सर्वत्र
Everywhere · 6 श्लोक
जनक अब बोलते हैं। छह छोटे श्लोक, हर एक एक pearls। ज्ञानी सब जगह आत्मा को देखता है, और कोई भी situation उसे विचलित नहीं कर सकती। यह छोटा सा प्रकरण पूरे text की tone को settle करता है।
न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता॥
na hi saṁsāra-vāhīkair mūḍhaiḥ saha samānatā
अर्थ“हाँ! भोग की लीला से खेलते आत्म-ज्ञानी धीर की, संसार के बोझ को ढोने वाले मूढ़ों से कोई समानता नहीं।”
पाठक के लिएदिन भर का काम वही, मगर attitude बदलता है। “मुझे यह करना पड़ रहा है” से “मैं यह कर रहा हूँ” में shift। फिर “मैं” भी थोड़ा loose, “यह हो रहा है” में shift। यह progression है।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥
aho tatra sthito yogī na harṣam upagacchati
अर्थ“जिस पद को इन्द्र आदि सब देवता दीन हो कर चाहते हैं, ओह! उसमें स्थित योगी हर्षित भी नहीं होता।”
पाठक के लिए“हर्षित न होना” depression नहीं है। यह उससे आगे की state है। पहले excitement आता है, फिर settle होता है, फिर baseline एक calm में बदल जाता है। उस calm से देखो तो “उत्साह” भी एक wave लगता है।
न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि सङ्गतिः॥
na hy ākāśasya dhūmena dṛśyamānāpi saṅgatiḥ
अर्थ“उस ज्ञानी को पुण्य और पाप का स्पर्श अन्दर नहीं होता। जैसे आकाश का, धुएँ के साथ दिखाई देने वाला साथ भी, सच में साथ नहीं।”
पाठक के लिएयह श्लोक misunderstood हो सकता है। “तो ज्ञानी कुछ भी कर सकता है?” नहीं। ज्ञानी पुण्य-पाप करता है, मगर “करता हूँ” का sense नहीं। और जो “मैं” है, वो उन कर्मों से colour नहीं होता।
यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः॥
yadṛcchayā vartamānaṁ taṁ niṣeddhuṁ kṣameta kaḥ
अर्थ“‘यह सारा जगत आत्मा ही है’ यह जिस महात्मा ने जान लिया, उस अनायास बर्ताव करने वाले को कौन रोक सकता है?”
पाठक के लिएहम सब कुछ “plan” करते हैं। “अगले हफ़्ते यह, अगले महीने वो”। और plans टूटते हैं तो दुःख। ज्ञानी की “plan” बहुत loose है। जो आ जाए, ठीक है।
विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने॥
vijñasyaiva hi sāmarthyam icchā-nicchā-vivarjane
अर्थ“ब्रह्मा से लेकर तृण तक, चार प्रकार के प्राणियों में, सिर्फ़ ज्ञानी में ही यह सामर्थ्य है, इच्छा और अनिच्छा को छोड़ने का।”
पाठक के लिएहम सोचते हैं “इच्छा” बुरी है, “अनिच्छा” अच्छी। मगर “मुझे यह नहीं चाहिए” भी एक इच्छा ही है, negative form में। ज्ञानी दोनों games से बाहर।
यद्वेत्ति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्॥
yad vetti tat sa kurute na bhayaṁ tasya kutracit
अर्थ“कोई ही आत्मा को अद्वय और जगदीश्वर जानता है। जो जानता है, वो वही करता है। उसे कहीं भय नहीं।”
पाठक के लिएप्रकरण 4 ख़त्म। छोटा प्रकरण, मगर सबसे important point: “यद् वेत्ति तत् स कुरुते”। “जो जानता है, वो वही करता है”। यानी ज्ञान और कर्म अलग नहीं। पहचान पक्की हो, action automatic है।