अष्टावक्र गीता · प्रकरण 2: आश्चर्य

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 2

आश्चर्य

Wonder · 25 श्लोक

प्रकरण 1 में अष्टावक्र ने उपदेश दिया। प्रकरण 2 में जनक की प्रतिक्रिया है। हर श्लोक “अहो” से शुरू होता है, “ओह!” यह पूरी text का दिल है। यहाँ जनक “समझे” नहीं, यहाँ जनक “हो गए”।

श्लोक 1
जनक उवाच
अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः।
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडम्बितः॥
aho nirañjanaḥ śānto bodho’haṁ prakṛteḥ paraḥ
etāvantam ahaṁ kālaṁ mohenaiva viḍambitaḥ

अर्थ“ओह! मैं तो निरंजन हूँ, शान्त हूँ, बोध हूँ, प्रकृति से परे हूँ। इतने समय तक मैं मोह से ही ठगा गया।”

सन्दर्भयह श्लोक पूरी अष्टावक्र गीता का hinge point है। जनक ने अष्टावक्र की बात सुनी, और कुछ हुआ। समझ नहीं, recognition। “अहो”, “ओह!”। यह intellectual reaction नहीं, यह visceral है। जैसे पूरी ज़िंदगी कुछ ढूँढ़ रहा था, अचानक पाया कि वो already पास था।

पाठक के लिए“विडम्बितः”, “ठगा गया”। मोह कोई बाहरी शक्ति नहीं, यह self-deception था। जनक अपने आप को धोखा देता रहा। हम सब देते रहते हैं। शायद इसी श्लोक पर ज़्यादा देर ठहरना चाहिए।

श्लोक 2
जनक उवाच
यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत्।
अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किञ्चन॥
yathā prakāśayāmy eko dehamenaṁ tathā jagat
ato mama jagat sarvam athavā na ca kiñcana

अर्थ“जैसे मैं अकेला इस देह को प्रकाशित करता हूँ, वैसे ही जगत को भी। इसलिए सारा जगत मेरा है, या मेरा कुछ भी नहीं।”

सन्दर्भ“मेरा सब है, या मेरा कुछ नहीं”, यह विरोधाभास नहीं। दोनों एक ही point को कह रहे हैं। अगर “मैं” चेतना है, तो सब उसी में दिखता है, सब “मेरा”। और अगर “मैं” चेतना है, तो कोई separate “मैं” है नहीं जिसके पास कुछ हो, इसलिए “कुछ नहीं”।

पाठक के लिएयह श्लोक रोज़मर्रा के “मेरा” और “नहीं मेरा” को मिटा देता है। जब “मैं” बहुत बड़ा हो जाए, “मेरा-पराया” का distinction काम नहीं करता।

श्लोक 3
जनक उवाच
सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाधुना।
कुतश्चित्कौशलाद्व पर्म आत्मा विलोक्यते॥
sa-śarīram aho viśvaṁ parityajya mayādhunā
kutaścit kauśalād eva paramātmā vilokyate

अर्थ“ओह! शरीर सहित सारा विश्व अब मैंने त्याग दिया है। किसी कौशल से ही परम आत्मा दिख रहा है।”

सन्दर्भ“त्याग” शारीरिक नहीं, perceptual है। जनक राजगद्दी छोड़ कर जंगल नहीं गया। पर “विश्व” मानो उसके लिए छूट गया। क्योंकि “मैं” विश्व से अलग हो गया।

पाठक के लिए“कौशल”, skill। ज्ञान कोई skill नहीं, फिर “कौशल” क्यों? क्योंकि यह perception का shift है। एक angle से देखो, संसार ही दिखता है। दूसरे angle से देखो, आत्मा ही दिखता है। “कौशल” वो angle है।

श्लोक 4
जनक उवाच
यथा न तोयतो भिन्नास्तरङ्गाः फेनबुद्बुदाः।
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम्॥
yathā na toyato bhinnās taraṅgāḥ phena-budbudāḥ
ātmano na tathā bhinnaṁ viśvam ātma-vinirgatam

अर्थ“जैसे लहरें, झाग, बुलबुले, पानी से अलग नहीं हैं, वैसे ही आत्मा से निकला विश्व, आत्मा से अलग नहीं है।”

सन्दर्भतरंग-समुद्र का classic वेदान्त metaphor। लहर कोई अलग चीज़ नहीं, पानी का ही एक shape है। दिख तो ऐसे है जैसे लहर पैदा हो रही है, मिट रही है, पर पानी न पैदा हो रहा न मिट रहा। ठीक वैसे ही, संसार दिख रहा है, बदल रहा है, मगर आत्मा वही है।

पाठक के लिएआप भी एक लहर हैं। पैदा हुए, मिटेंगे। पर “आप” का जो पानी है, चेतना, वो न पैदा हुआ था न मिटेगा। यह श्लोक मृत्यु के डर का सबसे simple इलाज है।

श्लोक 5
जनक उवाच
तन्तुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारितः।
आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम्॥
tantu-mātro bhaved eva paṭo yadvad vicāritaḥ
ātma-tan-mātram evedaṁ tadvad viśvaṁ vicāritam

अर्थ“जैसे विचार करने पर कपड़ा सिर्फ़ धागे ही है, वैसे ही विचार करने पर यह विश्व सिर्फ़ आत्मा ही है।”

सन्दर्भकपड़ा-धागा का metaphor। कपड़ा एक object लगता है, मगर analysis से सिर्फ़ धागे बचते हैं। कपड़ा कोई separate चीज़ नहीं, धागों का arrangement है। ठीक वैसे ही, संसार एक “thing” लगता है, पर analysis से सिर्फ़ चेतना बचती है।

पाठक के लिए“विचारितम्”, “विचार करने पर”। यह वेदान्त की technique है, inquiry। चीज़ों को “देखो” नहीं, “जाँचो”। हर experience को question करो, “यह क्या है?” अंत में जो बचेगा, वो आत्मा है।

श्लोक 6
जनक उवाच
यथैवेक्षुरसे क्लृप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा।
तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम्॥
yathaivekṣu-rase kḷptā tena vyāptaiva śarkarā
tathā viśvaṁ mayi kḷptaṁ mayā vyāptaṁ nirantaram

अर्थ“जैसे गन्ने के रस से बनी शक्कर उसी रस से व्याप्त रहती है, वैसे ही मुझमें कल्पित यह विश्व, मुझसे ही निरन्तर व्याप्त है।”

सन्दर्भशक्कर-गन्ने का metaphor। शक्कर “अलग” चीज़ नहीं, गन्ने के रस का solidified form है। हर crystal में गन्ना है। ठीक वैसे ही, हर atom में चेतना है। चेतना संसार के “अन्दर” नहीं, संसार चेतना का ही ठोस रूप है।

पाठक के लिएयह श्लोक material और consciousness का divide ख़त्म करता है। पत्थर भी चेतना। पेड़ भी चेतना। ख़याल भी चेतना। बस different densities, different forms।

श्लोक 7
जनक उवाच
आत्माज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्न भासते।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद्भासते न हि॥
ātmājñānāj jagad bhāti ātma-jñānān na bhāsate
rajjv-ajñānād ahir bhāti taj jñānād bhāsate na hi

अर्थ“आत्मा के अज्ञान से जगत दिखता है, आत्मज्ञान से नहीं। जैसे रस्सी का अज्ञान होने पर साँप दिखता है, और रस्सी का ज्ञान होते ही साँप दिखना बन्द।”

सन्दर्भरस्सी-साँप metaphor फिर से, मगर एक twist के साथ। पहले प्रकरण में अष्टावक्र ने यह metaphor use किया था। अब जनक ख़ुद use कर रहे हैं। मतलब, जनक ने सिर्फ़ सुना नहीं, अब वो भी इसी language में सोच रहे हैं।

पाठक के लिए“जगत भाति”, “जगत दिखता है”। शब्द ध्यान देने योग्य है। जनक नहीं कहते “जगत है”। वो कहते हैं “दिखता है”। दिखना एक appearance है, होना real है। दोनों different हैं।

श्लोक 8
जनक उवाच
प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः।
यदा प्रकाशते विश्वं तदाहं भास एव हि॥
prakāśo me nijaṁ rūpaṁ nātirikto’smy ahaṁ tataḥ
yadā prakāśate viśvaṁ tadāhaṁ bhāsa eva hi

अर्थ“प्रकाश मेरा स्वरूप है, मैं उससे अलग नहीं हूँ। जब विश्व प्रकाशित होता है, तब वह मेरा ही प्रकाश है।”

सन्दर्भ“प्रकाश” यहाँ light नहीं, awareness है। जो भी anything experience होता है, उसके होने का proof “अनुभव” है। और अनुभव awareness का function है। तो हर experience awareness का प्रकाश है।

पाठक के लिएएक experiment। यह screen देख रहे हैं। screen को देखना possible है क्योंकि awareness है। awareness न हो, तो screen “होते हुए भी” नहीं होगी। इसका मतलब, screen का “होना” awareness पर depend करता है।

श्लोक 9
जनक उवाच
अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते।
रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा॥
aho vikalpitaṁ viśvam ajñānān mayi bhāsate
rūpyaṁ śuktau phaṇī rajjau vāri sūrya-kare yathā

अर्थ“ओह! अज्ञान से कल्पित यह विश्व मुझमें दिखता है, जैसे सीप में चाँदी, रस्सी में साँप, और सूरज की किरणों में जल।”

सन्दर्भतीन metaphors एक साथ। सीप-चाँदी (दूर से सीप चमकती है, चाँदी जैसी लगती है), रस्सी-साँप, और सूरज-जल (mirage, रेगिस्तान में पानी का भ्रम)। तीनों एक ही बात कह रहे हैं: substrate असली है, projection illusion।

पाठक के लिएतीनों examples में एक common pattern है। मन कुछ ढूँढ़ रहा था, और जो था, उसमें वो “ढूँढ़ी हुई” चीज़ project कर दी। हमारी रोज़मर्रा भी ऐसी है। हम जो देखना चाहते हैं, अक्सर वही “देखते” हैं।

श्लोक 10
जनक उवाच
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति।
मृदि कुम्भो जले वीचिः कनके कटकं यथा॥
matto vinirgataṁ viśvaṁ mayy eva layam eṣyati
mṛdi kumbho jale vīciḥ kanake kaṭakaṁ yathā

अर्थ“मुझसे निकला यह विश्व मुझमें ही लय हो जाएगा, जैसे मिट्टी में घड़ा, पानी में लहर, और सोने में कंगन।”

सन्दर्भउत्पत्ति, स्थिति, प्रलय, तीनों एक ही substrate में। मिट्टी से घड़ा बना, मिट्टी में मिट जाएगा। पानी से लहर उठी, पानी में मिल जाएगी। सोने से कंगन ढला, सोने में पिघल जाएगा। बीच में जो “object” था, वो substrate का ही form था।

पाठक के लिएयह श्लोक मृत्यु के बारे में नया perspective देता है। मृत्यु disappearance नहीं, return है। जैसे लहर समुद्र में लौटती है, हम चेतना में लौटते हैं। हम चेतना से अलग कभी थे ही नहीं।

श्लोक 11
जनक उवाच
अहो अहं नमो मह्यं विनाशो यस्य नास्ति मे।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशेऽपि तिष्ठतः॥
aho ahaṁ namo mahyaṁ vināśo yasya nāsti me
brahmādi-stamba-paryantaṁ jagan-nāśe’pi tiṣṭhataḥ

अर्थ“ओह! मुझे मेरा ही नमस्कार है। मेरा विनाश नहीं है। ब्रह्मा से लेकर तृण तक, सारा जगत नष्ट हो जाए, फिर भी मैं रहूँगा।”

सन्दर्भ“अहं नमो मह्यं”, “मैं अपने आप को नमस्कार करता हूँ”। यह arrogance नहीं, recognition है। जनक ने पहचान लिया कि “मैं” चेतना है। उस चेतना को नमस्कार करते हैं, क्योंकि वही पूज्य है, चाहे जिसमें भी हो।

पाठक के लिएयह श्लोक atheists को भी काम का है। आप ईश्वर को मानें या न मानें, चेतना तो है। उसी को “मैं” कहो, या ब्रह्म, या awareness, नाम अलग, वस्तु एक।

श्लोक 12
जनक उवाच
अहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानपि।
क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः॥
aho ahaṁ namo mahyam eko’haṁ dehavān api
kvacin na gantā nāgantā vyāpya viśvam avasthitaḥ

अर्थ“ओह! मुझे मेरा नमस्कार। मैं एक हूँ, देह वाला होते हुए भी। कहीं जाता नहीं, आता नहीं, विश्व को व्याप्त कर के स्थित हूँ।”

सन्दर्भ“देहवान् अपि”, “देह वाला होते हुए भी”। यह key qualification है। जनक ने शरीर नहीं छोड़ा। राजा हैं, राजा रहेंगे। पर पहचान बदल गयी। शरीर अब “मैं” नहीं, “मेरा एक aspect” है।

पाठक के लिए“क्वचिन्न गन्ता न आगन्ता”। आप कहीं नहीं जाते, कहीं से नहीं आते। शरीर जाता है, mind जाता है, awareness बस है। एक dot की तरह नहीं, एक sky की तरह।

श्लोक 13
जनक उवाच
अहो अहं नमो मह्यं दक्षो नास्तीह मत्समः।
असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम्॥
aho ahaṁ namo mahyaṁ dakṣo nāstīha mat-samaḥ
asaṁspṛśya śarīreṇa yena viśvaṁ ciraṁ dhṛtam

अर्थ“ओह! मुझे मेरा नमस्कार। मेरे जैसा कुशल कोई नहीं। बिना शरीर से छुए, मैंने इतने समय से पूरे विश्व को धारण किया हुआ है।”

सन्दर्भ“असंस्पृश्य शरीरेण”, “बिना शरीर से छुए”। चेतना bodyless है, फिर भी देह को धारण करती है। यह paradox है, magic नहीं। सूरज पृथ्वी को रोशन करता है, पृथ्वी को छुए बिना। चेतना ऐसी ही है।

पाठक के लिए“दक्षः”, कुशल। चेतना कुछ “करती” नहीं, फिर भी सब कुछ “होता” है। यह सबसे बड़ी कुशलता है, बिना कुछ किए सब करवा देना।

श्लोक 14
जनक उवाच
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किञ्चन।
अथवा यस्य मे सर्वं यद् वाङ्मनसगोचरम्॥
aho ahaṁ namo mahyaṁ yasya me nāsti kiñcana
athavā yasya me sarvaṁ yad vāṅ-manasa-gocaram

अर्थ“ओह! मुझे मेरा नमस्कार। मेरा कुछ नहीं, या मेरा वो सब है जो वाणी और मन की पहुँच में है।”

सन्दर्भदोनों एक साथ। “कुछ नहीं” because कोई separate “मैं” नहीं जिसके पास possessions हों। “सब कुछ” because चेतना ही सबका substrate है। यह paradox नहीं, दोनों angles सच हैं।

पाठक के लिएआज जो “मेरा” है, कल नहीं रहेगा। मगर जो “मेरा” था, अगर awareness में था, तो वो “मैं” का ही हिस्सा था। इसलिए loss की बात नहीं। आज “मेरा” है, awareness में है। कल “नहीं मेरा” है, फिर भी awareness में है। दोनों situations में “मैं” बरक़रार।

श्लोक 15
जनक उवाच
ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम्।
अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः॥
jñānaṁ jñeyaṁ tathā jñātā tritayaṁ nāsti vāstavam
ajñānād bhāti yatredaṁ so’ham asmi nirañjanaḥ

अर्थ“ज्ञान, ज्ञेय, और ज्ञाता, यह त्रिपुटी वास्तव में नहीं है। यह जिसमें अज्ञान से दिखती है, वही निरंजन मैं हूँ।”

सन्दर्भ“त्रिपुटी” (triple): knower, knowing, known। हर experience में यह तीन अलग दिखते हैं। मैं देखता हूँ, देखना, जो दिखा। अष्टावक्र-जनक कहते हैं, यह तीन भी अज्ञान का product हैं। असल में सिर्फ़ “देखना” है, अकेला, बिना देखने वाले और दिखने वाले के।

पाठक के लिएयह advanced point है। सहज नहीं समझ आता। पर एक clue: सपने में आप “देखते” हैं, “देखना” होता है, “दिखता” है। सब आपके ही mind में। तीनों एक ही substrate के functions थे। जागते समय भी same है।

श्लोक 16
जनक उवाच
अहो द्वैतस्य मूलं मे द्वयमेव परं विषम्।
आत्मज्ञानामृतं प्राप्तं द्वैतमुच्चाटयाम्यहम्॥
aho dvaitasya mūlaṁ me dvayam eva paraṁ viṣam
ātma-jñānāmṛtaṁ prāptaṁ dvaitam uccāṭayāmy aham

अर्थ“ओह! द्वैत का मूल, यह ‘दो’ का भाव ही सबसे बड़ा ज़हर है। आत्मज्ञान का अमृत मिल गया, अब मैं द्वैत को निकाल फेंकता हूँ।”

सन्दर्भ“द्वैत का ज़हर”। द्वैत यानी “दो”, subject-object, मैं-तुम, अच्छा-बुरा। हर पीड़ा का root यही है, “मैं” और “मेरे न होने वाला कुछ”। अद्वैत यानी “दो नहीं”, सिर्फ़ एक। और एक में पीड़ा का scope ही नहीं।

पाठक के लिएहर रिश्ता द्वैत पर खड़ा है। “मैं तुमसे प्यार करता हूँ”, दो लोग चाहिए। लेकिन सबसे गहरा प्यार वो है जहाँ दो नहीं रहते। माँ-बच्चा कभी ऐसा। ध्यान में कभी ऐसा। अद्वैत प्यार का opposite नहीं, प्यार की चरम है।

श्लोक 17
जनक उवाच
अज्ञानं भयजननं ज्ञानं चाभयकारणम्।
अहमज्ञानगो भीतः को नु भेष्यामि निर्भयः॥
ajñānaṁ bhaya-jananaṁ jñānaṁ cābhaya-kāraṇam
aham ajñāna-go bhītaḥ ko nu bheṣyāmi nirbhayaḥ

अर्थ“अज्ञान भय जन्म देता है, ज्ञान अभय का कारण है। मैं अज्ञान में था तो डरा। अब निर्भय हूँ, किससे डरूँ?”

सन्दर्भहर डर की जड़ में “मैं” है जो miss हो सकता है। अगर “मैं” शरीर है, तो शरीर के nuकसान का डर। अगर “मैं” reputation है, तो reputation का डर। पर अगर “मैं” चेतना है, तो चेतना को कुछ हो ही नहीं सकता। डर का base ही ख़त्म।

पाठक के लिएएक छोटी सी practice। जब डर आए, पूछो, “किसको डर है?” “मुझे।” “वो ‘मैं’ कौन?” Body? पर body तो हर रात नींद में disappear हो जाता है, फिर डर नहीं लगता। Mind? Mind भी सपनों में बदल जाता है। फिर डरने वाला कौन? यह inquiry डर को घटाती है।

श्लोक 18
जनक उवाच
अहो अहं नमो मह्यं तज्ज्ञानमपि नास्ति यत्।
दृश्योऽनुभूयते यद्वत्तदाद्यानुभवो हि सः॥
aho ahaṁ namo mahyaṁ taj jñānam api nāsti yat
dṛśyo’nubhūyate yadvat tad ādy-anubhavo hi saḥ

अर्थ“ओह! मुझे मेरा नमस्कार। यह ‘ज्ञान’ भी नहीं है। जैसे दृश्य अनुभव होता है, वैसे ही वह आदि अनुभव है।”

सन्दर्भ“ज्ञान” शब्द भी छूट गया। क्योंकि “ज्ञान” object लगता है, कुछ जिसे “पाया” गया। पर असली recognition object नहीं, “अनुभव” है, अधिक सीधा, अधिक primary। हर experience के पीछे जो experiencer है, वो ख़ुद experience है।

पाठक के लिए“ज्ञान” शब्द कभी-कभी रास्ता blocked कर देता है। साधक सोचने लगते हैं, “मुझे ज्ञान कब होगा?” जैसे कोई achievement हो। अष्टावक्र-जनक कहते हैं, ज्ञान कोई achievement नहीं। यह आपकी first experience है, सबसे primary।

श्लोक 19
जनक उवाच
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्यास्ति भेषजम्।
दृश्यमेतन्मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोऽमलः॥
dvaita-mūlam aho duḥkhaṁ nānyat tasyāsti bheṣajam
dṛśyam etan mṛṣā sarvam eko’haṁ cid-raso’malaḥ

अर्थ“ओह! दुःख का मूल द्वैत है, और इसकी कोई दूसरी दवा नहीं। यह जो दिखता है सब झूठ है। मैं एक चित्-रस, निर्मल हूँ।”

सन्दर्भ“भेषज”, दवा। बाक़ी सब दवाएँ symptoms का इलाज हैं। तनाव के लिए meditation, अकेलेपन के लिए company, उदासी के लिए therapy। सब काम करती हैं, मगर कुछ समय के लिए। असली बीमारी “दो” का भाव है। और अद्वैत-ज्ञान ही उसकी इकलौती दवा।

पाठक के लिए“मृषा” का मतलब “नहीं है” नहीं, “जैसा दिखता वैसा नहीं है”। सपना मृषा है, पर सपना देखा गया। संसार मृषा है, पर unfold हो रहा है। मगर इसके “real” होने की मान्यता दुःख देती है।

श्लोक 20
जनक उवाच
बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया।
एवं विमृशतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम॥
bodha-mātro’ham ajñānād upādhiḥ kalpito mayā
evaṁ vimṛśato nityaṁ nirvikalpe sthitir mama

अर्थ“मैं बोध मात्र हूँ। अज्ञान से उपाधियों को मैंने कल्पना किया। ऐसा विमर्श करने वाले की स्थिति निर्विकल्प में हो जाती है।”

सन्दर्भ“उपाधि”, super-imposition। जैसे जल पर बादल के साथ रंग आ जाता है। जल original रहता है, बस colours उपाधि हैं। ठीक वैसे ही, “मैं पुरुष हूँ, मैं भारतीय हूँ, मैं engineer हूँ”, सब उपाधियाँ। नीचे पड़ा “मैं” बस बोध है।

पाठक के लिएएक list बनाइए, “मैं ____ हूँ” को 10 ways में complete करिए। हर answer एक उपाधि है। अब उन सबको हटा दीजिए। जो बचा, वो “मैं” है। शायद कुछ नहीं बचेगा। वो “कुछ नहीं” ही सब कुछ है।

श्लोक 21
जनक उवाच
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्ता निराश्रया।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम्॥
na me bandho’sti mokṣo vā bhrāntiḥ śāntā nirāśrayā
aho mayi sthitaṁ viśvaṁ vastuto na mayi sthitam

अर्थ“मेरा कोई बन्धन नहीं, न मोक्ष। भ्रम शान्त हो गया, निराश्रय हो गया। ओह! विश्व मुझमें स्थित है, और वस्तुतः मुझमें स्थित नहीं है।”

सन्दर्भ“न बन्ध, न मोक्ष”। यह विरोधाभास नहीं। बन्धन कभी था ही नहीं, तो मोक्ष कैसा? बन्धन एक मान्यता थी, वो गयी, बस। मुक्ति नयी state नहीं, original state की recognition है।

पाठक के लिएसाधक का goal “मुक्ति” होता है। अष्टावक्र कहते हैं, यह goal भी एक trap है। क्योंकि जो “मुक्त होना” चाहता है, वो मान बैठा है कि “बँधा” है। और बँधा कभी था ही नहीं। बस “मुक्त होने” की इच्छा छोड़िए, और देखिए, कोई बन्धन कहाँ है।

श्लोक 22
जनक उवाच
सशरीरमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चितम्।
शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन् कल्पनाधुना॥
sa-śarīram idaṁ viśvaṁ na kiñcid iti niścitam
śuddha-cin-mātra ātmā ca tat kasmin kalpanādhunā

अर्थ“शरीर सहित यह विश्व कुछ भी नहीं, यह निश्चित हो गया। आत्मा शुद्ध चित्-मात्र है। अब कल्पना किसमें?”

सन्दर्भ“कल्पना किसमें?” यह क्या प्रश्न है? कल्पना के लिए दो चाहिए, कल्पना करने वाला और कल्पना की वस्तु। पर अब दो नहीं हैं। बस चेतना है, अकेली। तो कल्पना का scope ख़त्म।

पाठक के लिएहम constantly कल्पना करते हैं, future की, past की, “अगर ऐसा हो तो”, “अगर वैसा हो तो”। यह कल्पना दुःख का बड़ा source है। जब “मैं” और “बाक़ी” का divide ख़त्म होता है, कल्पना naturally settle हो जाती है।

श्लोक 23
जनक उवाच
शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा।
कल्पनामात्रमेवैतत्किं मे कार्यं चिदात्मनः॥
śarīraṁ svarga-narakau bandha-mokṣau bhayaṁ tathā
kalpanā-mātram evaitat kiṁ me kāryaṁ cid-ātmanaḥ

अर्थ“शरीर, स्वर्ग-नरक, बन्धन-मोक्ष, भय, यह सब कल्पना मात्र है। चित्-आत्मा मुझ को इन से क्या काम?”

सन्दर्भList देखिए। शरीर, स्वर्ग, नरक, बन्ध, मोक्ष, भय, छह बड़े-बड़े categories। जिन पर पूरी ज़िंदगी टिकी रहती है। अष्टावक्र-जनक कहते हैं, सब कल्पना।

पाठक के लिए“स्वर्ग-नरक भी कल्पना” यह statement शायद sceptical readers को pleasing लगे, “देखो, यह तो scientist की तरह सोच रहे हैं!” मगर ध्यान रखिए, “मोक्ष भी कल्पना” भी कहा। यह atheist position नहीं, यह उससे आगे की position है।

श्लोक 24
जनक उवाच
अहो जनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम।
अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम्॥
aho jana-samūhe’pi na dvaitaṁ paśyato mama
araṇyam iva saṁvṛttaṁ kva ratiṁ karavāṇy aham

अर्थ“ओह! भीड़ में भी मुझे द्वैत नहीं दिखता। जैसे जंगल बन गया हो। मैं किसमें रति करूँ?”

सन्दर्भ“जनसमूह = अरण्य”। भीड़ और जंगल बराबर। दोनों में कोई “दूसरा” नहीं। क्योंकि “दूसरा” तो mind बनाता है। अद्वैत में “मैं और बाक़ी” का distinction collapse हो जाता है।

पाठक के लिए“रति” यानी attachment, attraction। जनक राजा हैं। उनके पास हर तरह का attraction available है। पर ज्ञान के बाद वो attraction objects “object” नहीं रहे। वो भी “मैं” का ही हिस्सा। मैं अपने आप से रति कैसे करूँ?

श्लोक 25
जनक उवाच
नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित्।
अयमेव हि मे बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा॥
nāhaṁ deho na me deho jīvo nāham ahaṁ hi cit
ayam eva hi me bandha āsīd yā jīvite spṛhā

अर्थ“मैं देह नहीं, देह मेरी नहीं, मैं जीव नहीं, मैं तो चित् हूँ। मेरा बन्धन बस इतना था, जीवन की स्पृहा।”

सन्दर्भ“जीविते स्पृहा”, “जीवन की चाह”। यह बहुत subtle point है। हम सोचते हैं बन्धन धन-दौलत में, इच्छाओं में है। अष्टावक्र-जनक कहते हैं, बन्धन सबसे basic level पर है, “जीने” की चाह में। यह चाह छूट जाए, बाक़ी सब अपने आप settle।

पाठक के लिएप्रकरण 2 यहाँ ख़त्म होता है। जनक “हो गए”। बाक़ी 18 प्रकरण इसी realization की elaboration हैं। संवाद आगे चलता है, अब जनक भी बोलने लगते हैं। दोनों, गुरु और शिष्य, अब same level पर बात कर रहे हैं।

॥ आश्चर्य ॥