राग गउड़ी पूरबी, महला 4 ॥ कामि करोधि नगरु बहु भरिआ मिलि साधू खंडल खंडा हे ॥ पूरबि लिखत लिखे गुरु पाइआ मनि हरि लिव मंडल मंडा हे ॥1॥ करि साधू अंजुली पुनु वडा हे ॥ करि डंडउत पुनु वडा हे ॥1॥ रहाउ ॥ साकत हरि रस सादु न जाणिआ तिन अंतरि हउमै कंडा हे ॥ जिउ जिउ चलहि चुभै दुखु पावहि जमकालु सहहि सिरि डंडा हे ॥2॥ हरि जन हरि हरि नामि समाणे दुखु जनम मरण भव खंडा हे ॥ अबिनासी पुरखु पाइआ परमेसरु बहु सोभ खंड ब्रहमंडा हे ॥3॥ हम गरीब मसकीन प्रभ तेरे हरि राखु राखु वड वडा हे ॥ जन नानक नामु अधारु टेक है हरि नामे ही सुखु मंडा हे ॥4॥4॥
राग गउड़ी पूरबी, महला 5 ॥ करउ बेनंती सुनहु मेरे मीता संत टहल की बेला ॥ ईहा खाटि चलहु हरि लाहा आगै बसनु सुहेला ॥1॥ अउध घटै दिनसु रैनारे ॥ मन गुर मिलि काज सवारे ॥1॥ रहाउ ॥ इहु संसारु बिकारु संसे महि तरिओ ब्रहम गिआनी ॥ जिसहि जगाइ पीआवै इहु रसु अकथ कथा तिनि जानी ॥2॥ जा कउ आए सोई बिहाझहु हरि गुर ते मनहि बसेरा ॥ निज घरि महलु पावहु सुख सहजे बहुरि न होइगो फेरा ॥3॥ अंतरजामी पुरख बिधाते सरधा मन की पूरे ॥ नानक दासु इहै सुखु मागै मो कउ करि संतन की धूरे ॥4॥5॥
गुरु अर्जन देव जी का यह आख़िरी शबद, और सोहिला का closing। शुरू में ही एक intimate बुलावा: “करउ बेनंती सुनहु मेरे मीता।” मैं विनती करता हूँ, सुनो मेरे मित्र। यह तीसरा-व्यक्ति नहीं, गुरु आपसे directly बात कर रहे हैं।
“संत टहल की बेला।” यह संत-सेवा का समय है। “बेला” यानी time, hour। हर इन्सान के पास एक window होती है, जब उसका हाथ अभी कुछ कर सकता है। उसे miss मत करो।
“ईहा खाटि चलहु हरि लाहा आगै बसनु सुहेला।” यहीं से हरि का मुनाफ़ा कमाकर चलो, आगे रहना आसान होगा। गुरु अर्जन बिज़नेस-language use कर रहे हैं। “खाटना”, “लाहा”, यह सब Punjabi व्यापारी की vocabulary है। ज़िंदगी एक trade-trip है, यहाँ कुछ कमा कर ले जाओ।
रहाउ line में एक ज़ोर: “अउध घटै दिनसु रैनारे।” आयु कम हो रही है, दिन और रात दोनों मिलकर। “मन गुर मिलि काज सवारे।” मन, गुरु से मिलकर अपना काम संवार ले। यह warning है, मगर urgency वाली, panic वाली नहीं।
“इहु संसारु बिकारु संसे महि।” यह संसार विकार और संशय में है। “तरिओ ब्रहम गिआनी।” ब्रह्म-ज्ञानी ही इसे तरता है। “जिसहि जगाइ पीआवै इहु रसु।” जिसको जगाकर वो यह रस पिलाता है, “अकथ कथा तिनि जानी”, वही अकथ कथा जान पाता है। यह कुछ practice-based नहीं, यह कृपा है। कोई जागता है, कोई नहीं। कोई पीता है, कोई नहीं।
“जा कउ आए सोई बिहाझहु।” तुम जिस काम के लिए (इस संसार में) आए हो, वही ख़रीदो। बाज़ार में आदमी हर चीज़ ख़रीद लेता है, उसी को छोड़कर जिसके लिए आया था। गुरु अर्जन का काटने वाला observation है। “हरि गुर ते मनहि बसेरा।” हरि और गुरु के द्वारा ही मन में वास होगा।
“निज घरि महलु पावहु सुख सहजे।” अपने ही घर में महल पा लो, सहज सुख से। “बहुरि न होइगो फेरा।” फिर लौटना नहीं होगा। यह सिख-वेदान्त की declaration है: मोक्ष कहीं और जाना नहीं, अपने ही “निज घर” में मिलता है।
और आख़िरी line में गुरु अर्जन भी अपने को धूल बना लेते हैं: “अंतरजामी पुरख बिधाते सरधा मन की पूरे।” हे अन्तर्यामी, मन की श्रद्धा पूरी कर। “नानक दासु इहै सुखु मागै।” नानक का दास बस यही सुख माँगता है, “मो कउ करि संतन की धूरे।” मुझे संतों की धूल बना दे।
पूरी सोहिला यहीं ख़त्म होती है। और यह आख़िरी इच्छा कि “संतों की धूल बनाओ”, यह बहुत meaningful है। ब्रह्म चाहिए नहीं, मोक्ष भी नहीं, पास बैठने का सौभाग्य भी नहीं, बस उनके पैरों की धूल। यह humility का चरम है। और शायद इसीलिए सोहिला रात को सोने से पहले पढ़ी जाती है। दिन भर के अहंकार को धोकर, धूल बनकर, सो जाओ।
[ इस अंग की गहरी चिंतना ]
सोहिला का closing। अंग 12 में तीन शबद थे, यहाँ दो और।
गुरु राम दास जी का यह शबद यह दिखाता है कि शरीर एक “नगर” है, और यह नगर “कामि करोधि” से भरा है।
दिल्ली का traffic सोचिए, सड़कें भरी हुई, हर इन्सान दूसरे को हॉर्न बजा रहा है। शरीर ऐसा ही है, मगर बाहर नहीं, अन्दर।
“मिलि साधू खंडल खंडा।” साधू मिलने पर, यह सब टूट कर बिखर जाता है। काम-क्रोध की वो जो जमी हुई गाँठ है, साधू के साथ बैठने भर से ढीली पड़ जाती है।
“पूरबि लिखत लिखे गुरु पाइआ।” गुरु मिलना संयोग नहीं, पूर्व-कर्म से लिखा होता है।
दिल्ली में जब किसी genuine spiritual guide से मिलना होता है, यह random नहीं लगता। एक specific quality होती है उस meeting में, “अब हुआ।”
गुरु अर्जन देव जी का closing shabad है, “करउ बेनंती सुनहु मेरे मीता।”
सबसे intimate बुलावा। “मित” शब्द ने hierarchy को dissolve किया, अब बस “मित।”
“संत टहल की बेला।” “यह संत-सेवा का समय है।” हर इन्सान के पास एक window होती है, जब उसका हाथ अभी कुछ कर सकता है। उसे miss मत करो।
“मो कउ करि संतन की धूरे।” “मुझे संतों की धूल बना दे।”
पूरी सोहिला यहीं ख़त्म होती है। और यह आख़िरी इच्छा “संतों की धूल बनाओ” बहुत meaningful है। ब्रह्म चाहिए नहीं, मोक्ष भी नहीं, पास बैठने का सौभाग्य भी नहीं, बस उनके पैरों की धूल।
यह humility का चरम है। और शायद इसीलिए सोहिला रात को सोने से पहले पढ़ी जाती है। दिन भर के अहंकार को धो कर, धूल बन कर, सो जाओ।
गुरु राम दास जी का यह शबद। शुरू में ही एक powerful image: “कामि करोधि नगरु बहु भरिआ।” यह शरीर एक नगर है, और यह नगर काम और क्रोध से भरा हुआ है। दिल्ली का traffic सोचिए, सड़कें भरी हुई, हर इन्सान दूसरे को हॉर्न बजा रहा है। शरीर ऐसा ही है, मगर बाहर नहीं, अन्दर।
“मिलि साधू खंडल खंडा हे।” साधू मिलने पर, यह सब टूटकर बिखर जाता है। “खंडल खंडा”, खंड-खंड हो जाते हैं। काम-क्रोध की वो जो जमी हुई गाँठ है, साधू के साथ बैठने भर से ढीली पड़ जाती है।
“पूरबि लिखत लिखे गुरु पाइआ।” गुरु मिलना संयोग नहीं, पूर्व-कर्म से लिखा होता है। मन में फिर “हरि लिव मंडल मंडा”, ईश्वर की प्रीति का मण्डल बनता है।
रहाउ line कितनी सरल है: “करि साधू अंजुली पुनु वडा हे। करि डंडउत पुनु वडा हे।” साधू को हाथ जोड़ देना ही बड़ा पुण्य है। दण्डवत् कर देना बड़ा पुण्य है। यानी मात्र इतना ही चाहिए, झुकना। आजकल लोग बहुत technique ढूँढ़ते हैं, यह आसन वो प्राणायाम। राम दास कह रहे हैं, झुक जाओ बस, बाक़ी काम तो हो जाएगा।
“साकत हरि रस सादु न जाणिआ।” “साकत” शब्द ध्यान देने योग्य है, मतलब वो आदमी जिसने हरि का स्वाद चखा ही नहीं। “तिन अंतरि हउमै कंडा हे।” उसके अन्दर अहंकार का काँटा है। “जिउ जिउ चलहि चुभै दुखु पावहि।” जैसे-जैसे चलता है, काँटा चुभता है, दुख होता है।
यह metaphor कमाल है। अहंकार पैर में एक काँटा है। जब तक खड़े हो, चुभता नहीं। चलना शुरू करते ही, एक-एक क़दम पर tease। ज़िंदगी का हर action मुश्किल लगता है, क्योंकि अहंकार चुभ रहा है। और इसका इलाज क्या? साधू-संगत में पैर धोने से काँटा निकलता है।
फिर “हरि जन” की state: “हरि नामि समाणे।” हरि के नाम में समा गए। “दुखु जनम मरण भव खंडा हे।” जन्म-मरण का दुख खंडित हो गया। और सबसे beautiful, “अबिनासी पुरखु पाइआ परमेसरु बहु सोभ खंड ब्रहमंडा हे।” अविनाशी पुरुष पा लिया, सब लोकों में सोहभा बढ़ी।
आख़िर में राम दास अपने आप को छोटा कर लेते हैं: “हम गरीब मसकीन प्रभ तेरे।” हम तेरे ग़रीब, मसकीन हैं। “हरि राखु राखु वड वडा हे।” बचा ले, बचा ले, हे बड़े वाले। “जन नानक नामु अधारु टेक है।” गुरु नानक का दास, बस नाम का सहारा है। यह वो tone है जो सिख parampara में हर ardas का closing है। मसकीनी, और नाम।