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महाभारतधर्म की कठिन भूमि

अध्याय 13 · भाग 2 · द्यूत, वियोग और वन में खोज

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महाभारत · वन पर्व
द्यूत, वियोग और वन में खोज

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पासों में बँधे नल, और दमयन्ती का बच्चों को बचाने का उपाय

द्वापर से यह समझौता करके कलि निषधराज के देश में पहुँचा। वह बहुत समय तक वहीं रहकर नल में कोई दोष खोजता रहा। बारहवें वर्ष उसे अवसर मिला। एक दिन शौच के बाद नल ने जल का स्पर्श किया और सन्ध्योपासना करने लगे, परन्तु पहले अपने पैर नहीं धोए थे। इसी चूक से कलि उनके भीतर प्रवेश कर गया। नल को अपने वश में करने के बाद वह पुष्कर के पास पहुँचा और बोला, “आइए, नल के साथ जुआ खेलिए। हमारी सहायता से आप निश्चय ही जीतेंगे। नल को हराकर उनका राज्य प्राप्त करिए और निषध देश का शासन कीजिए।” इस प्रकार प्रेरित होकर पुष्कर नल के पास गया। द्वापर भी वृष नाम का प्रधान पासा बनकर उसके पास पहुँच गया। दमयन्ती की उपस्थिति में पुष्कर बार-बार नल से साथ बैठकर द्यूत खेलने को कहने लगा। उस चुनौती को राजा अधिक देर तक अस्वीकार न कर सके। उन्होंने खेलने का समय निश्चित कर दिया। कलि के वश में पड़े नल दाँव पर रखा सोना, चाँदी, घोड़ों सहित रथ और वस्त्र हारने लगे। खेल की धुन ऐसी चढ़ी कि मित्रों में से कोई उन्हें रोक न सका। प्रमुख मन्त्रियों के साथ नगरवासी एकत्र होकर वहाँ आए। वे अपने संकटग्रस्त राजा से मिलना और उन्हें खेल से हटाना चाहते थे। सारथि ने दमयन्ती को जाकर बताया, “देवि, प्रजाजन और राज्य के अधिकारी द्वार पर प्रतीक्षा कर रहे हैं। राजा को समाचार दीजिए। धर्म और अर्थ जानने वाले अपने स्वामी की विपत्ति उनसे देखी नहीं जाती।”

संध्या के अर्घ्य में लगे नल के शरीर में पीछे से काली छाया रूपी कलि प्रवेश करता हुआ।

दमयन्ती दुःख से व्याकुल थीं; मानो चेतना ही साथ छोड़ रही हो। रुँधे हुए स्वर में उन्होंने नल से कहा, “महाराज, आपके प्रति निष्ठा से प्रेरित प्रजाजन और मन्त्री द्वार पर खड़े हैं। वे आपसे मिलना चाहते हैं। उन्हें दर्शन दीजिए।” कलि के अधिकार में पड़े राजा ने अपनी पत्नी के इस विलाप पर एक शब्द भी उत्तर न दिया। लज्जा और शोक से भरे मन्त्री तथा नगरवासी अपने घरों को लौट गए। वे कह रहे थे, “राजा जीवित ही नहीं रहे।” बृहदश्व ने युधिष्ठिर से कहा कि नल और पुष्कर का खेल इस प्रकार कई महीनों तक चलता रहा और धर्मात्मा नल निरन्तर हारते रहे। पति को द्यूत में उन्मत्त और विवेकहीन देखकर धैर्यशालिनी दमयन्ती भय तथा दुःख से भर उठीं। उन्हें संकट की गम्भीरता समझ में आ रही थी। वे नल का हित चाहती थीं, परन्तु अनिष्ट की आशंका बढ़ती जा रही थी। अन्ततः पति का सब कुछ चला गया है, यह समझकर उन्होंने अपनी धाय और परिचारिका बृहत्सेना को बुलाया। बृहत्सेना यशस्विनी थीं, हर काम में निपुण, विश्वस्त, मधुर बोलने वाली और दमयन्ती का भला चाहने वाली थीं। रानी ने उनसे कहा, “नल के नाम से मन्त्रियों को बुला लाइए। उन्हें यह भी बताइए कि धन और दूसरी वस्तुओं में क्या-क्या हार चुके हैं और क्या शेष है।” राजा का बुलावा सुनकर मन्त्री प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है, और फिर नल के पास आए। प्रजाजन दूसरी बार एकत्र हुए तो दमयन्ती ने राजा को समाचार दिया। नल ने फिर उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। पति को अपना वचन उपेक्षित करते देखकर दमयन्ती लज्जित होकर अपने कक्ष में लौट गईं।

द्यूत सभा में पुष्कर पासे फेंकता हुआ, हारते नल के ऊपर कलि की काली छाया मंडराती।

जब दमयन्ती ने सुना कि पासे निरन्तर नल के प्रतिकूल पड़ रहे हैं और वे सब कुछ हार गए हैं, तो उन्होंने फिर बृहत्सेना से कहा, “नल के नाम से एक बार और जाइए। इस बार सारथि वार्ष्णेय को यहाँ बुला लाइए। सामने का संकट बहुत गम्भीर है।” बृहत्सेना ने विश्वस्त सेवकों के द्वारा वार्ष्णेय को बुलवाया। देश और काल के अनुसार उचित आचरण जानने वाली दमयन्ती ने अवसर के अनुकूल कोमल वाणी में उनसे कहा, “आप जानते हैं कि राजा ने सदा आपके साथ कैसा व्यवहार किया है। अब वे कठिनाई में हैं; आपको उनकी सहायता करनी चाहिए। वे पुष्कर से जितना हारते जाते हैं, उतना ही खेलने का उत्साह बढ़ता जाता है। पासे पुष्कर की इच्छा के अनुसार पड़ते हैं और नल के विरोध में जाते हैं। खेल में डूबे राजा मित्रों और सम्बन्धियों का कहा नहीं सुनते, हमारा भी नहीं सुनते। फिर भी इसमें हम महात्मा नल को दोषी नहीं मानते। वे खेल में इतने डूबे हैं कि हमारी बात पर भी ध्यान नहीं दे रहे। हे सारथि, हम आपकी शरण लेते हैं। हमारी बात कीजिए। हमारा मन अनिष्ट की आशंका से भरा है; राजा पर बड़ा संकट आ सकता है। नल के प्रिय घोड़ों को रथ में जोतिए, जो मन के समान वेगवान हैं। हमारे इन दोनों जुड़वाँ बच्चों, पुत्र और पुत्री, को रथ पर बैठाकर कुण्डिनपुर ले जाइए। वहाँ हमारे सम्बन्धियों के पास बच्चों को छोड़ दीजिए। रथ और घोड़े भी वहीं छोड़िए। फिर आपकी इच्छा हो तो वहीं रहें, अथवा जहाँ जाना चाहें चले जाएँ।”

वार्ष्णेय ने दमयन्ती के ये वचन विस्तार से राजा के प्रधान अधिकारियों को बताए। उनके साथ विचार करके व्यवस्था निश्चित की और उनकी सहमति प्राप्त की। तब दोनों बच्चों को रथ पर बैठाकर विदर्भ देश के लिए प्रस्थान किया। वहाँ पुत्र इन्द्रसेन और पुत्री इन्द्रसेना को छोड़ दिया; वह उत्तम रथ और घोड़े भी वहीं रहे। नल की दशा से दुःखी सारथि ने भारी मन से राजा भीम से विदा ली। कुछ समय इधर-उधर विचरने के बाद वे अयोध्या पहुँचे। वहाँ शोकभरे मन से राजा ऋतुपर्ण के सामने उपस्थित हुए और उनके यहाँ सारथि की सेवा स्वीकार कर ली।

सार: बारहवें वर्ष मिली एक चूक से कलि नल में प्रवेश करता है और द्वापर पासा बनकर पुष्कर की सहायता करता है। नल महीनों हारते रहते हैं तथा प्रजा और मन्त्रियों की दो बार की प्रार्थना अनसुनी कर देते हैं। दमयन्ती वार्ष्णेय को दोनों बच्चों सहित कुण्डिनपुर भेजती हैं। बच्चों, रथ और घोड़ों को वहाँ छोड़कर वार्ष्णेय अन्ततः अयोध्या में ऋतुपर्ण के सारथि बन जाते हैं।

अन्तिम वस्त्र भी गया, और सोती दमयन्ती को छोड़ने का निर्णय

वार्ष्णेय के चले जाने के बाद पुष्कर ने नल का राज्य और बचा हुआ सारा धन जीत लिया। वह हँसकर बोला, “खेल चलते रहने दीजिए। अब आपके पास दाँव पर लगाने को क्या है? सब कुछ तो हम जीत चुके हैं; केवल दमयन्ती बची हैं। यदि आपको स्वीकार हो, तो अब उन्हीं को दाँव पर रख दें।” यह सुनकर नल का हृदय क्रोध से फटने लगा, परन्तु उन्होंने एक शब्द नहीं कहा। पीड़ा से पुष्कर की ओर देखा और शरीर के सभी आभूषण उतार दिए। समस्त सम्पत्ति छोड़कर वे एक ही वस्त्र में, शेष शरीर खुला लिए, निकल पड़े। उन्हें जाते देखकर मित्रों का दुःख और बढ़ गया। दमयन्ती भी एक वस्त्र पहने उनके पीछे नगर से निकलीं। पति-पत्नी नगर के बाहर तीन रात रहे। पुष्कर ने सारे नगर में घोषणा करा दी कि नल का आदर-सत्कार करने वाले को प्राणदण्ड दिया जाएगा। उसके आदेश और नल के प्रति उसके द्वेष को जानकर प्रजाजन उनका स्वागत करने से रुक गए। सत्कार के योग्य राजा को कहीं आदर नहीं मिला। तीन रात वे केवल जल पीकर रहे, फिर भूख से पीड़ित होकर फल-मूल खोजने चल दिए। दमयन्ती पीछे-पीछे थीं। कई दिन बीत जाने पर भूख से व्याकुल नल ने सुनहरे पंखों वाले कुछ पक्षी देखे। सोचा कि आज ये हमारा भोजन भी होंगे और धन भी। अपने पहने हुए वस्त्र से उन्हें ढक दिया। परन्तु पक्षी उसी वस्त्र को लेकर आकाश में उड़ गए।

राज्य हारकर नल और दमयन्ती एक-एक वस्त्र में नगर द्वार से निकलते, नगरवासी शोक में देखते हुए।

नल निर्वस्त्र और उदास खड़े थे; मुख भूमि की ओर झुका था। पक्षियों ने कहा, “हे अल्पबुद्धि, हम वही पासे हैं। आपका वस्त्र लेने आए थे। आप एक वस्त्र पहनकर भी चले जाएँ, यह हमें स्वीकार नहीं था।” अपना वस्त्र छिनते और पासों को उसके साथ जाते देखकर नल ने दमयन्ती से कहा, “जिनके क्रोध से हमारा राज्य गया, जिनके प्रभाव से हम संकट और भूख में पड़े हैं और भोजन नहीं पा रहे, जिनके कारण निषधवासियों ने हमारा सत्कार नहीं किया, वही पक्षियों का रूप लेकर हमारा वस्त्र भी ले जा रहे हैं। इस भारी विपत्ति ने हमें शोक में डालकर विवेक से वञ्चित कर दिया है। हम आपके पति हैं; आपके हित की जो बात कह रहे हैं, सुनिए। ये अनेक मार्ग अवन्ती और ऋक्षवत् पर्वतों से होकर दक्षिण देश की ओर जाते हैं। वह विशाल विन्ध्य पर्वत है, उधर समुद्र की ओर बहती पयस्विनी नदी है। वहाँ तपस्वियों के आश्रम हैं, जहाँ तरह-तरह के फल और मूल मिलते हैं। यह मार्ग विदर्भ देश को जाता है और वह कोसल को। इन मार्गों से आगे दक्षिण की ओर दक्षिण देश है।” दुःखी नल दमयन्ती से बार-बार यही दिशाएँ बताते रहे। आँसुओं से रुँधे स्वर में दमयन्ती बोलीं, “महाराज, आपका अभिप्राय सोचकर हमारा हृदय काँप रहा है और अंग शिथिल हो रहे हैं। राज्य और धन छिन गए हैं, तन पर वस्त्र नहीं है, भूख और श्रम ने आपको थका दिया है। ऐसे में इस एकान्त वन में आपको छोड़कर हम कैसे जाएँ? गहरे वन में भूख और थकान से पीड़ित होकर जब आप पहले का सुख याद करेंगे, तब हम आपका कष्ट शान्त करेंगे। वैद्य कहते हैं कि हर दुःख में पत्नी के समान कोई औषधि नहीं होती। हे नल, हम सत्य कह रहे हैं।”

सुनहरे पक्षी नल का एकमात्र वस्त्र लेकर उड़ते हुए, नल उछलकर उसे पकड़ने की चेष्टा में।

नल ने कहा, “दमयन्ती, आपने ठीक कहा। संकट में पड़े पुरुष के लिए पत्नी के समान न कोई मित्र है, न औषधि। परन्तु हम आपको छोड़ना नहीं चाहते। आपको यह भय क्यों हो रहा है? हम अपने को छोड़ सकते हैं, आपको नहीं छोड़ सकते।” दमयन्ती बोलीं, “यदि आपका हमें छोड़ने का विचार नहीं है, तो बार-बार विदर्भ का मार्ग क्यों बता रहे हैं? हम जानते हैं कि आप हमें नहीं छोड़ेंगे, किन्तु आपका मन व्याकुल है; उसी व्याकुलता में कहीं छोड़ न दें। बार-बार रास्ता दिखाकर आप हमारा दुःख बढ़ा रहे हैं। यदि आप चाहते हैं कि हम अपने सम्बन्धियों के यहाँ जाएँ, तो दोनों ही विदर्भ चलें। वहाँ हमारे पिता आपका आदर करेंगे। उनके सम्मान से आप हमारे घर में सुख से रह सकेंगे।” नल ने उत्तर दिया, “आपके पिता का राज्य हमारे अपने राज्य के समान है। फिर भी इस दुर्दशा में वहाँ किसी प्रकार नहीं जाएँगे। पहले वहाँ अपने वैभव के साथ आए थे और आपका आनन्द बढ़ाया था। अब इस दीन दशा में आकर आपका दुःख कैसे बढ़ाएँ?” वे बार-बार यही बात कहते हुए दमयन्ती को सान्त्वना देते रहे। नल उनके आधे वस्त्र में ढके थे; एक ही कपड़े से दोनों अपने को सँभाले हुए थे। भूख और प्यास से थके पति-पत्नी घूमते हुए यात्रियों के एक आश्रयस्थल में पहुँचे। वहाँ नल दमयन्ती के साथ नंगी धरती पर बैठ गए। शरीर पर धूल थी, दशा मलिन और कृश थी। उसी एक वस्त्र को साझा किए वे थककर भूमि पर सो गए। सहसा आए दुःख से पीड़ित, निर्दोष और सुकुमार दमयन्ती गहरी नींद में डूब गईं।

नल पहले की तरह शान्ति से नहीं सो सके। हृदय और मन व्याकुल थे। राज्य का नाश, मित्रों का साथ छूटना और वन का कष्ट याद आने लगा। वे सोचने लगे कि इस प्रकार चलते रहने से क्या होगा और ऐसा न करने से क्या होगा। अब मृत्यु अधिक उचित है, अथवा पत्नी को छोड़ देना चाहिए? दमयन्ती हमसे प्रेम करती हैं और हमारे लिए ही यह दुःख सह रही हैं। हमसे अलग होकर शायद अपने सम्बन्धियों के पास चली जाएँ। हमारे साथ रहेंगी, तो अपने अनुराग के कारण निश्चित ही संकट में रहेंगी। छोड़ दें तो उनका दुःख निश्चित नहीं है; किसी समय सुख भी मिल सकता है। बार-बार सोचकर उन्होंने दमयन्ती को छोड़ना ही अपने लिए उचित समझा। यह भी विचार किया कि वे यशस्विनी, सौभाग्यशालिनी और पतिव्रता हैं; अपने तेज के कारण मार्ग में किसी के द्वारा आहत नहीं हो सकतीं। दुष्ट कलि के प्रभाव में उनका मन इस निर्णय पर पहुँच गया। फिर उन्हें अपने वस्त्र का अभाव और दमयन्ती का एक ही कपड़ा ध्यान में आया। उनके वस्त्र में से आधा अपने लिए काट लेने का विचार किया। प्रिय पत्नी को पता भी न चले, कपड़ा इस प्रकार कैसे बाँटें? यह सोचते हुए नल आश्रयस्थल में इधर-उधर चलने लगे। पास ही म्यान से निकली हुई एक सुन्दर तलवार पड़ी मिली। उससे आधा वस्त्र काटा, तलवार फेंक दी और गहरी नींद में पड़ी दमयन्ती को छोड़कर चले गए।

निद्रा में डूबी दमयन्ती का आधा वस्त्र काटकर नल तलवार और कटा वस्त्र लिए जाने को उद्यत।

किन्तु नल का मन साथ नहीं दे सका। वे लौट आए। दमयन्ती को देखकर आँसू बहने लगे। बोले, “हाय, हमारी यह प्रिया, जिन्हें पहले न वायु ने देखा था, न सूर्य ने, आज अनाथ जैसी नंगी धरती पर सो रही हैं। इस कटे हुए वस्त्र में, विक्षिप्त-सी पड़ी हुई, जागने पर क्या करेंगी? पति के प्रति अनुरक्त भीम की सुन्दर कन्या हमसे बिछुड़कर इन गहरे वनों में अकेली कैसे घूमेंगी, जहाँ हिंसक पशु और सर्प रहते हैं? हे कल्याणी, आदित्य, वसु, दोनों अश्विनीकुमार और मरुत् आपकी रक्षा करें। आपका धर्म ही आपका सबसे बड़ा रक्षक हो।” यह कहकर नल फिर जाने का प्रयत्न करने लगे। कलि ने उनकी बुद्धि हर ली थी। वे जाते और फिर लौट आते। कलि दूर खींचता था और प्रेम वापस ले आता था। उनका हृदय मानो दो भागों में फट गया हो; झूले की तरह आश्रयस्थल से बाहर जाते और फिर भीतर आ जाते। बहुत देर तक करुण विलाप करने के बाद अन्ततः वे चले गए। कलि से मोहित और विवेकहीन राजा अपनी सोती हुई पत्नी को उस एकान्त वन में अकेला छोड़कर निकल पड़े। अपने किए का विचार करते हुए वे दुःख में डूबे जा रहे थे।

सार: पुष्कर दमयन्ती को दाँव पर लगाने को कहता है और नल मौन रहकर नगर छोड़ देते हैं। पासे पक्षी बनकर उनका अन्तिम वस्त्र भी ले जाते हैं। दमयन्ती साथ रहने और दोनों के विदर्भ जाने का आग्रह करती हैं। नल वहाँ लौटना नहीं चाहते। कलि के प्रभाव में वे पत्नी को छोड़ना ही उनके भावी सुख की सम्भावना मान बैठते हैं, वस्त्र का आधा भाग काटते हैं और बार-बार लौटने के बाद अन्ततः उन्हें सोता छोड़ जाते हैं।

दमयन्ती की पुकार और व्याध का अन्त

नल के चले जाने पर दमयन्ती जागीं। नींद से कुछ विश्राम मिला था, किन्तु उस सूने वन में आँख खुलते ही भय लगने लगा। निषधराज कहीं दिखाई नहीं दिए। दुःख और घबराहट से वे चीख उठीं, “महाराज! स्वामी! क्या आप हमें छोड़ गए? इस निर्जन स्थान में हम भय से व्याकुल हैं, हमारा सर्वस्व चला गया। आप सत्यवादी हैं, धर्म जानते हैं। फिर वचन देकर हमें वन में सोता हुआ कैसे छोड़ गए? हम आपकी अनुरक्त और सद्गुणवती पत्नी हैं। दूसरों ने आपका अहित किया है, किन्तु हमने तो कोई अपराध नहीं किया। हमें क्यों छोड़ दिया? लोकपालों के सामने आपने जो वचन कहे थे, उन्हीं के अनुसार निष्ठा निभाइए। आपके छोड़ देने पर भी आपकी पत्नी एक क्षण जीवित है, इसका यही कारण है कि मनुष्य की मृत्यु का समय निश्चित होता है। अब यह परिहास बहुत हुआ। हमें बड़ा भय लग रहा है। सामने आइए। हमने आपको देख लिया! महाराज, हमने आपको देख लिया! निषधराज, आप उन झाड़ियों के पीछे छिपे हैं; उत्तर क्यों नहीं देते? हमें इस दशा में रोता देखकर भी पास आकर सान्त्वना नहीं देते, यह बड़ी निर्दयता है। हमें अपनी अथवा किसी और बात की चिन्ता नहीं है। यही दुःख है कि आप अकेले दिन कैसे बिताएँगे। सन्ध्या को भूख, प्यास और थकान से पीड़ित होकर वृक्षों के नीचे बैठेंगे और हमें नहीं देखेंगे, तब आपकी क्या दशा होगी?” दुःख से जलती दमयन्ती रोती हुई इधर-उधर दौड़ने लगीं। कभी उछलकर उठतीं, कभी बेसुध होकर बैठ जातीं, कभी भय से सिकुड़ जातीं और कभी ज़ोर से विलाप करने लगतीं। पति के प्रति अनुरक्त भीमकन्या की शक्ति क्षीण हो रही थी; बार-बार आह भरतीं और रोतीं। बोलीं, “जिसके शाप से दुःखी निषधराज यह कष्ट भोग रहे हैं, उसे हमसे भी अधिक शोक सहना पड़े। जिस दुष्ट ने निष्पाप हृदय वाले नल की यह दशा की है, उसका जीवन इससे भी दुःखमय हो और वह इससे भी बड़ी विपत्तियाँ भोगे।”

यशस्वी राजा की पट्टमहिषी इस प्रकार विलाप करती हुई हिंसक पशुओं से भरे वन में पति को खोजने लगीं। “हाय महाराज! हाय!” कहतीं और विक्षिप्त-सी इधर-उधर भटकतीं। उनकी करुण पुकार कुररी के क्रन्दन जैसी थी। निरन्तर रोते और दुःख करते हुए वे एक विशाल सर्प के निकट पहुँच गईं। वह बहुत बड़ा और भूखा था। जैसे ही दमयन्ती उसकी पहुँच में आईं, उसने उन्हें पकड़कर कुण्डली में बाँध लिया। सर्प से जकड़ी हुई भी वे अपने लिए नहीं, निषधराज के लिए रो रही थीं। बोलीं, “स्वामी, इस निर्जन वन में सर्प ने हमें पकड़ लिया है। कोई रक्षक नहीं है; आप दौड़कर क्यों नहीं आते? निषधराज, हमें याद करके आपकी क्या दशा होगी? आज हमें वन में छोड़कर क्यों चले गए? जब शाप से मुक्त होकर आप फिर अपना विवेक, इन्द्रियों की स्वस्थता और धन प्राप्त करेंगे, तब हमारा स्मरण आने पर आपको कैसा लगेगा? हे निष्पाप नल, हे राजाओं में व्याघ्र के समान पराक्रमी, थके हुए, भूख से पीड़ित और मूर्च्छित होते समय आपको कौन सान्त्वना देगा?” उनकी पुकार सुनकर गहरे वन में घूमता हुआ एक व्याध शीघ्र वहाँ आ पहुँचा। विशाल नेत्रों वाली स्त्री को सर्प की कुण्डली में देखकर वह आगे बढ़ा और तीखे शस्त्र से सर्प का सिर काट दिया। सर्प के मरने पर उसने दमयन्ती को मुक्त किया। उनके शरीर पर जल छिड़का, भोजन दिया और ढाढ़स बँधाया। फिर पूछने लगा, “मृगशावक जैसे नेत्रों वाली कल्याणी, आप कौन हैं? इस वन में क्यों आई हैं? आपको इतना भारी कष्ट कैसे मिला?” उसके पूछने पर दमयन्ती ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया।

व्याध उस सुन्दरी को देखता रहा। आधा वस्त्र तन पर था; उन्नत वक्ष, गोल नितम्ब और कोमल, निर्दोष अंग थे। मुख पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसा, आँखों की पलकें मुड़ी हुई और वाणी मधु के समान मधुर थी। उसे देखकर व्याध के भीतर कामना भड़क उठी। कामदेव से पीड़ित होकर वह मन लुभाने वाले स्वर और कोमल शब्दों में उन्हें रिझाने लगा। पतिव्रता दमयन्ती ने उसकी ओर देखकर अभिप्राय समझ लिया। तीव्र क्रोध से वे मानो जल उठीं। परन्तु कामना से जलता वह दुष्ट भी क्रुद्ध हो गया और उनके साथ बलप्रयोग करने का प्रयत्न किया। दमयन्ती प्रज्वलित अग्नि की ज्वाला की तरह अजेय थीं। राज्य छिन चुका था, पति बिछुड़ गए थे; अब अकथनीय दुःख की इस घड़ी में उन्होंने क्रोध से व्याध को शाप दिया, “हमने निषधराज के अतिरिक्त किसी दूसरे पुरुष का विचार तक नहीं किया है। उस सत्य के प्रभाव से शिकार पर जीविका चलाने वाला यह नीच मनुष्य निष्प्राण होकर गिर पड़े।” उनके कहते ही व्याध भूमि पर निर्जीव होकर गिर गया, जैसे आग से जल चुका वृक्ष गिर पड़ता है।

विशाल अजगर के पास खड़ी दमयन्ती के उठे हाथ के शाप से व्याध जलकर गिरता हुआ।

सार: जागकर दमयन्ती नल को पुकारती हैं, उनके वचन याद दिलाती हैं और वन में खोजने लगती हैं। एक विशाल सर्प उन्हें पकड़ लेता है। व्याध उन्हें बचाता है, किन्तु फिर बलप्रयोग का प्रयत्न करता है। दमयन्ती अपने पति के प्रति अनन्य निष्ठा के सत्य पर उसे शाप देती हैं और वह तत्काल मर जाता है।

व्याघ्र और पर्वत से नल का पता पूछती दमयन्ती

व्याध के मरने पर कमलदल जैसे नेत्रों वाली दमयन्ती उस भयावह, निर्जन वन में आगे बढ़ीं। झींगुरों का स्वर गूँज रहा था। सिंह, चीते, रुरु मृग, व्याघ्र, भैंसे, रीछ और हिरण वहाँ रहते थे। अनेक प्रकार के पक्षी थे; चोरों और म्लेच्छ जातियों का भी निवास था। शाल, बाँस, धव, अश्वत्थ, तिन्दुक, इंगुद, किंशुक, अर्जुन, नीम, तिनिश, सेमल, जामुन, आम, लोध्र, खैर, बेंत, पद्मक, आँवला, प्लक्ष, कदम्ब, उदुम्बर, बेर, बेल, बरगद, पियाल, ताल, खजूर, हरड़ और बहेड़े के वृक्ष थे। विदर्भ की राजकन्या ने अनेक धातुओं वाले पर्वत, पक्षियों के कलरव से गूँजते उपवन और अद्भुत घाटियाँ देखीं। नदियाँ, झीलें, सरोवर और भाँति-भाँति के पक्षी-पशु दिखाई दिए। असंख्य सर्प थे, भूत थे और भयानक मुख वाले राक्षस भी। जलाशय, तालाब, छोटी पहाड़ियाँ, नाले और सुन्दर जलस्रोत थे। कहीं भैंसों के झुण्ड, कहीं सूअर, रीछ और वन के सर्प मिले। धर्म, यश, सौभाग्य और धैर्य की रक्षा में दमयन्ती अकेली ही नल को खोजती रहीं। उस भयावह वन की कोई वस्तु उन्हें डरा नहीं रही थी; पति का वियोग ही उनका दुःख था। अन्त में एक शिला पर बैठ गईं। नल के शोक से अंग-अंग काँप रहा था। वे विलाप करने लगीं, “हे विशाल वक्ष और महाबाहु निषधराज, हमें इस एकान्त वन में छोड़कर कहाँ चले गए? आपने अश्वमेध और दूसरे यज्ञ किए, ब्राह्मणों को भरपूर दक्षिणा दी। फिर केवल हमारे ही साथ विश्वास क्यों तोड़ा? आपने हमारे सामने जो कहा था, उसे याद कीजिए। आकाश में उड़ने वाले हंसों ने आपके और हमारे सामने जो बातें कही थीं, वे भी स्मरण कीजिए। चारों वेदों का सम्पूर्ण अध्ययन, उनके अंग और उपांग सहित, एक ओर रखा जाए और एक सत्य दूसरी ओर, तो दोनों समान होते हैं। इसलिए आपने जो वचन दिया था, उसे पूरा कीजिए।”

दमयन्ती पुकारती रहीं, “हे वीर नल, हे निष्पाप, हम आपकी हैं और इस भयानक वन में प्राण खोने वाली हैं। उत्तर क्यों नहीं देते? यह भयंकर मुख वाला वनराज भूख से व्याकुल, मुँह फैलाए खड़ा है; हमें भय लग रहा है। क्या आपको हमारी रक्षा नहीं करनी चाहिए? आप सदा कहते थे, ‘आपके अतिरिक्त हमें कोई प्रिय नहीं है।’ पहले कहे हुए वे शब्द अब सत्य कीजिए। आपकी पत्नी आपसे प्रेम करती है, आप भी उसे चाहते हैं; फिर शोक से विक्षिप्त होकर पुकारने पर उत्तर क्यों नहीं देते? हे पृथ्वीपति, हे सम्मानित शत्रुदमन, हे विशाल नेत्रों वाले, हमारी ओर क्यों नहीं देखते? हम दुर्बल, दुःखी, पीली और विवर्ण हो गई हैं। आधा वस्त्र पहने अकेली रो रही हैं, जैसे कोई अनाथ हो, जैसे झुण्ड से बिछुड़ी अकेली हिरणी। आपकी अनुरक्त दमयन्ती ही इस विशाल वन में आपको पुकार रही है; फिर मौन क्यों हैं? आप उच्च कुल में जन्मे, उत्तम आचरण वाले और अंग-अंग से सुन्दर हैं। आज इस पर्वत पर आप कहीं दिखाई नहीं देते। सिंहों और व्याघ्रों से भरे इस वन में आपका न मिलना हमारा दुःख बढ़ा रहा है। आप कहीं लेटे हैं, बैठे हैं, खड़े हैं अथवा चले गए? किससे पूछें कि इन वनों में राजा नल को देखा है? सुन्दर, उदारहृदय और शत्रुओं की सेनाओं का संहार करने वाले नल का समाचार किससे लें? किसके मुख से आज यह मधुर बात सुनें कि ‘जिन कमलदल जैसे नेत्रों वाले राजा नल को आप खोज रही हैं, वे यहीं हैं’?” तभी सुन्दर चाल वाला, चार दाँतों और उभरे गालों वाला एक व्याघ्र आता दिखाई दिया। दमयन्ती ने निडर होकर उसी से पूछने का निश्चय किया। बोलीं, “आप सभी पशुओं के स्वामी और इस वन के राजा हैं। हम विदर्भराज की कन्या दमयन्ती हैं, शत्रुओं को जीतने वाले निषधराज नल की पत्नी। दुःख से व्याकुल होकर इन वनों में अकेली अपने पति को खोज रही हैं। यदि आपने उन्हें देखा है, तो उनका समाचार देकर हमें ढाढ़स बँधाइए। यदि नल के विषय में कुछ नहीं बता सकते, तो हमें खा जाइए और इस दुःख से मुक्त कर दीजिए।” व्याघ्र ने उनकी करुण पुकार पर ध्यान नहीं दिया और समुद्र की ओर बहती निर्मल नदी की ओर चला गया।

तब दमयन्ती ने पर्वत से राजा का समाचार पूछना चाहा। वह ऊँचा, पवित्र पर्वत असंख्य सुन्दर, रंग-बिरंगे, आकाश छूते शिखरों वाला था। अनेक धातुएँ और रत्न उसमें थे। विशाल वन के ऊपर ध्वज की तरह उठ रहा था। सिंह, व्याघ्र, हाथी, सूअर, रीछ और हरिण उस पर घूमते थे; चारों ओर अनेक पक्षियों का स्वर गूँजता था। किंशुक, अशोक, बकुल, पुन्नाग, फूलों से भरे कर्णिकार, धव और प्लक्ष के वृक्ष थे। उसकी धाराओं में अनेक प्रकार के जलपक्षी रहते थे और ऊपर शिखरों की श्रेणियाँ उठी थीं। दमयन्ती बोलीं, “हे पवित्र पर्वतश्रेष्ठ, हे अद्भुत और यशस्वी शरणदाता, हे अत्यन्त मंगलमय पृथ्वी के स्तम्भ, आपको प्रणाम है। आपके निकट आकर फिर प्रणाम करती हैं। हमारा नाम दमयन्ती है। हम राजा की कन्या, राजा की पुत्रवधू और राजा की पत्नी हैं। विदर्भ पर शासन करने वाले पराक्रमी राजा भीम हमारे पिता हैं। वे चारों वर्णों की रक्षा करते हैं। उन्होंने राजसूय और अश्वमेध यज्ञ किए और ब्राह्मणों को बहुत दक्षिणा दी। उनके नेत्र विशाल और सुन्दर हैं; वेदों में श्रद्धा है, आचरण निष्कलंक है। सत्यवादी, छलरहित, कोमल स्वभाव वाले और पराक्रमी हैं। अपार धन के स्वामी, धर्म के ज्ञाता और पवित्र हैं। शत्रुओं को जीतकर विदर्भवासियों की भली प्रकार रक्षा करते हैं। उन्हीं की कन्या आपके पास आई है। हमारे श्वसुर निषध के प्रसिद्ध राजा वीरसेन थे। उनके पुत्र नल पिता से मिले राज्य का उत्तम शासन करते हैं। वे वीर और सुन्दर हैं; उनका तेज निष्फल नहीं जाता। शत्रुओं को जीतने वाले उन नल का एक नाम पुण्यश्लोक भी है। स्वर्ण के समान कान्ति है, ब्राह्मणों के प्रति भक्ति है, वेदों का ज्ञान और वाणी का कौशल है। वे धर्मात्मा, सोमपान करने वाले, अग्नि के उपासक और यज्ञकर्ता हैं। दान देते हैं, युद्ध में पराक्रम दिखाते हैं और अपराधियों को उचित दण्ड देते हैं। उनकी निर्दोष पत्नी, उनकी प्रमुख रानी, आपके सामने खड़ी है।”

दमयन्ती ने कहा, “हमारी सम्पदा छिन गई है, पति का साथ छूट गया है, कोई रक्षक नहीं रहा। विपत्ति में पड़कर उन्हें खोजती हुई यहाँ आई हैं। हे सैकड़ों ऊँचे शिखरों वाले पर्वतश्रेष्ठ, क्या इस भयानक वन में राजा नल को देखा है? क्या हमारे पति, यशस्वी निषधराज को देखा है, जिनकी चाल विशाल हाथी जैसी है? वे बुद्धिमान, लम्बी भुजाओं वाले, अग्नि के समान तेजस्वी, पराक्रमी, धैर्यवान, साहसी और प्रसिद्ध हैं। हमें अकेली, शोक से दबी हुई रोती देखकर आज अपनी वाणी से सान्त्वना क्यों नहीं देते, जैसे संकट में पड़ी अपनी कन्या को देते? हे वीर, हे पराक्रमी योद्धा, हे समस्त धर्मों के ज्ञाता सत्यनिष्ठ नल, यदि आप इस वन में हैं, तो सामने आइए। फिर कब आपका स्वर सुनेंगे, जो कोमल और मेघ के समान गम्भीर है? आपकी अमृत जैसी मधुर वाणी फिर कब हमें ‘विदर्भ की कन्या’ कहकर पुकारेगी? आपके शब्द स्पष्ट, पवित्र और वेदपाठ जैसे सुरीले हैं; भरपूर स्वर हमारा सारा दुःख शान्त कर देता है। महाराज, हमें भय लग रहा है। हे धर्मात्मा, हमें ढाढ़स बँधाइए।”

सार: वन में नल को खोजती दमयन्ती उनके सत्य और वचन का स्मरण कराती हैं। पहले व्याघ्र से, फिर पर्वत से उनका पता पूछती हैं। अपने कुल और पति के गुण बताते हुए वे फिर उसी मधुर स्वर को सुनने के लिए पुकारती हैं, जो उनका दुःख शान्त करता था।

अन्तर्धान हुआ आश्रम और चेदि की ओर जाता सार्थ

पर्वत से इस प्रकार कहकर दमयन्ती उत्तर दिशा में चल पड़ीं। तीन दिन और तीन रात चलने के बाद एक अनुपम तपोवन मिला, जिसकी शोभा देवताओं के उपवन जैसी थी। वहाँ वसिष्ठ, भृगु और अत्रि के समान तपस्वी रहते थे। संयमी, नियमित आहार वाले, मन और इन्द्रियों को वश में रखने वाले पवित्र पुरुष थे। कोई जल पर, कोई वायु पर और कोई गिरे हुए पत्तों पर जीवन निर्वाह करता था। वल्कल और मृगचर्म पहने, कामनाओं को रोककर वे स्वर्ग का मार्ग खोज रहे थे। हिरणों और बन्दरों के झुण्डों से भरा वह आश्रम देखकर दमयन्ती का मन कुछ प्रसन्न हुआ। सुन्दर भौंहों, लम्बे केशों, सुडौल नितम्बों, उन्नत वक्ष, सुन्दर दाँतों और बड़े काले नेत्रों वाली निर्दोष दमयन्ती अपने तेज और गरिमा के साथ आश्रम में गईं। तप करते हुए वृद्ध हुए ऋषियों को प्रणाम करके विनयपूर्वक खड़ी हो गईं। तपोधन मुनियों ने स्वागत किया, आदर दिया और कहा, “बैठिए। बताइए, हम आपके लिए क्या करें?” दमयन्ती ने पहले उनकी कुशल पूछी, “हे निष्पाप, परम भाग्यशाली तपस्वियों, आपका तप, यज्ञाग्नि, धार्मिक अनुष्ठान और अपने आश्रम के धर्म सब कुशल से हैं? यहाँ के पशु और पक्षी भी कुशल से हैं?” उन्होंने कहा, “कल्याणी, हमारा सब प्रकार से कल्याण है। आप कौन हैं और क्या चाहती हैं? आपका सुन्दर रूप और उज्ज्वल तेज देखकर हमें आश्चर्य हो रहा है। धीरज रखिए, शोक न कीजिए। क्या आप इस वन की, इस पर्वत की अथवा इस नदी की देवी हैं?” दमयन्ती ने उत्तर दिया, “ब्राह्मणो, हम वन, पर्वत अथवा नदी की देवी नहीं हैं। तपोधन ऋषियो, हम मनुष्य हैं। अपना वृत्तान्त विस्तार से कहती हैं, सुनिए।”

वे बोलीं, “विदर्भ के शक्तिशाली राजा भीम हमारे पिता हैं। निषध के बुद्धिमान और प्रसिद्ध राजा नल हमारे पति हैं। वे वीर, युद्ध में सदा विजयी और विद्वान हैं। देवताओं की पूजा करते हैं, ब्राह्मणों के भक्त हैं और निषधवंश के रक्षक हैं। अपार तेज और बल है; सत्यवादी, समस्त धर्मों के ज्ञाता और विवेकी हैं। प्रतिज्ञा से कभी नहीं डिगते। शत्रुओं को कुचलते हैं, देवसेवा में लगे रहते हैं, सुन्दर हैं और विरोधियों के नगर जीत लेते हैं। देवराज के समान कान्ति वाले, विशाल नेत्रों और पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसे वर्ण वाले वे नल हमारे पति हैं। बड़े यज्ञ करते हैं, वेदों और उनके अंगों को जानते हैं, रण में शत्रुओं का नाश करते हैं और सूर्य-चन्द्रमा के समान शोभा पाते हैं। उन सत्य और धर्म में रत राजा को नीच स्वभाव वाले, असंस्कृत, कुटिल और जुए में कुशल कुछ छलपूर्ण लोगों ने खेलने के लिए बुलाया और उनका धन तथा राज्य छीन लिया। उन्हीं श्रेष्ठ राजा की पत्नी का नाम दमयन्ती है। हम अपने बिछुड़े स्वामी को खोज रही हैं। उदास हृदय लेकर वन, पर्वत, झील, नदी और सरोवरों के बीच घूमती हैं। हमारे पति नल उदारहृदय, युद्ध में कुशल और अस्त्र चलाने के ज्ञाता हैं। क्या वे निषधराज आपके इस सुन्दर आश्रम में आए हैं? उन्हीं को खोजने के लिए हम व्याघ्र और दूसरे पशुओं से भरे इस भयानक निर्जन वन में आई हैं। यदि कुछ दिन और रातों में राजा नल दिखाई न दिए, तो इस देह को छोड़कर अपना कल्याण खोजेंगी। उनके बिना जीवन किस काम का? पति के शोक से पीड़ित होकर कैसे जी सकेंगी?” वन में इस प्रकार विलाप करती भीमकन्या से सत्यवादी ऋषियों ने कहा, “कल्याणी, अपने तप के बल से हम देखते हैं कि आगे आपको सुख मिलेगा। शीघ्र ही निषधराज के दर्शन होंगे। शत्रुओं को जीतने वाले धर्मात्माओं में श्रेष्ठ नल आपको दुःख से मुक्त दिखाई देंगे। आपके पति सारे पापों से मुक्त होकर, अनेक प्रकार के रत्नों से विभूषित, उसी नगर पर फिर शासन करेंगे। वे शत्रुओं को दण्ड देंगे, विरोधियों के हृदय में भय उत्पन्न करेंगे और मित्रों को आनन्द देंगे। उन्हें सब प्रकार का कल्याण प्राप्त होगा।”

नल की प्रिय रानी से इतना कहते ही वे ऋषि अपनी यज्ञाग्नियों और आश्रम सहित अदृश्य हो गए। यह बड़ा आश्चर्य देखकर वीरसेन की पुत्रवधू चकित रह गईं। सोचने लगीं, “क्या हमने स्वप्न देखा? यह क्या हुआ? वे सब तपस्वी कहाँ हैं? वह आश्रम कहाँ है? अनेक पक्षियों वाली पवित्र जल की सुन्दर नदी कहाँ गई? फल और फूलों से सजे वे मनोहर वृक्ष कहाँ हैं?” कुछ देर सोचती रहीं। फिर पति के शोक से मुख की कान्ति फीकी पड़ गई। वन के दूसरे भाग में जाने पर एक अशोक वृक्ष दिखाई दिया। पत्तों और फूलों से भरा वह सुन्दर वृक्ष पक्षियों के कलरव से गूँज रहा था। दमयन्ती उसके पास गईं। आँखों में आँसू थे, स्वर दुःख से रुँध रहा था। बोलीं, “वन के बीच फूलों से सजा यह सुन्दर वृक्ष मनोहर पर्वतराज जैसा शोभा पा रहा है। हे अशोक, हमारा शोक शीघ्र दूर कीजिए। क्या आपने शत्रुओं को जीतने वाले, दमयन्ती के प्रिय पति नल को भय, दुःख और बाधाओं से मुक्त देखा है? क्या आधा वस्त्र पहने, कोमल त्वचा वाले उन दुःखी निषधराज को देखा है, जो इस वन में आए हैं? हे अशोक, हमें शोक से छुड़ाइए। अपना नाम सत्य कीजिए; अशोक का अर्थ ही शोक का नाश करने वाला है।” वृक्ष की तीन परिक्रमा करके वे दुःखी मन से वन के और भी भयानक भाग में चली गईं। नल को खोजते हुए अनेक वृक्ष, धाराएँ, सुन्दर पर्वत, पशु-पक्षी, गुफाएँ, खड़ी ढलानें और अद्भुत नदियाँ देखीं। आगे एक चौड़े मार्ग पर उन्हें व्यापारियों का सार्थ दिखाई दिया। घोड़ों और हाथियों सहित व्यापारी नदी के तट पर उतर रहे थे। नदी चौड़ी और सुन्दर थी; जल निर्मल और शीतल था। बेंत की झाड़ियाँ थीं, सारस, कुररी और चक्रवाकों की पुकार गूँजती थी। जल में कछुए, ग्राह और मछलियाँ थीं तथा असंख्य छोटे द्वीप थे।

सार्थ को देखकर दमयन्ती उसके बीच जा पहुँचीं। आधा वस्त्र पहने थीं, देह दुर्बल, पीला और मैला था, केश धूल से भरे थे। शोक ने उन्हें विक्षिप्त-सा कर दिया था। उन्हें देखकर कुछ लोग भय से भागे, कुछ अत्यन्त चिन्तित हो उठे, कुछ चिल्लाए, कुछ हँसे और कुछ ने घृणा की। कुछ को दया आई। उन्होंने पूछा, “कल्याणी, आप कौन हैं, किसकी हैं? वन में क्या खोज रही हैं? आपको देखकर हम डर गए हैं। क्या आप मनुष्य हैं? सत्य बताइए। क्या इस वन, पर्वत अथवा दिशाओं की देवी हैं? हम आपकी शरण चाहते हैं। आप यक्षिणी, राक्षसी अथवा देवकन्या तो नहीं हैं? हमें आशीर्वाद दीजिए और हमारी रक्षा कीजिए। ऐसा कीजिए कि यह सार्थ शीघ्र कुशल से यहाँ से निकल जाए और हम सबका कल्याण हो।” पति के प्रति अनुरक्त दमयन्ती ने उत्तर दिया, “सार्थवाह, व्यापारियो, युवकों, वृद्धों, बच्चों और इस सार्थ के सभी जनो, हम मनुष्य हैं। राजा की कन्या, राजा की पुत्रवधू और राजा की पत्नी हैं। अपने पति के दर्शन चाहती हैं। विदर्भ के राजा हमारे पिता हैं और निषध के राजा नल हमारे पति। उन्हीं अजेय, कल्याणकारी राजा को अभी खोज रही हैं। यदि आपने हमारे प्रिय नल को देखा है, जो पुरुषों में व्याघ्र के समान और शत्रुओं की सेनाओं का नाश करने वाले हैं, तो शीघ्र बताइए।” बड़े सार्थ के नायक का नाम शुचि था। उसने कहा, “कल्याणी, सुनिए। हम व्यापारी और इस सार्थ के नायक हैं। नल नाम के किसी पुरुष को हमने नहीं देखा। मनुष्यों से रहित इस विशाल वन में हाथी, चीते, भैंसे, व्याघ्र, रीछ और दूसरे पशु ही मिले हैं। आपके अतिरिक्त यहाँ कोई पुरुष या स्त्री नहीं दिखाई दिया। यक्षराज मणिभद्र हमारी सहायता करें!” दमयन्ती ने व्यापारियों और उनके नायक से पूछा कि सार्थ कहाँ जा रहा है। शुचि ने बताया, “राजकन्या, व्यापार में लाभ के लिए यह सार्थ सीधे सत्यवादी चेदिराज सुवाहु के नगर जा रहा है।”

सार: तपस्वी दमयन्ती को नल से मिलने और उनका राज्य लौटने का आश्वासन देकर आश्रम सहित अदृश्य हो जाते हैं। दमयन्ती अशोक वृक्ष से शोक हरने की प्रार्थना करती हैं, फिर शुचि के सार्थ से मिलती हैं। किसी ने नल को नहीं देखा; व्यापारी चेदिराज सुवाहु के नगर जा रहे हैं।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), वन पर्व; यह अध्याय के. एम. गांगुली, खण्ड LII-LXXIX (52-79) का क्रम निभाता है; गीता प्रेस हिन्दी संस्करण की अध्याय-संख्या इससे भिन्न है। नामों, क्रम और मुख्य घटनाओं की जाँच गांगुली के सम्पूर्ण अंग्रेज़ी अनुवाद से हुई है। यह भावपूर्ण पुनर्कथन है, शब्दशः अनुवाद नहीं। स्रोतों के बारे में।

आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)