अध्याय 13 · नल-दमयन्ती

महाभारत · वन पर्व
बृहदश्व मुनि की सुनाई नल और दमयन्ती की कथा, जुए में सब कुछ गँवाकर भी पुनः पा लेने की वह कहानी जो वनवासी युधिष्ठिर को सान्त्वना देती है।

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कुरुवंश की वह कथा जहाँ काम्यक वन में बैठे पाँचों पाण्डव और द्रौपदी एक स्वच्छ, एकान्त घास के मैदान पर शोक में डूबे हुए थे। अर्जुन अस्त्र पाने के लिए इन्द्रलोक चले गए थे, और उनके वियोग में सबका कण्ठ रुँध रहा था। उसी क्षण भीम ने युधिष्ठिर से कहा कि जिस वीर पर हम सबके प्राण टिके हैं, वह आपकी आज्ञा से चला गया है, और आपके द्यूत-व्यसन (जुए की लत) के कारण ही हम इस विपत्ति में पड़े हैं। भीम ने यह भी कहा कि छल का उत्तर छल से देना अधर्म नहीं माना जाता, और वे चाहें तो आज ही हस्तिनापुर जाकर दुर्योधन को भस्म कर दें। युधिष्ठिर ने उनका मस्तक सूँघकर शान्त किया और कहा कि असत्य उनमें नहीं है। इसी संवाद के बीच महर्षि बृहदश्व वहाँ पधारे, और युधिष्ठिर ने उन्हें मधुपर्क से पूजकर, अत्यन्त करुण स्वर में अपनी व्यथा कह सुनाई कि क्या इस पृथ्वी पर उनसे अधिक अभागा कोई राजा है। तब बृहदश्व ने मुस्कुराकर कहा कि वे एक ऐसे राजा की कथा सुनाएँगे जो युधिष्ठिर से कहीं अधिक दुखी हुआ था, फिर भी जिसने सब कुछ खोकर पुनः सब पा लिया। यही नल और दमयन्ती की कथा है, जो जुए में हारे हुए वनवासी युधिष्ठिर को सान्त्वना देने के लिए कही गई।

बृहदश्व का आगमन और कथा का आरम्भ

बृहदश्व ने कहा कि वे एक ऐसे राजा का वृत्तान्त सुनाएँगे जो युधिष्ठिर से भी अधिक दुर्भाग्यशाली रहा। निषध देश में वीरसेन नामक एक प्रसिद्ध राजा थे, जिनके पुत्र का नाम नल था। नल धर्म और अर्थ दोनों के ज्ञाता थे। उन्हें छल से पुष्कर ने जुए में हराया, और विपत्ति में पड़कर वे अपनी पत्नी के साथ वन में रहने लगे। उस समय उनके पास न दास थे, न रथ, न भाई, न मित्र। बृहदश्व ने युधिष्ठिर से कहा कि आप तो देवताओं के समान वीर भाइयों और ब्रह्मा के समान श्रेष्ठ ब्राह्मणों से घिरे हैं, अतः आपको इतना शोक करना उचित नहीं। युधिष्ठिर ने विस्तार से वह कथा सुनने की इच्छा प्रकट की, और बृहदश्व ने उसे आरम्भ किया।

नल बलवान, सुन्दर और अश्वविद्या (घोड़ों के ज्ञान) में निपुण थे। वे समस्त राजाओं में अग्रणी थे और तेज में सूर्य के समान दीप्तिमान थे। वे निषधों के राजा थे, ब्राह्मणों के हितैषी, वेदों के ज्ञाता और वीर थे। वे सत्यवादी थे, द्यूत (पासे के खेल) के प्रेमी थे, और एक विशाल सेना के स्वामी थे। दूसरी ओर विदर्भ देश में भीम नामक एक राजा थे, प्रतापी और सर्वगुणसम्पन्न, परन्तु निःसन्तान। सन्तान की कामना से उन्होंने दमन नामक ब्रह्मर्षि की अपनी रानी के साथ श्रद्धापूर्वक सेवा की। प्रसन्न होकर दमन ऋषि ने उन्हें एक रत्न-समान कन्या और तीन उत्तम पुत्रों का वरदान दिया। उनके नाम क्रमशः दमयन्ती, और दम, दान्त तथा दमन रखे गए। दमयन्ती अपने रूप, यश और सौभाग्य से समस्त संसार में प्रसिद्ध हुई। उसकी सुन्दरता न देवताओं में, न यक्षों में, न मनुष्यों में कहीं देखी या सुनी गई थी।

समझने की कुंजी (वंश): निषध और विदर्भ दो भिन्न राज्य हैं। नल निषध-नरेश वीरसेन के पुत्र हैं; दमयन्ती विदर्भ-नरेश भीम की पुत्री हैं। ध्यान रहे, यह भीम विदर्भ के राजा हैं, पाण्डव भीम नहीं। पुष्कर नल के भाई हैं, जो आगे जुए में नल का राज्य छीनेंगे।

नल और दमयन्ती ने एक-दूसरे के गुणों की प्रशंसा बार-बार सुनी, और बिना एक-दूसरे को देखे ही उनमें परस्पर अनुराग उत्पन्न हो गया। एक दिन नल अपने उद्यान में स्वर्णपंखों वाले हंसों को देखकर एक को पकड़ लाए। उस हंस ने मनुष्य-वाणी में कहा कि हे राजन्, आप हमें न मारिए, हम आपका हित करेंगे, और दमयन्ती के सामने आपकी ऐसी प्रशंसा करेंगे कि वह किसी और को पति रूप में नहीं चाहेगी। नल ने उस हंस को मुक्त कर दिया। तब वे हंस विदर्भ देश में दमयन्ती के पास उड़ गए। दमयन्ती जिस हंस के पीछे दौड़ी, वह उसे एकान्त स्थान पर ले गया और बोला कि निषधों में नल नामक एक राजा हैं, जो रूप में अश्विनीकुमारों के समान हैं, और मनुष्यों में जिनका कोई सानी नहीं। यदि आप उनकी पत्नी बनें तो आपका रूप और आपका जीवन सार्थक हो जाए। दमयन्ती ने उत्तर दिया कि वह हंस नल के सामने भी ऐसा ही कहे। हंस ने निषध लौटकर नल को सब कुछ कह सुनाया।

सार: युधिष्ठिर के शोक को देखकर बृहदश्व नल की कथा आरम्भ करते हैं। निषध-नरेश नल और विदर्भ-राजकुमारी दमयन्ती बिना मिले ही एक-दूसरे के गुणों पर अनुरक्त हो गए, और स्वर्णपंखी हंस इस अनुराग का दूत बन गया।

स्वयंवर की घोषणा और देवताओं का आगमन

हंस के वचन सुनकर दमयन्ती नल के लिए व्याकुल हो उठी। वह बार-बार आहें भरती, उदास और पीली पड़ जाती, और दिन-रात रोती रहती। उसकी दशा देखकर सखियों ने संकेतों में राजा भीम को उसकी व्यथा बताई। भीम ने समझ लिया कि कन्या युवावस्था को प्राप्त हो गई है, और उन्होंने दमयन्ती के स्वयंवर का निश्चय किया। उन्होंने समस्त पृथ्वी के राजाओं को निमन्त्रण भेजा, और सब राजा अपने हाथियों, घोड़ों और सेनाओं के साथ विदर्भ आ पहुँचे। भीम ने उन सबका यथोचित सत्कार किया।

इसी बीच देवर्षि नारद और पर्वत, अपने भ्रमण के क्रम में, इन्द्रलोक पहुँचे। इन्द्र ने उनका आदर किया और कुशल पूछी। बातचीत में इन्द्र ने पूछा कि अब वे वीर क्षत्रिय राजा क्यों नहीं दिखाई देते जो युद्ध में प्राणों की चिन्ता छोड़कर लड़ते और स्वर्ग को प्राप्त होते थे। नारद ने उत्तर दिया कि विदर्भ-नरेश भीम की कन्या दमयन्ती का स्वयंवर होने वाला है, और संसार के समस्त राजा उसी ओर जा रहे हैं। यह सुनते ही अग्नि सहित लोकपाल भी वहाँ आ पहुँचे और बोले कि हम भी वहाँ चलेंगे। अतः इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम, ये चारों लोकपाल अपने वाहनों पर बैठकर विदर्भ की ओर चल पड़े।

समझने की कुंजी (अवधारणा): लोकपाल वे देव हैं जो दिशाओं और जगत् की रक्षा करते हैं। यहाँ चार लोकपाल हैं, इन्द्र (देवराज), अग्नि (हुताशन), वरुण (जल के स्वामी) और यम (मृत्यु के देवता)। ये चारों स्वयं दमयन्ती को पाना चाहते हैं, और यहीं से कथा में देव और मनुष्य का असाधारण द्वन्द्व उठता है।

मार्ग में वे देवता नल को पृथ्वी पर चलते हुए देखते हैं, जिनका रूप साक्षात् कामदेव के समान था। उनके सौन्दर्य से चकित होकर लोकपालों ने आकाश में अपने रथ छोड़ दिए और नल के पास उतरकर बोले कि हे निषधों के राजा, आप सत्यनिष्ठ हैं, अतः हमारी सहायता कीजिए और हमारे दूत बन जाइए। नल ने बिना जाने ही वचन दे दिया, फिर हाथ जोड़कर पूछा कि आप कौन हैं और मुझे क्या करना है। इन्द्र ने अपना परिचय दिया कि वे चारों दमयन्ती के लिए आए हैं, और नल को उनका सन्देश दमयन्ती तक पहुँचाना है कि वह इन चारों में से किसी एक को अपना पति चुने। नल ने हाथ जोड़कर कहा कि वे स्वयं इसी प्रयोजन से आए हैं, और जो पुरुष स्वयं प्रेम के वशीभूत हो, वह दूसरों के लिए किसी स्त्री से कैसे ऐसा कहे, अतः उन्हें इस कार्य से मुक्त किया जाए। परन्तु देवताओं ने कहा कि वचन देकर अब वे पीछे नहीं हट सकते। नल ने पूछा कि भलीभाँति रक्षित उस अन्तःपुर में वे कैसे प्रवेश करेंगे, और इन्द्र ने आश्वासन दिया कि वे प्रवेश कर सकेंगे।

नल देवताओं की शक्ति से अदृश्य रूप में दमयन्ती के महल में प्रवेश कर गए। वहाँ उन्होंने सखियों से घिरी, अपने तेज से चन्द्रमा की कान्ति को भी फीका करती हुई दमयन्ती को देखा। नल का प्रेम बढ़ा, पर सत्य की रक्षा के लिए उन्होंने अपने मन को रोक लिया। दमयन्ती ने मुस्कुराकर पूछा कि आप कौन हैं, और इस सुरक्षित अन्तःपुर में बिना देखे कैसे प्रवेश कर सके। नल ने अपना परिचय दिया और कहा कि वे देवताओं (इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम) के दूत बनकर आए हैं, जो उसे पाना चाहते हैं, अतः वह उनमें से किसी एक को चुने।

सार: भीम ने दमयन्ती का स्वयंवर घोषित किया। इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम, ये चार लोकपाल, भी दमयन्ती को पाने आ पहुँचे, और उन्होंने नल को ही अपना दूत बना दिया। नल ने वचनबद्ध होकर अपने ही प्रेम के विरुद्ध देवताओं का सन्देश दमयन्ती तक पहुँचाया। यहाँ कथा की पहली नैतिक उलझन है, कि प्रेमी को ही अपने प्रेम के प्रतिद्वन्द्वियों का दूत बनना पड़ा।

दमयन्ती का वरण और देवताओं के वरदान

दमयन्ती ने देवताओं को प्रणाम करके मुस्कुराते हुए नल से कहा कि वह उन्हीं से प्रेम करती है, और जो कुछ उसका है वह सब नल का है। उसने कहा कि हंसों की वाणी ही उसे जला रही है, और उसी के कारण उसने इतने राजाओं को एकत्र किया है। यदि नल उसे त्याग देंगे तो वह विष, अग्नि, जल या रस्सी का सहारा ले लेगी। परन्तु नल ने कहा कि जब लोकपाल स्वयं उपस्थित हैं, तब क्या वह एक मनुष्य को चुनेगी; उसे उन्हीं उच्च-आत्मा देवताओं की ओर मन लगाना चाहिए, जिनके चरणों की धूलि के भी वे समान नहीं। देवताओं को अप्रसन्न करके मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है, अतः वह उन सर्वश्रेष्ठ देवों को ही चुने।

दमयन्ती ने आँखों में आँसू भरकर उत्तर दिया कि सब देवताओं को प्रणाम करते हुए भी वह नल को ही अपना पति चुनती है, और यह सत्य है। तब उसने एक निर्दोष मार्ग बताया, कि नल इन्द्र सहित सब देवताओं के साथ स्वयंवर में आएँ, और वहाँ लोकपालों की उपस्थिति में वह उन्हें ही चुनेगी, जिससे नल पर कोई दोष न आए। नल ने लौटकर देवताओं को सब कुछ कह सुनाया।

नियत शुभ मुहूर्त में राजा भीम ने राजाओं को स्वयंवर में बुलाया। स्वर्णस्तम्भों और ऊँचे तोरण से सुशोभित उस सभा में राजागण सिंहों के समान प्रविष्ट हुए। फिर दमयन्ती ने सभा में प्रवेश किया और सबके नेत्रों तथा हृदयों को मोह लिया। जब राजाओं के नाम घोषित हुए, तब दमयन्ती ने पाँच पुरुषों को एक समान रूप में बैठे देखा, और वह यह न पहचान सकी कि उनमें नल कौन हैं। चारों देवताओं ने नल का ही रूप धारण कर लिया था। चिन्तित होकर उसने मन ही मन सोचा कि वह देवताओं और राजा नल में भेद कैसे करे।

तब दमयन्ती ने हाथ जोड़कर, काँपते हुए, देवताओं की शरण ली और कहा कि जब से उसने हंसों की वाणी सुनी, तब से उसने नल को ही पति चुन लिया है; इस सत्य के बल पर देवता नल को प्रकट करें। उसने प्रार्थना की कि लोकपाल अपने वास्तविक रूप धारण करें ताकि वह धर्मात्मा राजा को पहचान सके। दमयन्ती की दृढ़ निष्ठा और नल के प्रति उसके पवित्र प्रेम को देखकर देवताओं ने अपने-अपने लक्षण प्रकट कर दिए। तब दमयन्ती ने देखा कि देवता पसीने से रहित, बिना पलक झपकाए, अम्लान मालाओं वाले, धूलिरहित और भूमि को बिना छुए स्थित हैं; जबकि नल की छाया थी, उनकी मालाएँ कुछ मुरझाई थीं, वे धूलि और स्वेद से युक्त थे, और पलक झपकाते हुए भूमि पर खड़े थे। देवताओं और धर्मात्मा नल में भेद कर लेने पर दमयन्ती ने अपने सत्य के अनुसार नल को ही चुना, और लज्जापूर्वक उनके वस्त्र का छोर पकड़कर उनके गले में पुष्पमाला डाल दी।

समझने की कुंजी (अवधारणा): देवताओं को पहचानने के पारम्परिक लक्षण ये हैं, न पसीना, न पलक का झपकना, अम्लान (कभी न मुरझाने वाली) माला, धूलिरहित शरीर, और भूमि को न छूना। मनुष्य इसके विपरीत होता है। दमयन्ती ने इन्हीं भेदों से नल को पहचाना। यह कथा का मार्मिक मोड़ है, जहाँ मनुष्य का अपूर्ण रूप ही उसकी सच्चाई का प्रमाण बन गया।

दमयन्ती के एक मनुष्य को देवताओं के सामने चुनते ही राजागण हाहाकार कर उठे, परन्तु देवताओं और महर्षियों ने ‘साधु! साधु!’ कहकर नल की प्रशंसा की। नल ने प्रसन्न होकर दमयन्ती को आश्वस्त किया कि जब तक इस शरीर में प्राण रहेंगे, वे उसी के रहेंगे। प्रसन्न होकर लोकपालों ने नल को आठ वरदान दिए। इन्द्र ने वरदान दिया कि नल यज्ञों में उन्हें देख सकेंगे और श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होंगे। अग्नि ने अपनी उपस्थिति का और अपने समान दीप्त लोकों का वरदान दिया। यम ने भोजन में सूक्ष्म रस-ज्ञान और धर्म में श्रेष्ठता दी। वरुण ने इच्छानुसार अपनी उपस्थिति और दिव्य गन्ध की मालाएँ दीं। इस प्रकार प्रत्येक ने दो-दो वरदान दिए, और देवता स्वर्ग को लौट गए। भीम ने नल और दमयन्ती का विवाह सम्पन्न किया। नल अपनी नगरी लौटकर सुखपूर्वक राज्य करने लगे और उन्होंने अश्वमेध आदि अनेक यज्ञ किए। दमयन्ती से उनके इन्द्रसेन नामक पुत्र और इन्द्रसेना नामक पुत्री हुई।

सार: दमयन्ती ने देवताओं के समक्ष भी नल को ही चुना, और मनुष्य के लक्षणों से उन्हें पहचाना। चारों लोकपालों ने प्रसन्न होकर नल को आठ वरदान दिए। विवाह के बाद नल सुखपूर्वक राज्य करने लगे और उनके दो सन्तानें हुईं। देवताओं ने मनुष्य के प्रेम और सत्य को स्वीकार कर लिया, पर इसी निर्णय से एक नया वैर जन्म लेने वाला था।

कलि का वैर और द्यूत का छल

स्वयंवर के बाद लौटते समय लोकपालों को मार्ग में द्वापर के साथ आता हुआ कलि मिला। इन्द्र ने पूछा कि वह कहाँ जा रहा है, और कलि ने कहा कि वह दमयन्ती के स्वयंवर में उसे पाने जा रहा है, क्योंकि उसका मन उसी पर लगा है। इन्द्र ने मुस्कुराकर कहा कि स्वयंवर तो समाप्त हो चुका, और उनके सामने ही दमयन्ती ने नल को चुन लिया। यह सुनकर कलि क्रोध से भर गया और बोला कि जब उसने देवताओं के सामने एक मनुष्य को चुना है, तो उसे कठोर दण्ड मिलना चाहिए। देवताओं ने उत्तर दिया कि दमयन्ती ने उनकी अनुमति से ही नल को चुना है, और नल सर्वगुणसम्पन्न हैं; वे चारों वेदों के ज्ञाता, सत्यवादी, अहिंसक और धर्मनिष्ठ हैं; जो मूढ़ ऐसे नल को शाप देना चाहेगा, वह स्वयं को ही शाप देगा और घोर नरक में गिरेगा। यह कहकर देवता स्वर्ग चले गए।

देवताओं के जाने पर कलि ने द्वापर से कहा कि वह अपना क्रोध रोक नहीं सकता; वह नल पर अधिकार करेगा, उन्हें राज्य से वंचित करेगा, और द्वापर पासों में प्रवेश करके उसकी सहायता करे। यह सन्धि करके कलि निषध देश आया और छिद्र (दोष) की खोज में बहुत समय तक वहाँ रहा। बारहवें वर्ष में उसे एक छिद्र मिला। एक दिन शौच के पश्चात् नल ने पैर धोए बिना ही जल छूकर सन्ध्या-वन्दना की, और इसी चूक से कलि उनके शरीर में प्रवेश कर गया।

एक उप-कथा: कथा यहाँ स्पष्ट करती है कि नल का पतन उनके किसी पाप से नहीं हुआ। यह तो बारह वर्षों तक प्रतीक्षा करते कलि के एक तुच्छ अवसर से हुआ, एक अधूरे शुद्धिकरण के क्षण से। महाभारत यह नहीं छिपाता कि नल पर जो आपत्ति आई, उसका मूल कारण उनका दोष नहीं, बाहरी शक्ति का प्रवेश था; फिर भी कथा यह भी नहीं कहती कि नल पूर्णतः निर्दोष हैं, क्योंकि जुए के प्रति उनका आकर्षण पहले से ही था।

कलि से ग्रस्त होकर नल का मन पासों के खेल में डूब गया। कलि ने पुष्कर के पास जाकर कहा कि वह नल से जुआ खेले, क्योंकि उसकी सहायता से वह अवश्य जीतेगा और निषध-राज्य पा लेगा। द्वापर भी वृष नामक प्रमुख पासा बनकर इसमें सम्मिलित हो गया। पुष्कर ने नल को बार-बार जुए के लिए ललकारा, और दमयन्ती के सामने ललकारे जाने पर उच्च-हृदय नल अधिक समय तक इन्कार न कर सके। कलि से ग्रस्त नल खेल में अपना सोना, चाँदी, रथ, घोड़े और वस्त्र हारने लगे। जुए में उन्मत्त हुए नल को कोई मित्र रोक न सका। नगरवासी और मन्त्री राजा को रोकने आए, और सारथी ने दमयन्ती को यह बताया, पर कलि से ग्रस्त नल ने रानी के एक भी वचन का उत्तर न दिया। इस प्रकार कई महीनों तक नल और पुष्कर जुआ खेलते रहे, और धर्मात्मा नल सदा हारते रहे।

सार: दमयन्ती के देवताओं के सामने मनुष्य को चुनने से कलि क्रुद्ध हुआ। बारह वर्ष प्रतीक्षा करके, नल की एक छोटी-सी धार्मिक चूक से कलि ने उनके शरीर में प्रवेश किया और पुष्कर तथा द्वापर के साथ मिलकर जुए में नल को पराजित किया। यहाँ युधिष्ठिर की अपनी कथा की प्रतिध्वनि है, जुआ, छल, और राज्य का विनाश।

दमयन्ती की दूरदर्शिता और सन्तानों की रक्षा

राजा को जुए में उन्मत्त और अपने हानि-लाभ से बेसुध देखकर दमयन्ती भयभीत हुई। उसने समझ लिया कि राजा सब कुछ हार चुके हैं। उसने अपनी विश्वसनीय धाय बृहत्सेना को बुलाकर मन्त्रियों को नल के नाम से बुलाने और यह बताने को कहा कि क्या-क्या नष्ट हो चुका है और क्या शेष है। मन्त्री आए, पर राजा ने दमयन्ती के वचनों की ओर ध्यान न दिया। लज्जित होकर दमयन्ती अपने कक्ष में लौट गई।

तब दमयन्ती ने पुनः बृहत्सेना के द्वारा सारथी वार्ष्णेय को बुलवाया। उसने कोमल वचनों में उससे कहा कि राजा संकट में हैं और उसे उनकी सहायता करनी चाहिए; जितना अधिक राजा पुष्कर से हारते हैं, उतना ही उनका खेल के प्रति आवेश बढ़ता जाता है, और वे किसी के भी, यहाँ तक कि उसके भी, वचन नहीं सुनते। उसने कहा कि वह नल के तीव्र वेग वाले प्रिय घोड़ों को रथ में जोतकर उनके दोनों बच्चों (इन्द्रसेन और इन्द्रसेना) को कुण्डिन (विदर्भ की राजधानी) ले जाए, और उन्हें उसके परिजनों के पास छोड़ दे, फिर चाहे वहीं रहे या जहाँ चाहे चला जाए। वार्ष्णेय ने यह बात राजा के प्रमुख अधिकारियों से कही, और उनकी सम्मति से बच्चों को रथ में लेकर विदर्भ चला गया। वहाँ बच्चों, रथ और घोड़ों को छोड़कर, नल के लिए शोक करता हुआ वार्ष्णेय अयोध्या पहुँचा और राजा ऋतुपर्ण के यहाँ सारथी के रूप में सेवा करने लगा।

समझने की कुंजी (स्थान): कुण्डिन विदर्भ की राजधानी है, दमयन्ती का मायका। अयोध्या कोसल देश की राजधानी है, जहाँ राजा ऋतुपर्ण राज्य करते हैं, जो आगे चलकर कथा में निर्णायक भूमिका निभाएँगे। वार्ष्णेय का अयोध्या जाना संयोग नहीं, कथा का सूत्र है, क्योंकि नल भी वहीं पहुँचेंगे।

वार्ष्णेय के जाने के बाद पुष्कर ने नल का राज्य और शेष सब सम्पत्ति जीत ली। तब हँसते हुए पुष्कर ने कहा कि अब क्या दाँव बचा है, केवल दमयन्ती शेष है, चाहे तो वही दाँव पर लगा दे। यह सुनकर नल का हृदय क्रोध से फटने को हुआ, पर वे एक शब्द न बोले। उन्होंने शरीर के सब आभूषण उतार दिए, और केवल एक वस्त्र पहने, शरीर अनावृत, अपनी सारी सम्पत्ति त्यागकर नगर से निकल पड़े। दमयन्ती भी एक ही वस्त्र में उनके पीछे चली। पुष्कर ने घोषणा करवा दी कि जो कोई नल का आदर-सत्कार करेगा, उसे मृत्युदण्ड मिलेगा। अतः नल नगर के बाहर तीन रात केवल जल पर रहे।

भूख से व्याकुल नल फल-मूल की खोज में निकले, दमयन्ती पीछे-पीछे चलती रही। तभी नल ने स्वर्ण-वर्ण के कुछ पक्षी देखे और सोचा कि ये ही आज उनका भोजन और धन होंगे। उन्होंने अपने एकमात्र वस्त्र से उन्हें ढँकना चाहा, पर पक्षी उस वस्त्र को ही लेकर आकाश में उड़ गए। उन्होंने नग्न और उदास खड़े नल से कहा कि वे ही पासे हैं, और इसलिए आए थे कि नल उस अन्तिम वस्त्र के साथ भी न जा सकें। अपने वस्त्र से वंचित नल ने दमयन्ती को दक्षिण देश के, विदर्भ के और कोसल के मार्ग बार-बार दिखाए। दमयन्ती ने आँसुओं में डूबकर कहा कि वह नल को इस अवस्था में अकेला छोड़कर कैसे जा सकती है; हर दुःख में पत्नी से बढ़कर कोई औषधि नहीं। नल ने कहा कि वे उसे त्यागना नहीं चाहते, वे अपने को त्याग सकते हैं पर उसे नहीं। तब दमयन्ती ने कहा कि यदि उनका मन व्याकुल हो तो दोनों साथ विदर्भ चलें, जहाँ उसके पिता नल का सत्कार करेंगे। पर नल ने कहा कि वह राज्य उनके अपने राज्य के समान है, परन्तु जिस गौरव में वे एक बार वहाँ गए थे, उस दुर्दशा में वे अब वहाँ नहीं जाएँगे।

सार: दमयन्ती ने दूरदर्शिता से दोनों बच्चों को विदर्भ भिजवा दिया, जिससे वे सुरक्षित रहें। पुष्कर ने नल का सम्पूर्ण राज्य और धन जीत लिया; नल केवल एक वस्त्र में नगर से निकले, दमयन्ती साथ चली, और पक्षी रूप में आए पासे उनका वह अन्तिम वस्त्र भी ले उड़े। नल का स्वाभिमान उन्हें श्वसुर के घर शरण लेने से रोकता है।

नल का दमयन्ती को त्याग

एक ही वस्त्र में लिपटे, भूख-प्यास से व्याकुल वे दोनों भटकते हुए एक यात्रियों के विश्राम-स्थल तक पहुँचे। वहाँ नल भूमि पर बैठ गए, और थककर दमयन्ती के साथ धरती पर ही सो गए। दमयन्ती गहरी निद्रा में चली गई, पर नल का मन व्यथित था और उन्हें नींद न आई। राज्य के नाश, मित्रों के त्याग और वन की पीड़ा पर विचार करते हुए उन्होंने सोचा कि क्या मृत्यु अच्छी है, या पत्नी का त्याग। उन्होंने सोचा कि उससे अलग होकर वह सम्भवतः अपने परिजनों के पास लौट जाएगी, और उसके साथ रहने से उसे निश्चित दुःख ही मिलेगा। कलि से प्रभावित उनका मन दमयन्ती को त्यागने का निश्चय कर बैठा। उन्होंने सोचा कि वह सौभाग्यवती और तेजस्विनी है, मार्ग में कोई उसका अनिष्ट न कर सकेगा।

फिर अपने वस्त्रहीन होने और दमयन्ती के एक ही वस्त्र पहने होने पर विचार करके, उन्होंने उसके वस्त्र का आधा भाग काट लेने का निश्चय किया। विश्राम-स्थल में टहलते हुए उन्हें एक खुली तलवार पड़ी मिली, जिससे उन्होंने वस्त्र का आधा भाग काट लिया, और तलवार फेंककर सोई हुई दमयन्ती को छोड़कर चल पड़े। पर उनका हृदय व्याकुल हो उठा और वे लौट आए; दमयन्ती को देखकर वे फूट-फूटकर रोए। बार-बार वे जाते और लौटते रहे; कलि उन्हें खींच ले जाता और प्रेम उन्हें वापस ले आता, मानो उनका हृदय दो भागों में फट रहा हो। अन्ततः कलि के स्पर्श से बुद्धि-शून्य होकर नल अपनी सोई हुई पत्नी को उस निर्जन वन में छोड़कर चले गए।

एक उप-कथा: कथा नल के इस कृत्य को न तो छिपाती है, न उसका सरलीकरण करती है। वह स्पष्ट कहती है कि नल का हृदय प्रेम से भरा था, पर कलि से ग्रस्त बुद्धि ने उन्हें यह घोर कृत्य कराया। महाभारत यहाँ मनुष्य की नैतिक दुर्बलता और बाहरी प्रभाव के बीच की महीन रेखा को दिखाता है; नल अपराधी भी हैं और पीड़ित भी, और यही उनकी कथा को इतना मार्मिक बनाता है।

नल के जाने के बाद दमयन्ती जागी और अपने पति को न पाकर भय से चीख उठी। उसने पुकारा कि हे राजन्, आपने अपनी पत्नी को इस निर्जन वन में सोते हुए कैसे छोड़ दिया, जबकि आपने लोकपालों के सामने वचन दिया था। उसने कहा कि वह अपने लिए नहीं रोती; उसका विलाप तो इस चिन्ता से है कि नल अकेले अपने दिन कैसे बिताएँगे। शोक से व्याकुल वह वन में इधर-उधर भटकने लगी। उसी समय एक विशाल और भूखे सर्प ने उसे अपनी कुण्डली में जकड़ लिया। फँसी हुई दमयन्ती तब भी अपने लिए नहीं, नल के लिए ही रोती रही। उसकी पुकार सुनकर एक व्याध (शिकारी) वहाँ आया और उसने अपने तीक्ष्ण शस्त्र से सर्प का मस्तक काट दिया, और दमयन्ती को मुक्त कर दिया।

व्याध ने उसे जल छिड़ककर सान्त्वना दी और उसका वृत्तान्त पूछा। पर उस अर्धवस्त्र में लिपटी सुन्दरी को देखकर वह कामवश हो गया और उसे बलपूर्वक छूने का प्रयास करने लगा। दमयन्ती, जो पहले से ही पति और राज्य के वियोग से दुखी थी, क्रोध से जल उठी और उसने शाप दिया कि उसने नल के अतिरिक्त किसी और का चिन्तन भी नहीं किया, अतः यह नीच-बुद्धि व्याध निष्प्राण होकर गिर पड़े। उसके यह कहते ही व्याध अग्नि से जले वृक्ष के समान भूमि पर गिरकर मर गया।

सार: कलि से ग्रस्त बुद्धि वाले नल ने प्रेम और विवशता के द्वन्द्व में दमयन्ती का आधा वस्त्र काटकर उसे सोते हुए छोड़ दिया। जागकर दमयन्ती ने अपने लिए नहीं, नल के लिए विलाप किया। सर्प से एक व्याध ने उसकी रक्षा की, पर कामवश होने पर दमयन्ती के सतीत्व के तेज ने ही उसे शाप-दग्ध कर दिया।

दमयन्ती का वन-विलाप और तपोवन

व्याध को मारकर दमयन्ती उस भयानक, सिंह-व्याघ्रों से भरे वन में आगे बढ़ी। उसने अनेक पर्वत, नदियाँ, वृक्ष और भाँति-भाँति के पशु-पक्षी देखे। पति के वियोग से दुखी होकर वह एक शिला पर बैठकर विलाप करने लगी कि हे निषध-नरेश, आप मुझे इस निर्जन वन में छोड़कर कहाँ चले गए। उसने वन के राजा सिंह से, फिर उस ऊँचे पर्वत से प्रार्थना की कि वे नल का समाचार दें। उसने अपने को विदर्भ-नरेश भीम की पुत्री और निषध-नरेश नल की पत्नी बताकर बार-बार पूछा कि क्या किसी ने नल को देखा है। पर्वत से उत्तर न पाकर वह उत्तर दिशा में चल पड़ी।

तीन दिन-रात चलकर वह तपस्वियों के एक अनुपम आश्रम में पहुँची, जो किसी स्वर्गीय वन के समान था। वहाँ वसिष्ठ, भृगु और अत्रि जैसे संयमी ऋषि जल, वायु और गिरे हुए पत्तों पर निर्वाह करते हुए तप कर रहे थे। दमयन्ती ने उन्हें प्रणाम किया, और ऋषियों ने उसका स्वागत करके पूछा कि वह कौन है, क्या वह वन की, पर्वत की या नदी की देवी है। दमयन्ती ने कहा कि वह एक मनुष्य-नारी है, विदर्भ-नरेश भीम की पुत्री और निषध-नरेश नल की पत्नी; और उसने अपना सारा वृत्तान्त सुनाया, यह भी कि उसके पति को छली, नीच-बुद्धि व्यक्तियों ने जुए के लिए बुलाकर राज्य और धन से वंचित कर दिया।

विलाप करती दमयन्ती को सत्यवादी ऋषियों ने उत्तर दिया कि वे अपनी तपःशक्ति से देखते हैं कि भविष्य उसे सुख देगा, और वह शीघ्र ही नल को देखेगी; वे सब पापों से मुक्त, समस्त रत्नों से सुसज्जित, उसी नगरी पर राज्य करते हुए, शत्रुओं को त्रास देते और मित्रों को आनन्दित करते हुए दिखाई देंगे। यह कहते ही वे ऋषि, उनके यज्ञ-अग्नि और सम्पूर्ण आश्रम सहित अदृश्य हो गए। यह महान् आश्चर्य देखकर दमयन्ती चकित रह गई और सोचने लगी कि क्या यह स्वप्न था। फिर वह आगे बढ़ी और एक अशोक वृक्ष को देखकर बोली कि हे अशोक, आप अपना नाम सार्थक कीजिए (‘अशोक’ अर्थात् शोक का नाश करने वाला), और मुझे नल का समाचार देकर शोक से मुक्त कीजिए। वृक्ष की तीन परिक्रमा करके वह और गहन वन में चली गई।

समझने की कुंजी (अवधारणा): ‘अशोक’ शब्द का अर्थ है ‘शोकरहित’ या ‘शोक-नाशक’ (अ + शोक)। दमयन्ती अशोक वृक्ष से प्रार्थना करती है कि वह अपने नाम के अनुरूप उसका शोक हरे। संस्कृत साहित्य में नामों का यह अर्थपूर्ण प्रयोग कथा के भावों को गहराई देता है।

आगे चलकर दमयन्ती को एक व्यापारियों का दल (सार्थ) मिला, जो घोड़ों और हाथियों के साथ एक नदी के तट पर उतरा हुआ था। मलिन, अर्धवस्त्र में, धूलि से सनी दमयन्ती को देखकर कुछ लोग भयभीत होकर भागे, कुछ ने उसे देवी या यक्षी समझा। व्यापारियों के नायक शुचि ने कहा कि उसने नल नामक किसी पुरुष को नहीं देखा, और यह दल चेदि देश के सत्यवादी राजा सुबाहु की नगरी की ओर लाभ के लिए जा रहा है। दमयन्ती उस दल के साथ अपने पति की खोज में चल पड़ी।

एक रात्रि जब दल एक कमल-सरोवर के तट पर सो रहा था, तब जंगली हाथियों का एक झुण्ड वहाँ आया और दल के पालतू हाथियों को देखकर मदोन्मत्त होकर टूट पड़ा। उस आक्रमण में अनेक मनुष्य, ऊँट और घोड़े मारे गए, और भगदड़ में लोग एक-दूसरे को कुचलकर मर गए। बची हुई भीड़ ने इस विनाश का दोष उस उन्मादिनी-सी स्त्री, अर्थात् दमयन्ती पर मढ़ा, और उसे राक्षसी या यक्षी कहकर मारने को उद्यत हुए। भय और लज्जा से दमयन्ती वन में भाग गई और अपने भाग्य को कोसती हुई सोचने लगी कि किस पूर्वजन्म के पाप का यह फल है। बचे हुए वेद-ज्ञानी ब्राह्मणों के साथ वह चेदि-नरेश सुबाहु की नगरी पहुँची।

सार: वन में भटकती दमयन्ती को तपस्वियों के आश्रम में नल के पुनर्मिलन का आश्वासन मिला, पर आश्रम अदृश्य हो गया। एक व्यापारी-दल के साथ चलते हुए हाथियों के आक्रमण में भारी विनाश हुआ, जिसका दोष दमयन्ती पर मढ़ा गया। अन्ततः वह चेदि-नरेश सुबाहु की नगरी पहुँची।

चेदि-नगरी में दमयन्ती और कर्कोटक से नल का रूपान्तर

मलिन, उन्मादिनी-सी दमयन्ती को नगर में बालक घेरकर चलने लगे। राजमहल के झरोखे से राजमाता ने उसे देखा और उसके सौन्दर्य से चकित होकर अपनी धाय को भेजकर उसे बुलवाया। दमयन्ती ने अपना परिचय एक सैरन्ध्री (कुलीन सेविका) के रूप में दिया और कहा कि उसका पति जुए में हारकर वन में चला गया, और एक दिन उसने सोती हुई उसका आधा वस्त्र काटकर उसे छोड़ दिया। उसने राजमाता के समक्ष कुछ शर्तें रखीं, कि वह जूठा भोजन नहीं करेगी, किसी के पैर नहीं धोएगी, और किसी पराये पुरुष से वार्ता नहीं करेगी; यदि कोई उसे चाहे तो उसे दण्ड मिले, और बार-बार चाहने पर मृत्युदण्ड। राजमाता ने प्रसन्न होकर सब शर्तें स्वीकार कीं और उसे अपनी पुत्री सुनन्दा की सखी बना दिया। दमयन्ती वहाँ सैरन्ध्री बनकर सम्मान से रहने लगी।

समझने की कुंजी (अवधारणा): ‘सैरन्ध्री’ उस कुलीन परिचारिका को कहते हैं जो किसी राजपरिवार में सम्मानजनक सेविका के रूप में रहती है, पर दासी नहीं होती। दमयन्ती अपना परिचय छिपाकर इसी रूप में चेदि-नगरी में रहती है, ठीक वैसे ही जैसे आगे चलकर अज्ञातवास में द्रौपदी विराट-नगरी में सैरन्ध्री बनेगी।

उधर दमयन्ती को छोड़ने के बाद नल ने वन में एक भीषण दावानल (वन की आग) देखा। उसी अग्नि के मध्य से किसी प्राणी की पुकार सुनाई दी, ‘हे धर्मात्मा नल, यहाँ आइए।’ ‘भय न कीजिए’ कहकर नल अग्नि के बीच गए और कुण्डली मारे एक विशाल नाग को देखा। उस नाग ने कहा कि वह कर्कोटक नामक सर्प है, जिसने महर्षि नारद को छला था और उनके शाप से वह अचल हो गया है; शाप यह था कि वह तब तक स्थिर रहेगा जब तक नल उसे वहाँ से न ले जाएँ, और जहाँ नल उसे ले जाएँगे वहीं वह शाप से मुक्त होगा। नाग ने नल से प्रार्थना की कि वे उसे उठा लें, वह अँगूठे के बराबर छोटा हो जाएगा और नल का हित करेगा। नल उसे उठाकर अग्नि से बाहर ले गए।

खुले स्थान पर पहुँचकर कर्कोटक ने नल से कहा कि वे कुछ पग और गिनते हुए आगे चलें, और इसी बीच वह उनका महान् उपकार करेगा। जैसे ही नल ने अपने पग गिने, दसवें पग पर सर्प ने उन्हें डँस लिया, और तत्क्षण नल का रूप बदल गया। कर्कोटक ने अपना वास्तविक रूप धारण करके नल को समझाया कि उसने उनका रूप इसलिए बदल दिया है ताकि लोग उन्हें पहचान न सकें; और जिस कलि ने उन्हें छला है, वह अब नल के शरीर में उसके विष से पीड़ित होकर रहेगा। नाग ने वरदान दिया कि अब नल को न पशुओं से, न शत्रुओं से भय रहेगा, न विष की पीड़ा होगी, और वे युद्ध में सदा विजयी होंगे।

कर्कोटक ने नल को आदेश दिया कि वे अयोध्या जाकर, जुए में निपुण राजा ऋतुपर्ण के पास, स्वयं को ‘बाहुक नामक सारथी’ कहकर प्रस्तुत हों। वह राजा उन्हें अश्वविद्या के बदले द्यूतविद्या (पासों का ज्ञान) देगा, और जब नल पासों में निपुण हो जाएँगे, तब उन्हें पुनः समृद्धि, पत्नी, सन्तान और राज्य की प्राप्ति होगी। नाग ने यह भी कहा कि जब नल अपना वास्तविक रूप देखना चाहें, तब उसका स्मरण करके यह दिव्य वस्त्र धारण करें, जिससे उन्हें अपना रूप वापस मिल जाएगा। यह कहकर और दो दिव्य वस्त्र देकर कर्कोटक अदृश्य हो गया।

सार: दमयन्ती चेदि-नगरी में सैरन्ध्री बनकर सम्मानपूर्वक रहने लगी। उधर नाग कर्कोटक ने नल को डँसकर उनका रूप बदल दिया, जिससे वे पहचाने न जा सकें, और कलि को उनके भीतर विष से पीड़ित कर दिया। नाग ने नल को अयोध्या जाकर बाहुक नाम से ऋतुपर्ण की सेवा करने और द्यूतविद्या प्राप्त करने का मार्ग बताया।

बाहुक रूप में नल और दमयन्ती की खोज

नाग के अदृश्य होने पर नल दसवें दिन अयोध्या पहुँचे और राजा ऋतुपर्ण के पास जाकर बोले कि उनका नाम बाहुक है, अश्वविद्या में उनका कोई सानी नहीं, और वे पाक-कला (रसोई) में भी निपुण हैं। ऋतुपर्ण ने उन्हें दस सहस्र मुद्राओं के वेतन पर अपने अश्वशाला का अध्यक्ष नियुक्त किया, और वार्ष्णेय तथा जीवल को उनके अधीन कर दिया। बाहुक रूप में नल वहाँ सम्मान से रहने लगे, पर प्रतिदिन सन्ध्या के समय वे दमयन्ती का स्मरण करते हुए एक श्लोक कहते कि वह असहाय, भूख-प्यास से व्याकुल नारी अब किसके आश्रय में होगी। एक रात जीवल ने पूछा कि वे किसके लिए विलाप करते हैं, तो नल ने एक अज्ञात पुरुष की कथा के रूप में अपनी ही व्यथा कह दी, कि एक मूर्ख ने अपनी विख्यात पत्नी को त्याग दिया, और अब वह पश्चात्ताप में जल रहा है।

इधर विदर्भ-नरेश भीम ने नल और दमयन्ती की खोज के लिए ब्राह्मणों को प्रचुर धन देकर सब दिशाओं में भेजा। उनमें से सुदेव नामक ब्राह्मण चेदि-नगरी पहुँचा और वहाँ राजमहल में सुनन्दा के साथ बैठी, मलिन और कृशकाय दमयन्ती को पहचान लिया। उसकी भौंहों के बीच जन्म से एक तिल था, जो धूलि से ढका था। सुदेव ने दमयन्ती के पास जाकर अपना परिचय उसके भाई के मित्र के रूप में दिया और बताया कि उसके माता-पिता, भाई और दोनों सन्तानें कुशल हैं, और सैकड़ों ब्राह्मण उसकी खोज में संसार भर में घूम रहे हैं। दमयन्ती सुदेव को पहचानकर रो पड़ी।

सुनन्दा ने यह देखकर राजमाता को बताया, और राजमाता ने सुदेव से दमयन्ती का वृत्तान्त पूछा। सुदेव ने सब कुछ कह सुनाया, और दमयन्ती की भौंहों के बीच के उस तिल की बात बताई। सुनन्दा ने धूलि धोकर उस तिल को प्रकट किया, जो मेघों से निकले चन्द्रमा के समान चमक उठा। तब राजमाता ने रोते हुए कहा कि इस तिल से वह जान गई हैं कि दमयन्ती उनकी बहन की पुत्री है; वे और दमयन्ती की माता, दोनों दशार्ण-नरेश सुदामन की कन्याएँ हैं। यह जानकर दमयन्ती ने अपनी मौसी को प्रणाम किया, पर अपने बच्चों के पास, विदर्भ लौटने की अनुमति माँगी। राजमाता ने एक सुन्दर पालकी, रक्षक और सब सामग्री देकर उसे विदर्भ भिजवा दिया, जहाँ उसके परिजनों ने उसका सादर स्वागत किया।

समझने की कुंजी (अवधारणा): भौंहों के बीच का जन्मजात तिल दमयन्ती का पहचान-चिह्न है, जिसे विधाता ने सौभाग्य के संकेत रूप में रखा था। कथा में यह तिल वह कुंजी है जिससे राजमाता उसे अपनी बहन की पुत्री के रूप में पहचानती हैं, रक्त-सम्बन्ध का अप्रत्याशित उद्घाटन।

विदर्भ पहुँचकर दमयन्ती ने अपनी माता से कहा कि यदि वे उसका जीवन चाहती हैं तो नल को ढूँढ़ने का प्रयत्न करें। माता ने यह बात राजा भीम से कही, और भीम ने पुनः ब्राह्मणों को सब दिशाओं में भेजा। दमयन्ती ने ब्राह्मणों को एक विशेष सन्देश हर सभा में दोहराने को कहा, ‘हे प्रिय जुआरी, मेरा आधा वस्त्र काटकर, सोई हुई अपनी प्रिय और भक्त पत्नी को त्यागकर आप कहाँ चले गए? वह आपकी आज्ञा के अनुसार आधे वस्त्र में, शोक में जलती हुई आपकी प्रतीक्षा कर रही है।’ उसने कहा कि जो कोई इन वचनों का उत्तर दे, उसका पता और परिचय लेकर लौटें।

सार: बाहुक रूप में नल अयोध्या में ऋतुपर्ण की सेवा करते हुए दमयन्ती का स्मरण करते रहे। सुदेव ने चेदि-नगरी में तिल से दमयन्ती को पहचाना, और वह विदर्भ लौट आई। फिर दमयन्ती ने ब्राह्मणों के द्वारा एक मर्मभेदी सन्देश सब दिशाओं में फैलाया, जिसका उत्तर केवल नल ही दे सकते थे।

पर्णाद का सन्देश और दूसरे स्वयंवर का छल

बहुत समय बाद पर्णाद नामक ब्राह्मण विदर्भ लौटकर दमयन्ती से बोला कि उसने अयोध्या में ऋतुपर्ण के समक्ष वे वचन कहे, पर न राजा ने, न दरबारियों ने उत्तर दिया; केवल बाहुक नामक सारथी ने, जो छोटी भुजाओं वाला, कुरूप, पर रथ-चालन और पाक-कला में निपुण था, आहें भरते और रोते हुए उत्तर दिया कि सती स्त्रियाँ विपत्ति में भी अपनी रक्षा करती हैं और क्रोध नहीं करतीं, क्योंकि जिस पुरुष ने उसे त्यागा वह विपत्ति से अभिभूत और सब सुखों से वंचित था; जिस पुरुष का वस्त्र भोजन ढूँढ़ते समय पक्षी ले उड़े, उस शोक-दग्ध पर पतिव्रता को क्रोध नहीं करना चाहिए। यह सुनकर पर्णाद शीघ्र लौट आया।

दमयन्ती ने इन वचनों से अनुमान लगा लिया कि वह बाहुक ही नल हैं। उसने अपनी माता से एकान्त में कहा कि राजा भीम को उसका प्रयोजन ज्ञात न हो, और सुदेव को अयोध्या भेजा जाए। उसने सुदेव से कहलवाया कि वह ऋतुपर्ण से जाकर कहे कि दमयन्ती दूसरा स्वयंवर करने जा रही है, और कल सूर्योदय के बाद वह दूसरा पति चुनेगी, क्योंकि उसे नहीं पता कि नल जीवित हैं या नहीं; अतः यदि सम्भव हो तो ऋतुपर्ण शीघ्र आएँ। यह सूचना देकर सुदेव अयोध्या गया।

एक उप-कथा: यह दूसरा स्वयंवर वास्तविक नहीं, दमयन्ती की एक चतुर युक्ति है। वह जानती है कि एक ही दिन में सौ योजन का मार्ग केवल नल ही पार कर सकते हैं, क्योंकि उनकी अश्वविद्या अद्वितीय है। यह स्वयंवर वस्तुतः एक परीक्षा है, कि यदि ऋतुपर्ण एक ही दिन में आ पहुँचें, तो उनका सारथी अवश्य नल ही होगा। दमयन्ती की यह बुद्धिमत्ता कथा का निर्णायक मोड़ है।

सुदेव के वचन सुनकर ऋतुपर्ण ने बाहुक से कोमल वचनों में कहा कि वह घोड़ों के प्रशिक्षण में निपुण है, अतः यदि सम्भव हो तो वे एक ही दिन में दमयन्ती के स्वयंवर में पहुँचना चाहते हैं। यह सुनकर नल का हृदय शोक से फटने को हुआ। उन्होंने मन में सोचा कि सम्भवतः दमयन्ती शोक से व्याकुल होकर ऐसा कर रही है, या यह उन्हीं के लिए कोई युक्ति है। उन्होंने सोचा कि क्या वह पतिव्रता और सन्तानवती स्त्री सचमुच ऐसा करेगी; यह जानने के लिए वहाँ जाना ही उचित है। हाथ जोड़कर बाहुक ने ऋतुपर्ण की आज्ञा स्वीकार की।

नल ने अश्वशाला में जाकर पतले शरीर वाले, पर बलवान, उत्तम लक्षणों से युक्त, सिन्धु देश में उत्पन्न और वायु के समान वेगवान घोड़ों को चुना। ऋतुपर्ण ने कुछ क्रोध से कहा कि ये दुर्बल घोड़े इतनी लम्बी यात्रा कैसे करेंगे, पर बाहुक ने उनके भौंरों और लक्षणों से सिद्ध किया कि वे ही श्रेष्ठ हैं। नल ने चार उत्तम घोड़े रथ में जोते। रथ पर बैठते ही घोड़े घुटनों के बल भूमि पर गिर पड़े। तब नल ने उन्हें सान्त्वना देकर, लगाम से उठाकर, वार्ष्णेय को रथ पर बैठाया, और वे घोड़े वायु के वेग से आकाश में उड़ चले। उनकी कुशलता देखकर वार्ष्णेय चकित हुआ और सोचने लगा कि कहीं यह बाहुक स्वयं नल तो नहीं, क्योंकि उसका अश्व-ज्ञान नल के समान है, और दोनों समवयस्क हैं; पर उसने यह सोचकर मन को समझाया कि विपत्ति में महापुरुष रूप बदलकर भी पृथ्वी पर विचरते हैं।

समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): ‘योजन’ दूरी की प्राचीन इकाई है, जो लगभग आठ से तेरह किलोमीटर के बराबर मानी जाती है। ‘एक दिन में सौ योजन’ का अर्थ है लगभग आठ सौ से तेरह सौ किलोमीटर की असाधारण यात्रा, जो केवल नल की दिव्य अश्वविद्या से ही सम्भव थी। यही असम्भव-सी गति दमयन्ती की परीक्षा का आधार है।

सार: पर्णाद के द्वारा दमयन्ती ने जान लिया कि बाहुक ही नल हैं। उसने एक झूठे दूसरे स्वयंवर की युक्ति रची, क्योंकि एक दिन में सौ योजन की यात्रा केवल नल कर सकते थे। ऋतुपर्ण ने बाहुक को सारथी बनाकर अयोध्या से विदर्भ की ओर प्रस्थान किया, और बाहुक की अश्व-कुशलता ने वार्ष्णेय के मन में सन्देह जगा दिया।

अक्ष-विद्या का विनिमय और कलि का बहिर्गमन

नदियों, पर्वतों और वनों को पक्षी के समान पार करते हुए, मार्ग में ऋतुपर्ण का उत्तरीय वस्त्र भूमि पर गिर गया। उन्होंने नल से कहा कि घोड़ों को रोकें ताकि वार्ष्णेय वस्त्र ले आए, पर नल ने कहा कि वे एक योजन आगे आ चुके हैं, अतः वह वस्त्र अब लौटाया नहीं जा सकता। फिर ऋतुपर्ण ने एक फलों से लदे विभीतक वृक्ष को देखकर बाहुक से कहा कि वे गणना में अत्यन्त निपुण हैं; उस वृक्ष की दो शाखाओं पर पाँच करोड़ पत्ते और दो हजार पंचानबे फल हैं, और भूमि पर गिरे पत्ते-फल वृक्ष पर लगे पत्ते-फलों से एक सौ एक अधिक हैं।

बाहुक ने कहा कि वे प्रत्यक्ष प्रमाण से इसे जाँचेंगे, और रथ रोककर उन्होंने वह विभीतक वृक्ष काट डाला। गणना करने पर वे चकित रह गए कि फलों की संख्या वही निकली जो राजा ने कही थी। उन्होंने ऋतुपर्ण से वह विद्या जानने की इच्छा प्रकट की। ऋतुपर्ण ने कहा कि वे संख्या-ज्ञान के साथ-साथ द्यूत-विद्या (पासों का ज्ञान) में भी निपुण हैं। बाहुक ने प्रार्थना की कि राजा उन्हें यह विद्या दें और बदले में उनसे अश्व-विद्या ले लें। ऋतुपर्ण ने, बाहुक की सद्भावना के महत्त्व को और उसकी अश्व-विद्या को देखते हुए, सहमति दी और नल को अक्ष-विद्या (पासों का विज्ञान) प्रदान की, यह कहकर कि अश्व-विद्या अभी बाहुक के पास ही धरोहर रहे।

नल के अक्ष-विद्या से सम्पन्न होते ही कलि उनके शरीर से बाहर निकल आया, और कर्कोटक के तीव्र विष को मुख से उगलता रहा। दमयन्ती के शाप से लम्बे समय तक पीड़ित कलि जब बाहर निकला, तब उस शाप की अग्नि भी कलि को छोड़ गई। नल क्रोध से कलि को शाप देना चाहते थे, पर भयभीत कलि ने हाथ जोड़कर कहा कि वे क्रोध रोकें; इन्द्रसेन की माता (दमयन्ती) ने उस समय शाप दिया था जब नल ने उसे त्यागा था, और तब से कलि नल के शरीर में नाग के विष से जलता हुआ निवास कर रहा था। कलि ने कहा कि यदि नल उसे शाप न दें, तो जो लोग नल की इस कथा को श्रद्धापूर्वक सुनेंगे, वे उसके भय से मुक्त रहेंगे। यह सुनकर नल ने अपना क्रोध संयत किया, और भयभीत कलि विभीतक वृक्ष में प्रवेश कर गया। उसी क्षण से विभीतक वृक्ष अपकीर्ति को प्राप्त हुआ। कलि के स्पर्श से मुक्त होकर नल आनन्दित हुए और विदर्भ की ओर बढ़े, यद्यपि उन्होंने अभी अपना वास्तविक रूप धारण नहीं किया था।

समझने की कुंजी (अवधारणा): ‘अक्ष-विद्या’ अर्थात् पासों का गूढ़ ज्ञान, वही विद्या जिसके अभाव में नल जुए में हारे थे। ध्यान दीजिए कि नल का उद्धार युद्ध से नहीं, ज्ञान से होता है; जिस विद्या के अभाव ने उन्हें गिराया, उसी विद्या की प्राप्ति उन्हें उठाती है। कथा के अन्त में यही विद्या बृहदश्व युधिष्ठिर को भी देते हैं, ताकि वे पुनः छले न जा सकें।

सार: मार्ग में ऋतुपर्ण ने अपनी संख्या-गणना की अद्भुत शक्ति दिखाई, और नल ने अश्व-विद्या के बदले अक्ष-विद्या (द्यूत-ज्ञान) प्राप्त की। इस ज्ञान के पाते ही कलि नल के शरीर से बाहर निकला और विभीतक वृक्ष में जा छिपा। नल अब अपने दुर्भाग्य से मुक्त थे, यद्यपि उनका रूप अभी बदला हुआ ही था।

केशिनी की परीक्षा और दमयन्ती का सन्देह

सन्ध्या समय ऋतुपर्ण विदर्भ की राजधानी कुण्डिन पहुँचे और राजा भीम के निमन्त्रण पर नगर में प्रवेश किया। उनके रथ की वह गड़गड़ाहट, जो मेघों की गर्जना के समान थी, सुनकर नल के पुराने घोड़े, हाथी और मोर आनन्द से ध्वनि करने लगे। दमयन्ती ने भी वह ध्वनि सुनी और कहा कि यह रथ-ध्वनि उसके हृदय को जिस प्रकार आनन्दित कर रही है, उससे लगता है कि नल ही आए हैं; यदि वह नल को न देख सकी तो वह अवश्य प्राण त्याग देगी। पर भीम ने ऋतुपर्ण का यह सोचकर स्वागत किया कि वे केवल सम्मान प्रकट करने आए हैं, क्योंकि वहाँ न कोई स्वयंवर था, न राजाओं का समागम। ऋतुपर्ण ने भी कोई स्वयंवर का चिह्न न पाकर केवल इतना कहा कि वे भीम को प्रणाम करने आए हैं।

ऋतुपर्ण के जाने के बाद बाहुक रथ को अश्वशाला में ले गए, घोड़ों को छोड़कर, उनकी सेवा करके रथ के एक ओर बैठ गए। दमयन्ती ने मन में सोचा कि यह रथ-ध्वनि तो नल के रथ-समान थी, पर नल कहीं दिखाई नहीं देते; क्या वार्ष्णेय ने नल से यह कला सीखी, या ऋतुपर्ण भी नल के समान निपुण हैं। यह सोचकर उसने अपनी दूती केशिनी को उस सारथी की परीक्षा के लिए भेजा।

दमयन्ती ने केशिनी से कहा कि वह उस कुरूप, छोटी भुजाओं वाले सारथी के पास जाकर कुशल पूछे और पर्णाद वाले वचन कहे, फिर उसका उत्तर ध्यान से लाए। केशिनी ने जाकर बाहुक से पूछा कि वे किस प्रयोजन से, कब चले। बाहुक ने उत्तर दिया कि कोसल-नरेश ने किसी ब्राह्मण से दमयन्ती के दूसरे स्वयंवर की बात सुनी, और वायु-वेग से सौ योजन जाने वाले घोड़ों से वे यहाँ आए हैं; वे उनके सारथी हैं। केशिनी ने वार्ष्णेय और बाहुक का परिचय पूछा, और बाहुक ने कहा कि वार्ष्णेय नल के सारथी थे, जो नल के राज्य छोड़ने के बाद ऋतुपर्ण के पास आए; और बाहुक स्वयं अश्व-विद्या में निपुण होने के कारण सारथी और रसोइया नियुक्त हुए। केशिनी के यह पूछने पर कि नल कहाँ हैं, बाहुक ने कहा कि नल को नल के अतिरिक्त कोई नहीं जानता; वे रूप बदलकर अज्ञात रूप में संसार में विचरते हैं।

तब केशिनी ने वही पर्णाद वाले वचन दोहराए, ‘हे प्रिय जुआरी, मेरा आधा वस्त्र काटकर, सोई हुई अपनी भक्त पत्नी को त्यागकर आप कहाँ चले गए?’ ये वचन सुनकर नल का हृदय व्यथित हो गया और उनकी आँखें आँसुओं से भर आईं। शोक को रोककर उन्होंने पुनः वही उत्तर दिया कि सती स्त्रियाँ विपत्ति में भी अपनी रक्षा करती हैं और क्रोध नहीं करतीं; जिस पुरुष का वस्त्र भोजन ढूँढ़ते समय पक्षी ले गए, उस विपत्ति-ग्रस्त पर पतिव्रता को क्रोध करना उचित नहीं। यह कहते हुए नल आँसू न रोक सके। केशिनी ने लौटकर दमयन्ती को यह सारा वार्तालाप और नल का शोक कह सुनाया।

सार: ऋतुपर्ण कुण्डिन पहुँचे, पर स्वयंवर का कोई चिह्न न पाकर चकित हुए। रथ-ध्वनि से दमयन्ती को नल के आने का आभास हुआ, और उसने केशिनी को बाहुक की परीक्षा के लिए भेजा। बाहुक के उत्तरों और उसके आँसुओं ने दमयन्ती के सन्देह को और गहरा कर दिया।

चिह्नों से पहचान और दमयन्ती का प्रश्न

सब सुनकर दमयन्ती ने केशिनी को पुनः भेजा कि वह बाहुक के आचरण को मौन रहकर देखे, विशेषकर जब वह जल या अग्नि माँगे, तब देर करके उसकी प्रतिक्रिया देखे, और जो भी मानवीय या अमानवीय बात दिखे, उसे बताए। केशिनी ने लौटकर अनेक आश्चर्य बताए। बाहुक नीचे द्वार से निकलते समय झुकता नहीं, द्वार स्वयं ऊँचा हो जाता है; संकरे छिद्र उसके पास आते ही चौड़े हो जाते हैं; खाली पात्र उसके देखते ही जल से भर जाते हैं; वह मुट्ठी भर घास सूर्य के सामने रखता है तो अग्नि प्रज्वलित हो जाती है; वह अग्नि को छूता है पर जलता नहीं; उसके हाथ में दबाए जाने पर भी फूल अधिक खिल उठते और सुगन्धित हो जाते हैं।

नल के इन कार्यों को सुनकर दमयन्ती ने अनुमान लगा लिया कि वही नल हैं। उसने केशिनी को भेजकर बाहुक के बनाए हुए कुछ पके माँस को बिना उसके जाने मँगवाया। दमयन्ती, जिसने पहले अनेक बार नल के बनाए भोजन का स्वाद लिया था, उस माँस का स्वाद चखकर निश्चय कर बैठी कि बाहुक ही नल हैं, और शोक से रो पड़ी। फिर उसने अपने दोनों बच्चों को केशिनी के साथ भेजा। बाहुक रूप में नल ने इन्द्रसेना और उसके भाई को पहचानकर शीघ्रता से दौड़कर उन्हें गोद में उठा लिया और सुर-बालकों के समान उन बच्चों को लेकर उच्च स्वर में रो पड़े। फिर अपनी व्यथा को बार-बार प्रकट करके, अचानक उन्होंने बच्चों को छोड़ दिया और केशिनी से कहा कि ये जुड़वाँ बच्चे उनके अपने बच्चों के समान लगे, इसीलिए उन्हें देखकर आँसू आ गए; वह बार-बार न आए तो अच्छा है, क्योंकि वे परदेशी अतिथि हैं और लोग अन्यथा सोच सकते हैं।

समझने की कुंजी (अवधारणा): कर्कोटक के वरदान और लोकपालों के वरदानों के कारण नल के पास जल, अग्नि और प्रकृति पर असाधारण अधिकार है; बिना श्रम के पात्र भर जाते हैं, अग्नि बिना जलाए प्रज्वलित होती है। ये दिव्य लक्षण ही दमयन्ती के लिए बाहुक के नल होने का प्रमाण बनते हैं, क्योंकि कोई साधारण सारथी ऐसा नहीं कर सकता।

केशिनी ने यह सब दमयन्ती को बताया। तब दमयन्ती ने अपनी माता के द्वारा यह कहलवाया कि उसने बाहुक को अनेक प्रकार से परखा है, और अब केवल उसके रूप पर सन्देह है, अतः वह स्वयं उसे परखना चाहती है; या तो बाहुक को महल में प्रवेश दिया जाए, या उसे बाहुक के पास जाने की अनुमति दी जाए। माता ने भीम को यह बात बताई, और राजा की सम्मति से दमयन्ती ने नल को अपने कक्ष में बुलवाया।

दमयन्ती को अचानक देखकर नल शोक से अभिभूत होकर आँसुओं में डूब गए, और नल को उस दशा में देखकर दमयन्ती भी अत्यन्त दुखी हुई। लाल वस्त्र पहने, जटाधारी, धूलि से सनी दमयन्ती ने बाहुक से पूछा कि क्या उसने कभी ऐसा कोई धर्मज्ञ पुरुष देखा है जो अपनी सोई हुई पत्नी को वन में छोड़कर चला गया हो; नल के अतिरिक्त ऐसा कौन कर सकता था। उसने पूछा कि जिसे उसने देवताओं के सामने भी चुना, और जो उसके बच्चों की माता भी थी, उस सदा-भक्त पत्नी को उन्होंने क्यों त्यागा; अग्नि और देवताओं के समक्ष लिया वह वचन कहाँ गया कि वे सदा उसी के रहेंगे। यह कहते हुए उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

सार: केशिनी ने नल के अनेक दिव्य लक्षण देखे, और नल के बनाए भोजन के स्वाद तथा बच्चों को देखकर उमड़े उनके वात्सल्य से दमयन्ती का सन्देह दृढ़ हो गया। अन्ततः उसने नल को अपने कक्ष में बुलाकर सीधा प्रश्न किया कि उन्होंने अपनी सोई हुई भक्त पत्नी को क्यों त्यागा।

पुनर्मिलन और नल का स्वरूप-प्रत्यागमन

नल ने आँसू बहाते हुए उत्तर दिया कि न राज्य का नाश, न उसका त्याग उनका कृत्य था; दोनों कलि के कारण हुए। उन्होंने कहा कि वन में दिन-रात उसके लिए शोक करती हुई दमयन्ती ने ही कलि को शाप दिया था, और उसी शाप से जलता हुआ कलि नल के शरीर में अग्नि के भीतर अग्नि के समान निवास करता रहा; अपने तप और संयम से उन्होंने अन्ततः उस दुष्ट कलि पर विजय पा ली, और अब वह उन्हें छोड़ चुका है, इसीलिए वे यहाँ आए हैं, केवल दमयन्ती के लिए। फिर उन्होंने कहा कि क्या कोई अन्य स्त्री अपने भक्त और प्रेमी पति को त्यागकर दूसरा पति चुनेगी; राजा की आज्ञा से दूत यह घोषणा करते फिर रहे थे कि भीम की पुत्री स्वेच्छा से दूसरा पति चुनेगी, और यह सुनते ही ऋतुपर्ण का पुत्र यहाँ आ पहुँचा।

नल का यह विलाप सुनकर भयभीत और काँपती दमयन्ती ने हाथ जोड़कर कहा कि वे उसमें कोई दोष न समझें; उसने देवताओं को भी छोड़कर नल को ही चुना था। उसने बताया कि ब्राह्मणों को सब दिशाओं में उसके वचनों के साथ इसीलिए भेजा गया था ताकि नल का पता चले, और पर्णाद ने उन्हें कोसल में ऋतुपर्ण के महल में पाया; नल के उत्तर देने पर ही उसने यह युक्ति रची, क्योंकि नल के अतिरिक्त कोई एक दिन में सौ योजन घोड़ों से नहीं चल सकता। उसने नल के चरण छूकर शपथ ली कि उसने मन से भी कोई पाप नहीं किया, और कहा कि यदि उसने कोई पाप किया हो तो वायु, सूर्य और चन्द्र उसके प्राण ले लें।

तब आकाश से वायुदेव ने कहा कि दमयन्ती ने कोई दोष नहीं किया; उसने अपने कुल की मर्यादा की भलीभाँति रक्षा की है, और वे तीन वर्षों से उसके रक्षक रहे हैं, अतः इसके साक्षी हैं; नल के लिए ही उसने यह अद्वितीय युक्ति रची, क्योंकि एक दिन में सौ योजन और कोई नहीं चल सकता। वायुदेव ने कहा कि नल ने भीम की पुत्री को और उसने नल को पुनः पा लिया है, अतः कोई सन्देह न रखें और परस्पर मिल जाएँ। वायुदेव के यह कहते ही वहाँ पुष्पवृष्टि हुई, दिव्य दुन्दुभि बजी और शुभ वायु बहने लगी। ये आश्चर्य देखकर नल ने दमयन्ती के विषय में अपने सब सन्देह त्याग दिए।

तब नल ने नागराज कर्कोटक का स्मरण करके वह पवित्र वस्त्र धारण किया और अपना वास्तविक रूप पुनः प्राप्त कर लिया। अपने धर्मात्मा पति को उनके वास्तविक रूप में देखकर दमयन्ती ने उन्हें आलिंगन किया और रोने लगी। नल ने भी अपनी भक्त पत्नी और बच्चों को गले लगाकर परम आनन्द का अनुभव किया। राजमाता ने भीम को सब कुछ बताया, और भीम ने कहा कि नल आज विश्राम करें, कल वे उन्हें स्नान और सन्ध्या के पश्चात्, दमयन्ती सहित देखेंगे। राज्य के नाश के चौथे वर्ष में नल अपनी पत्नी से पुनः मिले, और उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हुईं।

सार: नल ने स्वीकार किया कि राज्य का नाश और दमयन्ती का त्याग कलि के कारण हुआ, और दमयन्ती के शाप से ही कलि उनके भीतर पीड़ित होकर रहा। दमयन्ती ने अपनी निर्दोषता की शपथ ली, जिसकी साक्षी स्वयं वायुदेव ने दी। नल ने कर्कोटक के दिए वस्त्र से अपना वास्तविक रूप पाया, और चौथे वर्ष में दोनों का पुनर्मिलन हुआ।

राज्य का पुनः अर्जन और कथा का उपसंहार

एक रात्रि सुख से बिताकर, अगले दिन नल आभूषणों से सज्जित होकर, दमयन्ती सहित भीम के समक्ष उपस्थित हुए और विनयपूर्वक प्रणाम किया। भीम ने उन्हें पुत्र के समान स्वीकार किया और सम्मान दिया। नल के आगमन से नगरवासी आनन्दित हुए और नगर को ध्वजों, मालाओं और पुष्पों से सजाया गया। ऋतुपर्ण ने जब सुना कि बाहुक ही दमयन्ती से मिल चुके हैं, तब उन्होंने नल को बुलाकर क्षमा माँगी कि यदि अनजाने उन्होंने कोई अपराध किया हो; नल ने भी अपने भेद को छिपाने के कारण उनसे क्षमा माँगी और कहा कि ऋतुपर्ण ने उनका कोई अनिष्ट नहीं किया, और वे उनके मित्र तथा सम्बन्धी हैं। नल ने अपनी अश्व-विद्या ऋतुपर्ण को विधिपूर्वक प्रदान की, और ऋतुपर्ण दूसरा सारथी लेकर अपनी नगरी लौट गए।

ऋतुपर्ण के जाने के एक मास बाद, नल भीम की अनुमति लेकर थोड़े-से अनुचरों के साथ निषध देश की ओर चले, एक श्वेत रथ, सोलह हाथी, पचास घोड़े और छह सौ पैदल सैनिकों के साथ। पृथ्वी को कँपाते हुए नल ने निषध देश में प्रवेश किया और अपने भाई पुष्कर के पास जाकर कहा कि वे पुनः खेलें, क्योंकि उन्होंने प्रचुर धन अर्जित किया है; इस बार दमयन्ती और उनका सब कुछ उनका दाँव होगा, और पुष्कर का राज्य पुष्कर का दाँव। उन्होंने यह भी कहा कि यदि पुष्कर को पासों का खेल पसन्द न हो तो वे शस्त्र से द्वन्द्व-युद्ध करें, और दोनों में से एक को शान्ति मिले; पैतृक राज्य को किसी भी प्रकार पुनः प्राप्त करना धर्म है। नल ने पुष्कर से इन दोनों (जुआ अथवा युद्ध) में से एक चुनने को कहा।

अपनी विजय के प्रति आश्वस्त पुष्कर ने हँसते हुए कहा कि सौभाग्य से नल ने पुनः दाँव लगाने योग्य धन अर्जित किया, और सौभाग्य से दमयन्ती का दुर्भाग्य भी अब समाप्त हुआ; आज वह सुन्दरी दमयन्ती को जीतकर अपने को धन्य मानेगा, क्योंकि वही सदा उसके हृदय में बसी रही। इस उद्धत प्रलाप को सुनकर नल क्रोध से जल उठे, और यद्यपि उनके नेत्र क्रोध से लाल थे, उन्होंने मुस्कुराकर कहा कि खेल हो, जीतने के बाद पुष्कर जो चाहे कहे। फिर खेल आरम्भ हुआ, और नल ने एक ही दाँव में अपना सम्पूर्ण धन और कोष, तथा पुष्कर का दाँव पर लगा जीवन भी जीत लिया।

जीतकर नल ने मुस्कुराते हुए पुष्कर से कहा कि अब यह सम्पूर्ण निष्कण्टक राज्य उनका है, और पुष्कर अब दमयन्ती की ओर देख भी नहीं सकता; वह अपने परिवार सहित दमयन्ती का दास हो गया है। पर नल ने कहा कि पुष्कर से उनकी पूर्व पराजय पुष्कर का कृत्य नहीं थी; वह सब कलि ने किया था, अतः वे पुष्कर पर दूसरों का दोष नहीं मढ़ेंगे। नल ने पुष्कर को प्राणदान दिया, पैतृक राज्य में उसका भाग और सब आवश्यक सामग्री दी, और कहा कि उसके प्रति उनका भ्रातृ-स्नेह पहले के समान ही है; पुष्कर सौ वर्ष जिए। नल ने उसे बार-बार आलिंगन करके अपनी नगरी जाने की अनुमति दी। पुष्कर ने प्रणाम करके, हाथ जोड़कर नल की दीर्घायु की कामना की, और एक मास वहाँ रहकर अपने नगर लौट गया।

एक उप-कथा: यहाँ महाभारत की नैतिक गहराई स्पष्ट होती है। नल पुष्कर को मार सकते थे, पर उन्होंने अपने भाई को प्राणदान दिया और दोष कलि पर मढ़कर पुष्कर को क्षमा कर दिया। यह क्षमा कथा का सर्वाधिक गरिमामय क्षण है, जहाँ विजेता प्रतिशोध नहीं, उदारता चुनता है। फिर भी कथा इस तथ्य को नहीं छिपाती कि पुष्कर ने छल किया था और दमयन्ती को पाने की कुत्सित इच्छा रखी थी; अच्छाई-बुराई का सरलीकरण किए बिना, नल की उदारता को उसके पूर्ण परिप्रेक्ष्य में दिखाया गया है।

राज्य पुनः प्राप्त करके नल ने अपने नगर में प्रवेश किया और प्रजा को सान्त्वना दी। नगर और देश के सब लोग आनन्द से रोमांचित हो उठे, और अधिकारियों सहित प्रजा ने हाथ जोड़कर कहा कि उन्हें आज अपना राजा वैसे ही मिल गया जैसे देवताओं को उनका इन्द्र। उत्सव आरम्भ होने पर नल ने अपनी सेना के साथ दमयन्ती को उसके पिता के घर से ले आया। भीम ने अपनी पुत्री का यथोचित सम्मान करके उसे विदा किया। पुत्र और पुत्री सहित दमयन्ती के आने पर नल नन्दनवन में इन्द्र के समान आनन्द से अपने दिन बिताने लगे। अपना राज्य पुनः पाकर, जम्बूद्वीप के राजाओं में प्रसिद्ध होकर, नल ने पुनः धर्मपूर्वक राज्य किया और ब्राह्मणों को प्रचुर दान देकर अनेक यज्ञ किए।

बृहदश्व ने युधिष्ठिर से कहा कि इसी प्रकार नगर-विजेता नल अपनी पत्नी सहित जुए के कारण घोर विपत्ति में पड़े थे, और अकेले ही वह कष्ट सहकर पुनः समृद्धि को प्राप्त हुए; जबकि युधिष्ठिर तो अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ इस महान् वन में हैं, और वेद-ज्ञानी ब्राह्मणों से घिरे हैं, अतः उन्हें इतना शोक करने का कारण नहीं। उन्होंने कहा कि नल, दमयन्ती, नागराज कर्कोटक और राजर्षि ऋतुपर्ण की यह कथा पाप-नाशक है, और कलि के प्रभाव को नष्ट करने वाली है; जो इसे श्रद्धा से सुनता या सुनाता है, वह कभी विपत्ति से स्पर्श नहीं किया जाता। उन्होंने युधिष्ठिर को आश्वस्त किया कि मनुष्य के प्रयत्न की अनिश्चितता और भाग्य की चंचलता पर विचार करके धैर्यवान् पुरुष न हर्ष करते हैं, न शोक।

अन्त में बृहदश्व ने कहा कि युधिष्ठिर को जो यह भय है कि कोई पासों में निपुण व्यक्ति उन्हें पुनः जुए के लिए ललकारेगा, उस भय को वे दूर करेंगे, क्योंकि वे अक्ष-विद्या (पासों का सम्पूर्ण विज्ञान) जानते हैं और युधिष्ठिर पर प्रसन्न होकर उन्हें वह विद्या देना चाहते हैं। प्रसन्न-हृदय युधिष्ठिर ने वह विद्या सीखने की इच्छा प्रकट की। तब उस महान् तपस्वी ऋषि ने पाण्डुपुत्र को अपनी द्यूत-विद्या प्रदान की, और स्नान के लिए हयशीर्ष नामक पवित्र तीर्थ की ओर प्रस्थान कर गए।

सार: नल ने पुष्कर को द्वन्द्व के लिए ललकारकर एक ही दाँव में अपना राज्य पुनः जीत लिया, पर भाई को प्राणदान देकर पूर्व पराजय का दोष कलि पर डाला। राज्य और दमयन्ती को पुनः पाकर नल ने धर्मपूर्वक राज्य किया। बृहदश्व ने इस कथा से युधिष्ठिर को सान्त्वना दी कि भाग्य चंचल है, पर धैर्य और ज्ञान विपत्ति को जीत लेते हैं, और उन्हें वह अक्ष-विद्या भी प्रदान की जिसके अभाव ने नल और स्वयं युधिष्ठिर, दोनों को छला था।

बृहदश्व का आगमन और एक प्रश्न जो भीतर ही भीतर सालता था

काम्यक वन में दिन बीत रहे थे, पर युधिष्ठिर के मन का बोझ हलका न होता था। राजपाट जुए में हार चुके, भाइयों समेत वनवासी हो चुके, और जिस अपमान का घूँट द्रौपदी को पीना पड़ा था वह स्मृति किसी क्षण उन्हें चैन न लेने देती थी। उसी समय वहाँ बृहदश्व नामक एक तेजस्वी मुनि (तपस्या में पगे हुए ऋषि) पधारे। युधिष्ठिर ने उन्हें यथोचित आदर से बैठाया, चरण धोए, अर्घ्य दिया, और फिर अपने हृदय की पीड़ा खोल दी।

वन में शोकमग्न युधिष्ठिर हाथ उठाकर भाइयों और द्रौपदी के बीच अपनी व्यथा कहते हुए।

“भगवन्,” उन्होंने कहा, “हम सोचते हैं कि इस पृथ्वी पर हमसे अधिक अभागा कोई न होगा। राज्य गया, धन गया, बंधु-बांधव छूटे, और हम वन-वन भटक रहे हैं।”

मुनि मुसकराए। “हे पाण्डुनन्दन, यदि आप सुनें तो हम आपको एक ऐसे राजा की कथा सुनाएँ जो आपसे कहीं अधिक दुःख में पड़ा था। उसके पास तो न रथ था, न दास, न भाई, न मित्र। वह अकेला अपनी पत्नी के साथ वन में रहा। पर आपके पास तो देवताओं के समान वीर भाई हैं, और ब्रह्मा-तुल्य ब्राह्मणजन भी आपके साथ हैं। इसलिए आपको शोक करना शोभा नहीं देता।”

युधिष्ठिर का कौतूहल जाग उठा। “हे वाणी के स्वामी, हम उस राजा की कथा विस्तार से सुनना चाहते हैं। कृपया सुनाइए।”

ऋषि बृहदश्व वन में हाथ जोड़े बैठे युधिष्ठिर को नल और दमयन्ती की कथा सुनाते हुए।

और तब बृहदश्व ने वह कथा आरम्भ की जो आज भी जुए के पासे और भाग्य के उलटफेर से उबरने की अत्यन्त जीवन्त कहानियों में गिनी जाती है। यह निषध-नरेश नल और विदर्भराजकुमारी दमयन्ती की कथा है।

समझने की कुंजी (कथा-के-भीतर-कथा): महाभारत में अक्सर एक पात्र दूसरे को कथा सुनाता है, ताकि सुनने वाले का दुःख हलका हो या उसे कोई शिक्षा मिले। यहाँ युधिष्ठिर का दर्पण नल हैं: नल भी जुए में सर्वस्व हारे, वनवासी हुए, फिर भी अन्ततः सब पुनः पा लिया। यह कथा सान्त्वना ही नहीं, एक संकेत भी है कि भाग्य का पहिया घूमता रहता है।

सार: वन में बैठे शोकग्रस्त युधिष्ठिर को मुनि बृहदश्व सान्त्वना देने आते हैं और उन्हें नल नामक राजा की कथा सुनाने लगते हैं, जो उनसे भी बड़े संकट में पड़ा था।

निषध-नरेश नल और विदर्भ-कन्या दमयन्ती

निषध (वर्तमान मध्य भारत का एक प्राचीन जनपद) नामक देश में वीरसेन नामक राजा हुए। उनके पुत्र थे नल। बलवान, सुन्दर, अश्वों की विद्या में पारंगत, और सब प्रकार के गुणों से सम्पन्न। समस्त राजाओं में वे ऐसे विराजते थे जैसे देवताओं में इन्द्र, और अपने तेज में सूर्य के समान। वे ब्राह्मणों के हितैषी, वेदज्ञ, और वीर थे; सत्यवादी थे, पर साथ ही पासों के खेल में उनकी विशेष रुचि थी। यही एक रुचि आगे चलकर उनके जीवन का गहनतम घाव बनी।

उसी काल में विदर्भ देश में भीम नामक राजा थे, भयंकर पराक्रमी और प्रजावत्सल। पर वे सन्तानहीन थे, और इस कारण व्यथित रहते थे। एक दिन उनके यहाँ दमन नामक एक ब्रह्मर्षि (तप में सिद्ध ब्राह्मण-ऋषि) पधारे। राजा भीम और रानी ने मिलकर उनकी ऐसी सेवा की कि ऋषि प्रसन्न हो गए और वर दिया: एक रत्न-सी कन्या और तीन उच्च-आत्मा पुत्र। कन्या का नाम दमयन्ती रखा गया, और तीन पुत्रों के नाम दम, दान्त तथा दमन। ऋषि के नाम पर ही ये नाम पड़े।

दमयन्ती की कान्ति और सौभाग्य की कीर्ति समस्त संसार में फैल गई। उसके यौवन में सैकड़ों दासियाँ और सहचरियाँ आभूषणों से सजकर सची (इन्द्र की पत्नी) के समान उसकी सेवा करतीं। न देवताओं में, न यक्षों में, न मनुष्यों में कभी ऐसी सुन्दरी देखी या सुनी गई थी। उधर नल का भी तीनों लोकों में कोई जोड़ नहीं था; सौन्दर्य में वे साक्षात् कन्दर्प (कामदेव) के समान थे।

दोनों ने एक-दूसरे को कभी देखा न था, पर चारणों (राजगुणों का गान करने वाले) से बार-बार एक-दूसरे के गुण सुनते-सुनते उनके हृदय में बिना देखे ही अनुराग जाग उठा, और वह अनुराग दिन-प्रतिदिन प्रबल होता गया।

समझने की कुंजी (वंश और स्थान): नल निषध के राजा, वीरसेन के पुत्र। दमयन्ती विदर्भ के राजा भीम की पुत्री (यह भीम पाण्डव भीम से भिन्न हैं, केवल नाम-साम्य है)। निषध और विदर्भ दोनों ही मध्य भारत के प्राचीन जनपद माने जाते हैं। दमयन्ती की राजधानी कुण्डिन थी।

सार: निषध-नरेश नल और विदर्भ-कन्या दमयन्ती दोनों अपने-अपने गुण और रूप के लिए विख्यात थे; एक-दूसरे के विषय में सुनते-सुनते उनमें बिना मिले ही प्रेम उत्पन्न हो गया।

सोने के पंखों वाला हंस: प्रेम का दूत

उद्यान में नल स्वर्ण पंखों वाले हंस को थामे हुए, झरोखे से स्त्रियां निहारतीं, वृक्ष की ओट में काली छाया।

हृदय की उमंग को रोक न पाकर नल अकसर अन्तःपुर से लगे उपवन में अकेले समय बिताने लगे। एक दिन उन्होंने वहाँ सोने के पंखों वाले कुछ हंस विचरते देखे। उन्होंने अपने हाथों से उनमें से एक को पकड़ लिया। तब उस आकाशचारी पक्षी ने मनुष्य-वाणी में कहा, “हे राजन्, हमें मारिए मत। हम आपका एक प्रिय कार्य करेंगे। हम दमयन्ती के समक्ष आपका ऐसा गुणगान करेंगे कि वह किसी और को पति रूप में चाहेगी ही नहीं।”

यह सुनकर नल ने हंस को मुक्त कर दिया। वे सब हंस उड़कर विदर्भ देश पहुँचे और दमयन्ती के सामने उतरे। उन अद्भुत पक्षियों को देख दमयन्ती और उसकी सखियाँ हर्षित होकर उन्हें पकड़ने दौड़ीं। हंस इधर-उधर बिखर गए, और प्रत्येक सखी एक-एक हंस के पीछे भागी। जिस हंस के पीछे दमयन्ती दौड़ी, वह उसे एकान्त स्थान में ले गया और मनुष्य-वाणी में बोला:

महल की छत पर दमयन्ती हंसों से घिरी बैठीं, एक हंस उनसे नल का संदेश कहता हुआ।

“हे दमयन्ती, निषध देश में नल नामक एक राजा हैं। सौन्दर्य में वे अश्विनीकुमारों के समान हैं, मनुष्यों में उनका कोई जोड़ नहीं। हमने देवता, गन्धर्व, नाग, राक्षस और मनुष्य सब देखे हैं, पर नल जैसा कोई नहीं देखा। जैसे आप अपनी जाति में रत्न हैं, वैसे ही नल पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। श्रेष्ठ का श्रेष्ठ से मिलन ही सुखदायी होता है।”

दमयन्ती ने उत्तर दिया, “आप नल से भी ऐसा ही कहिए।” हंस ने “तथास्तु” कहकर निषध लौटकर सब कुछ नल को कह सुनाया।

सार: सोने के पंखों वाले एक हंस ने दूत बनकर नल और दमयन्ती के बीच परस्पर अनुराग का सन्देश पहुँचाया, और दोनों का प्रेम और दृढ़ हो गया।

स्वयंवर की घोषणा और देवताओं का आगमन

हंस के वचन सुनकर दमयन्ती को चैन न रहा। वह बार-बार लम्बी साँसें भरती, चिन्ता में डूबी, पीली और दुबली हो चली। न शय्या में सुख, न भोजन में रुचि; दिन-रात “हाय!” कहती रोती रहती। दासियों ने संकेतों में राजा भीम को बेटी की दशा बताई। राजा ने समझ लिया कि अब कन्या विवाह-योग्य हो चुकी है, और निश्चय किया कि दमयन्ती का स्वयंवर (वह सभा जिसमें कन्या स्वयं वर चुनती है) रचाया जाए।

भीम ने पृथ्वी भर के राजाओं को निमन्त्रण भेजा। रथों की घड़घड़ाहट, हाथियों की चिंघाड़ और घोड़ों की हिनहिनाहट से धरती गूँज उठी; आभूषणों और मालाओं से सजी सेनाओं के साथ राजागण कुण्डिन आ पहुँचे। भीम ने सबका यथोचित सत्कार किया।

इसी बीच नारद और पर्वत नामक दो महान देवर्षि घूमते हुए इन्द्र के लोक में पहुँचे। इन्द्र ने उनका आदर-सत्कार किया और कुशल पूछी। बातों-बातों में इन्द्र ने पूछा, “वे वीर क्षत्रिय राजा अब क्यों नहीं आते जो युद्ध में प्राणों की परवाह न करके वीरगति पाते और इस स्वर्गलोक में आते थे? मेरे प्रिय अतिथि कहाँ हैं?”

नारद ने बताया, “हे मघवन्, विदर्भराज भीम की कन्या दमयन्ती का स्वयंवर होने वाला है। संसार के सभी राजा-राजकुमार उसी ओर जा रहे हैं, क्योंकि सब उस पृथ्वी-रत्न को पाना चाहते हैं।” यह सुनते ही अग्नि सहित लोकपाल (दिशाओं के रक्षक देवता) भी बोल उठे, “हम भी वहाँ चलेंगे।” और वे सब अपने वाहनों पर चढ़कर विदर्भ की ओर चल पड़े।

मार्ग में चार दिक्पाल देवता नल को घेरकर उन्हें अपना दूत बनने को कहते हुए।

उधर दमयन्ती के प्रेम से भरे हृदय वाले नल भी प्रसन्न मन से चल पड़े। मार्ग में देवताओं ने नल को देखा। सूर्य के समान तेजस्वी और कामदेव-तुल्य सुन्दर उस राजा को देखकर लोकपाल चकित रह गए और अपना स्वयं का संकल्प छोड़ बैठे। वे आकाश से उतरकर नल के पास आए और बोले, “हे निषध-नरेश नल, आप सत्य के पालक हैं। हमारी सहायता कीजिए। आप हमारे दूत बनिए।”

समझने की कुंजी (चार लोकपाल): इस कथा में जो चार देवता दमयन्ती को पाना चाहते हैं वे हैं इन्द्र (देवराज), अग्नि (अग्निदेव), वरुण (जल के स्वामी) और यम (मृत्यु के देवता)। ये “लोकपाल” कहलाते हैं, अर्थात् संसार और दिशाओं की रक्षा करने वाले देवता। इनका दमयन्ती-स्वयंवर में आना ही आगे की समूची कथा का बीज है।

सार: राजा भीम ने दमयन्ती का स्वयंवर घोषित किया; नारद से सुनकर इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम भी उसे पाने चल पड़े, और मार्ग में नल को देख उन्होंने उसे अपना दूत बनने को कहा।

देवताओं का दूत बनकर नल का दमयन्ती के पास जाना

नल ने वचन दे दिया, “मैं करूँगा।” फिर हाथ जोड़कर पूछा, “आप कौन हैं? और मुझे क्या करना होगा? सत्य बताइए।” इन्द्र ने उत्तर दिया, “हमें अमर देवता जानो, दमयन्ती के लिए आए हैं। मैं इन्द्र हूँ, यह अग्नि, यह जल के स्वामी वरुण, और यह यम। आप दमयन्ती के पास जाकर हमारे आगमन का समाचार दीजिए, और कहिए कि वह हम चारों में से किसी एक को पति रूप में चुने।”

नल ने हाथ जोड़कर कहा, “मैं तो स्वयं इसी प्रयोजन से यहाँ आया हूँ। जो पुरुष स्वयं प्रेम के वश में है, वह किसी स्त्री से दूसरों के लिए ऐसी बात कैसे कहे? आप मुझे क्षमा कीजिए।” पर देवताओं ने कहा, “पहले ‘मैं करूँगा’ कहकर अब क्यों पीछे हटते हैं? बिना विलम्ब जाइए।”

नल ने फिर शंका जताई, “वह अन्तःपुर तो भली-भाँति सुरक्षित है। मैं भीतर कैसे जाऊँगा?” इन्द्र ने कहा, “आप जा सकेंगे।” और सचमुच, देवताओं की शक्ति से नल बिना किसी पहरेदार के देखे दमयन्ती के महल में पहुँच गए। वहाँ उन्होंने दासियों से घिरी, चन्द्रमा की कान्ति को भी तिरस्कृत करती दमयन्ती को देखा। उसे देख नल का प्रेम और उमड़ा, पर सत्य की रक्षा के लिए उन्होंने अपने मन को रोके रखा।

नल के तेज से चकित होकर दासियाँ आसन से उठ खड़ी हुईं। वे मन ही मन सोचने लगीं, “यह कौन है? कोई देव, यक्ष या गन्धर्व?” पर लज्जा और विस्मय से कोई कुछ बोल न सकी। दमयन्ती ने मुसकराते हुए कहा, “हे निर्दोष रूप वाले वीर, आप कौन हैं जो मेरे हृदय में प्रेम जगाते हुए यहाँ आए हैं? और आप यहाँ बिना किसी के देखे कैसे पहुँचे, जबकि मेरा अन्तःपुर भली-भाँति रक्षित है और पिता की आज्ञा कठोर है?”

रात के अंतःपुर में तेजोमय नल चकित बैठी दमयन्ती के सम्मुख देवताओं का संदेश कहते हुए।

नल ने उत्तर दिया, “हे सुन्दरी, मेरा नाम नल है। मैं देवताओं का दूत बनकर आया हूँ। इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम आपको पाना चाहते हैं। आप उनमें से किसी एक को वर रूप में चुन लीजिए। उन्हीं की शक्ति से मैं यहाँ अनदेखा भीतर आ सका हूँ।”

सार: देवताओं को दिया वचन निभाते हुए नल ने अपने प्रेम को दबाकर दमयन्ती के पास उनका सन्देश पहुँचाया कि वह चार देवताओं में से किसी एक को पति चुने।

दमयन्ती का संकल्प: देवताओं के सामने भी एक मनुष्य

दमयन्ती ने देवताओं को प्रणाम करके मुसकराते हुए नल से कहा, “हे राजन्, आप मुझे यथोचित प्रेम से अपनाइए और आज्ञा दीजिए कि मैं आपके लिए क्या करूँ। मैं और मेरा जो भी धन है, सब आपका है। हंसों की वाणी मुझे जला रही है। आपके ही लिए मैंने इन राजाओं को यहाँ बुलवाया है। यदि आप मुझे, जो आपकी आराधना करती हूँ, छोड़ देंगे, तो आपके लिए मैं विष, अग्नि, जल या रस्सी का सहारा ले लूँगी।”

नल ने समझाया, “जब साक्षात् लोकपाल उपस्थित हैं, तब आप एक मनुष्य को क्यों चुनती हैं? जिन देवताओं के चरणों की धूल के भी मैं तुल्य नहीं, उन सृष्टिकर्ताओं की ओर अपना हृदय मोड़िए। देवताओं को रुष्ट करके मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है। आप मुझे बचाइए और सर्वश्रेष्ठ देवताओं को चुनिए।”

पर दमयन्ती की आँखें आँसुओं से भर आईं। उसने कहा, “हे पृथ्वीनाथ, सब देवताओं को प्रणाम करके भी मैं वर रूप में आपको ही चुनती हूँ। यह मैं सत्य कहती हूँ।” हाथ जोड़े काँपती दमयन्ती से नल ने कहा, “मैंने विशेष रूप से देवताओं को वचन दिया है; दूसरों का सन्देश लेकर आकर मैं अपना स्वार्थ कैसे साधूँ?”

तब आँसुओं में डूबे स्वर में दमयन्ती ने एक निर्दोष उपाय बताया, “हे राजन्, आप इन्द्र आदि सब देवताओं के साथ स्वयंवर में पधारिए। वहाँ लोकपालों के समक्ष ही मैं आपको चुनूँगी। इससे आप पर कोई दोष न आएगा।” यह सुनकर नल देवताओं के पास लौट आए और उन्हें सब कुछ कह सुनाया।

एक उप-कथा: ध्यान दीजिए कि यह कथा नल के चरित्र को सरल नायक नहीं बनाती। नल देवताओं के दूत बनकर आते हैं, अपना प्रेम जानते हुए भी ईमानदारी से देवताओं की ओर से ही बोलते हैं, और दमयन्ती से देवताओं को चुनने का आग्रह तक करते हैं। उनका धर्म-संकट यही है: प्रेम और दिया हुआ वचन आमने-सामने खड़े हैं। दमयन्ती का “स्वयंवर में आकर चुनूँगी” वाला उपाय इसी संकट से धर्मसम्मत निकास निकालता है।

सार: देवताओं के पक्ष में नल के बार-बार समझाने पर भी दमयन्ती ने नल को ही चुनना दृढ़ता से तय किया, और एक निर्दोष उपाय निकाला कि वह स्वयंवर में देवताओं के सामने ही नल का वरण करेगी।

स्वयंवर: पाँच एक-से नल, और सत्य की पुकार

शुभ मुहूर्त में राजा भीम ने राजाओं को स्वयंवर-सभा में बुलाया। प्रेम से व्याकुल राजागण सोने के खम्भों और ऊँचे तोरण-द्वार वाले उस मण्डप में ऐसे प्रवेश करने लगे जैसे सिंह पर्वत-कन्दराओं में। तब चन्द्रमुखी दमयन्ती ने सबकी आँखों और हृदयों को अपनी प्रभा से चुराते हुए सभा में प्रवेश किया।

स्वयंवर सभा में दमयन्ती हाथ जोड़े एक जैसे दिखते पांच नलों के आगे खड़ी हुईं।

जब राजाओं के नाम पुकारे गए, तब भीम-पुत्री ने एक विचित्र दृश्य देखा: पाँच पुरुष बिलकुल एक-से दिखाई दे रहे थे। चार देवताओं ने नल का ही रूप धारण कर लिया था। दमयन्ती संकट में पड़ गई, “कैसे जानूँ कि इनमें कौन देवता हैं और कौन राजा नल?” उसने वृद्धों से सुने देवताओं के लक्षण स्मरण किए, पर यहाँ खड़े देवताओं में वे लक्षण दिखाई न देते थे।

अन्ततः उसने देवताओं की ही शरण ली। हाथ जोड़, काँपते हुए, उसने मन और वाणी से प्रणाम करके कहा, “जब से मैंने हंसों की वाणी सुनी, तब से मैंने निषध-नरेश को ही अपना पति चुना है। सत्य के बल पर, हे देवताओं, मुझे नल को प्रकट कर दीजिए। मैंने मन या वचन से कभी उनसे विचलन नहीं किया; इस सत्य के बल पर मुझे वे प्रकट हो जाएँ। आप लोकपाल अपना-अपना यथार्थ रूप धारण कर लें, ताकि मैं उस धर्मात्मा राजा को पहचान सकूँ।”

दमयन्ती की इस करुण पुकार और अटल अनुराग को देख देवताओं ने वैसा ही किया। तब उसने देखा: देवता पसीने से रहित, अपलक नेत्रों वाले, अम्लान मालाओं वाले, धूलि से अछूते, और भूमि को बिना स्पर्श किए खड़े थे। और नल अपनी छाया सहित, कुम्हलाती माला, धूलि-पसीने से सने शरीर, झपकती पलकों और भूमि पर टिके चरणों से प्रकट थे, अर्थात् पूर्णतया मनुष्य। देवताओं और मनुष्य का यह भेद पहचानकर दमयन्ती ने अपने सत्य के अनुसार नल को चुना, और लज्जा से उनके वस्त्र का छोर पकड़कर उनके गले में सुन्दर वरमाला डाल दी।

राजागण “हाय!” कह उठे, पर देवता और महर्षि “साधु! साधु!” कहकर नल की प्रशंसा करने लगे। प्रसन्न देवताओं ने नल को आठ वर दिए: इन्द्र ने यज्ञों में अपने दर्शन और श्रेष्ठ लोकों की प्राप्ति का; अग्नि ने जब चाहें अपनी उपस्थिति और अपने समान तेजोमय लोकों का; यम ने भोजन में सूक्ष्म स्वाद और धर्म में श्रेष्ठता का; और वरुण ने जब चाहें अपनी उपस्थिति तथा दिव्य सुगन्ध वाली मालाओं का। इस प्रकार प्रत्येक ने दो-दो वर दिए, और फिर स्वर्ग लौट गए।

राजा भीम ने हर्षपूर्वक नल और दमयन्ती का विवाह कराया। कुछ काल वहाँ रहकर नल अपनी पटरानी को लेकर अपनी नगरी लौटे और धर्मपूर्वक राज्य करने लगे। उन्होंने अश्वमेध आदि अनेक यज्ञ किए, ब्राह्मणों को प्रचुर दान दिया। दमयन्ती से उन्हें इन्द्रसेन नामक पुत्र और इन्द्रसेना नामक कन्या हुई। राजा सुखपूर्वक धन-धान्य से भरी पृथ्वी पर शासन करते रहे।

समझने की कुंजी (देवता बनाम मनुष्य के चिह्न): भारतीय कथाओं में देवताओं के पारम्परिक लक्षण ये माने जाते हैं: वे पसीना नहीं बहाते, पलक नहीं झपकाते, उनकी मालाएँ कुम्हलाती नहीं, उन पर धूलि नहीं चढ़ती, और वे धरती को स्पर्श किए बिना अधर में रहते हैं। दमयन्ती इन्हीं चिह्नों के अभाव से नल को, जो साक्षात् मनुष्य थे, पहचान लेती है।

सार: स्वयंवर में देवताओं ने नल का रूप धर लिया, पर दमयन्ती ने सत्य की पुकार और देवचिह्नों के अभाव से असली नल को पहचानकर उन्हें वरमाला पहनाई; देवताओं ने आशीर्वाद और आठ वर देकर विदा ली, और नल-दमयन्ती सुखपूर्वक रहने लगे।

कलि का क्रोध और बारह वर्ष की प्रतीक्षा

स्वयंवर से लौटते समय लोकपालों को मार्ग में द्वापर के साथ आता कलि मिला। (यहाँ कलि और द्वापर युगों के अधिष्ठाता-तत्त्व के रूप में प्रकट हैं; कलि वह प्रवृत्ति है जो कलह, छल और पतन लाती है।) इन्द्र ने पूछा, “हे कलि, द्वापर के साथ कहाँ जा रहे हो?” कलि ने कहा, “दमयन्ती के स्वयंवर में, क्योंकि मेरा मन उसी पर लगा है; मैं उसे पाऊँगा।”

विवाह मंडप के बाहर कलि क्रोध में मुट्ठी ताने, भीतर दमयन्ती नल को वरमाला पहनाती हुई।

इन्द्र ने मुसकराकर कहा, “वह स्वयंवर तो समाप्त हो चुका। हमारे सामने ही दमयन्ती ने नल को वर लिया।” यह सुनकर कलि क्रोध से भर उठा, “देवताओं के समक्ष उसने एक मनुष्य को चुना; इस कारण उसे कठोर दण्ड भोगना चाहिए।” देवताओं ने उसे फटकारा, “हमारी अनुमति से ही दमयन्ती ने नल को चुना है। नल जैसे सर्वगुण-सम्पन्न राजा को कौन कन्या न चुनेगी? जो मूर्ख नल को शाप देने का यत्न करेगा, वह अपने ही को शाप देकर नरक के अथाह गर्त में गिरेगा।” इतना कहकर देवता स्वर्ग चले गए।

पर कलि अपना क्रोध रोक न सका। उसने द्वापर से कहा, “मैं नल में प्रवेश करूँगा, उसे राज्य से वंचित करूँगा। आप पासों में प्रवेश करके मेरी सहायता कीजिएगा।” यह सन्धि करके कलि निषध देश पहुँचा और छिद्र (दोष या चूक का अवसर) ढूँढ़ता हुआ वहीं रहने लगा।

संध्या के अर्घ्य में लगे नल के शरीर में पीछे से काली छाया रूपी कलि प्रवेश करता हुआ।

पूरे बारह वर्ष बीत गए, तब जाकर कलि को एक छिद्र मिला। एक दिन शौच के पश्चात् नल ने जल का स्पर्श करके सन्ध्या-वन्दन किया, पर पैर धोना भूल गए। इसी एक चूक से कलि उनके भीतर प्रवेश कर गया। फिर कलि ने नल के भाई पुष्कर के पास जाकर कहा, “नल के साथ पासे खेलिए। मेरी सहायता से आप अवश्य जीतेंगे, राज्य पाकर निषध पर शासन करेंगे।” द्वापर भी प्रमुख पासा ‘वृष’ बनकर साथ हो लिया।

एक उप-कथा: यह कथा युधिष्ठिर के अपने जुए के प्रसंग से गहरे जुड़ती है। नल भी सत्यवादी, धर्मात्मा और गुणी थे, पर पासों के प्रति आसक्ति उनकी दुर्बलता थी। यह कथा बुराई को सरल नहीं बनाती: पतन का बीज स्वयं नल के भीतर पहले से था, कलि ने तो केवल एक चूक का अवसर पाकर उसे फलने दिया।

सार: दमयन्ती के नल को चुनने से क्रुद्ध कलि ने बारह वर्ष तक छिद्र की ताक में रहकर, नल की एक धार्मिक चूक के अवसर पर उनके भीतर प्रवेश किया और उनके भाई पुष्कर को जुए के लिए उकसाया।

जुआ: सर्वस्व का नाश

द्यूत सभा में पुष्कर पासे फेंकता हुआ, हारते नल के ऊपर कलि की काली छाया मंडराती।

पुष्कर बार-बार नल को पासे खेलने की चुनौती देने लगा। दमयन्ती के समक्ष चुनौती पाकर उच्च-हृदय नल अधिक समय तक मना न कर सके और खेल का समय निश्चित कर दिया। कलि के वश में पड़े नल खेल में अपना सोना, चाँदी, रथ, घोड़े और वस्त्र, सब हारने लगे। पासों में ऐसे पगलाए कि कोई मित्र उन्हें रोक न सका।

नगरवासी और मन्त्रीगण दुःखी होकर राजा को रोकने द्वार पर आ खड़े हुए। सारथी ने दमयन्ती से कहा, “हे देवी, प्रजा और मन्त्री द्वार पर हैं; राजा से उन्हें मिलने का आग्रह कीजिए।” दमयन्ती ने रुँधे स्वर में नल से यह कहा, पर कलि के वश में पड़े नल ने एक शब्द भी उत्तर न दिया। लज्जित और शोकग्रस्त होकर प्रजा “अब वे जीवित नहीं रहे” कहती हुई लौट गई। इस प्रकार महीनों तक नल और पुष्कर का जुआ चलता रहा, और धर्मात्मा नल सदा हारते रहे।

दमयन्ती ने संकट की गम्भीरता समझ ली। उसने अपनी विश्वस्त धाय वृहत्सेना के द्वारा मन्त्रियों को बुलवाया, पर नल ने उनकी ओर ध्यान न दिया। फिर दमयन्ती ने सारथी वार्ष्णेय को बुलाकर कहा, “आप जानते हैं राजा सदा आपके प्रति कैसा रहे हैं। अब वे संकट में हैं। नल के तीव्र वेग वाले प्रिय घोड़ों को रथ में जोतकर मेरे दोनों बच्चों, इन्द्रसेन और इन्द्रसेना, को कुण्डिन ले जाइए। उन्हें मेरे माता-पिता के पास छोड़कर, रथ और घोड़े भी वहीं छोड़ दीजिए; फिर चाहे वहीं रहिए या जहाँ इच्छा हो, चले जाइए।”

वार्ष्णेय ने मन्त्रियों से परामर्श करके बच्चों को विदर्भ पहुँचाया, इन्द्रसेन और इन्द्रसेना को वहाँ छोड़ा, और दुःखी हृदय से नल का शोक करते हुए विदा ली। भटकते-भटकते वह अयोध्या पहुँचा और वहाँ राजा ऋतुपर्ण के यहाँ सारथी की सेवा में लग गया।

सार: कलि के वश में नल जुए में अपना सब कुछ हारते गए; दमयन्ती ने दूरदर्शिता से अपने दोनों बच्चों को सारथी वार्ष्णेय के साथ अपने मायके कुण्डिन सुरक्षित भिजवा दिया, और वार्ष्णेय अयोध्या में राजा ऋतुपर्ण की सेवा में चला गया।

राज्य से वनवास तक

राज्य हारकर नल और दमयन्ती एक-एक वस्त्र में नगर द्वार से निकलते, नगरवासी शोक में देखते हुए।

वार्ष्णेय के जाने के बाद पुष्कर ने नल का राज्य और शेष सारा धन भी जीत लिया। हँसते हुए उसने कहा, “अब खेल जारी रखिए। आपके पास और कौन-सा दाँव बचा है? केवल दमयन्ती बची है। चाहें तो उसी को दाँव पर लगाइए।” यह सुनकर नल का हृदय क्रोध से फटने को हुआ, पर वे एक शब्द न बोले। पीड़ा में पुष्कर को देखते हुए उन्होंने अपने सब आभूषण उतार दिए और केवल एक वस्त्र पहने, शरीर अनावृत किए, सारा धन त्यागकर नगरी से निकल पड़े। एक ही वस्त्र में दमयन्ती भी उनके पीछे चली।

पुष्कर ने नगर में घोषणा करवा दी कि जो नल की सहायता करेगा, वह मृत्युदण्ड का भागी होगा। इसलिए सत्कार-योग्य होने पर भी किसी नगरवासी ने नल का आदर न किया। नगर के बाहर केवल जल पीकर नल ने तीन रातें बिताईं। फिर भूख से व्याकुल होकर फल-मूल की खोज में निकले, दमयन्ती पीछे-पीछे।

सुनहरे पक्षी नल का एकमात्र वस्त्र लेकर उड़ते हुए, नल उछलकर उसे पकड़ने की चेष्टा में।

कई दिनों बाद नल ने सोने जैसे पंखों वाले कुछ पक्षी देखे और सोचा, “ये ही आज मेरा भोजन और धन बनेंगे।” उन्होंने अपना एकमात्र वस्त्र उन पर डाल दिया, पर वे पक्षी उसी वस्त्र को लेकर आकाश में उड़ गए। नग्न और उदास खड़े नल से वे बोले, “हे अल्पबुद्धि, हम वही पासे हैं। हम आपका वस्त्र हरने आए थे; हमें यह सहन न हुआ कि आप वस्त्र पहने ही जाएँ।”

वस्त्र से भी वंचित होकर नल ने दमयन्ती से कहा, “हे निर्दोष, जिनके क्रोध से मेरा राज्य गया, जिनके प्रभाव से मैं भूख में भी अन्न न पा सका, वे ही अब पक्षी का रूप धरकर मेरा वस्त्र ले गए। अब अपने भले के लिए मेरी बात सुनिए। ये अनेक मार्ग दक्षिण देश को जाते हैं, अवन्ती और ऋक्षवान् पर्वत के पास से। यह विन्ध्य पर्वत है, वह सागर की ओर बहती पयस्विनी नदी, और वे तपस्वियों के आश्रम। यह मार्ग विदर्भ को जाता है, और वह कोसल को।” यह बात नल ने बार-बार दोहराई।

दमयन्ती आँसुओं में डूबकर बोली, “हे राजन्, आपके इस उद्देश्य को सोचकर मेरा हृदय काँप उठता है। राज्य, धन और वस्त्र से हीन, भूख-थकान से चूर आपको इस निर्जन वन में छोड़कर मैं कैसे जाऊँ? दुःख में पत्नी के समान कोई औषधि नहीं, यह वैद्य भी कहते हैं।” नल ने कहा, “हे कृशांगी, यह सत्य है। मैं आपको त्यागना नहीं चाहता; मैं स्वयं को त्याग सकता हूँ, पर आपको नहीं।”

दमयन्ती ने पूछा, “यदि आप मुझे त्यागना नहीं चाहते, तो बार-बार विदर्भ का मार्ग क्यों बताते हैं? मैं जानती हूँ आप मुझे नहीं छोड़ेंगे, पर आपका मन विचलित है, इसी से मुझे भय है। यदि आपकी यही इच्छा है कि मैं अपने सम्बन्धियों के पास जाऊँ, तो हम दोनों ही विदर्भ चलें; वहाँ पिता आपका आदर करेंगे।” नल ने उत्तर दिया, “आपके पिता का राज्य मेरे अपने राज्य के समान है, पर इस विपत्ति में मैं वहाँ कैसे जाऊँ? एक बार वहाँ वैभव में गया था, अब दीनता में जाकर आपका दुःख कैसे बढ़ाऊँ?” यह कहते हुए उन्होंने आधे वस्त्र में लिपटी अपनी पत्नी को सान्त्वना दी।

सार: पुष्कर से राज्य भी हारकर नल केवल एक वस्त्र में नगर से निकले; वह वस्त्र भी पक्षी-रूपी पासे हर ले गए, और अब दोनों आधे वस्त्र में वन में भटकने लगे, नल बार-बार दमयन्ती को मायके का मार्ग बताते रहे पर वह उन्हें छोड़ने को तैयार न हुई।

परित्याग: एक रात की दुविधा

भूख-प्यास से थके दोनों एक यात्रियों की धर्मशाला में पहुँचे। नल भूमि पर बैठ गए और फिर मलिन, धूलि-धूसरित होकर दमयन्ती के साथ वहीं सो गए। निर्दोष दमयन्ती गहरी नींद में सो गई, पर शोक और चिन्ता से नल को नींद न आई। राज्य की हानि, मित्रों का बिछोह और वन का कष्ट सोचते हुए उनका कलि-प्रभावित मन व्याकुल हो उठा।

वे सोचने लगे, “क्या करूँ? यदि न करूँ तो? क्या मृत्यु ही श्रेष्ठ है, या पत्नी को छोड़ दूँ? यह मुझ पर अनुरक्त है और मेरे कारण यह कष्ट सह रही है। मुझसे अलग होकर शायद यह अपने सम्बन्धियों के पास पहुँच जाए। मेरे साथ रहकर तो इसे दुःख ही मिलेगा; अलग होकर सम्भव है कभी सुख पाए।” कलि के प्रभाव से उनका मन दमयन्ती को त्यागने पर अड़ गया। उन्होंने यह भी सोचा, “यशस्विनी और सौभाग्यवती यह स्त्री अपने तेज के कारण मार्ग में किसी से पीड़ित नहीं होगी।”

निद्रा में डूबी दमयन्ती का आधा वस्त्र काटकर नल तलवार और कटा वस्त्र लिए जाने को उद्यत।

फिर अपने वस्त्रहीन होने और दमयन्ती के एकमात्र वस्त्र को देख उन्होंने सोचा कि उसी वस्त्र का आधा भाग काट लें, पर ऐसे कि प्रिया जाग न जाए। धर्मशाला के पास उन्हें एक खुली तलवार पड़ी मिली। उससे वस्त्र का आधा भाग काटकर, तलवार फेंककर, सोई हुई विदर्भकुमारी को छोड़कर वे चल पड़े। पर हृदय ने साथ न दिया; लौटकर सोई दमयन्ती को देख फूट-फूटकर रोए।

वे विलाप करने लगे, “हाय! जिसे न कभी वायु ने, न सूर्य ने देखा था, वही आज अनाथ-सी भूमि पर सो रही है। जागने पर यह कटे वस्त्र में, अकेली, इन हिंसक पशुओं और सर्पों से भरे वन में कैसे विचरेगी? हे कल्याणी, आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार और मरुद्गण आपकी रक्षा करें; आपका सतीत्व ही आपका परम रक्षक हो।” कलि से विवश होकर वे चलते, और प्रेम से खिंचकर बार-बार उसी धर्मशाला में लौट आते। मानो उनका हृदय दो टुकड़ों में बँट गया हो; झूले के समान वे भीतर-बाहर डोलते रहे। अन्ततः कलि के स्पर्श से चेतनाहीन होकर नल अपनी सोई पत्नी को छोड़कर शोकमग्न चले गए।

एक उप-कथा: कथा यहाँ नल को क्षमा नहीं करती, पर निर्दयता से दोषी भी नहीं ठहराती। वह स्पष्ट कहती है कि यह कुकृत्य कलि के प्रभाव में हुआ, फिर भी यह नल के ही हाथों हुआ। “कलि से विवश होकर चलते, प्रेम से खिंचकर लौटते” वाला यह झूलता हुआ हृदय महाभारत की उस नैतिक जटिलता का चिह्न है जहाँ अच्छाई और भूल एक ही व्यक्ति में साथ-साथ रहती हैं।

सार: कलि से विवश नल ने सोई दमयन्ती के वस्त्र का आधा भाग काटकर, बार-बार लौटते-जाते, अन्ततः उसे निर्जन वन में अकेला छोड़ दिया।

दमयन्ती का विलाप और अजगर का संकट

नल के जाने के बाद दमयन्ती चौंककर जागी और अपने पति को न पाकर भय से चीख उठी, “हे प्राणनाथ! हे महाराज! क्या आपने मुझे त्याग दिया? मैं इस निर्जन स्थान में लुट गई। हे सत्यवादी राजन्, लोकपालों के समक्ष दिए वचन को स्मरण कीजिए। यह कोई हँसी हो तो बस कीजिए; मैं भयभीत हूँ, प्रकट हो जाइए। मैं अपने लिए नहीं, यह सोचकर रोती हूँ कि आप अकेले अपने दिन कैसे काटेंगे।”

शोक से जलती दमयन्ती इधर-उधर भागती, कभी उठती, कभी मूर्छित-सी गिरती, कभी काँपती, कभी फूट-फूटकर रोती। फिर उसने उस अदृश्य शक्ति को शाप-सा देते हुए कहा, “जिसके अभिशाप से निर्दोष नल यह कष्ट भोग रहे हैं, वह हमसे भी बड़ा दुःख पाए।”

हिंसक पशुओं से भरे वन में पति को ढूँढ़ती दमयन्ती के पास अचानक एक विशाल भूखा अजगर आ गया और उसने उसे अपनी कुण्डलियों में जकड़ लिया। फिर भी वह अपने लिए नहीं, नल के लिए ही विलाप करती रही, “हे नाथ, इस सर्प से जकड़ी मुझ अरक्षित को बचाने आप क्यों नहीं दौड़ते? जब आप होश और धन पाकर मुझे स्मरण करेंगे, तब आपकी क्या दशा होगी?”

तभी वन में घूमता एक व्याध (आखेटक, शिकारी) उसका विलाप सुनकर दौड़ा आया और तीखे शस्त्र से अजगर का सिर काटकर दमयन्ती को मुक्त कर दिया। उसने उस पर जल छिड़का, भोजन दिया, सान्त्वना दी और पूछा कि वह कौन है और इस दशा में कैसे पहुँची। दमयन्ती ने सब बता दिया।

विशाल अजगर के पास खड़ी दमयन्ती के उठे हाथ के शाप से व्याध जलकर गिरता हुआ।

पर आधे वस्त्र में लिपटी उस अनुपम सुन्दरी को देख व्याध काम के वश हो गया और मीठे शब्दों से उसे फुसलाने लगा। दमयन्ती उसकी कुत्सित मनोवृत्ति समझ गई और क्रोध से प्रज्वलित हो उठी। जब उस दुष्ट ने बलप्रयोग का यत्न किया, तब पति-वियोग और राज्य-नाश से पहले ही व्यथित दमयन्ती ने उसे शाप दिया, “यदि मैंने नल के अतिरिक्त किसी और का कभी विचार तक न किया हो, तो यह नीच व्याध इसी क्षण निष्प्राण होकर गिर पड़े।” वचन के साथ ही वह व्याध अग्नि से जले वृक्ष के समान भूमि पर गिर पड़ा।

सार: अकेली दमयन्ती ने वन में विलाप करते हुए नल को ढूँढ़ा; अजगर के चंगुल से एक व्याध ने उसे बचाया, पर जब वही व्याध कुदृष्टि से उस पर बल करना चाहा, तो उसके पातिव्रत्य के तेज से वह शापित होकर भस्म हो गया।

तपोवन, अशोक वृक्ष और सार्थ का विनाश

व्याध को मारकर दमयन्ती उस भयानक, झींगुरों से गूँजते वन में आगे बढ़ी, जहाँ सिंह, चीते, व्याघ्र, भालू और अनेक वृक्ष-लताएँ थीं। एक शिला पर बैठकर वह विलाप करने लगी, और फिर पर्वत और वन्य-राज सिंह से तक पति का समाचार पूछने लगी, मानो शोक ने उसे प्रत्येक स्थावर-जंगम से बात करने को विवश कर दिया हो।

तीन दिन-रात चलकर वह एक अनुपम तपोवन में पहुँची, जहाँ वसिष्ठ, भृगु और अत्रि जैसे संयमी तपस्वी रहते थे, कोई जल पर, कोई वायु पर, कोई गिरे पत्तों पर निर्वाह करते। तपस्वियों ने उसका स्वागत किया और पूछा कि वह कौन है। दमयन्ती ने अपना सारा वृत्तान्त सुनाया और नल के विषय में पूछा। तपस्वियों ने तप के बल से देखकर कहा, “हे कल्याणी, भविष्य आपको सुख देगा; आप शीघ्र ही नल को पाएँगी, संकटमुक्त, सब रत्नों से सज्जित, अपने ही नगर पर शासन करते।” इतना कहकर वे तपस्वी अपने आश्रम और अग्नि सहित अदृश्य हो गए। दमयन्ती चकित रह गई कि क्या यह स्वप्न था।

आगे एक सुन्दर अशोक वृक्ष देख उसने उससे प्रार्थना की, “हे अशोक, अपने नाम को सार्थक कीजिए; अशोक तो शोक का नाश करने वाला होता है। क्या आपने मेरे प्रिय नल को देखा है?” वृक्ष की तीन परिक्रमा कर वह और गहरे वन में बढ़ी।

चलते-चलते उसे एक मार्ग पर घोड़ों-हाथियों सहित व्यापारियों का एक सार्थ (व्यापारियों का दल या कारवाँ) मिला, जो एक स्वच्छ नदी के तट पर उतरा था। आधे वस्त्र में, दुबली, मलिन और धूलि-धूसरित दमयन्ती को देख कोई भयभीत हुआ, कोई हँसा, कोई द्रवित। उसने सार्थ के नायक से पूछा कि वे कहाँ जा रहे हैं। नायक ने बताया कि वे चेदि-नरेश सुबाहु की नगरी की ओर जा रहे हैं। दमयन्ती भी पति को खोजने की आशा में उसी सार्थ के साथ चल पड़ी।

रात में उन्मत्त हाथियों से रौंदे जाते काफ़िले के बीच से दमयन्ती भागती हुई।

कई दिन बाद वह सार्थ एक कमल-सुगन्धित विशाल सरोवर के पास रात में विश्राम के लिए रुका। आधी रात को जब सब थककर सो रहे थे, जंगली हाथियों का एक झुण्ड जल पीने आया और सार्थ के पालतू हाथियों को देख मदोन्मत्त होकर उन पर टूट पड़ा। सोते हुए लोग कुचले जाने लगे; कोई दाँतों से, कोई सूँड़ से, कोई पैरों से मारा गया। ऊँट-घोड़े मरे, भगदड़ में लोग एक-दूसरे को रौंदते मरे। “आग लग गई! भागो!” का कोलाहल मच गया।

दमयन्ती भयभीत होकर जागी। जो लोग बचे, वे आपस में कहने लगे, “यह उसी उन्मादिनी-सी स्त्री का काम है जो हमारे बीच आ मिली थी; वही कोई राक्षसी या यक्षी होगी।” वे उसे पत्थर-लकड़ी से मारने को उद्यत हुए। भय और लज्जा से दमयन्ती वन में भाग गई और स्वयं को कोसने लगी, “हाय! पूर्वजन्म के पापों के कारण ही मुझ पर यह विपत्ति आई: पति का राज्य गया, स्वजनों ने उसे हराया, पति-पुत्र-पुत्री से वियोग हुआ, और अब इन निर्दोष लोगों का भी नाश।”

अगले दिन बचे हुए व्यापारी अपने मृतकों का शोक करते आगे बढ़े। उनके साथ चलते वेदज्ञ ब्राह्मणों के संग दमयन्ती सन्ध्या तक सत्यवादी चेदि-नरेश सुबाहु की महान नगरी पहुँची। आधे वस्त्र में, उन्मादिनी-सी, धूलि से सनी उसे देख नगर के बालक कौतूहल से उसके पीछे हो लिए, और वह राजमहल के सामने आ खड़ी हुई।

एक उप-कथा: सार्थ-विनाश का प्रसंग दमयन्ती के अपराधबोध को गहरा करता है। वह स्वयं को इस आपदा का कारण मानने लगती है, यद्यपि यह उसका दोष नहीं था। यहाँ कथा मनुष्य के उस स्वभाव को छूती है जो असहाय दुःख में अपने ही ऊपर दोष ढूँढ़ने लगता है, और भाग्य तथा पूर्वकर्म पर विचार करता है।

सार: तपस्वियों के आश्वासन और अशोक वृक्ष से प्रार्थना के बाद दमयन्ती एक व्यापारी-सार्थ के साथ चली, पर हाथियों के आक्रमण में सार्थ नष्ट हो गया; बचे लोगों के दोषारोपण से भागकर वह चेदि-नरेश सुबाहु की नगरी पहुँची।

चेदि-नगरी में सैरन्ध्री दमयन्ती

महल की छत से राजमाता ने भीड़ से घिरी उस तेजस्वी स्त्री को देखा और अपनी धाय से कहा, “इस अनाथ, संकटग्रस्त स्त्री को मेरे पास ले आओ; उन्मादिनी-सी दिखती हुई भी यह विशाल नेत्रों वाली साक्षात् लक्ष्मी-सी है।” धाय उसे छत पर ले आई और पूछा कि वह कौन है। दमयन्ती ने केवल इतना बताया कि वह मनुष्य-जाति की एक पतिव्रता स्त्री है, सुकुल की सेविका, फल-मूल पर निर्वाह करती है। उसने अपने पति के गुण और जुए में हार, फिर वन-त्याग की कथा बिना अपना या नल का नाम लिए सुनाई।

राजमाता ने उससे अपने पास रहने का आग्रह किया, “मेरे पुरुष आपके पति को खोजेंगे, या वह स्वयं घूमते हुए यहाँ आ सकता है।” दमयन्ती ने कुछ नियमों के साथ रहना स्वीकार किया, “मैं किसी की जूठन नहीं खाऊँगी, किसी के पैर नहीं धोऊँगी, पराये पुरुषों से बात नहीं करूँगी। यदि कोई मुझे चाहे, तो वह आपके द्वारा दण्डनीय हो; बार-बार याचना करने वाला मृत्युदण्ड पाए। और जो ब्राह्मण मेरे पति की खोज में निकलें, उनसे मैं भेंट कर सकूँ।” राजमाता ने प्रसन्न होकर सब स्वीकार किया और दमयन्ती को अपनी पुत्री सुनन्दा की सैरन्ध्री (राजकुल में रहने वाली कुलीन परिचारिका) के रूप में रख लिया। दमयन्ती निश्चिन्त होकर वहाँ रहने लगी।

समझने की कुंजी (सैरन्ध्री): “सैरन्ध्री” का अर्थ है राजमहल में रहने वाली कुलीन सेविका या सखी, जो दासी नहीं होती। आगे चलकर अज्ञातवास में स्वयं द्रौपदी भी विराट-नगरी में सैरन्ध्री बनती हैं, इसलिए वनवासी पाण्डवों के लिए यह प्रसंग और भी मार्मिक हो उठता है।

सार: चेदि-नगरी की राजमाता ने दमयन्ती को पहचाने बिना ही अपने पास रख लिया; दमयन्ती ने कठोर पातिव्रत्य-नियमों के साथ राजकुमारी सुनन्दा की सैरन्ध्री बनकर रहना स्वीकार किया।

कर्कोटक नाग और नल का रूप-परिवर्तन

उधर दमयन्ती को त्यागकर चले गए नल ने उसी वन में एक भीषण दावानल (वन की आग) धधकता देखा। उस आग के बीच से कोई बार-बार पुकार रहा था, “हे धर्मात्मा नल, यहाँ आओ।” “भय मत करो” कहते हुए नल आग में घुसे और कुण्डली मारे पड़े एक विशाल नाग को देखा। नाग ने काँपते हुए कहा, “हे राजन्, मैं कर्कोटक नामक सर्प हूँ। मैंने महर्षि नारद को छला था, इस कारण उन्होंने मुझे शाप दिया कि जब तक कोई नल नामक राजा यहाँ से न ले जाए, तब तक मैं स्थावर के समान यहीं पड़ा रहूँ। आप मुझे यहाँ से ले चलिए; मैं आपका मित्र बनूँगा।” यह कहकर वह अँगूठे के बराबर छोटा हो गया।

जलते वन के बीच कर्कोटक नाग नल के पैर में दंश देता हुआ।

नल उसे लेकर आग से बाहर निकले। तब कर्कोटक बोला, “कुछ पग और गिनते हुए चलिए; मैं आपका बड़ा हित करूँगा।” जैसे ही नल ने पग गिने, दसवें पग पर नाग ने उन्हें डँस लिया, और तत्काल नल का रूप बदल गया। चकित नल को नाग ने समझाया, “मैंने आपका सौन्दर्य इसलिए हर लिया कि लोग आपको पहचान न सकें। और जिस कलि ने आपको छलकर दुःख में डाला है, वह अब मेरे विष से पीड़ित होकर आपके भीतर तब तक तड़पेगा जब तक आपको छोड़ न दे। आपको मेरे विष से कोई पीड़ा न होगी; आप युद्ध में सदा विजयी रहेंगे।”

नाग ने आगे कहा, “इसी दिन अयोध्या जाइए और पासों में निपुण राजा ऋतुपर्ण के समक्ष स्वयं को ‘बाहुक नामक सारथी’ कहकर प्रस्तुत कीजिए। वह राजा आपको अपनी पासों की विद्या देगा और आपसे अश्व-विद्या लेगा। पासों में निपुण होते ही आपका कल्याण होगा; आप पत्नी, पुत्र और राज्य पुनः पाएँगे। और जब अपना यथार्थ रूप देखना चाहें, मुझे स्मरण करके यह वस्त्र धारण कीजिए; तत्काल अपना रूप लौट आएगा।” यह कहकर कर्कोटक ने नल को दो दिव्य वस्त्र दिए और अन्तर्धान हो गया।

समझने की कुंजी (कलि और कर्कोटक का विष): ध्यान दीजिए कि नाग का विष नल को पीड़ा नहीं देता, उनके भीतर बैठे कलि को पीड़ा देता है। यह एक सुन्दर संकेत है: बाहरी विपत्ति वस्तुतः भीतर की उस बुराई को ही जलाती है जो पतन का कारण बनी थी। कलि का अन्ततः निकल जाना नल की मुक्ति का मार्ग बनेगा।

सार: दावानल से कर्कोटक नाग को बचाने पर उसने नल को डँसकर उनका रूप बदल दिया, जिससे भीतर का कलि उसके विष से तड़पने लगा; नाग ने नल को ‘बाहुक’ बनकर अयोध्या के राजा ऋतुपर्ण के पास जाने और रूप लौटाने वाले दिव्य वस्त्र दिए।

बाहुक के रूप में अयोध्या में नल

नाग के अन्तर्धान होने पर नल दसवें दिन अयोध्या पहुँचे और राजा ऋतुपर्ण से बोले, “मेरा नाम बाहुक है। अश्व-संचालन में संसार में मेरा कोई जोड़ नहीं; पाक-कला में भी मैं निपुण हूँ। आप मुझे रखिए।” ऋतुपर्ण ने प्रसन्न होकर उन्हें दस सहस्र मुद्रा वेतन पर अपनी अश्वशाला का अधीक्षक बना लिया, और वार्ष्णेय तथा जीवल को उनके अधीन कर दिया। (वही वार्ष्णेय, जो दमयन्ती के बच्चों को विदर्भ छोड़कर अयोध्या आ गया था।)

बहुक बने नल अश्वशाला में घोड़े को सहलाते हुए दमयन्ती की स्मृति में खोए, पीछे राजा ऋतुपर्ण।

वहाँ रहते हुए नल हर सन्ध्या एक श्लोक दोहराते, “भूख-प्यास से व्याकुल, थकी हुई वह अबला कहाँ होगी, उस अभागे को स्मरण करती हुई? अब वह किसकी सेवा करती होगी?” एक रात जीवल ने पूछा, “हे बाहुक, आप किसके लिए नित्य विलाप करते हैं?” नल ने अपनी पहचान छिपाते हुए तीसरे पुरुष में कहा, “एक मूर्ख का एक प्रसिद्ध पत्नी थी। वह वचन का झूठा निकला। किसी कारण वह उससे बिछुड़ गया, और अब दिन-रात शोक में जलता उसे स्मरण करता है। संकट में पत्नी उसके साथ वन में गई थी, पर उस अल्पगुण पुरुष ने उसे छोड़ दिया।” इस प्रकार दमयन्ती को स्मरण करते हुए नल अज्ञात रूप में वहीं रहने लगे।

सार: नल ‘बाहुक’ बनकर अयोध्या में राजा ऋतुपर्ण की अश्वशाला के अधीक्षक बने और प्रतिदिन गुप्त रूप से दमयन्ती को स्मरण कर विलाप करते रहे।

सुदेव की खोज और दमयन्ती की पहचान

उधर राजा भीम ने नल और दमयन्ती की खोज में अनेक ब्राह्मणों को प्रचुर धन देकर सब दिशाओं में भेजा, यह घोषणा करके कि जो उन्हें ढूँढ़ लाएगा उसे सहस्र गौएँ और एक गाँव मिलेगा। खोजते-खोजते सुदेव नामक एक ब्राह्मण चेदि-नगरी पहुँचा और उसने राजमहल में सुनन्दा के साथ बैठी दमयन्ती को देखा। धूलि से ढकी होने पर भी उसका सौन्दर्य धुएँ से ढकी अग्नि-सा झलक रहा था। अनेक चिह्नों से सुदेव ने उसे दमयन्ती जान लिया।

सुदेव ने पास जाकर कहा, “हे विदर्भकुमारी, मैं सुदेव हूँ, आपके भाई का मित्र, राजा भीम की इच्छा से आपको खोजने आया हूँ। आपके माता-पिता, भाई, पुत्र और पुत्री सब कुशल से हैं।” सुदेव को पहचानकर दमयन्ती फूट-फूटकर रोने लगी। उसे एकान्त में रोते देख सुनन्दा ने राजमाता को बताया।

राजमाता ने आकर सुदेव से पूरा वृत्तान्त पूछा। सुदेव ने बताया कि यह विदर्भराज भीम की पुत्री दमयन्ती है, निषध-नरेश नल की पत्नी, जो जुए में राज्य हारकर पति के साथ निकली थी। फिर उसने एक निर्णायक चिह्न बताया, “इसकी दोनों भौंहों के बीच जन्म से एक कमल-सा तिल है, जो अभी धूलि से ढका है।” सुनन्दा ने उस स्थान की धूलि धोई, और मेघों से निकले चन्द्रमा-सा वह तिल चमक उठा। तिल देखकर सुनन्दा और राजमाता रो पड़ीं और दमयन्ती को गले लगा लिया।

राजमाता ने आँसुओं में कहा, “इस तिल से जान गई कि आप मेरी बहन की पुत्री हैं। आपकी माता और मैं दोनों दशार्ण-नरेश सुदामा की पुत्रियाँ हैं; आपकी माता का विवाह राजा भीम से हुआ, और मेरा वीरबाहु से। आपका जन्म मैंने पिता के महल में देखा था।” दमयन्ती ने अपनी मौसी को प्रणाम किया और कहा कि अब वह अपने पुत्र-पुत्री के पास विदर्भ जाना चाहती है। राजमाता ने हर्ष से उसे पालकी, रक्षक और सब सामग्री देकर ससम्मान विदर्भ भिजवाया। वहाँ माता-पिता और सब स्वजनों ने उसका आदर किया, और प्रसन्न राजा भीम ने सुदेव को सहस्र गौएँ, धन और एक गाँव दिया।

सार: राजा भीम के भेजे ब्राह्मण सुदेव ने भौंहों के बीच के जन्मजात तिल से दमयन्ती को पहचाना; पता चला कि चेदि की राजमाता उसकी मौसी हैं, और दमयन्ती ससम्मान अपने मायके विदर्भ लौट आई।

दमयन्ती की युक्ति: श्लोक, और दूसरा झूठा स्वयंवर

विदर्भ लौटकर दमयन्ती ने माता से कहा, “यदि मेरा जीवन चाहती हो, तो नल को खोजने का प्रयत्न करो।” राजा भीम ने फिर ब्राह्मणों को भेजा, और दमयन्ती ने उन्हें एक विशेष सन्देश सिखाया, जिसे वे हर सभा में गाएँ, “हे प्रिय जुआरी, मेरे वस्त्र का आधा भाग काटकर, सोई हुई अपनी अनुरक्त पत्नी को वन में छोड़कर आप कहाँ चले गए? आपकी आज्ञा के अनुसार वह आधे वस्त्र में आपकी प्रतीक्षा कर रही है। हे वीर, आप तो धर्मज्ञ हैं; फिर इतने निर्मम क्यों हुए?” दमयन्ती ने कहा कि जो भी इसका उत्तर दे, उसका पूरा परिचय और निवास जानकर लौट आना।

बहुत समय बाद पर्णाद नामक ब्राह्मण लौटा और बोला, “हे दमयन्ती, मैं अयोध्या में ऋतुपर्ण के समक्ष यह सन्देश दोहराता रहा, पर न राजा ने, न किसी सभासद ने उत्तर दिया। पर बाद में ऋतुपर्ण के सेवक बाहुक ने, जो छोटी भुजाओं वाला कुरूप सारथी है पर अश्व और पाक-कला में निपुण है, बार-बार आहें भरते और रोते हुए कहा कि पतिव्रता स्त्री विपत्ति में भी क्रोध नहीं करती; जो पति विपत्ति, भूख और दुर्भाग्य से घिरकर, पक्षियों द्वारा वस्त्र छिने जाने पर विवश हुआ हो, उस पर पत्नी को रुष्ट नहीं होना चाहिए।”

यह सुनते ही दमयन्ती समझ गई। उसने माता से एकान्त में कहा कि राजा भीम को इसकी भनक न लगे, और सुदेव को फिर अयोध्या भेजा जाए। सुदेव को उसने यह कहकर भेजा कि वह ऋतुपर्ण से कहे, “विदर्भराज भीम की पुत्री दमयन्ती दूसरा स्वयंवर रचा रही है; कल सूर्योदय के पश्चात् वह दूसरा पति चुनेगी, क्योंकि उसे नहीं पता कि नल जीवित हैं या नहीं। सब राजा वहाँ जा रहे हैं।” यह एक युक्ति थी, क्योंकि केवल नल ही एक दिन में सौ योजन का मार्ग पार कर सकते थे।

समझने की कुंजी (योजन और सौ योजन की परीक्षा): “योजन” प्राचीन दूरी-मान है, मोटे तौर पर कुछ किलोमीटर के बराबर। “एक दिन में सौ योजन” अर्थात् सैकड़ों किलोमीटर, जो असाधारण अश्व-कौशल के बिना असम्भव था। दमयन्ती जानती थी कि केवल नल ही यह कर सकते हैं; इसलिए “दूसरा स्वयंवर” वस्तुतः नल को पहचानने का जाल था, न कि सचमुच दूसरा विवाह।

सार: दमयन्ती के सिखाए श्लोक का उत्तर बाहुक (छिपे नल) ने दिया; इससे संकेत पाकर दमयन्ती ने अगले दिन के झूठे दूसरे स्वयंवर की युक्ति रची, यह जानते हुए कि केवल नल ही एक दिन में सौ योजन पार कर सकते हैं।

सौ योजन की यात्रा: विद्या का आदान-प्रदान और कलि का निर्गमन

सुदेव का सन्देश सुनकर ऋतुपर्ण ने बाहुक से कहा, “आप अश्व-विद्या में निपुण हैं। यदि सम्भव हो तो एक ही दिन में मुझे दमयन्ती के स्वयंवर तक पहुँचा दीजिए।” यह सुनकर नल का हृदय शोक से फट-सा गया। वे सोचने लगे, “क्या दमयन्ती सचमुच दूसरा वर चुनेगी, या यह मेरे ही लिए कोई युक्ति है? मेरा अपराध भी तो बड़ा रहा। जो भी हो, वहाँ जाकर निश्चय कर लूँगा।” यह सोचकर उन्होंने ऋतुपर्ण की आज्ञा स्वीकार की।

नल ने अश्वशाला में दुबले-पतले पर बलवान, शुभ-लक्षणों वाले, सिन्धु देश में जन्मे और वायु-वेगी चार उत्तम घोड़े चुने। पहले तो ऋतुपर्ण को संदेह हुआ कि ये दुबले घोड़े इतना लम्बा मार्ग कैसे तय करेंगे, पर नल ने उनके लक्षण समझाकर उन्हें रथ में जोता। रथ पर चढ़ते ही घोड़े पहले घुटनों के बल बैठ गए, फिर नल के सान्त्वना देने पर उठकर आकाश में उड़ चले। वार्ष्णेय यह कौशल देख चकित रह गया और मन ही मन सोचने लगा, “कहीं यह स्वयं नल तो नहीं? बाहुक का ज्ञान तो नल के तुल्य है।”

द्रुत रथ पर राजा ऋतुपर्ण वृक्ष के पत्ते-फल गिनने की विद्या दिखाते हुए, सारथी बहुक हाथ बढ़ाए।

मार्ग में ऋतुपर्ण का उत्तरीय वस्त्र गिर गया। उन्होंने उसे उठवाना चाहा, पर नल ने कहा कि हम एक योजन आगे आ चुके हैं, अब वह नहीं मिलेगा। आगे फलों से लदे एक विभीतक वृक्ष को देख ऋतुपर्ण ने कहा, “हे बाहुक, मेरी गणना-विद्या देखिए: इस वृक्ष की दो शाखाओं पर पाँच करोड़ पत्ते और दो हजार पंचानबे (2095) फल हैं; जो भूमि पर गिरे हैं, वे ऊपर के पत्तों-फलों से एक सौ एक अधिक हैं।”

नल को विश्वास न हुआ। उन्होंने रथ रोककर वह शाखा काट गिनी, और गिनती ठीक वही निकली जो राजा ने कही थी। चकित होकर नल ने कहा, “यह विद्या मुझे सिखाइए।” ऋतुपर्ण ने कहा, “मैं संख्या-विद्या के साथ पासों की विद्या में भी निपुण हूँ।” नल बोले, “तो यह विद्या मुझे दीजिए और बदले में मेरी अश्व-विद्या ले लीजिए।” समय की आवश्यकता और अश्व-विद्या के लोभ से ऋतुपर्ण ने “तथास्तु” कहकर पासों की विद्या नल को दे दी।

नल के शरीर से निकला कलि सर्पों में जकड़ा वृक्ष के पास छटपटाता हुआ, रथ आगे बढ़ता।

पासों की विद्या पाते ही नल के भीतर से कलि निकल पड़ा, मुख से कर्कोटक का विष उगलता हुआ। दमयन्ती के शाप से जलते कलि से अब वह शाप-अग्नि भी हट गई। क्रुद्ध नल कलि को शाप देने को उद्यत हुए, पर भयभीत कलि ने हाथ जोड़कर कहा, “क्रोध रोकिए, राजन्। इन्द्रसेन की माता (दमयन्ती) के शाप से मैं इतने काल तक आपके भीतर विष में जलता रहा। मुझ शरणागत को शाप मत दीजिए; जो लोग आपकी यह कथा ध्यान से सुनेंगे, वे मेरे भय से मुक्त रहेंगे।” यह सुनकर नल ने क्रोध रोक लिया, और कलि उसी विभीतक वृक्ष में प्रवेश कर गया। उसी क्षण से वह विभीतक वृक्ष अपवित्र माना गया।

कलि से मुक्त, हर्ष से भरे नल ने रथ को विदर्भ की ओर तीव्र वेग से दौड़ाया। पर अपना यथार्थ रूप उन्होंने अभी नहीं धरा; वे अब भी बाहुक ही थे।

एक उप-कथा: यह प्रसंग कथा की एक गहरी विडम्बना खोलता है: नल का पतन पासों के कारण हुआ था, और उनका उद्धार भी पासों की उसी विद्या से होता है, जो उन्हें ऋतुपर्ण से मिलती है। जिस कला में दुर्बलता थी, उसी में निपुणता पाकर वे कलि के बन्धन से मुक्त होते हैं। बुराई को जड़ से समझ लेना ही उससे मुक्ति का मार्ग बनता है।

सार: सौ योजन की यात्रा में नल और ऋतुपर्ण ने अश्व-विद्या तथा पासों की विद्या का आदान-प्रदान किया; पासों की विद्या पाते ही नल के भीतर से कलि निकल गया, और नल बाहुक-रूप में ही विदर्भ की ओर बढ़े।

कुण्डिन में रथ की घड़घड़ाहट और दमयन्ती की परीक्षा

सन्ध्या को ऋतुपर्ण कुण्डिन पहुँचे। उनके रथ की घड़घड़ाहट दसों दिशाओं में गूँज उठी। नल के पुराने घोड़े वह ध्वनि सुनकर ऐसे हर्षित हुए मानो स्वयं नल आ गए हों। दमयन्ती को भी वह मेघ-गर्जन सी ध्वनि नल के रथ की-सी लगी। महल के मोर, हाथी और घोड़े उस ध्वनि की ओर मुँह करके हर्ष से बोल उठे।

झरोखे में खड़ी दमयन्ती रथ की परिचित गड़गड़ाहट पहचानकर संध्या में आते रथ को देखती हुई।

दमयन्ती बोल उठी, “इस रथ की घड़घड़ाहट से मेरा हृदय हर्षित हो रहा है; अवश्य ही नल आए हैं। यदि आज मैं चन्द्रमुख नल को न देख पाई, तो जीवित न रहूँगी।” वह छत पर चढ़ी, पर वहाँ रथ पर ऋतुपर्ण, वार्ष्णेय और बाहुक को देखा, नल को नहीं। उसने सोचा, “क्या वार्ष्णेय ने नल से यह कला सीखी है, या ऋतुपर्ण भी नल के समान निपुण हैं?”

राजा भीम ने ऋतुपर्ण का आदर-सत्कार किया, पर ऋतुपर्ण ने कहीं स्वयंवर के चिह्न न देखे, न राजाओं का जमावड़ा। चकित होकर वे केवल इतना बोले कि “मैं आपको प्रणाम करने आया हूँ।” भीम को आश्चर्य हुआ कि सौ योजन पार करके कोई केवल प्रणाम करने क्यों आएगा, पर उन्होंने ऋतुपर्ण को विश्राम-कक्ष में ठहरा दिया।

उधर बाहुक रथ को अश्वशाला ले गए, घोड़ों को सुलझाया, और रथ के पास बैठ गए। दमयन्ती ने अपनी सखी केशिनी को भेजा, “जाओ, उस कुरूप, छोटी भुजाओं वाले सारथी से कुशल पूछकर पर्णाद वाले वही वचन कहना, और उसका उत्तर ध्यान से सुनना।” केशिनी ने जाकर वही श्लोक सुनाया।

सुनते ही नल के नेत्र आँसुओं से भर आए। शोक रोककर उन्होंने वही उत्तर दोहराया कि पतिव्रता स्त्री विपत्ति में पति पर रुष्ट नहीं होती, क्योंकि वह विवश और दुर्भाग्य से घिरा था। केशिनी ने लौटकर दमयन्ती को सब कह सुनाया।

सार: रथ की ध्वनि से दमयन्ती को नल के आगमन का आभास हुआ, पर रथ पर बाहुक को देख वह दुविधा में पड़ी; सखी केशिनी द्वारा भेजे श्लोक का उत्तर सुनकर उसका संदेह और गहरा हुआ।

बाहुक के चमत्कार और बच्चों का स्पर्श

दमयन्ती ने केशिनी को फिर भेजा, “उसके आचरण को चुपचाप देखो; जब वह आग या जल माँगे तो देने में विलम्ब करना, और जो कुछ मानवीय या अमानवीय देखो, सब बताना।” केशिनी ने लौटकर अचरज भरे चमत्कार सुनाए, “ऐसा संयमी पुरुष मैंने न देखा न सुना। नीचे झुकता नहीं, द्वार स्वयं ऊँचे हो जाते हैं; सँकरे छिद्र चौड़े हो जाते हैं। खाली पात्र उसकी दृष्टि पड़ते ही जल से भर जाते हैं। मुट्ठी भर घास धूप में रखते ही आग जल उठती है; वह आग छूता है पर जलता नहीं। फूलों को हाथ से दबाने पर वे कुम्हलाते नहीं, उल्टे और खिल उठते हैं।”

बहुक बने नल अपने दोनों बच्चों को रोते हुए हृदय से लगाते, पास बैठी स्त्री देखती हुई।

ये चिह्न सुनकर दमयन्ती ने बाहुक को नल मान लिया। उसने केशिनी से बाहुक का बनाया हुआ कुछ माँस मँगवाया। नल के हाथ का बना माँस पहले अनेक बार चख चुकी दमयन्ती ने स्वाद से ही पहचान लिया कि यह नल ही हैं, और रोने लगी। फिर उसने अपने दोनों बच्चों, इन्द्रसेन और इन्द्रसेना को केशिनी के साथ बाहुक के पास भेजा। बच्चों को पहचानते ही नल दौड़कर उन्हें गोद में उठाकर ऊँचे स्वर में रो पड़े। फिर सहसा बच्चों को छोड़कर, अपनी व्याकुलता छिपाते हुए केशिनी से बोले, “ये जुड़वाँ मेरे अपने बच्चों जैसे हैं, इन्हें देख मेरी आँखें भर आईं। आप बार-बार मेरे पास आएँगी तो लोग कुछ और समझेंगे, क्योंकि हम परदेशी अतिथि हैं।”

सार: केशिनी द्वारा देखे गए अनेक चमत्कारों और नल के हाथ के बने माँस के स्वाद से दमयन्ती ने बाहुक को नल पहचान लिया; बच्चों को देख नल भावुक होकर रो पड़े, पर अपनी पहचान दबाए रखी।

पुनर्मिलन: रूप का लौटना और वायुदेव की साक्षी

कुबड़े बहुक रूप में छिपे नल से महल में दमयन्ती प्रश्न करती हुई।

दमयन्ती ने माता के द्वारा माता-पिता दोनों की अनुमति लेकर बाहुक को अपने कक्ष में बुलवाया। नल को अचानक सामने देख वह शोक में बोली, “हे बाहुक, क्या आपने कभी किसी धर्मज्ञ पुरुष को सुना है जो अपनी सोई पत्नी को वन में छोड़कर चला गया हो? धर्मात्मा नल के अतिरिक्त ऐसा कौन कर सकता था, जो अपनी निर्दोष, थकी पत्नी को वन में छोड़ जाए? अग्नि और देवताओं के समक्ष जिसने मेरा हाथ थामकर ‘मैं आपका हूँ’ कहा था, वह व्रत कहाँ गया?” यह कहते उसकी आँखों से अश्रुधारा बह चली।

नल भी आँसू बहाते हुए बोले, “हे भीरु, न राज्य की हानि मेरा कर्म थी, न आपका परित्याग; ये दोनों कलि के कारण हुए। आपने वन में जिस कलि को शाप दिया था, वह आपके शाप से जलता हुआ मेरे भीतर अग्नि के भीतर अग्नि की भाँति बसा रहा। अपनी साधना से मैंने उस दुष्ट को परास्त किया; वह मुझे छोड़ चुका है, और इसीलिए मैं यहाँ आया हूँ, केवल आपके लिए। पर हे भीरु, क्या कोई और स्त्री अपने अनुरक्त पति को छोड़कर आपकी भाँति दूसरा वर चुनेगी? राजा की आज्ञा से दूत यही घोषणा करते फिरे कि भीम-पुत्री दूसरा वर चुनेगी, और यही सुनकर ऋतुपर्ण-पुत्र यहाँ आ पहुँचे।”

दमयन्ती काँपते हुए हाथ जोड़कर बोली, “हे आर्य, मुझ में दोष मत खोजिए। देवताओं को छोड़कर मैंने आपको ही चुना था। आपको ही यहाँ लाने को ब्राह्मण सब दिशाओं में मेरे वचन गाते फिरे, और पर्णाद ने आपको कोसल में पाया। केवल आप ही एक दिन में सौ योजन पार कर सकते थे, इसी से मैंने यह युक्ति रची। आपके चरण छूकर सत्य कहती हूँ कि मैंने मन से भी कोई पाप नहीं किया। यदि किया हो तो यह सर्वसाक्षी वायु मेरे प्राण हर ले, यह सूर्य, यह चन्द्रमा मेरे प्राण हर लें।”

तभी आकाश से वायुदेव बोले, “हे नल, मैं सत्य कहता हूँ, इसने कोई पाप नहीं किया। दमयन्ती ने अपने कुल की मर्यादा की रक्षा करके उसे और ऊँचा किया है। तीन वर्ष से हम इसके रक्षक रहे हैं, हम साक्षी हैं। आपके ही लिए इसने यह अनुपम युक्ति रची, क्योंकि आपके अतिरिक्त कोई एक दिन में सौ योजन नहीं चल सकता। अब आप अपनी सहचरी से मिल जाइए।” वायुदेव के कहते ही वहाँ पुष्पवर्षा हुई, दिव्य दुन्दुभि बज उठी और मंगल-समीर बहने लगा।

तब नल ने सब संदेह त्यागकर, नागराज कर्कोटक को स्मरण करके वह दिव्य वस्त्र धारण किया और अपना यथार्थ रूप पा लिया। अपने धर्मात्मा पति को उसके असली रूप में देख दमयन्ती उससे लिपटकर रो पड़ी, और नल ने भी पत्नी और बच्चों को गले लगाकर परम हर्ष अनुभव किया। राजा भीम को राजमाता ने सब समाचार दिया। राज्य खोने के चौथे वर्ष में नल अपनी पत्नी से पुनः मिले और सब इच्छाएँ पूरी होने पर परम सुख पाया, जैसे सूखे खेत वर्षा पाकर हरे हो उठते हैं।

सार: दमयन्ती के सतीत्व की वायुदेव ने आकाश से साक्षी दी; नल ने कर्कोटक का दिया दिव्य वस्त्र पहनकर अपना असली रूप पाया, और राज्य खोने के चौथे वर्ष पति-पत्नी का पुनर्मिलन हुआ।

पुष्कर से अन्तिम दाँव और राज्य की पुनःप्राप्ति

एक मास विदर्भ में रहकर नल थोड़ी-सी सेना, एक श्वेत रथ, सोलह हाथी, पचास घोड़े और छह सौ पैदल सैनिकों के साथ निषध लौटे। पुष्कर के पास जाकर बोले, “हम फिर खेलेंगे। मैंने बहुत धन कमाया है। दमयन्ती और मेरा सब कुछ मेरा दाँव, और आपका राज्य आपका दाँव। या यदि पासे नहीं, तो आइए अस्त्रों से एक ही द्वन्द्व-युद्ध में निपटारा कर लें। दोनों में से एक चुन लीजिए।”

पुष्कर ने अपनी जीत के अहंकार में हँसते हुए कहा, “अच्छा हुआ कि आप फिर दाँव लगाने योग्य धन ले आए। आज दमयन्ती को जीतकर मैं उसे अप्सरा की भाँति अपने पास रखूँगा; वही तो मेरे हृदय में बसी है।” यह अनर्गल वाणी सुनकर नल का क्रोध भड़का, पर उन्होंने संयम रखकर कहा, “खेलिए; जीतकर जो चाहें कहिए।”

द्यूत में राज्य पुनः जीते नल सिंहासन से झुके पुष्कर की ओर क्षमा का हाथ बढ़ाते, संग दमयन्ती।

खेल आरम्भ हुआ, और नल ने एक ही दाँव में अपना समस्त धन, राज्य, और दाँव पर लगे पुष्कर के प्राण तक जीत लिए। तब मुसकराते हुए नल ने कहा, “यह निष्कण्टक राज्य अब निर्विघ्न मेरा है। आप अब दमयन्ती की ओर देख भी नहीं सकते; अपने कुल सहित आप अब उसके दास के समान हैं। पर मेरी पहली हार आपका दोष न थी, वह सब कलि का किया था; इसलिए मैं आप पर दूसरे के दोष नहीं मढ़ता। मैं आपको प्राण और आपका पैतृक भाग देता हूँ। आपके प्रति मेरा भ्रातृ-प्रेम पहले जैसा ही है। हे भाई, सौ वर्ष जिएँ।”

नल ने पुष्कर को गले लगाकर उसकी नगरी जाने की अनुमति दी। पुष्कर ने हाथ जोड़कर कहा, “हे राजन्, आपने मुझे प्राण और शरण दोनों दिए; आपका यश अमर हो, आप दस सहस्र वर्ष सुखी रहें।” एक मास नल के यहाँ रहकर पुष्कर हर्षित हृदय से अपनी नगरी लौट गया।

एक उप-कथा: यहाँ कथा एक दुर्लभ उदारता दिखाती है। नल जुए में अपना सब कुछ हार चुके थे, फिर भी जीतने पर वे पुष्कर के प्राण और भाग दोनों लौटा देते हैं और कहते हैं कि असली अपराधी कलि था, पुष्कर नहीं। प्रतिशोध के स्थान पर क्षमा का यह क्षण नल के चरित्र को पतन के बाद और ऊँचा उठा देता है।

सार: लौटकर नल ने पुष्कर को फिर दाँव की चुनौती दी और एक ही दाँव में राज्य और धन पुनः जीत लिया, पर पुष्कर को प्राण, पैतृक भाग और क्षमा देकर भ्रातृ-प्रेम बनाए रखा।

कथा का फल और युधिष्ठिर के लिए सान्त्वना

राज्य पुनः पाकर नल ने सज्जित महल में प्रवेश किया; प्रजा हर्ष से रोमांचित हो उठी। फिर बड़ी सेना के साथ नल विदर्भ से दमयन्ती को, पुत्र-पुत्री सहित, ससम्मान ले आए। राजा भीम ने भी अपनी पुत्री को आदरपूर्वक विदा किया। जम्बूद्वीप के राजाओं में विख्यात होकर नल पुनः धर्मपूर्वक शासन करने और प्रचुर दान-यज्ञ करने लगे।

कथा समाप्त कर बृहदश्व ने युधिष्ठिर से कहा, “हे महाराज, इस प्रकार राजा नल पत्नी सहित पासों के कारण घोर विपत्ति में पड़े, और फिर सब कुछ पुनः पा लिया। पर वे तो बिलकुल अकेले थे, और आप अपने वीर भाइयों, द्रौपदी और वेदज्ञ ब्राह्मणों के साथ हैं। इसलिए आपको शोक करना उचित नहीं। मनुष्य का प्रयत्न और भाग्य दोनों अनिश्चित हैं; इसे समझकर सम्पत्ति या विपत्ति में न अति हर्ष करना चाहिए, न अति शोक। जो इस कथा को सुनेगा या सुनाएगा, उसे विपत्ति नहीं छुएगी, और कलि का भय भी उससे दूर रहेगा।”

फिर मुनि ने कहा, “और हे कुन्तीपुत्र, जिस भय से आप व्यथित हैं कि कोई पासों में निपुण व्यक्ति फिर आपको चुनौती दे सकता है, वह भय भी मैं दूर करता हूँ। मैं पासों की समूची विद्या जानता हूँ; प्रसन्न होकर वह विद्या मैं आपको देता हूँ।” युधिष्ठिर ने हर्ष से वह विद्या ग्रहण की, और बृहदश्व हयशीर्ष के पवित्र जल में स्नान करने चले गए।

उनके जाने के पश्चात् युधिष्ठिर ने तीर्थयात्रियों और तपस्वियों से सुना कि उनका प्रिय भाई अर्जुन वायु पर निर्वाह करते हुए घोर तपस्या में लीन है। यह सुनकर शोकग्रस्त युधिष्ठिर उस विशाल वन में, अपने साथ रहने वाले ज्ञानी ब्राह्मणों के संग, सान्त्वना खोजते हुए वार्तालाप करने लगे।

समझने की कुंजी (कथा का प्रयोजन): यह कथा युधिष्ठिर के लिए दोहरी औषधि है। एक ओर यह सान्त्वना देती है कि नल भी सर्वस्व हारकर अकेले भटके और फिर सब पा गए; दूसरी ओर बृहदश्व अन्त में युधिष्ठिर को पासों की विद्या देकर उनका वह विशेष भय भी मिटाते हैं कि कोई फिर उन्हें जुए में हरा देगा। कथा और वर, दोनों मिलकर युधिष्ठिर को आगे बढ़ने का बल देते हैं।

सार: नल ने दमयन्ती और राज्य पुनः पाकर धर्मपूर्वक शासन किया; बृहदश्व ने युधिष्ठिर को इस कथा से सान्त्वना देकर पासों की विद्या भी प्रदान की, जिससे उनका जुए का भय दूर हुआ।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), वन पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।