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अध्याय 16: दैवासुर संपद् विभाग योग

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अध्याय 16: दैवासुर संपद् विभाग योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 16: दैवासुर संपद् विभाग योग

गीता अब अपने आख़िरी मोड़ों की ओर बढ़ रही है। कुरुक्षेत्र की धूल अभी बैठी नहीं है, पर अर्जुन के भीतर का तूफ़ान थमने लगा है। ऐसे में श्रीकृष्ण एक ऐसा दर्पण उनके सामने रख देते हैं जिसमें हर मनुष्य अपना असली चेहरा देख सकता है। यह अध्याय बाहरी शत्रुओं की बात नहीं करता। यह भीतर की दो प्रवृत्तियों की बात करता है, दैवी और आसुरी, जो हर हृदय में साथ-साथ बसती हैं।

दो स्वभाव, एक हृदय

श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस संसार में प्राणियों की रचना दो ढंग की हुई है। एक वह जो भीतर के प्रकाश को बढ़ाता है, और दूसरा वह जो अँधेरे को गाढ़ा करता है। इन्हें उन्होंने दैवी संपदा और आसुरी संपदा कहा। यह कोई जन्म की मुहर नहीं, न किसी कुल का ठप्पा। यह तो रोज़ के छोटे-छोटे चुनावों से बनने वाला स्वभाव है। कोई मनुष्य पूरी तरह देवता नहीं होता, न कोई पूरी तरह असुर। दोनों बीज हर छाती में पड़े रहते हैं, और जिसे हम सींचते हैं वही पनपता है।

दैवी संपदा के लक्षण

फिर वे उन गुणों की एक लंबी माला पिरोते हैं जो देवत्व की ओर ले जाती है। निर्भयता, अंतःकरण की स्वच्छता, और ज्ञान तथा योग में दृढ़ता। दान देने का खुला हाथ, इंद्रियों पर संयम, यज्ञ, स्वाध्याय और तप। सरलता, अहिंसा, सत्य और क्रोध का न होना। त्याग, भीतरी शांति, और किसी की चुगली न करने की टेक। प्राणियों पर दया, लोभ से मुक्ति, कोमलता, और अनुचित के सामने झुक जाने वाली लज्जा। चंचलता का अभाव, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, किसी से द्रोह न रखना, और अपने बड़प्पन का अभिमान न पालना।

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे भारत, ये सारे लक्षण उस मनुष्य में उगते हैं जो दैवी संपदा लेकर चलता है। ध्यान देने की बात यह है कि ये सब एक साथ किसी में उतर नहीं आते। हर गुण अपने आप में एक अभ्यास है, एक-एक करके सींचने की चीज़। आज निर्भयता का एक कदम, कल क्षमा का एक घूँट, परसों किसी की चुगली को होंठों पर आने से रोक लेना, यों ही भीतर का दीया धीरे-धीरे बड़ा होता जाता है। कोई इन्हें एक झटके में नहीं पा लेता, पर हर छोटा प्रयास इसी माला में एक और मनका जोड़ देता है।

इस सूची में एक बात छिपी है जिसे चूकना नहीं चाहिए। ये गुण किसी मंदिर या तीर्थ के नहीं, रोज़मर्रा के बरताव के हैं। कैसे बोलते हैं, किसका बोझ उठाते हैं, ग़ुस्से में क्या करते हैं, दूसरों की भूल पर कितना झुक जाते हैं। श्रीकृष्ण देवत्व को आकाश से उतारकर हमारी दिनचर्या में रख देते हैं। दैवी संपदा मुक्ति की ओर ले जाती है, वह मनुष्य को हल्का करती जाती है, जबकि आसुरी संपदा एक के बाद एक बंधन कसती है। इसीलिए वे अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि आप दैवी स्वभाव लेकर जन्मे हैं, इस भार से घबराने की कोई बात नहीं।

आसुरी वृत्ति की पहचान

अब वे दूसरी ओर मुड़ते हैं। आसुरी स्वभाव के लक्षण गिनती में थोड़े हैं, पर गहरे हैं। दिखावा, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी और अज्ञान। ये गुण मनुष्य को खोलते नहीं, बाँध देते हैं। जहाँ दैवी संपदा मुक्ति की ओर ले जाती है, वहीं आसुरी वृत्ति एक के बाद एक जंजीर पहनाती चली जाती है।

फिर श्रीकृष्ण आसुरी मन की पूरी दुनिया का नक्शा खींचते हैं, और वह नक्शा आज भी उतना ही पहचाना हुआ लगता है। ऐसा मनुष्य कहता है कि यह जगत असत्य है, इसका कोई आधार नहीं, कोई ईश्वर इसे चला नहीं रहा, यह तो बस काम और वासना के मेल से पैदा हुआ है, और इससे आगे कुछ नहीं। इसी सोच के सहारे वह अतृप्त इच्छाओं से भरा, दंभ और मद में डूबा, गलत को कसकर पकड़े हुए चलता रहता है।

उसके भीतर का राग सुनिए, ‘आज मैंने यह पा लिया, कल वह इच्छा भी पूरी कर लूँगा। यह धन मेरा है, वह भी मेरा हो जाएगा। यह शत्रु मैंने मार गिराया, बाक़ी को भी निपटा दूँगा। मैं ही स्वामी हूँ, मैं ही भोगने वाला, मैं ही सिद्ध, बलवान और सुखी हूँ।’ ऐसा मनुष्य यज्ञ भी करता है तो केवल नाम के लिए, दिखावे के लिए, बिना किसी सच्ची श्रद्धा के।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा मन सैकड़ों आशाओं की डोरियों में बँधा रहता है। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी सिर उठा लेती है, और वह भोग तथा संग्रह को ही जीवन का अंत मान बैठता है। भोग की चाह में वह न्याय-अन्याय का भेद भूल जाता है, धन इकट्ठा करने के लिए किसी भी रास्ते पर उतर आता है, और अपने ही धन, कुल और बल के मद में डूबा रहता है। अपने अहंकार के इसी बोझ के नीचे वह बार-बार गिरता चला जाता है, और जन्म-दर-जन्म उस प्रकाश से दूर होता रहता है जिसकी ओर दैवी स्वभाव सहज ही खिंचा जाता है। यही आसुरी वृत्ति का सबसे बड़ा दंड है, प्रकाश पास होकर भी दिखाई न देना।

नरक के तीन द्वार

और तब श्रीकृष्ण इस पूरी बात को एक तीखी चेतावनी में समेट देते हैं। इस सारे पतन की जड़ में तीन चीज़ें बैठी हैं, और वे तीनों नरक के दरवाज़े हैं।

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

अर्थ यह कि नरक के तीन द्वार हैं, जो आत्मा का नाश कर देते हैं, काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को छोड़ देना चाहिए। यह इस अध्याय का सबसे याद रखने योग्य वचन है, गीता 16.21 का। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो मनुष्य इन तीन अँधेरे दरवाज़ों से निकल आता है, वही अपना सच्चा कल्याण करता है और सर्वोच्च गति की ओर बढ़ता है।

आख़िर में वे एक कसौटी भी थमा देते हैं। जब यह समझ में न आए कि क्या करना है और क्या नहीं, तब अपनी इच्छा को नहीं, शास्त्र को प्रमाण मानिए। जो कर्तव्य शास्त्र दिखाता है, उसी राह पर पैर रखिए। यही दैवी स्वभाव की ओर लौटने का सीधा रास्ता है।

सोलहवें अध्याय का संदेश सीधा है। हमारे भीतर रोज़ एक चुनाव होता है, प्रकाश बढ़ाएँ या अँधेरा। न कोई पूरी तरह देवता है, न कोई पूरा असुर, यह फ़ैसला हर सुबह नए सिरे से करना पड़ता है। और यह जान लेना कि तीन दरवाज़े कहाँ खुलते हैं, आधी लड़ाई वहीं जीत लेने जैसा है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 24 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/16/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

16.1अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः

श्रीभगवानुवाच

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥1॥

abhayaṃ sattvasaṃśuddhir jñānayogavyavasthitiḥ |
dānaṃ damaś ca yajñaś ca svādhyāyas tapa ārjavam

अभयम्
निर्भयता
सत्त्वसंशुद्धिः
अन्तःकरण की पूर्ण शुद्धि
ज्ञानयोगव्यवस्थितिः
ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति
दानम्
दान
दमः
इन्द्रियों का दमन
च
और
यज्ञः
यज्ञ
च
और
स्वाध्यायः
शास्त्रों का अध्ययन
तपः
तप
आर्जवम्
सरलता

अन्वय: अभयम् सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः दानम् दमः च यज्ञः च स्वाध्यायः तपः आर्जवम्।

श्रीभगवान् बोले: निर्भयता, अन्तःकरण की पूर्ण शुद्धि, ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति, दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता।

16.2अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥2॥

ahiṃsā satyam akrodhas tyāgaḥ śāntir apaiśunam |
dayā bhūteṣv aloluptvaṃ mārdavaṃ hrīr acāpalam

अहिंसा
किसी को न दुखाना
सत्यम्
सत्य
अक्रोधः
क्रोध का अभाव
त्यागः
त्याग
शान्तिः
शान्ति
अपैशुनम्
किसी की निन्दा न करना
दया
दया
भूतेषु
प्राणियों पर
अलोलुप्त्वम्
लोभ का अभाव
मार्दवम्
कोमलता
ह्रीः
लज्जा
अचापलम्
चंचलता का अभाव

अन्वय: अहिंसा सत्यम् अक्रोधः त्यागः शान्तिः अपैशुनम् भूतेषु दया अलोलुप्त्वम् मार्दवम् ह्रीः अचापलम्।

अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, किसी की निन्दा न करना, प्राणियों पर दया, लोभ का अभाव, कोमलता, लज्जा और चंचलता का अभाव।

16.3तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥3॥

tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nātimānitā |
bhavanti saṃpadaṃ daivīm abhijātasya bhārata

तेजः
तेज
क्षमा
क्षमा
धृतिः
धैर्य
शौचम्
शुद्धि
अद्रोहः
द्रोह का अभाव
न
नहीं
अतिमानिता
अपने में पूज्यता का अभिमान
भवन्ति
होते हैं
संपदम्
संपदा को
दैवीम्
दैवी
अभिजातस्य
लेकर जन्मे पुरुष के
भारत
हे भारत

अन्वय: भारत, तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहः अतिमानिता न, दैवीम् संपदम् अभिजातस्य भवन्ति।

तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, किसी से द्रोह न करना और अपने में पूज्यता का अभिमान न होना, हे भारत, ये सब दैवी संपदा को लेकर जन्मे पुरुष के लक्षण होते हैं।

16.4दम्भो दर्पोऽतिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च

दम्भो दर्पोऽतिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥4॥

dambho darpo ’timānaś ca krodhaḥ pāruṣyam eva ca |
ajñānaṃ cābhijātasya pārtha saṃpadam āsurīm

दम्भः
पाखंड
दर्पः
घमंड
अतिमानः
अभिमान
च
और
क्रोधः
क्रोध
पारुष्यम्
कठोरता
एव
भी
च
और
अज्ञानम्
अज्ञान
च
और
अभिजातस्य
लेकर जन्मे पुरुष के
पार्थ
हे पार्थ
संपदम्
संपदा को
आसुरीम्
आसुरी

अन्वय: पार्थ, दम्भः दर्पः अतिमानः च क्रोधः पारुष्यम् एव च अज्ञानम् च आसुरीम् संपदम् अभिजातस्य।

हे पार्थ, पाखंड, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान, ये सब आसुरी संपदा को लेकर जन्मे पुरुष के लक्षण होते हैं।

16.5दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता

दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥5॥

daivī saṃpad vimokṣāya nibandhāyāsurī matā |
mā śucaḥ saṃpadaṃ daivīm abhijāto ’si pāṇḍava

दैवी
दैवी
संपद्
संपदा
विमोक्षाय
मोक्ष के लिए
निबन्धाय
बंधन के लिए
आसुरी
आसुरी
मता
मानी गई है
मा शुचः
शोक न कीजिए
संपदम्
संपदा को
दैवीम्
दैवी
अभिजातः
लेकर जन्मे
असि
हैं
पाण्डव
हे पाण्डव

अन्वय: दैवी संपद् विमोक्षाय, आसुरी निबन्धाय मता। पाण्डव, मा शुचः, दैवीम् संपदम् अभिजातः असि।

दैवी संपदा मोक्ष के लिए और आसुरी संपदा बंधन के लिए मानी गई है। हे पाण्डव, आप शोक न कीजिए, आप दैवी संपदा को लेकर जन्मे हैं।

16.6द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥6॥

dvau bhūtasargau loke ’smin daiva āsura eva ca |
daivo vistaraśaḥ prokta āsuraṃ pārtha me śṛṇu

द्वौ
दो
भूतसर्गौ
प्राणियों की सृष्टियाँ
लोके
लोक में
अस्मिन्
इस
दैवः
दैवी
आसुरः
आसुरी
एव
ही
च
और
दैवः
दैवी
विस्तरशः
विस्तार से
प्रोक्तः
कहा गया
आसुरम्
आसुरी को
पार्थ
हे पार्थ
मे
मुझसे
शृणु
सुनिए

अन्वय: अस्मिन् लोके द्वौ भूतसर्गौ, दैवः आसुरः एव च। दैवः विस्तरशः प्रोक्तः; पार्थ, आसुरम् मे शृणु।

इस लोक में प्राणियों की दो ही सृष्टियाँ हैं, दैवी और आसुरी। दैवी विस्तार से कही गई; हे पार्थ, अब आसुरी को मुझसे सुनिए।

16.7प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥7॥

pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca janā na vidur āsurāḥ |
na śaucaṃ nāpi cācāro na satyaṃ teṣu vidyate

प्रवृत्तिम्
क्या करना चाहिए, यह
च
और
निवृत्तिम्
क्या नहीं करना चाहिए, यह
च
और
जनाः
लोग
न
नहीं
विदुः
जानते
आसुराः
आसुरी स्वभाव वाले
न
न
शौचम्
शुद्धि
न
न
अपि
भी
च
और
आचारः
आचार
न
न
सत्यम्
सत्य
तेषु
उनमें
विद्यते
होता है

अन्वय: आसुराः जनाः प्रवृत्तिम् च निवृत्तिम् च न विदुः। तेषु न शौचम्, न अपि च आचारः, न सत्यम् विद्यते।

आसुरी स्वभाव वाले लोग प्रवृत्ति और निवृत्ति को नहीं जानते। उनमें न शुद्धि होती है, न आचार और न सत्य।

16.8असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥8॥

asatyam apratiṣṭhaṃ te jagad āhur anīśvaram |
aparasparasaṃbhūtaṃ kim anyat kāmahaitukam

असत्यम्
असत्य
अप्रतिष्ठम्
बिना आधार का
ते
वे
जगत्
जगत को
आहुः
कहते हैं
अनीश्वरम्
बिना ईश्वर का
अपरस्परसंभूतम्
स्त्री पुरुष के संयोग से उत्पन्न
किम्
क्या
अन्यत्
और
कामहैतुकम्
काम ही जिसका कारण है

अन्वय: ते जगत् असत्यम् अप्रतिष्ठम् अनीश्वरम् अपरस्परसंभूतम् कामहैतुकम् आहुः, किम् अन्यत्।

वे कहते हैं कि यह जगत असत्य है, बिना आधार का है, बिना ईश्वर का है, केवल स्त्री पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है और काम ही इसका कारण है; इसके सिवा और क्या।

16.9एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥9॥

etāṃ dṛṣṭim avaṣṭabhya naṣṭātmāno ’lpabuddhayaḥ |
prabhavanty ugrakarmāṇaḥ kṣayāya jagato ’hitāḥ

एताम्
इस
दृष्टिम्
दृष्टि को
अवष्टभ्य
आश्रय लेकर
नष्टात्मानः
नष्ट स्वभाव वाले
अल्पबुद्धयः
मंद बुद्धि वाले
प्रभवन्ति
समर्थ होते हैं
उग्रकर्माणः
क्रूर कर्म करने वाले
क्षयाय
नाश के लिए
जगतः
जगत के
अहिताः
अहित करने वाले

अन्वय: एताम् दृष्टिम् अवष्टभ्य नष्टात्मानः अल्पबुद्धयः उग्रकर्माणः अहिताः जगतः क्षयाय प्रभवन्ति।

इस दृष्टि का आश्रय लेकर नष्ट स्वभाव वाले, मंद बुद्धि वाले, क्रूर कर्म करने वाले और सबका अहित करने वाले लोग जगत के नाश के लिए ही समर्थ होते हैं।

16.10काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥10॥

kāmam āśritya duṣpūraṃ dambhamānamadānvitāḥ |
mohād gṛhītvāsadgrāhān pravartante ’śucivratāḥ

कामम्
काम का
आश्रित्य
आश्रय लेकर
दुष्पूरम्
कभी पूरी न होने वाली
दम्भमानमदान्विताः
पाखंड, मान और मद से युक्त
मोहात्
मोह से
गृहीत्वा
ग्रहण करके
असद्ग्राहान्
मिथ्या आग्रहों को
प्रवर्तन्ते
प्रवृत्त होते हैं
अशुचिव्रताः
अपवित्र व्रत वाले

अन्वय: दुष्पूरम् कामम् आश्रित्य दम्भमानमदान्विताः मोहात् असद्ग्राहान् गृहीत्वा अशुचिव्रताः प्रवर्तन्ते।

कभी पूरी न होने वाली कामना का आश्रय लेकर, पाखंड, मान और मद से भरे हुए, मोह से मिथ्या आग्रहों को पकड़कर, अपवित्र व्रत वाले वे लोग कर्मों में प्रवृत्त होते हैं।

16.11चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥11॥

cintām aparimeyāṃ ca pralayāntām upāśritāḥ |
kāmopabhogaparamā etāvad iti niścitāḥ

चिन्ताम्
चिन्ता का
अपरिमेयाम्
असीम
च
और
प्रलयान्ताम्
मृत्यु तक रहने वाली
उपाश्रिताः
आश्रय लिए हुए
कामोपभोगपरमाः
कामभोग को ही परम मानने वाले
एतावत्
इतना ही
इति
ऐसा
निश्चिताः
निश्चय किए हुए

अन्वय: अपरिमेयाम् च प्रलयान्ताम् चिन्ताम् उपाश्रिताः कामोपभोगपरमाः एतावत् इति निश्चिताः।

मृत्यु तक रहने वाली असीम चिन्ता का आश्रय लिए हुए, कामनाओं के भोग को ही परम मानने वाले, वे यही निश्चय किए रहते हैं कि बस इतना ही है।

16.12आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसंचयान् ॥12॥

āśāpāśaśatair baddhāḥ kāmakrodhaparāyaṇāḥ |
īhante kāmabhogārtham anyāyenārthasaṃcayān

आशापाशशतैः
आशा के सैकड़ों पाशों से
बद्धाः
बँधे हुए
कामक्रोधपरायणाः
काम और क्रोध के परायण
ईहन्ते
चेष्टा करते हैं
कामभोगार्थम्
कामनाओं के भोग के लिए
अन्यायेन
अन्याय से
अर्थसंचयान्
धन के संचय की

अन्वय: आशापाशशतैः बद्धाः कामक्रोधपरायणाः कामभोगार्थम् अन्यायेन अर्थसंचयान् ईहन्ते।

आशा के सैकड़ों पाशों से बँधे हुए, काम और क्रोध के परायण वे लोग कामनाओं के भोग के लिए अन्याय से धन के संचय की चेष्टा करते हैं।

16.13इदमद्य मया लब्धमिदं प्राप्स्ये मनोरथम्

इदमद्य मया लब्धमिदं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥13॥

idam adya mayā labdham idaṃ prāpsye manoratham |
idam astīdam api me bhaviṣyati punar dhanam

इदम्
यह
अद्य
आज
मया
मैंने
लब्धम्
पाया
इदम्
यह
प्राप्स्ये
पा लूँगा
मनोरथम्
मनोरथ को
इदम्
यह
अस्ति
है
इदम्
यह
अपि
भी
मे
मेरा
भविष्यति
होगा
पुनः
फिर
धनम्
धन

अन्वय: इदम् अद्य मया लब्धम्, इदम् मनोरथम् प्राप्स्ये। इदम् अस्ति, इदम् अपि धनम् पुनः मे भविष्यति।

“आज मैंने यह पाया है और इस मनोरथ को भी पा लूँगा। यह धन मेरा है और यह भी फिर मेरा होगा।”

16.14असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥14॥

asau mayā hataḥ śatrur haniṣye cāparān api |
īśvaro ’ham ahaṃ bhogī siddho ’haṃ balavān sukhī

असौ
वह
मया
मैंने
हतः
मारा
शत्रुः
शत्रु
हनिष्ये
मारूँगा
च
और
अपरान्
दूसरों को
अपि
भी
ईश्वरः
ईश्वर
अहम्
मैं
अहम्
मैं
भोगी
भोगी
सिद्धः
सिद्ध
अहम्
मैं
बलवान्
बलवान
सुखी
सुखी

अन्वय: असौ शत्रुः मया हतः, अपरान् च अपि हनिष्ये। अहम् ईश्वरः, अहम् भोगी, अहम् सिद्धः बलवान् सुखी।

“वह शत्रु मैंने मार डाला और दूसरों को भी मार डालूँगा। मैं ही ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, बलवान हूँ, सुखी हूँ।”

16.15आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥15॥

āḍhyo ’bhijanavān asmi ko ’nyo ’sti sadṛśo mayā |
yakṣye dāsyāmi modiṣya ity ajñānavimohitāḥ

आढ्यः
धनवान
अभिजनवान्
कुलीन
अस्मि
हूँ
कः
कौन
अन्यः
दूसरा
अस्ति
है
सदृशः
समान
मया
मेरे
यक्ष्ये
यज्ञ करूँगा
दास्यामि
दान दूँगा
मोदिष्ये
आनन्द करूँगा
इति
इस प्रकार
अज्ञानविमोहिताः
अज्ञान से मोहित

अन्वय: आढ्यः अभिजनवान् अस्मि, मया सदृशः अन्यः कः अस्ति। यक्ष्ये, दास्यामि, मोदिष्ये, इति अज्ञानविमोहिताः।

“मैं धनवान हूँ, कुलीन हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है; मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द करूँगा”, इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।

16.16अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥16॥

anekacittavibhrāntā mohajālasamāvṛtāḥ |
prasaktāḥ kāmabhogeṣu patanti narake ’śucau

अनेकचित्तविभ्रान्ताः
अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले
मोहजालसमावृताः
मोह के जाल से ढके हुए
प्रसक्ताः
अत्यन्त आसक्त
कामभोगेषु
कामनाओं के भोगों में
पतन्ति
गिरते हैं
नरके
नरक में
अशुचौ
अपवित्र

अन्वय: अनेकचित्तविभ्रान्ताः मोहजालसमावृताः कामभोगेषु प्रसक्ताः अशुचौ नरके पतन्ति।

अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले, मोह के जाल में लिपटे हुए और कामनाओं के भोगों में अत्यन्त आसक्त वे लोग अपवित्र नरक में गिरते हैं।

16.17आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः

आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥17॥

ātmasaṃbhāvitāḥ stabdhā dhanamānamadānvitāḥ |
yajante nāmayajñais te dambhenāvidhipūrvakam

आत्मसंभाविताः
अपने को ही श्रेष्ठ मानने वाले
स्तब्धाः
घमंड से जड़
धनमानमदान्विताः
धन, मान और मद से युक्त
यजन्ते
यज्ञ करते हैं
नामयज्ञैः
नाममात्र के यज्ञों से
ते
वे
दम्भेन
पाखंड से
अविधिपूर्वकम्
शास्त्रविधि के बिना

अन्वय: आत्मसंभाविताः स्तब्धाः धनमानमदान्विताः ते दम्भेन अविधिपूर्वकम् नामयज्ञैः यजन्ते।

अपने को ही श्रेष्ठ मानने वाले, घमंड से जड़ हुए और धन, मान और मद से भरे हुए वे लोग पाखंड से, शास्त्रविधि के बिना, नाममात्र के यज्ञों से यजन करते हैं।

16.18अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥18॥

ahaṃkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥ |
mām ātmaparadeheṣu pradviṣanto ’bhyasūyakāḥ

अहंकारम्
अहंकार का
बलम्
बल का
दर्पम्
घमंड का
कामम्
काम का
क्रोधम्
क्रोध का
च
और
संश्रिताः
आश्रय लिए हुए
माम्
मुझसे
आत्मपरदेहेषु
अपने और दूसरों के शरीरों में
प्रद्विषन्तः
द्वेष करते हुए
अभ्यसूयकाः
दूसरों में दोष देखने वाले

अन्वय: अहंकारम् बलम् दर्पम् कामम् क्रोधम् च संश्रिताः अभ्यसूयकाः आत्मपरदेहेषु माम् प्रद्विषन्तः।

अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध का आश्रय लिए हुए, दूसरों में दोष देखने वाले वे लोग अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझसे द्वेष करते हैं।

16.19तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥19॥

tān ahaṃ dviṣataḥ krūrān saṃsāreṣu narādhamān |
kṣipāmy ajasram aśubhān āsurīṣv eva yoniṣu

तान्
उन
अहम्
मैं
द्विषतः
द्वेष करने वालों को
क्रूरान्
क्रूरों को
संसारेषु
जन्म मरण के मार्गों में
नराधमान्
अधम मनुष्यों को
क्षिपामि
गिराता हूँ
अजस्रम्
निरन्तर
अशुभान्
अशुभ करने वालों को
आसुरीषु
आसुरी
एव
ही
योनिषु
योनियों में

अन्वय: तान् द्विषतः क्रूरान् अशुभान् नराधमान् अहम् संसारेषु अजस्रम् आसुरीषु एव योनिषु क्षिपामि।

उन द्वेष करने वाले, क्रूर, अशुभ कर्म करने वाले अधम मनुष्यों को मैं संसार में निरन्तर आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ।

16.20आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥20॥

āsurīṃ yonim āpannā mūḍhā janmani janmani |
mām aprāpyaiva kaunteya tato yānty adhamāṃ gatim

आसुरीम्
आसुरी
योनिम्
योनि को
आपन्नाः
प्राप्त हुए
मूढाः
मूढ़ लोग
जन्मनि जन्मनि
जन्म जन्म में
माम्
मुझे
अप्राप्य
न पाकर
एव
ही
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
ततः
उससे भी
यान्ति
जाते हैं
अधमाम्
अधम
गतिम्
गति को

अन्वय: कौन्तेय, जन्मनि जन्मनि आसुरीम् योनिम् आपन्नाः मूढाः माम् अप्राप्य एव ततः अधमाम् गतिम् यान्ति।

हे कुन्तीपुत्र, जन्म जन्म में आसुरी योनि को पाए हुए वे मूढ़ मुझे न पाकर ही उससे भी अधम गति को जाते हैं।

16.21त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥21॥

trividhaṃ narakasyedaṃ dvāraṃ nāśanam ātmanaḥ |
kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṃ tyajet

त्रिविधम्
तीन प्रकार का
नरकस्य
नरक का
इदम्
यह
द्वारम्
द्वार
नाशनम्
नाश करने वाला
आत्मनः
आत्मा का
कामः
काम
क्रोधः
क्रोध
तथा
और
लोभः
लोभ
तस्मात्
इसलिए
एतत्
इन
त्रयम्
तीनों को
त्यजेत्
त्याग देना चाहिए

अन्वय: कामः क्रोधः तथा लोभः, इदम् आत्मनः नाशनम् त्रिविधम् नरकस्य द्वारम्। तस्मात् एतत् त्रयम् त्यजेत्।

काम, क्रोध और लोभ, ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करने वाले हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

16.22एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥22॥

etair vimuktaḥ kaunteya tamodvārais tribhir naraḥ |
ācaraty ātmanaḥ śreyas tato yāti parāṃ gatim

एतैः
इन
विमुक्तः
छूटा हुआ
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
तमोद्वारैः
अंधकार के द्वारों से
त्रिभिः
तीन
नरः
मनुष्य
आचरति
आचरण करता है
आत्मनः
अपने
श्रेयः
कल्याण का
ततः
फिर
याति
जाता है
पराम्
परम
गतिम्
गति को

अन्वय: कौन्तेय, एतैः त्रिभिः तमोद्वारैः विमुक्तः नरः आत्मनः श्रेयः आचरति, ततः पराम् गतिम् याति।

हे कुन्तीपुत्र, अंधकार के इन तीन द्वारों से छूटा हुआ मनुष्य अपने कल्याण का आचरण करता है और फिर परम गति को जाता है।

16.23यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥23॥

yaḥ śāstravidhim utsṛjya vartate kāmakārataḥ |
na sa siddhim avāpnoti na sukhaṃ na parāṃ gatim

यः
जो
शास्त्रविधिम्
शास्त्र की विधि को
उत्सृज्य
छोड़कर
वर्तते
बरतता है
कामकारतः
अपनी इच्छा से
न
नहीं
सः
वह
सिद्धिम्
सिद्धि को
अवाप्नोति
पाता
न
न
सुखम्
सुख को
न
न
पराम्
परम
गतिम्
गति को

अन्वय: यः शास्त्रविधिम् उत्सृज्य कामकारतः वर्तते, सः न सिद्धिम् अवाप्नोति, न सुखम्, न पराम् गतिम्।

जो मनुष्य शास्त्र की विधि को छोड़कर अपनी इच्छा से मनमाना बरतता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख और न परम गति।

16.24तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥24॥

tasmāc chāstraṃ pramāṇaṃ te kāryākāryavyavasthitau |
jñātvā śāstravidhānoktaṃ karma kartum ihārhasi

तस्मात्
इसलिए
शास्त्रम्
शास्त्र
प्रमाणम्
प्रमाण
ते
आपके लिए
कार्याकार्यव्यवस्थितौ
कर्तव्य और अकर्तव्य के निश्चय में
ज्ञात्वा
जानकर
शास्त्रविधानोक्तम्
शास्त्र की विधि से कहे हुए
कर्म
कर्म को
कर्तुम्
करने के
इह
इस लोक में
अर्हसि
योग्य हैं

अन्वय: तस्मात् कार्याकार्यव्यवस्थितौ ते शास्त्रम् प्रमाणम्। शास्त्रविधानोक्तम् ज्ञात्वा इह कर्म कर्तुम् अर्हसि।

इसलिए कर्तव्य और अकर्तव्य के निश्चय में आपके लिए शास्त्र ही प्रमाण है। शास्त्र की विधि से कहे हुए कर्म को जानकर आपको इस लोक में कर्म करना चाहिए।