्न: तलवार की उत्पत्ति और असि का आख्यान

बाणों की शय्या के पास घुटनों पर बैठे नकुल भीष्म से तलवार की उत्पत्ति पूछते हैं; साथ में एक दृश्य, जिसमें पहली दहकती तलवार यज्ञ की अग्नि से एक उग्र प्राणी के रूप में उठती है

इस उपदेश के पूरा होने पर, खड्ग-विद्या में निपुण नकुल ने शर-शय्या पर लेटे कुरु-पितामह से पूछा, “पितामह! इस संसार में धनुष ही श्रेष्ठ शस्त्र माना जाता है। पर हमारा मन तलवार की ओर झुकता है, क्योंकि धनुष कट या टूट जाने पर, घोड़े मर या थक जाने पर, खड्ग में निपुण योद्धा अपनी तलवार से अपनी रक्षा कर सकता है। तलवारधारी वीर अकेला अनेक धनुर्धरों और गदा-शूल-धारियों का सामना कर सकता है। हमें यह संशय है: सब युद्धों में वस्तुतः श्रेष्ठ शस्त्र कौन है? तलवार पहले कैसे और किसलिए बनी? और इस शस्त्र का प्रथम आचार्य कौन था? यह सब बताइए।”

माद्री-पुत्र के ये वचन सुनकर, धनुर्विद्या के पूर्ण ज्ञाता भीष्म ने मधुर और कुशल वचनों में उत्तर दिया, “हे माद्री-पुत्र! जो आपने पूछा है उसका सत्य सुनिए। आदि-काल में यह विश्व जल का एक विशाल विस्तार था, गतिहीन और आकाश-रहित, अन्धकार में ढका, अमाप्य। अपने यथोचित समय में विश्व-पितामह (ब्रह्मा) ने जन्म लिया। उन्होंने वायु, अग्नि, तेजस्वी सूर्य, आकाश, स्वर्ग, पाताल, पृथ्वी, दिशाएँ, चन्द्र-तारों सहित आकाश-मण्डल, नक्षत्र, ग्रह, वर्ष, ऋतुएँ, मास और काल के सूक्ष्म विभाग रचे।

“फिर उन्होंने अपनी इच्छा-शक्ति से कुछ महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न किए, ऋषि मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, अंगिरा, महान रुद्र, और प्रचेता। प्रचेता ने दक्ष को उत्पन्न किया, और दक्ष ने साठ कन्याएँ। उनसे देव, पितर, गन्धर्व, अप्सरा, राक्षस, पक्षी, पशु, मत्स्य, वानर, महासर्प, और सब प्रकार के प्राणी उपजे। इस प्रकार चराचर विश्व उत्पन्न हुआ। तब विश्व-पितामह ने वेदों में निहित सनातन धर्म का प्रवर्तन किया, जिसे देवताओं और महर्षियों ने स्वीकार किया।

“किन्तु दानवों में अग्रणी, पितामह की आज्ञा को ठुकराकर, क्रोध और लोभ के वश, धर्म का नाश करने लगे। ये थे हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, विरोचन, सम्बर, विप्रचित्ति, प्रह्लाद, नमुचि और बलि। ये और अनेक दैत्य-दानव सब प्रकार के दुष्कर्मों में रमने लगे, स्वयं को देवताओं के समान मानकर उन्हें ललकारने लगे, और साम-दान-भेद, इन तीन ज्ञात उपायों की उपेक्षा कर केवल दण्ड के बल से सब प्राणियों को सताने लगे।

“तब ब्रह्मा महर्षियों सहित हिमवान के एक रमणीय शिखर पर गए और वहाँ शास्त्रोक्त विधि से एक महान यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में कुछ अति भयानक घटा। यज्ञ-अग्नि से एक प्राणी प्रकट हुआ, जिसका तेज चन्द्रमा-सा था, वर्ण नील-कमल-सा श्याम, दाँत तीक्ष्ण, उदर कृश, और रूप दुर्निवार। उसके प्रकट होते ही पृथ्वी काँपी, समुद्र क्षुब्ध हुआ, उल्काएँ गिरीं, वृक्षों की शाखाएँ टूटीं, और अमंगल वायु बहने लगी। यह देखकर पितामह ने ऋषियों, देवों और गन्धर्वों से कहा, ‘यह प्राणी मेरे संकल्प से उपजा है। महातेजस्वी, इसका नाम है असि (तलवार)। संसार की रक्षा और देव-शत्रुओं के नाश के लिए मैंने इसे रचा है।’

“तब वह प्राणी अपना पहला रूप त्यागकर एक तेजस्वी, तीक्ष्ण-धार तलवार बन गया। ब्रह्मा ने वह तीक्ष्ण शस्त्र नीलकण्ठ रुद्र को सौंपा, ताकि वे अधर्म और पाप का दमन करें। रुद्र ने चार भुजाएँ धारण कर ऐसा विकराल रूप लिया कि पृथ्वी पर खड़े होकर भी उनका मस्तक सूर्य को छूता था। उन्होंने वह असि और तीन ऊँचे उभारों वाली विशाल ढाल लेकर आकाश में अनेक प्रकार के युद्ध-कौशल दिखाए। यह देख दानव हर्षित होकर शिलाएँ, जलती लकड़ियाँ और छुरे-सी तीक्ष्ण लोहे की शस्त्र-वर्षा करते उन पर टूट पड़े।

“अकेले होते हुए भी रुद्र इतनी तीव्रता से युद्ध-भूमि में घूमे कि असुरों को सहस्र रुद्र दिखाई दिए। शुष्क घास के ढेरों में दावानल की भाँति वे शत्रु-समूहों में घूमते रहे, काटते, बेधते और पीसते। दानव कटे अंगों के साथ धरती पर गिरे; शेष भागकर पृथ्वी के गर्भ में, पर्वतों की ओट में और समुद्र की गहराई में छिप गए। पृथ्वी रक्त-मांस से लथपथ हो गई। धर्म को पुनः स्थापित कर रुद्र ने अपना भयंकर रूप त्याग दिया, और सब ऋषि-देवों ने उनकी जय-जयकार की।

“रुद्र ने वह धर्म-रक्षक असि विष्णु को दी, विष्णु ने मरीचि को, मरीचि ने महर्षियों को, उन्होंने वासव (इन्द्र) को, इन्द्र ने लोकपालों को, और लोकपालों ने सूर्य-पुत्र मनु को। उसे देते समय उन्होंने कहा, ‘आप सब मनुष्यों के स्वामी हैं। इस धर्म-गर्भित असि से सब प्राणियों की रक्षा कीजिए। जो धर्म की सीमा लाँघें, उन्हें विधिपूर्वक दण्ड दीजिए, मनमानी से नहीं। किसी को वचन से, किसी को अर्थ-दण्ड से दण्डित कीजिए। तुच्छ कारणों से अंग-भंग या मृत्यु का दण्ड कभी न दीजिए। ये दण्ड, जिनमें पहला है शब्द-भर्त्सना, असि के ही रूप हैं।’

“तब मनु ने यह असि अपने पुत्र क्षुप को सौंपी, क्षुप से इक्ष्वाकु ने, इक्ष्वाकु से पुरूरवा ने, पुरूरवा से आयु ने, आयु से नहुष ने, नहुष से ययाति ने, ययाति से पुरु ने, पुरु से अमूर्तरय ने, उससे भूमिषय ने, भूमिषय से दुष्यन्त-पुत्र भरत ने, भरत से ऐलविल ने, उससे राजा धुन्धुमार ने, उससे कम्बोज ने, कम्बोज से मुचुकुन्द ने, उससे मरुत्त ने, मरुत्त से रैवत ने, रैवत से युवनाश्व ने, उससे रघु ने, रघु से वीर हरिनाश्व ने, उससे शुनक ने, शुनक से उशीनर ने, उससे भोजों और यादवों ने, यदुओं से शिवि ने, शिवि से प्रतर्दन ने, उससे अष्टक ने, अष्टक से पृषदश्व ने, उससे भरद्वाज ने, भरद्वाज से द्रोण ने, और द्रोण के पश्चात कृप ने। कृप से वह श्रेष्ठ खड्ग आपको और आपके भाइयों को प्राप्त हुआ।

“असि का नक्षत्र कृत्तिका है, देवता अग्नि, गोत्र रोहिणी, और परम आचार्य रुद्र। इसके आठ नाम हैं जो प्रायः अज्ञात रहते हैं: असि, वैशसन, खड्ग, तीक्ष्ण-धार, दुर्लभ, श्रीगर्भ, विजय, और धर्म-रक्षक। इन्हें जो कहता है, वह सदा विजय पाता है। सब शस्त्रों में, हे माद्रवती-पुत्र, तलवार ही श्रेष्ठ है; पुराण कहते हैं कि इसे पहले महादेव ने धारण किया। रही धनुष की बात, उसे पहले पृथु ने रचा; उसी से वेन-पुत्र पृथु ने धरती को दुहकर अन्न-धान्य की वृद्धि की। यह सुनकर मनुष्य इस लोक में यश और परलोक में आनन्द पाता है।”

एक उप-कथा: ध्यान दीजिए कि “असि” की वंशावली केवल पौराणिक नाम-गणना नहीं, यह एक सूक्ष्म राज-धर्म-शिक्षा है। जब मनु को असि सौंपी जाती है, साथ में चेतावनी भी दी जाती है: तलवार का अर्थ केवल वध नहीं। दण्ड के अनेक रूप हैं, और इनमें पहला है केवल कठोर शब्द। अंग-भंग और मृत्यु अन्तिम उपाय हैं, तुच्छ कारणों के लिए नहीं। इस प्रकार शस्त्र की कथा वस्तुतः दण्ड-नीति (न्यायपूर्ण दण्ड का विज्ञान) की कथा बन जाती है, राजा के हाथ में तलवार धर्म से बँधी है।

सार: ब्रह्मा के यज्ञ से धर्म-रक्षा हेतु असि का जन्म हुआ, रुद्र ने उससे दानवों का संहार किया, और वह विष्णु से होते हुए मनु और फिर राजवंशों की लम्बी परम्परा से अब पाण्डवों तक पहुँची। तलवार को दण्ड-नीति का प्रतीक बताया गया है, जो धर्म से बँधी है, मनमानी से नहीं।

धर्म, अर्थ और काम: भाइयों का वाद-विवाद

इतना कहकर भीष्म मौन हो गए, और युधिष्ठिर सब के साथ घर लौटे। वहाँ विदुर को पाँचवाँ बनाकर राजा ने भाइयों से कहा, “संसार की गति धर्म, अर्थ और काम पर टिकी है। इन तीनों में कौन प्रथम, कौन द्वितीय, और कौन अन्तिम महत्व का है? काम-क्रोध-लोभ, इस त्रिपुटी को जीतने के लिए मन को इन तीनों में से किस पर टिकाना चाहिए? आप सब सच-सच उत्तर दीजिए।”

अर्थ-शास्त्र, लोक-व्यवहार और सत्य के ज्ञाता, प्रखर-बुद्धि विदुर पहले बोले, “विविध शास्त्रों का अध्ययन, तप, दान, श्रद्धा, यज्ञ, क्षमा, सरलता, करुणा, सत्य और आत्म-संयम, ये धर्म की सम्पत्तियाँ हैं। आप धर्म को अपनाइए, आपका हृदय उससे कभी विमुख न हो। धर्म और अर्थ, दोनों की जड़ इन्हीं में है। ऋषि धर्म से ही संसार पार कर गए। सब लोक धर्म पर टिके हैं। देवता धर्म से ही श्रेष्ठ-पद को पहुँचे। अर्थ भी धर्म पर टिका है। धर्म पुण्य में सर्वोपरि है, अर्थ मध्यम है, और काम मनीषियों के मत में निम्न। इसलिए मनुष्य संयत-चित्त होकर धर्म पर सर्वाधिक ध्यान दे, और सब प्राणियों के साथ वैसा ही व्यवहार करे जैसा अपने साथ।”

तब अर्थ-शास्त्र में निपुण अर्जुन बोले, “हे राजन्! यह संसार कर्म की भूमि है, इसलिए यहाँ कर्म ही सराहा जाता है। कृषि, व्यापार, गो-पालन और विविध कलाएँ, इन्हें अर्थ कहते हैं, और अर्थ इन सब कर्मों का लक्ष्य है। अर्थ बिना न धर्म सिद्ध होता है, न काम। श्रुति यही कहती है। मलिन-चित्त मनुष्य भी, यदि धनवान हो, तो उच्च धर्म-कर्म कर सकता है और दुर्लभ कामनाओं को तृप्त कर सकता है। धर्म और काम, अर्थ के अंग हैं। यहाँ तक कि मृगचर्म धारी, जटाधारी, संयमी ब्रह्मचारी भी मन में धन की इच्छा रखते हैं। आस्तिक, नास्तिक और कठोर योगी, सभी धन की श्रेष्ठता प्रमाणित करते हैं। वही सच्चा धनवान है जो आश्रितों को भोग देता है और शत्रुओं को दण्ड। अब इन दोनों (नकुल-सहदेव) को सुनिए।”

नकुल और सहदेव बोले, “बैठते-लेटते, चलते-खड़े, मनुष्य को अति-प्रयत्न से धन का अर्जन करना चाहिए। दुर्लभ और प्रिय धन यदि कमाया जाए, तो कमाने वाला सब कामनाएँ पा लेता है। धर्म से जुड़ा अर्थ, और अर्थ से जुड़ा धर्म, अमृत-समान है। धनहीन कोई कामना तृप्त नहीं कर सकता; वैसे ही धर्महीन के पास धन नहीं ठहरता। जो धर्म और अर्थ, दोनों से बाहर हो, वह संसार के लिए भय का कारण है। इसलिए धर्म की उपेक्षा किए बिना, समर्पित मन से धन का अर्जन करना चाहिए। पहले धर्म का पालन करे, फिर धर्म-रहित हुए बिना अर्थ कमाए, और तब अन्त में काम की तृप्ति चाहे।”

अश्विनी-कुमारों के दोनों पुत्र मौन हुए, तब भीमसेन बोले, “जो कामना-रहित है, वह न धन चाहता है न धर्म। कामना-रहित कोई इच्छा ही नहीं कर सकता। इसलिए काम ही तीनों में प्रथम है। काम के ही वश ऋषि तप करते हैं, फल-मूल या वायु पर जीते हैं। व्यापारी, कृषक, गोपालक, कलाकार, सब काम से ही कर्म करते हैं। समुद्र की गहराई में डुबकी लगाने वाले भी काम से प्रेरित हैं। सब कुछ काम के सिद्धान्त से व्याप्त है। कामना-रहित मनुष्य न कभी हुआ, न है, न होगा। जैसे दही का सार मक्खन है, वैसे ही अर्थ और धर्म का सार काम है। तेल, बीजों से उत्तम है; घी, खट्टे दूध से; पुष्प-फल, काठ से। वैसे ही काम, धर्म और अर्थ से उत्तम है। काम ही धर्म और अर्थ का जनक और आत्मा है। काम बिना ब्राह्मण भी ब्राह्मणों को मिष्टान्न या धन न देते।

“फिर भी, हे धर्मनन्दन, धर्म, अर्थ और काम, तीनों का समान रूप से सेवन करना चाहिए। जो केवल एक का सेवन करता है वह श्रेष्ठ पुरुष नहीं; जो दो का, वह मध्यम; और जो तीनों का सेवन करता है, वही अपनी जाति में श्रेष्ठ है।” इतना कहकर, चन्दन-लेपित और मालाओं से सजे भीम मौन हो गए।

सबके वचन सुनकर, और उन सबको झूठा दर्शन मानकर, धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा, “निःसन्देह आप सब शास्त्रों के निश्चित मत रखते हैं और प्रमाणों के ज्ञाता हैं। आपके ये निश्चयपूर्ण वचन हमने सुने। अब एकाग्र मन से वह सुनिए जो हम कहते हैं। जो न पुण्य में लगा हो न पाप में, जो अर्थ, धर्म या काम पर ध्यान न दे, जो सब दोषों से परे हो, जो सोने और ईंट को समान दृष्टि से देखे, वह सुख-दुःख और प्रयोजन-पूर्ति की विवशता से मुक्त हो जाता है। सब प्राणी जन्म-मृत्यु के अधीन हैं, सब क्षय और परिवर्तन के पात्र हैं। जीवन के सुख-दुःखों से बार-बार जगाए गए सब, मुक्ति की प्रशंसा करते हैं। पर मुक्ति क्या है, यह हम नहीं जानते।

“स्वयम्भू ब्रह्मा ने कहा है कि आसक्ति और स्नेह के बन्धन में बँधे के लिए मुक्ति नहीं। विद्वान निर्वाण को खोजते हैं। इसलिए किसी वस्तु को न प्रिय मानना चाहिए न अप्रिय। इस संसार में कोई अपनी इच्छानुसार कर्म नहीं कर सकता। मैं ठीक वैसे ही करता हूँ जैसे (किसी श्रेष्ठ शक्ति द्वारा) कराया जाता हूँ। विधाता परम है। जो होना है वह होता है। जो त्रिपुटी से अलग हो गया, वही मुक्ति पा सकता है, और इसी से मुक्ति परम कल्याणकारी जान पड़ती है।” यह सुनकर भीम आदि हर्षित होकर हाथ जोड़कर कुरुनन्दन को नमन कर, उनकी प्रशंसा करने लगे।

समझने की कुंजी (त्रिवर्ग और चतुर्थ पुरुषार्थ): धर्म (नैतिक-धार्मिक कर्तव्य), अर्थ (धन-सम्पदा), और काम (इच्छा-भोग), ये तीन मिलकर त्रिवर्ग कहलाते हैं। विदुर धर्म को, अर्जुन-नकुल-सहदेव अर्थ को, और भीम काम को प्रथम बताते हैं, पर युधिष्ठिर इन तीनों को ही झूठा दर्शन कहकर चौथे पुरुषार्थ मोक्ष (मुक्ति) की ओर इशारा करते हैं। यह संवाद महाभारत की नैतिक जटिलता दिखाता है: हर भाई का पक्ष भीतर से सही है, पर युधिष्ठिर उन सब से ऊपर उठ जाते हैं।

सार: पाँचों ने धर्म-अर्थ-काम की श्रेष्ठता पर अलग-अलग पक्ष रखे, भीम ने तीनों के समान सेवन का सन्तुलित मत दिया। पर युधिष्ठिर ने इन सब से ऊपर मोक्ष को परम कल्याण बताया, यह मानते हुए कि सब विधाता के अधीन है।

मित्रता का धर्म: किससे मैत्री हो, किससे नहीं

युधिष्ठिर ने फिर पूछा, “हे महाज्ञानी पितामह! किन मनुष्यों को सौम्य-स्वभाव कहा जाता है? किनके साथ परम सुखद मैत्री हो सकती है? हमारा मत है कि न बढ़ता धन, न सम्बन्धी, न बन्धु वह स्थान पाते हैं जो हितैषी मित्र पाते हैं। हितकर सलाह सुनने वाला और भला करने वाला मित्र अत्यन्त दुर्लभ है। इन विषयों पर विस्तार से कहिए।”

भीष्म बोले, “सुनिए, मैं आपको उन मनुष्यों के विषय में बताता हूँ जिनसे मैत्री करनी चाहिए और जिनसे नहीं। जो लोभी हो, निर्दय हो, अपने वर्ण-धर्म से च्युत हो, बेईमान, धूर्त, नीच, पापाचारी, सब पर सन्देह करने वाला, आलसी, टालमटोल करने वाला, टेढ़े स्वभाव का, सर्व-निन्दित, गुरु-द्रोही, सात कुख्यात व्यसनों में लिप्त, दुखी मित्रों को त्यागने वाला, निर्लज्ज, नास्तिक, वेद-निन्दक, असंयमी, झूठा, छली, ईर्ष्यालु, क्रूर, जुआरी, मित्र-द्रोही, और दूसरों का धन हड़पने वाला हो, ऐसे मनुष्य से बचना चाहिए। जो अपने दिए से कभी सन्तुष्ट न हो, अकारण क्रोध करे, अकारण झगड़े, और जो मित्र के अनजाने छोटे-से अपकार पर भी झगड़ा ठान ले, जो मित्र-सा बोले पर शत्रु-सा बरते, ऐसे से दूरी रखिए। मद्यप, द्वेषी, क्रोधी, करुणा-हीन, दूसरों के सुख से जलने वाला, मित्र-द्रोही, हिंसक और कृतघ्न, इन सब से मैत्री कभी न हो।

“अब उन्हें सुनिए जिनसे मैत्री हो सकती है। जो सुकुल में जन्मे हों, वाणी में मधुर और शिष्ट हों, ज्ञान-विज्ञान से युक्त, गुणवान, लोभ-रहित, परिश्रम से न थकने वाले, मित्रों के प्रति भले, कृतज्ञ, बहुश्रुत, अलोभी, प्रिय गुणों वाले, सत्य में दृढ़, जितेन्द्रिय, सुकुलीन, और निर्दोष हों, ऐसों से राजा मैत्री करे। जो थोड़े-से व्यवहार से सन्तुष्ट हो जाएँ, अकारण क्रोध न करें, अर्थ-शास्त्र के ज्ञाता हों, और रुष्ट होने पर भी मन शान्त रखें, जो आत्म-त्याग से भी मित्र की सेवा करें, जो लाल कम्बल की भाँति अपना रंग न बदलें, जो निर्धन मित्रों को क्रोधवश तिरस्कृत न करें, जो मित्रों को कुमार्ग न दिखाएँ, जो विश्वसनीय हों, धर्म-परायण हों, और सोने-ईंट को समान दृष्टि से देखें, ऐसों से मैत्री करनी चाहिए। ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों से मैत्री करने वाले राजा का राज्य चन्द्रमा के प्रकाश की भाँति हर दिशा में फैलता है।

“उन सब दुष्टों में, हे निष्पाप, नीचतम वे हैं जो कृतघ्न हैं और मित्रों को क्षति पहुँचाते हैं। ऐसे दुराचारी परम त्याज्य हैं, यही निश्चित मत है।”

युधिष्ठिर ने कहा, “हम विस्तार से सुनना चाहते हैं। बताइए, कौन मित्र-द्रोही और कृतघ्न कहलाते हैं।”

सार: भीष्म मैत्री के दो पक्ष गिनाते हैं, किससे बचें (लोभी, कृतघ्न, मित्र-द्रोही, छली) और किनसे मैत्री करें (सुकुलीन, कृतज्ञ, अलोभी, सत्य-निष्ठ, समदर्शी)। परम त्याज्य कृतघ्न और मित्र-द्रोही हैं। युधिष्ठिर इन्हीं के विषय में विस्तार माँगते हैं, जिससे एक लम्बा आख्यान आरम्भ होता है।

गौतम और राजधर्म की कथा: कृतघ्नता का दृष्टान्त (आरम्भ)

भीष्म बोले, “मैं आपको एक पुरानी कथा सुनाता हूँ, जिसकी घटनाएँ उत्तर के म्लेच्छ-देश में घटीं। मध्य-देश का एक ब्राह्मण था, वेद-विद्या से रहित। एक सम्पन्न ग्राम देखकर वह दान की इच्छा से उसमें घुसा। उस ग्राम में एक धनवान डाकू रहता था, जो सब वर्णों के लक्षण जानता था, ब्राह्मणों का भक्त, सत्य में दृढ़, और सदा दान में लगा रहता था। उसके घर जाकर ब्राह्मण ने भिक्षा माँगी, रहने को घर और एक वर्ष की जीवन-सामग्री।

“डाकू ने उसे छोरों समेत नया वस्त्र और एक युवा विधवा स्त्री दे दी। यह सब पाकर ब्राह्मण, जिसका नाम गौतम था, हर्षित होकर उस सुविधाजनक घर में सुख से रहने लगा। वह धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा और प्रतिदिन, वहाँ के अन्य डाकुओं की भाँति, वन में जाकर जंगली सारसों का वध करने लगा। प्राणि-वध में निपुण होकर उसने करुणा को सदा के लिए विदा कर दिया, और डाकुओं की संगति से वह उन्हीं जैसा हो गया।

“उस डाकू-ग्राम में सुख से अनेक मास बिताते हुए उसने असंख्य सारस मारे। एक दिन एक दूसरा ब्राह्मण उस ग्राम में आया। वह चीथड़ों और मृगचर्म से ढका, जटाधारी, अति पवित्र-आचरण, वेदों का अध्येता, विनम्र, मिताहारी, ब्राह्मण-भक्त और ब्रह्मचर्य-व्रत का पालक था। वह उसी प्रदेश का था जहाँ से गौतम आया था, और गौतम का प्रिय मित्र रह चुका था। शूद्र का दिया अन्न वह कभी न लेता था, अतः वह उस डाकू-ग्राम में किसी ब्राह्मण का घर ढूँढ़ने लगा, और अन्ततः गौतम के घर पहुँचा।

“उसी समय गौतम भी वन से लौटकर अपने घर में प्रवेश कर रहा था। दोनों मित्र मिले। धनुष-तलवार से सज्जित गौतम के कन्धे पर मारे हुए सारसों का बोझ था, और उसका शरीर उस थैले से टपकते रक्त से सना था। नर-भक्षी-से दिखते, अपने वर्ण-धर्म से च्युत उस मनुष्य को घर में घुसते देख, नवागत अतिथि ने उसे पहचानकर कहा, ‘यह आप मूढ़ता से क्या कर रहे हैं? आप ब्राह्मण हैं, ब्राह्मण-कुल के वाहक। मध्य-देश के सम्मानित कुल में जन्मे होकर डाकू-से आचरण कैसे करने लगे? अपने पूर्व-कालीन प्रसिद्ध वेदज्ञ बन्धुओं को स्मरण कीजिए। उनके वंश में जन्मे होकर, हाय, आप उसके कलंक बन गए। अपने प्रयत्न से जागिए। हे द्विज! अपने जन्म से प्राप्त तेज, आचरण, विद्या, संयम और करुणा को स्मरण कर इस निवास को छोड़िए।’

“यह सुनकर गौतम ने अत्यन्त दुखी होकर उत्तर दिया, ‘हे श्रेष्ठ द्विज! मैं निर्धन हूँ, वेद-ज्ञान से भी हीन। जान लीजिए, मैं केवल धन के लिए यहाँ रहता हूँ। पर आज आपके दर्शन से मैं धन्य हूँ। हम कल साथ ही यहाँ से प्रस्थान करेंगे। आज की रात आप मेरे साथ बिताइए।’ किन्तु करुणाशील नवागत ब्राह्मण भूखा होकर भी, बार-बार आग्रह किए जाने पर भी, उस घर में कुछ छूने से बचता रहा और रात बिता दी।”

समझने की कुंजी (म्लेच्छ, मध्य-देश): म्लेच्छ-देश = वैदिक संस्कृति की सीमा के बाहर का क्षेत्र, यहाँ “उत्तर का” कहा गया है। मध्य-देश = आर्यावर्त का केन्द्रीय, सांस्कृतिक रूप से प्रतिष्ठित प्रदेश। गौतम का मध्य-देश से म्लेच्छ-डाकू-ग्राम में आकर बसना, और सारस-वध में रम जाना, उसके नैतिक पतन का संकेत है। यह कथा बताती है कि वातावरण और संगति मनुष्य के चरित्र को कैसे ढाल देती है, गौतम धीरे-धीरे डाकुओं जैसा हो जाता है।

सार: मध्य-देश का ब्राह्मण गौतम धन के लोभ में म्लेच्छ-डाकू-ग्राम में बस जाता है, करुणा छोड़कर सारस-वध करने लगता है। उसका पुराना धर्मनिष्ठ मित्र उसे चेताता है, पर उस अशुद्ध घर में अन्न तक नहीं छूता।

सारस राजधर्म से भेंट और विरूपाक्ष से धन

भीष्म बोले, “रात बीतने और श्रेष्ठ ब्राह्मण के चले जाने पर, गौतम भी अपने घर से निकलकर समुद्र की ओर चला। मार्ग में उसे कुछ समुद्र-यात्री व्यापारी मिले; उनके दल के साथ वह समुद्र की ओर बढ़ा। पर एक घाटी से गुज़रते समय एक मतवाला हाथी उस बड़े दल पर टूट पड़ा, और प्रायः सब मारे गए। किसी प्रकार बचकर गौतम उत्तर की ओर भागा, यह न जानते हुए कि कहाँ जा रहा है। दल से बिछुड़कर वह एक वन में किम्पुरुष की भाँति अकेला भटकने लगा।

“अन्त में समुद्र की ओर जाने वाले एक मार्ग पर पहुँचकर वह एक रमणीय, स्वर्गोपम वन में पहुँचा, जो वर्ष-भर फूलने-फलने वाले आम के वृक्षों, चन्दन, ताल, तमाल और अगुरु से सुशोभित था। वहाँ भारुण्ड नामक मनुष्य-मुख पक्षी और अन्य पक्षी मधुर स्वर में गाते थे। उस वन में सुनहली रेत वाले एक रमणीय समतल स्थल पर एक विशाल वट-वृक्ष खड़ा था, जिसकी गोल चोटी छाते-सी थी। उसके नीचे की भूमि सुगन्धित चन्दन-जल से सिंची, फूलों से भरी, मानो स्वयं ब्रह्मा का प्रांगण थी।

“उस मनोहर स्थल को देख गौतम प्रसन्न हुआ और प्रसन्न-चित्त बैठ गया। एक सुगन्धित मन्द वायु बहने लगी, जिससे उसकी थकान दूर हुई और वह सो गया। सूर्य अस्ताचल के पीछे छिप गया और सन्ध्या आई। तब उस स्थान को, जो उसका घर था, ब्रह्मा के लोक से लौटता एक श्रेष्ठ पक्षी आया। उसका नाम था नाडीजंघ; वह ब्रह्मा का प्रिय मित्र, सारसों का राजकुमार, महाज्ञानी, और कश्यप का पुत्र था। पृथ्वी पर वह राजधर्म नाम से प्रसिद्ध था। एक देव-कन्या का पुत्र, अति सुन्दर और विद्वान, वह अपने आभूषणों से सूर्य-सा देदीप्यमान था।

“उस पक्षी को देख गौतम विस्मित हुआ। भूख-प्यास से व्याकुल वह ब्राह्मण उसे मारने की इच्छा से ताकने लगा। राजधर्म बोला, ‘स्वागत है, हे ब्राह्मण! सौभाग्य से आज आप मेरे निवास पर आए। सूर्य अस्त हो चुका, सन्ध्या आ गई। मेरे घर आए आप आज मेरे प्रिय और श्रेष्ठ अतिथि हैं। शास्त्रोक्त विधि से मेरा सत्कार पाकर, कल प्रातः जहाँ चाहें वहाँ जा सकते हैं।’

“ये मधुर वचन सुनकर गौतम विस्मित और कौतूहल से भर गया। राजधर्म ने कहा, ‘मैं कश्यप का पुत्र हूँ, दक्ष की एक कन्या से उत्पन्न। आप आज मेरे अतिथि हैं, स्वागत है।’ फिर उसने शास्त्रोक्त विधि से उसका आतिथ्य किया, साल के फूलों की उत्तम शय्या बनाई, और भागीरथी के गहरे जल से पकड़ी बड़ी मछलियाँ तथा जलती अग्नि अतिथि को अर्पित कीं। भोजन से तृप्त गौतम को उस तपस्वी पक्षी ने अपने पंखों से पंखा झलकर थकान दूर की।

“फिर उसने अतिथि के कुल आदि का परिचय पूछा। गौतम ने केवल इतना कहा कि ‘मैं गौतम नामक ब्राह्मण हूँ’, और मौन हो गया। राजधर्म ने उसे फूलों से सुगन्धित पत्तों की कोमल शय्या दी। जब गौतम लेट गया, तो यम-समान धर्मज्ञ कश्यप-पुत्र ने उसके आगमन का कारण पूछा। गौतम बोला, ‘मैं अति निर्धन हूँ; धन कमाने के लिए समुद्र की ओर जाना चाहता हूँ।’ कश्यप-पुत्र ने प्रसन्न होकर कहा, ‘चिन्ता न कीजिए। आप सफल होंगे और धन लेकर घर लौटेंगे। बृहस्पति ने धन-अर्जन के चार उपाय बताए हैं: उत्तराधिकार, भाग्य या देव-कृपा से अकस्मात प्राप्ति, परिश्रम से अर्जन, और मित्रों की सहायता से अर्जन। मैं आपका मित्र बन गया हूँ; मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि आप धन पा सकें।’

“प्रातः होते ही पक्षी बोला, ‘इसी मार्ग से जाइए, सफल होंगे। यहाँ से लगभग तीन योजन दूर विरूपाक्ष नामक एक महाबली राक्षस-राज है, मेरा मित्र। उसके पास जाइए; मेरे अनुरोध से वह आपको मनचाहा धन देगा।’ गौतम मार्ग के अमृत-तुल्य मीठे फल खाता, चन्दन-वृक्षों की शीतल छाया में, शीघ्र चलता हुआ मेरुव्रज नगर पहुँचा, जो पत्थर के विशाल द्वारों, ऊँची दीवारों और परिखा से घिरा था। राजधर्म के मित्र द्वारा भेजे प्रिय अतिथि के रूप में वह राक्षस-राज को ज्ञात हुआ।

“विरूपाक्ष ने उसका सहर्ष स्वागत किया, और कुल-आचार आदि पूछे। ब्राह्मण ने अन्य प्रश्नों का उत्तर न देकर केवल अपना नाम और वंश बताया। राक्षस ने उसे ब्राह्मण-तेज और वेद-अध्ययन से हीन देखकर निवास-स्थान पूछा। तब उसने पूछा, ‘आपका निवास कहाँ है, और आपकी पत्नी किस कुल की है? बिना भय के सच बताइए।’ गौतम बोला, ‘मैं जन्म से मध्य-देश का हूँ, पर शिकारियों के ग्राम में रहता हूँ। मैंने एक विधवा शूद्रा से विवाह किया है। यह सब सच है।’

“राक्षस-राज सोचने लगा, ‘यह जन्म से ब्राह्मण है, और मेरे महान मित्र राजधर्म का मित्र भी। उसी कश्यप-पुत्र ने इसे मेरे पास भेजा है। मुझे अपने मित्र को प्रिय लगने वाला कर्म करना चाहिए। आज कार्तिक के इस पुण्य-दिन पर मेरे घर एक हज़ार श्रेष्ठ ब्राह्मणों का सत्कार होना है। इस गौतम का भी उन्हीं के साथ सत्कार होगा और मैं इसे भी धन दूँगा।’

“तभी स्नान कर, चन्दन-पुष्प से सज्जित, लम्बे वस्त्र पहने एक हज़ार विद्वान ब्राह्मण आए। विरूपाक्ष ने विधिपूर्वक उनका सत्कार किया, उनके लिए मृगचर्म और कुश के आसन बिछवाए, और तिल, हरी दूब और जल से उनकी पूजा की। कुछ को विश्वेदेव, पितर और अग्नि-देवों का प्रतिनिधि चुना गया। फिर घी-शहद से बने उत्तम भोजन से भरे सुनहले पात्र दिए गए। प्रति वर्ष आषाढ़ और माघ की पूर्णिमा को वह राक्षस-राज ब्राह्मणों को उनका मनचाहा उत्तम भोजन देता था, और विशेषतः कार्तिक की पूर्णिमा को उन्हें सोना, चाँदी, रत्न, मणि, मोती, हीरे, मृगचर्म आदि विपुल धन दान करता था।

“विरूपाक्ष ने ब्राह्मणों से कहा, ‘इन रत्नों-मणियों में से जितना चाहें और ले जा सकें, ले लीजिए। और जिन सुनहले पात्रों में भोजन किया है, उन्हें भी ले जाइए।’ सब ब्राह्मणों ने अपनी-अपनी इच्छा-भर धन लिया। फिर राक्षस-राज ने अपने राक्षसों को रोककर कहा, ‘आज एक दिन, हे द्विजगण, आपको यहाँ राक्षसों से कोई भय नहीं। इच्छानुसार विहार कर, फिर शीघ्र चले जाइए।’ सब ब्राह्मण तेज़ी से चारों दिशाओं में चले गए। गौतम भी बहुत-सा सोना उठाकर चल पड़ा।”

समझने की कुंजी (राजधर्म नाम, योजन): सारस-राज का नाम ही “राजधर्म” है, जो इस पूरे प्रसंग की गूँज है: राज-धर्म के उपदेश के बीच एक ऐसा पात्र जो आतिथ्य और मैत्री के राजधर्म का साकार रूप है। एक राक्षस (विरूपाक्ष) भी इस कथा में ब्राह्मणों का सत्कार करने वाला, मित्र-वचन का मान रखने वाला धर्मात्मा है, जबकि ब्राह्मण गौतम कृतघ्न। महाभारत यहाँ जाति या योनि से नहीं, आचरण से धर्म आँकता है। योजन = प्राचीन दूरी-माप; सारस ने गौतम को बताया था कि राक्षस-राज विरूपाक्ष का नगर वहाँ से लगभग तीन योजन दूर है।

सार: सारस-राज राजधर्म गौतम का अतिथि-सत्कार कर उसे धन-अर्जन का मार्ग बताता है और अपने राक्षस-मित्र विरूपाक्ष के पास भेजता है। विरूपाक्ष कार्तिक-पूर्णिमा के दान-उत्सव में गौतम को विपुल सोना देता है, और वह उसे लेकर लौट पड़ता है।

कृतघ्नता का घोर पाप: गौतम राजधर्म को मारता है

विशाल वट-वृक्ष के नीचे विश्वासघाती गौतम उस दयालु सारस-राज राजधर्म को मार गिराता है जिसने उसे आश्रय दिया था; उसके पैरों के पास सोना बिखरा है

भीष्म बोले, “सोना लेकर गौतम उसी वट-वृक्ष तक पहुँचा जहाँ उसने सारस से भेंट की थी। थका, श्रान्त और भूखा वह वहीं बैठ गया। तभी मित्र-प्रेमी राजधर्म आया, ‘स्वागत है’ कहकर गौतम को प्रसन्न किया, पंखों से पंखा झलकर उसकी थकान दूर की, उसका सत्कार किया और भोजन की व्यवस्था की। भोजन कर तृप्त होकर गौतम सोचने लगा, ‘यह चमकीले सोने का भारी बोझ मैंने लोभ और मूढ़ता से उठा लिया है। मार्ग लम्बा है, और रास्ते के लिए मेरे पास भोजन नहीं। प्राण-रक्षा कैसे होगी?’

“बहुत सोचने पर भी उसे मार्ग के लिए कोई भोजन न सूझा। तब उस कृतघ्न मनुष्य के मन में यह विचार उठा, ‘यह सारस-राज, इतना बड़ा और मांस से भरा, मेरे पास ही ठहरा है। इसे मारकर थैले में बाँध, मैं यहाँ से शीघ्र निकल जाऊँगा।’

“उस वट के नीचे, अतिथि की रक्षा के लिए, पक्षी-राज ने ऊँची-धधकती ज्वालाओं वाली अग्नि जलाकर रखी थी। आग के एक ओर वह विश्वासपूर्वक सो गया। उस कृतघ्न, दुष्टात्मा नीच ने सोते हुए अपने यजमान को मारने की तैयारी की। उस धधकती अग्नि की सहायता से उसने विश्वासी पक्षी को मार डाला, और मारकर हर्षित हुआ; उसे यह न सूझा कि उसके किए में कोई पाप है। पंख और रोएँ नोचकर, उसने उस आग पर मांस भूना, और सोने समेत उसे लेकर वहाँ से तेज़ी से भागा।

“अगले दिन राक्षस-राज विरूपाक्ष ने अपने पुत्र से कहा, ‘हाय पुत्र! आज मुझे श्रेष्ठ पक्षी राजधर्म दिखाई नहीं दे रहा। प्रति प्रातः वह ब्रह्म-लोक जाकर पितामह की वन्दना करता है, और लौटते समय मुझसे भेंट किए बिना घर नहीं जाता। दो प्रातः और दो रातें बीत गईं, पर वह नहीं आया; मेरा मन अशान्त है। वह गौतम, जो यहाँ आया था, वेद-हीन और ब्राह्मण-तेज से रहित है। वह मेरे मित्र के निवास पर गया था। मुझे भारी भय है कि उस नीच ब्राह्मण ने राजधर्म को मार डाला। उसके लक्षणों से मैंने उसे पहचान लिया था, करुणा-हीन, क्रूर-मुख, और डाकू-सा दुष्ट। शीघ्र जाकर पता लगाओ कि वह पवित्रात्मा पक्षी जीवित है या नहीं।’

“पिता के आदेश से राजकुमार अन्य राक्षसों सहित तीव्र गति से उस वट के नीचे पहुँचा, और वहाँ राजधर्म के अवशेष देखे, पंख, हड्डियाँ और पैरों से रहित कटा शरीर। शोक से रोते हुए राक्षस गौतम को पकड़ने दौड़े, और शीघ्र ही उसे पकड़ लिया। उसे बन्दी बनाकर वे मेरुव्रज लौटे, और राजा को राजधर्म का विकृत शव तथा वह कृतघ्न नीच गौतम दिखाया।

“मित्र के अवशेष देख राजा अपने मन्त्रियों और पुरोहित सहित ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। राक्षस-राज के समस्त नगर में, स्त्री-पुरुष-बालक सब शोक में डूब गए। तब राजा ने अपने पुत्र से कहा, ‘इस पापी को मारो। ये राक्षस इसके मांस से तृप्त हों।’ किन्तु भयानक पराक्रमी अनेक राक्षसों ने उस पापी का मांस खाने में अनिच्छा प्रकट की। उन रात्रिचरों ने सिर झुकाकर कहा, ‘इस नीचतम मनुष्य को डाकुओं को दे दीजिए। आप हमें यह पापी भोजन के लिए न दें।’ राजा ने कहा, ‘ऐसा ही हो। इस कृतघ्न को बिना देर डाकुओं को दे दीजिए।’

“तब लांस और फरसों से सज्जित राक्षसों ने उस नीच को टुकड़े-टुकड़े कर डाकुओं को दे दिया। पर वे डाकू भी उसका मांस खाने से इनकार कर गए। नर-भक्षी होते हुए भी वे कृतघ्न को न खाएँगे। ब्रह्म-हत्यारे, मद्यप, चोर, व्रत-भ्रष्ट, सबके लिए प्रायश्चित है, पर कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित नहीं। जो मित्र को क्षति पहुँचाता और कृतघ्न होता है, उस क्रूर नीच को नर-भक्षी तक नहीं खाते, न मुर्दा-खोर कीड़े।”

सार: थका-भूखा गौतम, मार्ग के भोजन के लोभ में, अपने ही मित्र और मेज़बान सारस-राज राजधर्म को सोते में मारकर भून लेता है। विरूपाक्ष राजधर्म के न लौटने पर शंकित होता है, गौतम पकड़ा जाता है। राक्षस तक और डाकू तक उस कृतघ्न का मांस खाने से इनकार कर देते हैं, क्योंकि कृतघ्नता का कोई प्रायश्चित नहीं।

सुरभि का अमृत, राजधर्म का पुनर्जीवन और कथा का मर्म

भीष्म बोले, “राक्षस-राज ने उस सारस-राज के लिए रत्न, गन्ध और बहुमूल्य वस्त्रों से सजी चिता बनवाई। पक्षी-राज के शव के साथ उसमें आग लगाकर उसने विधिपूर्वक मित्र की अन्त्येष्टि की। उसी समय, दक्ष-पुत्री शुभ देवी सुरभि (कामधेनु) उस चिता के ऊपर आकाश में प्रकट हुई। उसके स्तन दूध से भरे थे। उसके मुख से दूध-मिश्रित फेन राजधर्म की चिता पर गिरा, और सारस-राज पुनर्जीवित हो उठा। उठकर वह अपने मित्र विरूपाक्ष के पास गया।

“उसी समय देवराज इन्द्र विरूपाक्ष के नगर में आए और बोले, ‘सौभाग्य से आपने सारस-राज को पुनर्जीवित कर दिया।’ फिर इन्द्र ने पितामह द्वारा इस पक्षी पर दिए पुराने शाप की कथा सुनाई, ‘एक बार यह सारस-राज ब्रह्म-लोक में, जब इसकी उपस्थिति अपेक्षित थी, अनुपस्थित रहा। क्रुद्ध होकर पितामह ने कहा, चूँकि यह नीच सारस आज मेरी सभा में उपस्थित नहीं हुआ, अतः यह दुष्टात्मा शीघ्र (पृथ्वी छोड़ने योग्य) मरेगा नहीं। इसी वचन के कारण, गौतम द्वारा मारा जाकर भी, अमृत-सिंचन से यह पुनः जीवित हुआ है।’

“इन्द्र के मौन होने पर राजधर्म ने उन्हें नमन कर कहा, ‘हे देवश्रेष्ठ! यदि आपका हृदय मुझ पर कृपालु है, तो मेरे प्रिय मित्र गौतम को भी पुनर्जीवित कीजिए।’ यह सुनकर वासव (इन्द्र) ने ब्राह्मण गौतम पर अमृत छिड़ककर उसे जीवित कर दिया। सारस-राज ने अपने मित्र गौतम के पास जाकर, जो अब भी कन्धे पर सोने का बोझ लिए था, उसे गले लगाया और हर्षित हुआ। फिर वह कृतघ्न-कर्मा गौतम को उसके धन समेत विदा कर अपने निवास लौट गया, और यथासमय ब्रह्म-लोक गया, जहाँ पितामह ने अतिथि-सा उसका सत्कार किया।

“गौतम भी शिकारियों के ग्राम में लौटकर अपनी शूद्रा पत्नी से अनेक पापी सन्तानें उत्पन्न करता रहा। देवताओं ने उस पर भारी शाप दिया कि कुछ वर्षों में अनेक सन्तानें उत्पन्न कर वह कृतघ्न पापी अनेक वर्षों तक घोर नरक में गिरेगा। यह सब, हे भारत, मुझे पूर्व में नारद ने सुनाया था। इसी से, हे भरतश्रेष्ठ, मैंने आपको यह सम्पूर्ण कथा सुनाई।

“कृतघ्न को यश कहाँ? उसका स्थान कहाँ? सुख कहाँ? कृतघ्न विश्वास के योग्य नहीं। कृतघ्न कभी (दण्ड से) बच नहीं सकता। किसी को मित्र की क्षति नहीं करनी चाहिए; जो मित्र को क्षति पहुँचाता है, वह घोर और शाश्वत नरक में गिरता है। सबको कृतज्ञ होना चाहिए और मित्रों का हित चाहना चाहिए। मित्र से सब कुछ पाया जा सकता है, सम्मान, भोग, और संकट से उद्धार। बुद्धिमान अपने मित्र का सर्वोत्तम आदर से सत्कार करे। कृतघ्न, निर्लज्ज, पापी मनुष्य का त्याग करे। मित्र-द्रोही अपने वंश का कलंक और मनुष्यों में नीचतम है। यही उस पापी के लक्षण हैं जो कृतघ्नता से कलंकित और मित्र-द्रोही है। और क्या सुनना चाहते हैं?” यह सुनकर युधिष्ठिर अति प्रसन्न हुए।

एक उप-कथा: इस आख्यान की नैतिक जटिलता पर रुकिए। राजधर्म, जिसकी हत्या स्वयं हुई, इन्द्र से अपने हत्यारे मित्र गौतम के पुनर्जीवन की भीख माँगता है, यह मैत्री-धर्म की पराकाष्ठा है। पर कथा गौतम को आसान क्षमा नहीं देती: पुनर्जीवित होकर भी वह सुधरता नहीं, अनेक पापी सन्तानें उत्पन्न करता है, और देव-शाप से अन्ततः नरक में गिरता है। महाभारत यहाँ दो सत्य साथ रखता है, मित्र की उदारता असीम हो सकती है, पर कृतघ्न का अपना कर्म-फल उसे नहीं छोड़ता।

समझने की कुंजी (सुरभि, कृतज्ञता): सुरभि = दक्ष-पुत्री कामधेनु, इच्छाएँ पूर्ण करने वाली दिव्य गौ; उसके मुख का दूध-फेन अमृत-तुल्य है। पितामह के शाप का अर्थ था कि राजधर्म तुरन्त “मुक्त” न हो, इसी से वह मारा जाकर भी फिर जी उठता है। कथा का मूल सन्देश: कृतज्ञता परम धर्म है, और मित्र-द्रोह व कृतघ्नता ऐसा पाप जिसका कोई प्रायश्चित नहीं।

सार: देवी सुरभि के अमृत-फेन से राजधर्म पुनर्जीवित होता है, और वह इन्द्र से माँगकर अपने हत्यारे मित्र गौतम को भी जीवित करा देता है। फिर भी गौतम कृतघ्न ही रहता है और अन्ततः नरकगामी होता है। भीष्म का निष्कर्ष: कृतघ्नता और मित्र-द्रोह परम अक्षम्य पाप हैं।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), शान्ति पर्व, राजधर्मानुशासन उपपर्व, अध्याय 1-128; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।

आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)