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अध्याय 12: भक्ति योग

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अध्याय 12: भक्ति योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 12: भक्ति योग

सार: ग्यारहवें अध्याय के उस विराट दर्शन के बाद अर्जुन के मन में एक सहज सवाल उठता है, भगवान तक पहुँचने के लिए उन्हें रूप-समेत भजें, या निराकार मानकर? कृष्ण का उत्तर सीधा और करुणामय है। दोनों रास्ते उन तक पहुँचते हैं, पर देह में बँधे साधारण मनुष्य के लिए प्रेम-भरा साकार रास्ता कहीं सरल है। फिर वे उन गुणों की झाँकी देते हैं, जो किसी भक्त को उन्हें प्रिय बना देते हैं।

अर्जुन का सवाल

पिछले अध्याय में अर्जुन वह विराट रूप देख चुके थे, जिसे देखकर मन डर से भर गया था। अब उनके भीतर एक बहुत सहज सवाल उठा कि रोज़ की साधना में किसे थामें। वह भरा-पूरा, स्नेह करने वाला रूप, जिससे बात की जा सकती है, हाथ जोड़े जा सकते हैं, या वह निराकार सत्य, जिसका न कोई आकार है, न ठिकाना।

अर्जुन ने पूछा, “जो भक्त आप जैसे साकार रूप में मन लगाकर आपकी उपासना करते हैं, और जो उस अविनाशी निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं, इन दोनों में योग की दृष्टि से कौन बढ़कर है?”

कृष्ण का उत्तर किसी ऊँची दार्शनिक बहस में नहीं गया। वे बड़े व्यावहारिक ढंग से बोले, “जो मुझमें मन जमाकर, श्रद्धा के साथ मेरे रूप की उपासना करते हैं, मैं उन्हें सबसे युक्त मानता हूँ।”

निराकार का कठिन रास्ता

फिर उन्होंने एक बात खोलकर कही, जो बहुतों के अपने अनुभव की है। जो लोग उस अव्यक्त, अचिन्त्य, निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं, वे भी अंत में उन्हीं तक पहुँचते हैं। पर वह राह अधिक क्लेश भरी है, क्योंकि देह रखते हुए निराकार पर मन टिकाना बहुत कठिन काम है। जिसके पास हाथ हैं, आँख है, मन है और भाव है, उसके लिए एक रूप, एक नाम, एक चेहरा सहज सहारा बन जाता है।

इसलिए कृष्ण एक सीढ़ी-दर-सीढ़ी अभ्यास बताते हैं। पहले तो अपना सारा मन मुझमें लगा दीजिए। यदि यह अभी न बने, तो अभ्यास-योग से, बार-बार लौट-लौटकर, मुझ तक आने की कोशिश कीजिए। यदि यह भी कठिन लगे, तो अपने सब कर्म मेरे लिए कीजिए। और यदि यह भी न सधे, तो कम-से-कम अपने कर्मों के फल की चिंता छोड़ दीजिए, मन अपने-आप शान्त होने लगेगा।

प्रिय भक्त के लक्षण

इसके बाद यह अध्याय अपने सबसे सुंदर हिस्से में पहुँचता है। कृष्ण एक-एक करके उन गुणों को गिनाते हैं, जो किसी को उनका प्रिय बना देते हैं। यह गिनती जैसे भक्त के स्वभाव का पूरा चित्र खींच देती है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

“जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं रखता, सबके प्रति मित्रता और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से मुक्त है, सुख और दुख में समान रहता है, और क्षमा करना जानता है।” ऐसा भक्त, जो सदा संतुष्ट रहता है, संयमी है, दृढ़ निश्चय वाला है, और अपना मन तथा बुद्धि उन्हीं को सौंप चुका है, कृष्ण कहते हैं कि वही मुझे प्रिय है।

फिर एक और कसौटी आती है, जिसे बाहर से भी नापा जा सकता है।

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥

“जिससे किसी को उद्वेग नहीं होता, और जो स्वयं भी किसी से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और घबराहट से छूट चुका है, वह मुझे प्रिय है।” आपकी भक्ति का एक प्रमाण यह भी है कि आपके पास बैठकर दूसरों को कैसा लगता है। जो न किसी को दुख दे, न स्वयं दुखी हो, उसके भीतर का ठहराव अपने-आप बोलने लगता है।

कृष्ण गिनते जाते हैं। वह भक्त जो किसी वस्तु की चाह नहीं रखता, भीतर-बाहर से पवित्र है, काम में निपुण पर फल से उदासीन है, चिंता से मुक्त है, जो न बहुत हर्षित होता है न किसी से घृणा करता है, जो न शोक करता है न कामना, जो निंदा और स्तुति को एक-सा लेता है, सर्दी-गर्मी, सुख-दुख और मान-अपमान में समान रहता है, और जहाँ रह जाए वहीं संतुष्ट हो जाता है। ऐसा स्थिर मन वाला प्रेमी उन्हें अत्यंत प्रिय है।

ध्यान देने की बात यह है कि इस पूरी सूची में कहीं किसी बड़े चमत्कार या कठोर तप की माँग नहीं है। कृष्ण कोई असंभव शर्त नहीं रख रहे। वे बस एक ऐसे इंसान का चित्र खींच रहे हैं, जिसका भीतर ठंडा है, जो किसी से बैर नहीं रखता, और जिसका मन उन्हीं की ओर झुका रहता है। यही स्वभाव, धीरे-धीरे, अपने-आप भक्ति बन जाता है।

और अंत में सब समेटते हुए कृष्ण कहते हैं कि जो इस धर्म-रूपी अमृत का, इसी श्रद्धा के साथ, उन्हें ही परम मानकर पान करते हैं, वे भक्त उन्हें सबसे अधिक प्रिय हैं। यही इस छोटे-से अध्याय का समापन-सूत्र है।

सार

एक वाक्य में कहें तो, भक्ति का रास्ता इसलिए सरल है कि उसमें अपने-आप को समझना नहीं, बस सौंप देना है। और सच्चा भक्त वही है, जो किसी को दुखी न करे और स्वयं भी किसी से दुखी न हो। गीता के सबसे छोटे अध्यायों में से यह एक है, पर इसकी एक-एक पंक्ति जीवन भर साथ चलने लायक है। सदियों बाद दक्षिण के आचार्य रामानुज ने इसी अध्याय को अपने भक्ति-दर्शन का केंद्र बनाया, और भारत का बहुत सारा भक्ति-गीत इन्हीं पंक्तियों की गोद में पला।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक-दर-श्लोक

इस अध्याय के सभी 20 श्लोक: देवनागरी मूल, रोमन लिप्यन्तरण, पदच्छेद, अन्वय और सीधा अर्थ। हर श्लोक की अपनी कड़ी है, जैसे lulla.net/bhagavad-gita/12/1/। ऊपर की कथा-व्याख्या पढ़ने के बाद यहाँ मूल तक उतरिए।

12.1एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते

अर्जुन उवाच

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥1॥

evaṃ satatayuktā ye bhaktās tvāṃ paryupāsate |
ye cāpy akṣaram avyaktaṃ teṣāṃ ke yogavittamāḥ

एवम्
इस प्रकार
सततयुक्ताः
निरन्तर आपमें लगे हुए
ये
जो
भक्ताः
भक्त
त्वाम्
आपको
पर्युपासते
उपासना करते हैं
ये
जो
च
और
अपि
भी
अक्षरम्
अविनाशी को
अव्यक्तम्
अव्यक्त को
तेषाम्
उन दोनों में
के
कौन
योगवित्तमाः
योग को सबसे अच्छा जानने वाले

अन्वय: एवम् ये सततयुक्ताः भक्ताः त्वाम् पर्युपासते, ये च अपि अक्षरम् अव्यक्तम् पर्युपासते, तेषाम् के योगवित्तमाः।

जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आपकी उपासना करते हैं, और जो अविनाशी अव्यक्त की उपासना करते हैं, उन दोनों में योग को सबसे अच्छा जानने वाले कौन हैं?

12.2मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते

श्रीभगवानुवाच

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥2॥

mayy āveśya mano ye māṃ nityayuktā upāsate |
śraddhayā parayopetās te me yuktatamā matāḥ

मयि
मुझमें
आवेश्य
लगाकर
मनः
मन को
ये
जो
माम्
मुझको
नित्ययुक्ताः
नित्य लगे हुए
उपासते
उपासना करते हैं
श्रद्धया
श्रद्धा से
परया
परम
उपेताः
युक्त
ते
वे
मे
मेरे मत में
युक्ततमाः
सबसे उत्तम योगी
मताः
माने गए हैं

अन्वय: ये मयि मनः आवेश्य नित्ययुक्ताः परया श्रद्धया उपेताः माम् उपासते, ते मे युक्ततमाः मताः।

जो मुझमें मन लगाकर, नित्य मुझमें लगे हुए, परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सबसे उत्तम योगी हैं।

12.3ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥3॥

ye tv akṣaram anirdeśyam avyaktaṃ paryupāsate |
sarvatragam acintyaṃ ca kūṭastham acalaṃ dhruvam

ये
जो
तु
परन्तु
अक्षरम्
अविनाशी
अनिर्देश्यम्
जिसका निर्देश न हो सके
अव्यक्तम्
अव्यक्त
पर्युपासते
उपासना करते हैं
सर्वत्रगम्
सर्वव्यापी
अचिन्त्यम्
चिन्तन से परे
च
और
कूटस्थम्
निर्विकार, सदा एकरूप
अचलम्
अचल
ध्रुवम्
नित्य

अन्वय: ये तु अक्षरम् अनिर्देश्यम् अव्यक्तम् सर्वत्रगम् अचिन्त्यम् च कूटस्थम् अचलम् ध्रुवम् पर्युपासते,

परन्तु जो लोग उस अविनाशी की उपासना करते हैं, जो अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, निर्विकार, अचल और नित्य है,

12.4संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः

संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥4॥

saṃniyamyendriyagrāmaṃ sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti mām eva sarvabhūtahite ratāḥ

संनियम्य
भली प्रकार वश में करके
इन्द्रियग्रामम्
इन्द्रियों के समूह को
सर्वत्र
सब कहीं
समबुद्धयः
समान बुद्धि वाले
ते
वे
प्राप्नुवन्ति
प्राप्त होते हैं
माम्
मुझको
एव
ही
सर्वभूतहिते
सब प्राणियों के हित में
रताः
लगे हुए

अन्वय: इन्द्रियग्रामम् संनियम्य सर्वत्र समबुद्धयः सर्वभूतहिते रताः ते माम् एव प्राप्नुवन्ति।

जो इन्द्रियों के समूह को भली प्रकार वश में करके सब कहीं समान बुद्धि रखते हैं और सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे भी मुझको ही प्राप्त होते हैं।

12.5क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥5॥

kleśo ’dhikataras teṣām avyaktāsaktacetasām |
avyaktā hi gatir duḥkhaṃ dehavadbhir avāpyate

क्लेशः
कष्ट
अधिकतरः
अधिक
तेषाम्
उनको
अव्यक्तासक्तचेतसाम्
अव्यक्त में आसक्त चित्त वालों को
अव्यक्ता
अव्यक्त विषयक
हि
क्योंकि
गतिः
गति, लक्ष्य
दुःखम्
कठिनाई से
देहवद्भिः
देहधारियों द्वारा
अवाप्यते
प्राप्त की जाती है

अन्वय: अव्यक्तासक्तचेतसाम् तेषाम् क्लेशः अधिकतरः, हि अव्यक्ता गतिः देहवद्भिः दुःखम् अवाप्यते।

अव्यक्त में आसक्त चित्त वाले उन लोगों को कष्ट अधिक होता है, क्योंकि देहधारियों द्वारा अव्यक्त विषयक गति कठिनाई से प्राप्त की जाती है।

12.6ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥6॥

ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi saṃnyasya matparāḥ |
ananyenaiva yogena māṃ dhyāyanta upāsate

ये
जो
तु
परन्तु
सर्वाणि
सब
कर्माणि
कर्मों को
मयि
मुझमें
संन्यस्य
अर्पण करके
मत्पराः
मेरे परायण
अनन्येन
अनन्य
एव
ही
योगेन
योग से
माम्
मुझको
ध्यायन्तः
ध्यान करते हुए
उपासते
उपासना करते हैं

अन्वय: ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः अनन्येन एव योगेन माम् ध्यायन्तः उपासते,

परन्तु जो मेरे परायण होकर सब कर्म मुझमें अर्पण कर, अनन्य योग से ही मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं,

12.7तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥7॥

teṣām ahaṃ samuddhartā mṛtyusaṃsārasāgarāt |
bhavāmi nacirāt pārtha mayy āveśitacetasām

तेषाम्
उनका
अहम्
मैं
समुद्धर्ता
उद्धार करने वाला
मृत्युसंसारसागरात्
मृत्युरूप संसार सागर से
भवामि
होता हूँ
नचिरात्
शीघ्र ही
पार्थ
हे पार्थ
मयि
मुझमें
आवेशितचेतसाम्
चित्त लगाए हुओं का

अन्वय: पार्थ, मयि आवेशितचेतसाम् तेषाम् अहम् नचिरात् मृत्युसंसारसागरात् समुद्धर्ता भवामि।

हे पार्थ, मुझमें चित्त लगाए हुए उन भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्युरूप संसार सागर से उद्धार करने वाला होता हूँ।

12.8मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥8॥

mayy eva mana ādhatsva mayi buddhiṃ niveśaya |
nivasiṣyasi mayy eva ata ūrdhvaṃ na saṃśayaḥ

मयि
मुझमें
एव
ही
मनः
मन को
आधत्स्व
लगाइए
मयि
मुझमें
बुद्धिम्
बुद्धि को
निवेशय
स्थापित कीजिए
निवसिष्यसि
आप निवास करेंगे
मयि
मुझमें
एव
ही
अतः
इसके
ऊर्ध्वम्
बाद
न
नहीं
संशयः
संशय

अन्वय: मयि एव मनः आधत्स्व, मयि बुद्धिम् निवेशय, अतः ऊर्ध्वम् मयि एव निवसिष्यसि, न संशयः।

आप मुझमें ही मन लगाइए और मुझमें ही बुद्धि स्थापित कीजिए। इसके बाद आप मुझमें ही निवास करेंगे, इसमें संशय नहीं।

12.9अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥9॥

atha cittaṃ samādhātuṃ na śaknoṣi mayi sthiram |
abhyāsayogena tato mām icchāptuṃ dhanaṃjaya

अथ
यदि
चित्तम्
चित्त को
समाधातुम्
स्थापित करने में
न
नहीं
शक्नोषि
आप समर्थ हैं
मयि
मुझमें
स्थिरम्
स्थिर रूप से
अभ्यासयोगेन
अभ्यासरूप योग से
ततः
तो
माम्
मुझको
इच्छ
इच्छा कीजिए
आप्तुम्
प्राप्त करने की
धनंजय
हे धनंजय

अन्वय: धनंजय, अथ मयि चित्तम् स्थिरम् समाधातुम् न शक्नोषि, ततः अभ्यासयोगेन माम् आप्तुम् इच्छ।

हे धनंजय, यदि आप मुझमें चित्त को स्थिर रूप से स्थापित करने में समर्थ नहीं हैं, तो अभ्यासरूप योग से मुझको प्राप्त करने की इच्छा कीजिए।

12.10अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥10॥

abhyāse ’py asamartho ’si matkarmaparamo bhava |
madartham api karmāṇi kurvan siddhim avāpsyasi

अभ्यासे
अभ्यास में
अपि
भी
असमर्थः
असमर्थ
असि
आप हैं
मत्कर्मपरमः
मेरे लिए कर्म करने के परायण
भव
हो जाइए
मदर्थम्
मेरे लिए
अपि
भी
कर्माणि
कर्मों को
कुर्वन्
करते हुए
सिद्धिम्
सिद्धि को
अवाप्स्यसि
आप प्राप्त करेंगे

अन्वय: अभ्यासे अपि असमर्थः असि, मत्कर्मपरमः भव; मदर्थम् कर्माणि कुर्वन् अपि सिद्धिम् अवाप्स्यसि।

यदि आप अभ्यास में भी असमर्थ हैं, तो मेरे लिए कर्म करने के परायण हो जाइए। मेरे लिए कर्म करते हुए भी आप सिद्धि प्राप्त करेंगे।

12.11अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥11॥

athaitad apy aśakto ’si kartuṃ madyogam āśritaḥ |
sarvakarmaphalatyāgaṃ tataḥ kuru yatātmavān

अथ
यदि
एतत्
यह
अपि
भी
अशक्तः
असमर्थ
असि
आप हैं
कर्तुम्
करने में
मद्योगम्
मेरे योग के
आश्रितः
आश्रित होकर
सर्वकर्मफलत्यागम्
सब कर्मों के फल का त्याग
ततः
तो
कुरु
कीजिए
यतात्मवान्
मन को वश में रखने वाले

अन्वय: अथ मद्योगम् आश्रितः एतत् अपि कर्तुम् अशक्तः असि, ततः यतात्मवान् सर्वकर्मफलत्यागम् कुरु।

यदि मेरे योग के आश्रित होकर आप यह भी करने में असमर्थ हैं, तो मन को वश में रखते हुए सब कर्मों के फल का त्याग कीजिए।

12.12श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥12॥

śreyo hi jñānam abhyāsāj jñānād dhyānaṃ viśiṣyate |
dhyānāt karmaphalatyāgas tyāgāc chāntir anantaram

श्रेयः
श्रेष्ठ
हि
क्योंकि
ज्ञानम्
ज्ञान
अभ्यासात्
अभ्यास से
ज्ञानात्
ज्ञान से
ध्यानम्
ध्यान
विशिष्यते
श्रेष्ठ है
ध्यानात्
ध्यान से
कर्मफलत्यागः
कर्मफल का त्याग
त्यागात्
त्याग से
शान्तिः
शान्ति
अनन्तरम्
तत्काल

अन्वय: हि अभ्यासात् ज्ञानम् श्रेयः, ज्ञानात् ध्यानम् विशिष्यते, ध्यानात् कर्मफलत्यागः विशिष्यते, त्यागात् अनन्तरम् शान्तिः।

क्योंकि अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, और ध्यान से कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है। त्याग से तत्काल ही शान्ति मिलती है।

12.13अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥13॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca |
nirmamo nirahaṃkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī

अद्वेष्टा
द्वेष न करने वाला
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों से
मैत्रः
मित्रभाव वाला
करुणः
दयालु
एव
ही
च
और
निर्ममः
ममता से रहित
निरहंकारः
अहंकार से रहित
समदुःखसुखः
सुख और दुःख में समान
क्षमी
क्षमाशील

अन्वय: यः सर्वभूतानाम् अद्वेष्टा, मैत्रः करुणः एव च, निर्ममः निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी,

जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख और दुःख में समान है और क्षमाशील है,

12.14संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः

संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥14॥

saṃtuṣṭaḥ satataṃ yogī yatātmā dṛḍhaniścayaḥ |
mayy arpitamanobuddhir yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ

संतुष्टः
सन्तुष्ट
सततम्
निरन्तर
योगी
योगी
यतात्मा
मन को वश में रखने वाला
दृढनिश्चयः
दृढ़ निश्चय वाला
मयि
मुझमें
अर्पितमनोबुद्धिः
मन और बुद्धि अर्पण किए हुए
यः
जो
मद्भक्तः
मेरा भक्त
सः
वह
मे
मुझको
प्रियः
प्रिय

अन्वय: यः सततम् संतुष्टः योगी यतात्मा दृढनिश्चयः मयि अर्पितमनोबुद्धिः मद्भक्तः, सः मे प्रियः।

जो निरन्तर सन्तुष्ट है, योगी है, मन को वश में रखने वाला और दृढ़ निश्चय वाला है, और जिसने मन और बुद्धि मुझमें अर्पण कर दिए हैं, वह मेरा भक्त मुझको प्रिय है।

12.15यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥15॥

yasmān nodvijate loko lokān nodvijate ca yaḥ |
harṣāmarṣabhayodvegair mukto yaḥ sa ca me priyaḥ

यस्मात्
जिससे
न
नहीं
उद्विजते
उद्वेग पाता है
लोकः
संसार
लोकात्
संसार से
न
नहीं
उद्विजते
उद्वेग पाता है
च
और
यः
जो
हर्षामर्षभयोद्वेगैः
हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेग से
मुक्तः
मुक्त
यः
जो
सः
वह
च
भी
मे
मुझको
प्रियः
प्रिय

अन्वय: यस्मात् लोकः न उद्विजते, यः च लोकात् न उद्विजते, यः हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तः, सः च मे प्रियः।

जिससे संसार को उद्वेग नहीं होता और जो संसार से उद्वेग नहीं पाता, तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेग से मुक्त है, वह भी मुझको प्रिय है।

12.16अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥16॥

anapekṣaḥ śucir dakṣa udāsīno gatavyathaḥ |
sarvārambhaparityāgī yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ

अनपेक्षः
अपेक्षा से रहित
शुचिः
शुद्ध
दक्षः
चतुर
उदासीनः
पक्षपात से रहित
गतव्यथः
व्यथा से रहित
सर्वारम्भपरित्यागी
सब आरम्भों का त्यागी
यः
जो
मद्भक्तः
मेरा भक्त
सः
वह
मे
मुझको
प्रियः
प्रिय

अन्वय: यः अनपेक्षः शुचिः दक्षः उदासीनः गतव्यथः सर्वारम्भपरित्यागी मद्भक्तः, सः मे प्रियः।

जो अपेक्षा से रहित, शुद्ध, चतुर, पक्षपात से रहित और व्यथा से रहित है, तथा सब आरम्भों का त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझको प्रिय है।

12.17यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥17॥

yo na hṛṣyati na dveṣṭi na śocati na kāṅkṣati |
śubhāśubhaparityāgī bhaktimān yaḥ sa me priyaḥ

यः
जो
न
न
हृष्यति
हर्षित होता है
न
न
द्वेष्टि
द्वेष करता है
न
न
शोचति
शोक करता है
न
न
काङ्क्षति
कामना करता है
शुभाशुभपरित्यागी
शुभ और अशुभ का त्यागी
भक्तिमान्
भक्तियुक्त
यः
जो
सः
वह
मे
मुझको
प्रियः
प्रिय

अन्वय: यः न हृष्यति, न द्वेष्टि, न शोचति, न काङ्क्षति, यः शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्, सः मे प्रियः।

जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, और जो शुभ और अशुभ का त्यागी है, वह भक्तियुक्त मुझको प्रिय है।

12.18समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानावमानयोः

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानावमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥18॥

samaḥ śatrau ca mitre ca tathā mānāvamānayoḥ |
śītoṣṇasukhaduḥkheṣu samaḥ saṅgavivarjitaḥ

समः
समान
शत्रौ
शत्रु में
च
और
मित्रे
मित्र में
च
भी
तथा
तथा
मानावमानयोः
मान और अपमान में
शीतोष्णसुखदुःखेषु
शीत, उष्ण, सुख और दुःख में
समः
समान
सङ्गविवर्जितः
आसक्ति से रहित

अन्वय: यः शत्रौ च मित्रे च तथा मानावमानयोः समः, शीतोष्णसुखदुःखेषु समः, सङ्गविवर्जितः,

जो शत्रु और मित्र में तथा मान और अपमान में समान है, जो शीत, उष्ण, सुख और दुःख में समान है और आसक्ति से रहित है,

12.19तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केन चित्

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केन चित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥19॥

tulyanindāstutir maunī saṃtuṣṭo yena kena cit |
aniketaḥ sthiramatir bhaktimān me priyo naraḥ

तुल्यनिन्दास्तुतिः
निन्दा और स्तुति को समान मानने वाला
मौनी
मननशील
संतुष्टः
सन्तुष्ट
येन केन चित्
जिस किसी से भी
अनिकेतः
घर के प्रति ममता से रहित
स्थिरमतिः
स्थिर बुद्धि वाला
भक्तिमान्
भक्तियुक्त
मे
मुझको
प्रियः
प्रिय
नरः
मनुष्य

अन्वय: तुल्यनिन्दास्तुतिः मौनी येन केन चित् संतुष्टः अनिकेतः स्थिरमतिः भक्तिमान् नरः मे प्रियः।

जो निन्दा और स्तुति को समान मानता है, मननशील है, जिस किसी से भी सन्तुष्ट रहता है, घर के प्रति ममता से रहित है और स्थिर बुद्धि वाला है, वह भक्तियुक्त मनुष्य मुझको प्रिय है।

12.20ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥20॥

ye tu dharmyāmṛtam idaṃ yathoktaṃ paryupāsate |
śraddadhānā matparamā bhaktās te ’tīva me priyāḥ

ये
जो
तु
परन्तु
धर्म्यामृतम्
धर्ममय अमृत का
इदम्
इस
यथोक्तम्
जैसा कहा गया
पर्युपासते
सेवन करते हैं
श्रद्दधानाः
श्रद्धावान
मत्परमाः
मुझको परम मानने वाले
भक्ताः
भक्त
ते
वे
अतीव
अत्यन्त
मे
मुझको
प्रियाः
प्रिय

अन्वय: ये तु श्रद्दधानाः मत्परमाः भक्ताः इदम् यथोक्तम् धर्म्यामृतम् पर्युपासते, ते मे अतीव प्रियाः।

परन्तु जो श्रद्धावान भक्त मुझको परम मानकर इस धर्ममय अमृत का, जैसा कहा गया है, सेवन करते हैं, वे मुझको अत्यन्त प्रिय हैं।