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अष्टावक्र गीता · प्रकरण 2: आश्चर्य

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पाठ्य-संगति

दूसरे-प्रकरण में जनक की पहली-प्रतिक्रिया ‘आश्चर्य’ है। यह आश्चर्य प्लेटो के थॉमेज़िन (thaumazein) से मिलता है, यानी ‘दर्शन-शास्त्र की शुरुआत आश्चर्य से होती है’। अरस्तू ने मेटाफ़िज़िक्स में यही बात कही थी (980b-983a)।

जनक के ‘अहो’ से शुरू हुए ये पच्चीस-श्लोक एक तरह की संस्कृत-काव्य-संरचना में बँधे हैं, जहाँ हर-श्लोक ‘अहो’ से शुरू होता है। यह आवृत्ति-शैली कालिदास के मेघदूत में भी मिलती है, और आधुनिक-काल में डब्ल्यू. एच. ऑडेन की ‘फ़ोर क्वार्टेट्स’ में भी।

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 2

आश्चर्य

Wonder · 25 श्लोक

प्रकरण 1 में अष्टावक्र ने उपदेश दिया। प्रकरण 2 में जनक की प्रतिक्रिया है। हर श्लोक “अहो” से शुरू होता है, “ओह!” यही पूरी रचना का हृदय है। यहाँ जनक “समझे” नहीं, यहाँ जनक “हो गए”।

अब तक

पिछले प्रकरण में अष्टावक्र ने कहा था, “आप ही द्रष्टा हैं, आपका कोई बंधन कभी था ही नहीं।” इस प्रकरण में जनक उसका अनुभव कर के “आश्चर्य” से भर उठते हैं।

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गुरु की एक बात सुनी, और जनक के भीतर कुछ टूट गया। कोई तर्क नहीं, कोई धीमी समझ नहीं, बस एक सीधा पहचान का धक्का। उनके मुँह से निकलता है, “अहो”, “ओह!” और यह विस्मय-भरा स्वर ही अब आगे के हर श्लोक का द्वार बन जाता है। पहली ही साँस में वे कह उठते हैं कि वे तो निरंजन हैं, शान्त हैं, बोध-स्वरूप हैं, प्रकृति से परे हैं; और इतने लम्बे समय तक वे अपने ही मोह से ठगे जाते रहे। यह मोह बाहर से आई कोई शक्ति नहीं थी, यह अपने ही हाथों किया हुआ धोखा था।

श्लोक 1

अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः।
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडम्बितः॥

फिर वही पहचान फैलने लगती है। जैसे यह एक देह उन्हीं की चेतना से प्रकाशित होती है, वैसे ही सारा जगत भी उन्हीं के प्रकाश में दिखता है। इसी से एक अनोखा विरोधाभास उठता है, सारा जगत उन्हीं का है, या फिर उनका कुछ भी नहीं। दोनों एक ही बात कह रहे हैं, क्योंकि जब “मैं” चेतना है तो सब उसी में दिखता है, और जब “मैं” चेतना है तो कोई अलग पकड़ने वाला बचता ही नहीं। इसी अनुभव में वे आगे कहते हैं कि शरीर समेत यह पूरा विश्व अब उनसे छूट गया है, किसी सूक्ष्म कौशल से ही परम आत्मा झलकने लगा है। जनक ने राजगद्दी नहीं छोड़ी, फिर भी “विश्व” मानो उनके लिए गिर गया, क्योंकि “मैं” उससे अलग हो उठा।

श्लोक 2 · 3

यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत्।
अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किञ्चन॥

सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाधुना।
कुतश्चित्कौशलाद्व पर्म आत्मा विलोक्यते॥

अब जनक एक के बाद एक उपमाएँ खोलते हैं, मानो हर ओर से एक ही सत्य की ओर इशारा कर रहे हों। जैसे लहरें, झाग और बुलबुले पानी से अलग नहीं होते, वैसे ही आत्मा से निकला यह विश्व आत्मा से अलग नहीं है। जैसे ध्यान से देखने पर कपड़ा केवल धागे ही निकलता है, वैसे ही जाँच करने पर यह विश्व केवल आत्मा ही ठहरता है। और जैसे गन्ने के रस से बनी शक्कर उसी रस से भीतर तक भरी रहती है, वैसे ही उनमें कल्पित यह विश्व उन्हीं से निरन्तर व्याप्त है। हर लहर में पानी, हर धागे में कपड़ा, हर कण में चेतना; विश्व चेतना का ही ठोस रूप है।

श्लोक 4 · 5 · 6

यथा न तोयतो भिन्नास्तरङ्गाः फेनबुद्बुदाः।
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम्॥

तन्तुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारितः।
आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम्॥

यथैवेक्षुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा।
तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम्॥

फिर जनक उसी रस्सी-साँप की उपमा पर लौटते हैं जो पहले अष्टावक्र ने दी थी, पर अब वे स्वयं उसे बरत रहे हैं। आत्मा के अज्ञान से जगत दिखता है, और आत्मज्ञान होते ही दिखना बन्द हो जाता है, ठीक जैसे रस्सी का अज्ञान होने पर साँप दिखता है और रस्सी पहचानते ही साँप मिट जाता है। वे आगे कहते हैं कि प्रकाश ही उनका अपना स्वरूप है, वे उससे ज़रा भी अलग नहीं; जब-जब विश्व प्रकाशित होता है, वह उन्हीं का प्रकाश होता है। हर अनुभव का सबूत “दिखना” है, और दिखना चेतना का ही काम है, इसलिए जो कुछ झलकता है वह उसी एक प्रकाश की झलक है।

श्लोक 7 · 8

आत्माज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्न भासते।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद्भासते न हि॥

प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः।
यदा प्रकाशते विश्वं तदाहं भास एव हि॥

अब विस्मय एक और गहराई पकड़ता है। जनक कहते हैं, अहो! अज्ञान से कल्पा गया यह विश्व उन्हीं में दिखता है, जैसे सीप में चाँदी, रस्सी में साँप, और सूरज की किरणों में पानी का भ्रम। तीनों में आधार असली है, ऊपर चढ़ी छवि भ्रम। और जो उनसे निकला है, वही उन्हीं में लय हो जाएगा, जैसे मिट्टी में घड़ा, पानी में लहर और सोने में कंगन लौट जाता है। बीच में जो “वस्तु” दिखती है, वह आधार का ही रूप थी; उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय, तीनों एक ही आधार के भीतर का खेल हैं।

श्लोक 9 · 10

अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते।
रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा॥

मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति।
मृदि कुम्भो जले वीचिः कनके कटकं यथा॥

यहाँ से जनक का स्वर एक अनोखे नमस्कार में बदल जाता है, वे अपने ही आप को प्रणाम करने लगते हैं। अहो, उन्हें अपना ही नमस्कार, क्योंकि उनका कोई विनाश नहीं; ब्रह्मा से ले कर तृण तक सारा जगत मिट जाए, तब भी वे बने रहेंगे। फिर वही नमस्कार दोहराता है, वे एक हैं, देहधारी होते हुए भी; न कहीं जाते हैं न कहीं से आते हैं, पूरे विश्व को व्याप्त कर के स्थित हैं। और फिर एक बार, वे अपने जैसा कुशल किसी को नहीं पाते, क्योंकि बिना शरीर से छुए ही वे इतने युगों से इस पूरे विश्व को धारण किए हुए हैं, जैसे सूरज पृथ्वी को छुए बिना ही उसे रोशन करता रहता है।

श्लोक 11 · 12 · 13

अहो अहं नमो मह्यं विनाशो यस्य नास्ति मे।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशेऽपि तिष्ठतः॥

अहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानपि।
क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः॥

अहो अहं नमो मह्यं दक्षो नास्तीह मत्समः।
असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम्॥

वही नमस्कार एक बार और उठता है, पर अब उसके साथ एक खुला विरोधाभास भी आता है, उनका कुछ भी नहीं है, या फिर वह सब कुछ उन्हीं का है जो वाणी और मन की पहुँच में आता है। दोनों एक साथ सच हैं, क्योंकि न कोई अलग “मैं” है जिसके पास संग्रह हो, और न ही कुछ ऐसा बचता है जो उस चेतना के बाहर पड़ा हो। इसी पहचान में वे ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता की त्रिपुटी को भी झूठा कह देते हैं; जानने वाला, जानना और जाना-जाने वाला, ये तीन भी अज्ञान से ही अलग दिखते हैं, और जिसमें यह तीनों झलकते हैं, वही निरंजन वे स्वयं हैं।

श्लोक 14 · 15

अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किञ्चन।
अथवा यस्य मे सर्वं यद् वाङ्मनसगोचरम्॥

ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम्।
अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः॥

अब जनक सीधे उस जड़ पर हाथ रखते हैं जहाँ से सारा दुःख उठता है। अहो, द्वैत का मूल, यह “दो” का भाव ही सबसे बड़ा ज़हर है; आत्मज्ञान का अमृत मिल गया है, अब वे इस द्वैत को उखाड़ फेंकते हैं। यही “दो” का भाव डर को भी जन्म देता है, क्योंकि अज्ञान भय पैदा करता है और ज्ञान अभय का कारण बनता है। पहले जब वे अज्ञान में थे, तब डरते थे; अब निर्भय हैं, तो डरें भी किससे, जब डरने वाला और डराने वाला, दोनों एक ही चेतना में घुल चुके हैं।

श्लोक 16 · 17

अहो द्वैतस्य मूलं मे द्वयमेव परं विषम्।
आत्मज्ञानामृतं प्राप्तं द्वैतमुच्चाटयाम्यहम्॥

अज्ञानं भयजननं ज्ञानं चाभयकारणम्।
अहमज्ञानगो भीतः को नु भेष्यामि निर्भयः॥

फिर एक और नमस्कार, पर इस बार वे “ज्ञान” शब्द को भी छोड़ देते हैं। अहो, उन्हें अपना नमस्कार, क्योंकि वह “ज्ञान” भी नहीं जिसे कहीं से पाया जाए; जैसे दृश्य अपने आप अनुभव होता है, वैसे ही वह सबसे पहला, सबसे सीधा अनुभव है। “ज्ञान” शब्द कभी-कभी इसे कोई दूर रखी हुई उपलब्धि बना देता है, इसलिए वे उसे हटा कर सीधे “अनुभव” पर आ जाते हैं। और तुरंत वे दुःख की जड़ पर लौटते हैं, दुःख का मूल द्वैत है और इसकी कोई दूसरी दवा नहीं; जो दिखता है वह सब मृषा है, और वे स्वयं एक निर्मल चित्-रस हैं। यहाँ “मृषा” का अर्थ “है ही नहीं” नहीं, बल्कि “जैसा दिखता है, वैसा नहीं है”।

श्लोक 18 · 19

अहो अहं नमो मह्यं तज्ज्ञानमपि नास्ति यत्।
दृश्योऽनुभूयते यद्वत्तदाद्यानुभवो हि सः॥

द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्यास्ति भेषजम्।
दृश्यमेतन्मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोऽमलः॥

अब जनक अपने स्वरूप को सबसे सादे शब्दों में बाँधते हैं, वे बोध-मात्र हैं, और जो भी उपाधियाँ थीं, वे अज्ञान से उन्होंने स्वयं कल्पी थीं; ऐसा निरंतर विमर्श करने वाले की स्थिति निर्विकल्प में ठहर जाती है। उपाधि वैसी ही है जैसे साफ़ जल पर बादल का रंग चढ़ जाए, जल वही रहता है, रंग बस ऊपर का। इसी से वे आगे कहते हैं कि उनका न कोई बन्धन है न मोक्ष, भ्रम शान्त हो कर निराधार हो गया है; अहो, विश्व उनमें टिका है, और वस्तुतः उनमें टिका भी नहीं। बन्धन कभी था ही नहीं, तो मोक्ष किसका; वह केवल एक मान्यता थी जो अब गिर गई।

श्लोक 20 · 21

बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया।
एवं विमृशतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम॥

न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्ता निराश्रया।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्॥

यहाँ कल्पना का आख़िरी सहारा भी छूट जाता है। शरीर समेत यह सारा विश्व कुछ भी नहीं, यह उन्हें निश्चित हो गया है; आत्मा शुद्ध चित्-मात्र है, तो अब कल्पना टिके भी किसमें। कल्पना के लिए दो चाहिए, एक कल्पने वाला और एक कल्पी हुई वस्तु, पर अब दो हैं ही नहीं। इसी निश्चय में वे गिनाते हैं, शरीर, स्वर्ग-नरक, बन्ध-मोक्ष और भय, यह सब केवल कल्पना-मात्र है, और चित्-स्वरूप उन्हें इनसे कोई काम नहीं। ध्यान देने की बात यह है कि वे “स्वर्ग-नरक भी कल्पना” के साथ “मोक्ष भी कल्पना” कह देते हैं, यह किसी सहज नास्तिकता से कहीं आगे की बात है।

श्लोक 22 · 23

सशरीरमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चितम्।
शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन् कल्पनाधुना॥

शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा।
कल्पनामात्रमेवैतत्किं मे कार्यं चिदात्मनः॥

और अब प्रकरण अपने अंतिम मोड़ पर आता है। अहो, भीड़ में खड़े हो कर भी जनक को कोई द्वैत नहीं दिखता; सारा जनसमूह उनके लिए एक सूने जंगल जैसा हो गया है, तो वे किसमें आसक्ति करें, किसमें रति करें। “दूसरा” तो मन गढ़ता है, और अद्वैत में “मैं और बाक़ी” का भेद ही ढह जाता है। अंत में वे अपने बन्धन की असली जड़ खोल देते हैं, वे न देह हैं, न देह उनकी है, न वे जीव हैं, वे तो केवल चित् हैं; उनका इकलौता बन्धन बस इतना था, “जीने की चाह”। यहीं प्रकरण 2 पूरा होता है। जनक “हो गए”, और आगे का सारा संवाद इसी एक पहचान की विस्तृत व्याख्या है, जहाँ अब गुरु और शिष्य एक ही स्तर पर बात करते हैं।

श्लोक 24 · 25

अहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम।
अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम्॥

नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित्।
अयमेव हि मे बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा॥

॥ आश्चर्य ॥