आश्चर्य
Wonder · 25 श्लोक
प्रकरण 1 में अष्टावक्र ने उपदेश दिया। प्रकरण 2 में जनक की प्रतिक्रिया है। हर श्लोक “अहो” से शुरू होता है, “ओह!” यह पूरी text का दिल है। यहाँ जनक “समझे” नहीं, यहाँ जनक “हो गए”।
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडम्बितः॥
etāvantam ahaṁ kālaṁ mohenaiva viḍambitaḥ
अर्थ“ओह! मैं तो निरंजन हूँ, शान्त हूँ, बोध हूँ, प्रकृति से परे हूँ। इतने समय तक मैं मोह से ही ठगा गया।”
पाठक के लिए“विडम्बितः”, “ठगा गया”। मोह कोई बाहरी शक्ति नहीं, यह self-deception था। जनक अपने आप को धोखा देता रहा। हम सब देते रहते हैं। शायद इसी श्लोक पर ज़्यादा देर ठहरना चाहिए।
अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किञ्चन॥
ato mama jagat sarvam athavā na ca kiñcana
अर्थ“जैसे मैं अकेला इस देह को प्रकाशित करता हूँ, वैसे ही जगत को भी। इसलिए सारा जगत मेरा है, या मेरा कुछ भी नहीं।”
पाठक के लिएयह श्लोक रोज़मर्रा के “मेरा” और “नहीं मेरा” को मिटा देता है। जब “मैं” बहुत बड़ा हो जाए, “मेरा-पराया” का distinction काम नहीं करता।
कुतश्चित्कौशलाद्व पर्म आत्मा विलोक्यते॥
kutaścit kauśalād eva paramātmā vilokyate
अर्थ“ओह! शरीर सहित सारा विश्व अब मैंने त्याग दिया है। किसी कौशल से ही परम आत्मा दिख रहा है।”
पाठक के लिए“कौशल”, skill। ज्ञान कोई skill नहीं, फिर “कौशल” क्यों? क्योंकि यह perception का shift है। एक angle से देखो, संसार ही दिखता है। दूसरे angle से देखो, आत्मा ही दिखता है। “कौशल” वो angle है।
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम्॥
ātmano na tathā bhinnaṁ viśvam ātma-vinirgatam
अर्थ“जैसे लहरें, झाग, बुलबुले, पानी से अलग नहीं हैं, वैसे ही आत्मा से निकला विश्व, आत्मा से अलग नहीं है।”
पाठक के लिएआप भी एक लहर हैं। पैदा हुए, मिटेंगे। पर “आप” का जो पानी है, चेतना, वो न पैदा हुआ था न मिटेगा। यह श्लोक मृत्यु के डर का सबसे simple इलाज है।
आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम्॥
ātma-tan-mātram evedaṁ tadvad viśvaṁ vicāritam
अर्थ“जैसे विचार करने पर कपड़ा सिर्फ़ धागे ही है, वैसे ही विचार करने पर यह विश्व सिर्फ़ आत्मा ही है।”
पाठक के लिए“विचारितम्”, “विचार करने पर”। यह वेदान्त की technique है, inquiry। चीज़ों को “देखो” नहीं, “जाँचो”। हर experience को question करो, “यह क्या है?” अंत में जो बचेगा, वो आत्मा है।
तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम्॥
tathā viśvaṁ mayi kḷptaṁ mayā vyāptaṁ nirantaram
अर्थ“जैसे गन्ने के रस से बनी शक्कर उसी रस से व्याप्त रहती है, वैसे ही मुझमें कल्पित यह विश्व, मुझसे ही निरन्तर व्याप्त है।”
पाठक के लिएयह श्लोक material और consciousness का divide ख़त्म करता है। पत्थर भी चेतना। पेड़ भी चेतना। ख़याल भी चेतना। बस different densities, different forms।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद्भासते न हि॥
rajjv-ajñānād ahir bhāti taj jñānād bhāsate na hi
अर्थ“आत्मा के अज्ञान से जगत दिखता है, आत्मज्ञान से नहीं। जैसे रस्सी का अज्ञान होने पर साँप दिखता है, और रस्सी का ज्ञान होते ही साँप दिखना बन्द।”
पाठक के लिए“जगत भाति”, “जगत दिखता है”। शब्द ध्यान देने योग्य है। जनक नहीं कहते “जगत है”। वो कहते हैं “दिखता है”। दिखना एक appearance है, होना real है। दोनों different हैं।
यदा प्रकाशते विश्वं तदाहं भास एव हि॥
yadā prakāśate viśvaṁ tadāhaṁ bhāsa eva hi
अर्थ“प्रकाश मेरा स्वरूप है, मैं उससे अलग नहीं हूँ। जब विश्व प्रकाशित होता है, तब वह मेरा ही प्रकाश है।”
पाठक के लिएएक experiment। यह screen देख रहे हैं। screen को देखना possible है क्योंकि awareness है। awareness न हो, तो screen “होते हुए भी” नहीं होगी। इसका मतलब, screen का “होना” awareness पर depend करता है।
रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा॥
rūpyaṁ śuktau phaṇī rajjau vāri sūrya-kare yathā
अर्थ“ओह! अज्ञान से कल्पित यह विश्व मुझमें दिखता है, जैसे सीप में चाँदी, रस्सी में साँप, और सूरज की किरणों में जल।”
पाठक के लिएतीनों examples में एक common pattern है। मन कुछ ढूँढ़ रहा था, और जो था, उसमें वो “ढूँढ़ी हुई” चीज़ project कर दी। हमारी रोज़मर्रा भी ऐसी है। हम जो देखना चाहते हैं, अक्सर वही “देखते” हैं।
मृदि कुम्भो जले वीचिः कनके कटकं यथा॥
mṛdi kumbho jale vīciḥ kanake kaṭakaṁ yathā
अर्थ“मुझसे निकला यह विश्व मुझमें ही लय हो जाएगा, जैसे मिट्टी में घड़ा, पानी में लहर, और सोने में कंगन।”
पाठक के लिएयह श्लोक मृत्यु के बारे में नया perspective देता है। मृत्यु disappearance नहीं, return है। जैसे लहर समुद्र में लौटती है, हम चेतना में लौटते हैं। हम चेतना से अलग कभी थे ही नहीं।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशेऽपि तिष्ठतः॥
brahmādi-stamba-paryantaṁ jagan-nāśe’pi tiṣṭhataḥ
अर्थ“ओह! मुझे मेरा ही नमस्कार है। मेरा विनाश नहीं है। ब्रह्मा से लेकर तृण तक, सारा जगत नष्ट हो जाए, फिर भी मैं रहूँगा।”
पाठक के लिएयह श्लोक atheists को भी काम का है। आप ईश्वर को मानें या न मानें, चेतना तो है। उसी को “मैं” कहो, या ब्रह्म, या awareness, नाम अलग, वस्तु एक।
क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः॥
kvacin na gantā nāgantā vyāpya viśvam avasthitaḥ
अर्थ“ओह! मुझे मेरा नमस्कार। मैं एक हूँ, देह वाला होते हुए भी। कहीं जाता नहीं, आता नहीं, विश्व को व्याप्त कर के स्थित हूँ।”
पाठक के लिए“क्वचिन्न गन्ता न आगन्ता”। आप कहीं नहीं जाते, कहीं से नहीं आते। शरीर जाता है, mind जाता है, awareness बस है। एक dot की तरह नहीं, एक sky की तरह।
असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम्॥
asaṁspṛśya śarīreṇa yena viśvaṁ ciraṁ dhṛtam
अर्थ“ओह! मुझे मेरा नमस्कार। मेरे जैसा कुशल कोई नहीं। बिना शरीर से छुए, मैंने इतने समय से पूरे विश्व को धारण किया हुआ है।”
पाठक के लिए“दक्षः”, कुशल। चेतना कुछ “करती” नहीं, फिर भी सब कुछ “होता” है। यह सबसे बड़ी कुशलता है, बिना कुछ किए सब करवा देना।
अथवा यस्य मे सर्वं यद् वाङ्मनसगोचरम्॥
athavā yasya me sarvaṁ yad vāṅ-manasa-gocaram
अर्थ“ओह! मुझे मेरा नमस्कार। मेरा कुछ नहीं, या मेरा वो सब है जो वाणी और मन की पहुँच में है।”
पाठक के लिएआज जो “मेरा” है, कल नहीं रहेगा। मगर जो “मेरा” था, अगर awareness में था, तो वो “मैं” का ही हिस्सा था। इसलिए loss की बात नहीं। आज “मेरा” है, awareness में है। कल “नहीं मेरा” है, फिर भी awareness में है। दोनों situations में “मैं” बरक़रार।
अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः॥
ajñānād bhāti yatredaṁ so’ham asmi nirañjanaḥ
अर्थ“ज्ञान, ज्ञेय, और ज्ञाता, यह त्रिपुटी वास्तव में नहीं है। यह जिसमें अज्ञान से दिखती है, वही निरंजन मैं हूँ।”
पाठक के लिएयह advanced point है। सहज नहीं समझ आता। पर एक clue: सपने में आप “देखते” हैं, “देखना” होता है, “दिखता” है। सब आपके ही mind में। तीनों एक ही substrate के functions थे। जागते समय भी same है।
आत्मज्ञानामृतं प्राप्तं द्वैतमुच्चाटयाम्यहम्॥
ātma-jñānāmṛtaṁ prāptaṁ dvaitam uccāṭayāmy aham
अर्थ“ओह! द्वैत का मूल, यह ‘दो’ का भाव ही सबसे बड़ा ज़हर है। आत्मज्ञान का अमृत मिल गया, अब मैं द्वैत को निकाल फेंकता हूँ।”
पाठक के लिएहर रिश्ता द्वैत पर खड़ा है। “मैं तुमसे प्यार करता हूँ”, दो लोग चाहिए। लेकिन सबसे गहरा प्यार वो है जहाँ दो नहीं रहते। माँ-बच्चा कभी ऐसा। ध्यान में कभी ऐसा। अद्वैत प्यार का opposite नहीं, प्यार की चरम है।
अहमज्ञानगो भीतः को नु भेष्यामि निर्भयः॥
aham ajñāna-go bhītaḥ ko nu bheṣyāmi nirbhayaḥ
अर्थ“अज्ञान भय जन्म देता है, ज्ञान अभय का कारण है। मैं अज्ञान में था तो डरा। अब निर्भय हूँ, किससे डरूँ?”
पाठक के लिएएक छोटी सी practice। जब डर आए, पूछो, “किसको डर है?” “मुझे।” “वो ‘मैं’ कौन?” Body? पर body तो हर रात नींद में disappear हो जाता है, फिर डर नहीं लगता। Mind? Mind भी सपनों में बदल जाता है। फिर डरने वाला कौन? यह inquiry डर को घटाती है।
दृश्योऽनुभूयते यद्वत्तदाद्यानुभवो हि सः॥
dṛśyo’nubhūyate yadvat tad ādy-anubhavo hi saḥ
अर्थ“ओह! मुझे मेरा नमस्कार। यह ‘ज्ञान’ भी नहीं है। जैसे दृश्य अनुभव होता है, वैसे ही वह आदि अनुभव है।”
पाठक के लिए“ज्ञान” शब्द कभी-कभी रास्ता blocked कर देता है। साधक सोचने लगते हैं, “मुझे ज्ञान कब होगा?” जैसे कोई achievement हो। अष्टावक्र-जनक कहते हैं, ज्ञान कोई achievement नहीं। यह आपकी first experience है, सबसे primary।
दृश्यमेतन्मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोऽमलः॥
dṛśyam etan mṛṣā sarvam eko’haṁ cid-raso’malaḥ
अर्थ“ओह! दुःख का मूल द्वैत है, और इसकी कोई दूसरी दवा नहीं। यह जो दिखता है सब झूठ है। मैं एक चित्-रस, निर्मल हूँ।”
पाठक के लिए“मृषा” का मतलब “नहीं है” नहीं, “जैसा दिखता वैसा नहीं है”। सपना मृषा है, पर सपना देखा गया। संसार मृषा है, पर unfold हो रहा है। मगर इसके “real” होने की मान्यता दुःख देती है।
एवं विमृशतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम॥
evaṁ vimṛśato nityaṁ nirvikalpe sthitir mama
अर्थ“मैं बोध मात्र हूँ। अज्ञान से उपाधियों को मैंने कल्पना किया। ऐसा विमर्श करने वाले की स्थिति निर्विकल्प में हो जाती है।”
पाठक के लिएएक list बनाइए, “मैं ____ हूँ” को 10 ways में complete करिए। हर answer एक उपाधि है। अब उन सबको हटा दीजिए। जो बचा, वो “मैं” है। शायद कुछ नहीं बचेगा। वो “कुछ नहीं” ही सब कुछ है।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्॥
aho mayi sthitaṁ viśvaṁ vastuto na mayi sthitam
अर्थ“मेरा कोई बन्धन नहीं, न मोक्ष। भ्रम शान्त हो गया, निराश्रय हो गया। ओह! विश्व मुझमें स्थित है, और वस्तुतः मुझमें स्थित नहीं है।”
पाठक के लिएसाधक का goal “मुक्ति” होता है। अष्टावक्र कहते हैं, यह goal भी एक trap है। क्योंकि जो “मुक्त होना” चाहता है, वो मान बैठा है कि “बँधा” है। और बँधा कभी था ही नहीं। बस “मुक्त होने” की इच्छा छोड़िए, और देखिए, कोई बन्धन कहाँ है।
शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन् कल्पनाधुना॥
śuddha-cin-mātra ātmā ca tat kasmin kalpanādhunā
अर्थ“शरीर सहित यह विश्व कुछ भी नहीं, यह निश्चित हो गया। आत्मा शुद्ध चित्-मात्र है। अब कल्पना किसमें?”
पाठक के लिएहम constantly कल्पना करते हैं, future की, past की, “अगर ऐसा हो तो”, “अगर वैसा हो तो”। यह कल्पना दुःख का बड़ा source है। जब “मैं” और “बाक़ी” का divide ख़त्म होता है, कल्पना naturally settle हो जाती है।
कल्पनामात्रमेवैतत्किं मे कार्यं चिदात्मनः॥
kalpanā-mātram evaitat kiṁ me kāryaṁ cid-ātmanaḥ
अर्थ“शरीर, स्वर्ग-नरक, बन्धन-मोक्ष, भय, यह सब कल्पना मात्र है। चित्-आत्मा मुझ को इन से क्या काम?”
पाठक के लिए“स्वर्ग-नरक भी कल्पना” यह statement शायद sceptical readers को pleasing लगे, “देखो, यह तो scientist की तरह सोच रहे हैं!” मगर ध्यान रखिए, “मोक्ष भी कल्पना” भी कहा। यह atheist position नहीं, यह उससे आगे की position है।
अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम्॥
araṇyam iva saṁvṛttaṁ kva ratiṁ karavāṇy aham
अर्थ“ओह! भीड़ में भी मुझे द्वैत नहीं दिखता। जैसे जंगल बन गया हो। मैं किसमें रति करूँ?”
पाठक के लिए“रति” यानी attachment, attraction। जनक राजा हैं। उनके पास हर तरह का attraction available है। पर ज्ञान के बाद वो attraction objects “object” नहीं रहे। वो भी “मैं” का ही हिस्सा। मैं अपने आप से रति कैसे करूँ?
अयमेव हि मे बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा॥
ayam eva hi me bandha āsīd yā jīvite spṛhā
अर्थ“मैं देह नहीं, देह मेरी नहीं, मैं जीव नहीं, मैं तो चित् हूँ। मेरा बन्धन बस इतना था, जीवन की स्पृहा।”
पाठक के लिएप्रकरण 2 यहाँ ख़त्म होता है। जनक “हो गए”। बाक़ी 18 प्रकरण इसी realization की elaboration हैं। संवाद आगे चलता है, अब जनक भी बोलने लगते हैं। दोनों, गुरु और शिष्य, अब same level पर बात कर रहे हैं।