अष्टावक्र गीता · प्रकरण 4: सर्वत्र

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 4

सर्वत्र

Everywhere · 6 श्लोक

जनक अब बोलते हैं। छह छोटे श्लोक, हर एक एक pearls। ज्ञानी सब जगह आत्मा को देखता है, और कोई भी situation उसे विचलित नहीं कर सकती। यह छोटा सा प्रकरण पूरे text की tone को settle करता है।

श्लोक 1
जनक उवाच
हन्तात्मज्ञानस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।
न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता॥
hantātma-jñānasya dhīrasya khelato bhoga-līlayā
na hi saṁsāra-vāhīkair mūḍhaiḥ saha samānatā

अर्थ“हाँ! भोग की लीला से खेलते आत्म-ज्ञानी धीर की, संसार के बोझ को ढोने वाले मूढ़ों से कोई समानता नहीं।”

सन्दर्भदो लोग same activity कर रहे हैं, मगर एक “खेल” रहा है, दूसरा “ढो” रहा है। बाहर से देखो तो दोनों एक से। अन्दर से एक ज़मीन-आसमान का फ़र्क़। ज्ञानी की “लीला” है, बाक़ी का “बोझ”।

पाठक के लिएदिन भर का काम वही, मगर attitude बदलता है। “मुझे यह करना पड़ रहा है” से “मैं यह कर रहा हूँ” में shift। फिर “मैं” भी थोड़ा loose, “यह हो रहा है” में shift। यह progression है।

श्लोक 2
जनक उवाच
यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥
yat padaṁ prepsavo dīnāḥ śakrādyāḥ sarva-devatāḥ
aho tatra sthito yogī na harṣam upagacchati

अर्थ“जिस पद को इन्द्र आदि सब देवता दीन हो कर चाहते हैं, ओह! उसमें स्थित योगी हर्षित भी नहीं होता।”

सन्दर्भदेवता “दीन” है, क्योंकि वो “चाह” रहा है। और योगी, जो पास खड़ा है, वो “हर्षित” भी नहीं। क्योंकि उसे पता है, यह कोई achievement नहीं। यह natural state है, सबकी।

पाठक के लिए“हर्षित न होना” depression नहीं है। यह उससे आगे की state है। पहले excitement आता है, फिर settle होता है, फिर baseline एक calm में बदल जाता है। उस calm से देखो तो “उत्साह” भी एक wave लगता है।

श्लोक 3
जनक उवाच
तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।
न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः॥
taj-jñasya puṇya-pāpābhyāṁ sparśo hy antar na jāyate
na hy ākāśasya dhūmena dṛśyamānāpi saṅgatiḥ

अर्थ“उस ज्ञानी को पुण्य और पाप का स्पर्श अन्दर नहीं होता। जैसे आकाश का, धुएँ के साथ दिखाई देने वाला साथ भी, सच में साथ नहीं।”

सन्दर्भआकाश-धुआँ का metaphor। धुआँ आकाश में फैलता है, “लगता है” मिल गया। पर आकाश तो वही है, untouched। धुआँ ख़त्म हो जाता है, आकाश रहता है। ठीक वैसे ही, पुण्य-पाप ज्ञानी के मन में आते हैं, मगर असली “मैं” untouched।

पाठक के लिएयह श्लोक misunderstood हो सकता है। “तो ज्ञानी कुछ भी कर सकता है?” नहीं। ज्ञानी पुण्य-पाप करता है, मगर “करता हूँ” का sense नहीं। और जो “मैं” है, वो उन कर्मों से colour नहीं होता।

श्लोक 4
जनक उवाच
आत्मैवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।
यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः॥
ātmaivedaṁ jagat sarvaṁ jñātaṁ yena mahātmanā
yadṛcchayā vartamānaṁ taṁ niṣeddhuṁ kṣameta kaḥ

अर्थ“‘यह सारा जगत आत्मा ही है’ यह जिस महात्मा ने जान लिया, उस अनायास बर्ताव करने वाले को कौन रोक सकता है?”

सन्दर्भज्ञानी “yadṛcchayā” अनायास, spontaneously चलता है। उसमें कोई planning नहीं। और उसे कोई “stop” नहीं कर सकता, क्योंकि वो किसी direction में जा ही नहीं रहा। बस हो रहा है।

पाठक के लिएहम सब कुछ “plan” करते हैं। “अगले हफ़्ते यह, अगले महीने वो”। और plans टूटते हैं तो दुःख। ज्ञानी की “plan” बहुत loose है। जो आ जाए, ठीक है।

श्लोक 5
जनक उवाच
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।
विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने॥
ā-brahma-stamba-paryante bhūta-grāme catur-vidhe
vijñasyaiva hi sāmarthyam icchā-nicchā-vivarjane

अर्थ“ब्रह्मा से लेकर तृण तक, चार प्रकार के प्राणियों में, सिर्फ़ ज्ञानी में ही यह सामर्थ्य है, इच्छा और अनिच्छा को छोड़ने का।”

सन्दर्भ“इच्छा-अनिच्छा”। यह दोनों polar opposites नहीं, एक ही coin के दो side हैं। “चाह” और “ना-चाह”। ज्ञानी दोनों से परे। उसकी position neutral नहीं, transcendent है।

पाठक के लिएहम सोचते हैं “इच्छा” बुरी है, “अनिच्छा” अच्छी। मगर “मुझे यह नहीं चाहिए” भी एक इच्छा ही है, negative form में। ज्ञानी दोनों games से बाहर।

श्लोक 6
जनक उवाच
आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानाति जगदीश्वरम्।
यद्वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्॥
ātmānam advayaṁ kaścij jānāti jagad-īśvaram
yad vetti tat sa kurute na bhayaṁ tasya kutracit

अर्थ“कोई ही आत्मा को अद्वय और जगदीश्वर जानता है। जो जानता है, वो वही करता है। उसे कहीं भय नहीं।”

सन्दर्भ“कोई ही”। यह दुर्लभ है। हर इन्सान आत्मा है, मगर हर इन्सान को यह पहचान नहीं। यह recognition rare है, magical नहीं। बस ध्यान का काम है, sustained inquiry।

पाठक के लिएप्रकरण 4 ख़त्म। छोटा प्रकरण, मगर सबसे important point: “यद् वेत्ति तत् स कुरुते”। “जो जानता है, वो वही करता है”। यानी ज्ञान और कर्म अलग नहीं। पहचान पक्की हो, action automatic है।

॥ सर्वत्र ॥