सलोक भगत कबीर जी, अंग 1364

SGGS, Ang
1364
सलोक भगत कबीर जी (आरंभ)
राग: सलोक खण्ड · रचयिता: भगत कबीर जी
पढ़ने का समय: लगभग 10 मिनट
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सलोक भगत कबीर जीउ के ॥ ॥ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥कबीर मेरी सिमरनी रसना ऊपरि राम ॥ आदि जुगादी सगल भगत ता कउ सुख बिसरामु ॥1॥

कबीर अपनी “सिमरनी” (माला, या स्मरण) describe कर रहे हैं। आम तौर पर माला हाथ में होती है, मणकों के साथ। मगर कबीर कह रहे हैं, मेरी सिमरनी अलग है।

“रसना ऊपरि राम।” मेरी ज़बान पर राम है। यानी मेरी माला, मेरा सिमरण, सब जीभ पर है। हर एक शब्द जो मैं बोलता हूँ, वो ही माला का एक मणका।

“आदि जुगादी सगल भगत।” आदि से (शुरुआत से), युगों के आरंभ से, सब भगत। “ता कउ सुख बिसरामु।” उनको सुख और विश्राम मिलता है।

यह कमाल का statement है। कबीर पारंपरिक माला को discard कर रहे हैं। यह physical माला (108 मणके, हाथ में घुमाना) वो नहीं manage करते। मगर जो भी बोलते हैं, वो ही राम-नाम।

सोचिए: आपके पास कौनसी माला है? अगर हम honestly बोलें, आज के लोगों की “माला” Instagram, WhatsApp, news feed है। हम वही “चलाते” रहते हैं। कबीर कह रहे हैं, यह माला बदलो। जो ज़बान पर है, वो ही माला है। तो उसी ज़बान को बदलो।

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सलोक 2 ॥ कबीर मेरी जाति कउ सभु को हसनेहारु ॥ बलिहारी इस जाति कउ जिह जपिओ सिरजनहारु ॥2॥

कबीर अपनी जाति के बारे में direct बोल रहे हैं। यह बहुत autobiographical है। कबीर एक जुलाहे (मुसलमान, low-caste) के घर पैदा हुए थे। उस ज़माने में दोनों identity, low-caste + Muslim, बहुत मार खाने वाली थी।

“मेरी जाति कउ सभु को हसनेहारु।” मेरी जाति पर सब हँसने वाले हैं। यह honest acknowledgment है। उच्च जाति वाले उनका मज़ाक़ उड़ाते थे।

मगर अगली line में कबीर counter-attack करते हैं: “बलिहारी इस जाति कउ।” मैं अपनी इसी जाति पर बलिहारी (निछावर) हूँ। “जिह जपिओ सिरजनहारु।” क्योंकि इस जाति में रहकर मैंने सिरजनहार (सृष्टिकर्ता) का जाप किया।

यह कबीर का सबसे defiant statement है। हाँ, मेरी जाति पर हँसो। मगर मेरी इस “नीच” जाति में रहकर ही मैंने हरि को जाना। तुम्हारी “ऊँची” जाति में रहकर तुम्हें क्या मिला?

यह सिर्फ़ कबीर के समय की बात नहीं। आज भी, low-caste, Dalit, marginalized communities की कई spiritual practices बहुत pure हैं, मगर mainstream उन पर हँसता है। कबीर इस pattern को पहले पकड़ गए, और अपनी जाति को honour भी किया।

देखें: भगत रविदास जी, जिन्होंने भी जाति को honour किया, “बेगमपुरा” का concept
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सलोक 3 ॥ कबीर डगमग किआ करहि कहा डुलावहि जीउ ॥ सरब सूख को नाइको राम नाम रसु पीउ ॥3॥

कबीर एक wavering soul को address कर रहे हैं। “डगमग किआ करहि।” डगमग (शक, हिचक) क्यों करता है? “कहा डुलावहि जीउ।” मन को क्यों डुला रहा है?

यह आम scene है: किसी ने भक्ति शुरू की, थोड़ी देर सच लगा, फिर doubt आने लगा। “क्या यह सब बस mind games है? क्या सच में कुछ है उस तरफ़?” डगमग।

कबीर का जवाब: “सरब सूख को नाइको।” सब सुखों का नायक (master)। “राम नाम रसु पीउ।” राम-नाम का रस पीओ।

कबीर सीधे recommendation दे रहे हैं। डगमग से बाहर निकलने का एक ही तरीक़ा: रस पीओ। यानी practice करो। बहस में लगने से डगमग और बढ़ेगा। मगर अगर actual experience होगा, तो doubts अपने आप गिर जाएंगे।

यह empiricism है। कबीर कह रहे हैं, “मेरी बात मत मानो, ख़ुद experiment करो। पीओ। फिर decide करो।” यह सबसे fair invitation है।

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सलोक 4 ॥ कबीर अनदा भलि एक है तिने सुनी रहीउ माइ ॥ जिनि जलि थलि तिहु लोइ रचिओ कोइ करि न सकै बुझाइ ॥4॥

कबीर एक अद्भुत claim कर रहे हैं। “अनदा भलि एक है।” वो “अनदा” (अदृश्य, अनदेखा) एक ही है। “तिने सुनी रहीउ माइ।” वो माँ (माया से, या एक माँ की लोरी जैसी) सुनाई देता रहता है।

कबीर का strange phrasing है। “अनदा” एक तरफ़ देखा नहीं जाता, मगर दूसरी तरफ़ सुनाई देता है। यह interesting paradox है: देख नहीं सकते, मगर सुन सकते हैं।

“जिनि जलि थलि तिहु लोइ रचिओ।” जिसने जल, थल, तीनों लोकों में रचना की। “कोइ करि न सकै बुझाइ।” कोई उसका bujhana (समझाना, बुझाना) नहीं कर सकता।

यह वो जो सब बना चुका, समझाया नहीं जा सकता। आप एक पंडित बैठ जाओ, सब definitions दे दो, फिर भी असली चीज़ हाथ नहीं आती। यह सिख की उपनिषद् मान्यता है, “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो।”

मगर कबीर एक solution देते हैं: “तिने सुनी रहीउ माइ।” सुनना। समझने का तरीक़ा सुनना है। वो लगातार बोल रहा है (अनहद नाद की तरह)। ध्यान दो, सुनो।

दिल्ली में हम सब बहुत बोलने वाले हैं। सुनने का abhyas कम है। कबीर कह रहे हैं, अध्यात्म पहले सुनने का काम है। वही “मा” की लोरी की तरह, continuously।

देखें: कठोपनिषद् 1.2.23, नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः
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सलोक 5 ॥ कबीर तीनि गुन तिआगहु राम धिआइ चलि भाइ ॥ जिह ठाकुर सिउ कीनी पिरीति सुहंडु सहाइ ॥5॥

कबीर एक practical instruction दे रहे हैं। “तीनि गुन तिआगहु।” तीनों गुणों (सत्व, रजस्, तमस्) का त्याग करो। “राम धिआइ चलि भाइ।” राम का ध्यान करते हुए “चलि भाइ” (भाव से चल) करो।

तीनों गुणों का त्याग? यह तो असम्भव है। हर human-action किसी गुण से उठती है। हम कैसे “गुणातीत” हो सकते हैं?

कबीर कह रहे हैं, सिर्फ़ “राम धिआइ” करो। यानी हर action में राम का ध्यान। जब ध्यान राम का है, तो गुण automatic background में चले जाते हैं। तू doer नहीं, observer बन जाता है।

“जिह ठाकुर सिउ कीनी पिरीति।” जिस ठाकुर से प्रीत की। “सुहंडु सहाइ।” वो “सुहंडु सहाइ” (शुभ-सहायक) रहता है।

यह कमाल का word है, “सुहंडु”। शायद “सुहाग” से, मतलब protector-husband। पंजाबी में “सोहाग” यानी married woman का status। यानी जिस से प्रीत की, वो आपका सुहाग-protector है। वो साथ देगा, हर वक़्त।

गीता का “योगक्षेमं वहाम्यहम्” वही बात है। कृष्ण कह रहे हैं, “मैं तेरा योग और क्षेम उठाता हूँ।” कबीर कह रहे हैं, “वो तेरा सुहंडु-सहाइ है।” अलग ज़बान, same promise।

देखें: गीता 9.22, “योगक्षेमं वहाम्यहम्”
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सलोक 6 ॥ कबीर जग महि चेति लै जिउ चेति लीउ संत ॥ नहीं तेरै कोई संगि सुणि सुणि माइआ अंत ॥6॥

कबीर एक direct नसीहत: “जग महि चेति लै।” जग में चेत जा। “जिउ चेति लीउ संत।” जैसे संतों ने चेत लिया।

यह वो moment है जिसे sanskrit में “विवेक” कहते हैं। संत वो जो अचानक एक दिन समझ गया, “अरे, यह जो मैं कर रहा हूँ, ये misdirection है।” तू भी ऐसा चेत जा।

“नहीं तेरै कोई संगि।” तेरे साथ कोई नहीं है। “सुणि सुणि माइआ अंत।” यह सुन-सुन कर, माया का अंत है।

यानी सबसे आख़िर में अकेले हो। माया (relationships, money, status) सब साथ-साथ हैं, यह मान्यता ख़त्म करो। तू अकेला आया था, अकेला जाएगा।

और सबसे tragic: “सुणि सुणि।” यह बात तू कई बार सुन चुका। हर अंत्येष्टि पर, हर नज़दीकी की मौत पर, यह बात सुनता है। मगर भूल जाता है। कबीर कह रहे हैं, इस बार सुन कर भूलना मत।

दिल्ली के बड़े-बड़े funerals में रोज़ यह scene होता है। 200 लोग आते हैं, 200 लोग जाते हैं, और मरने वाला अकेला। कबीर कह रहे हैं, यह pattern तू देख कर भी क्यों नहीं सीखता? अगली बार जब किसी की arthi उठाओ, अपने आप से पूछो, “मेरी आख़िरी journey के लिए मैं कितना तैयार हूँ?”

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सलोक 7 ॥ कबीर सब ते हम बुरे हम तजि भलो सभु कोइ ॥ जिनि ऐसा करि बूझिआ मीतु हमारा सोइ ॥7॥

कबीर की सबसे famous humility-line। “सब ते हम बुरे।” सब से मैं बुरा हूँ। “हम तजि भलो सभु कोइ।” मुझे छोड़कर सब अच्छे हैं।

यह कोई self-pity नहीं है। यह एक यौगिक stance है। कबीर अपने आप को नीचे रख रहे हैं, ताकि कोई judgment न दे सके।

“जिनि ऐसा करि बूझिआ मीतु हमारा सोइ।” जिसने ऐसा समझा (कि वो ख़ुद सबसे बुरा है), वो मेरा मित्र है।

यह तेजी कमाल का है। कबीर कह रहे हैं, मेरा मित्र वही है जो ख़ुद को नीचा रखता है। जो दूसरों को judge करता है, वो मेरा मित्र नहीं।

यह practice life-changing है। हर argument, हर conflict में, बस एक बार खुद से कहो, “मैं ही सबसे बुरा हूँ।” Conflict तुरंत defuse हो जाएगा। दूसरे को नीचा साबित करने की ज़रूरत ख़त्म, क्योंकि तू ख़ुद नीचे है। यह paradoxically सबसे ऊँचा position है।

गुरु अर्जन देव जी ने sukhmani में “मसकीन” का concept वही है। कबीर ने इसका seed बोया, गुरु अर्जन ने उगाया।

देखें: सुखमनी साहिब अष्टपदी 12, “सुखी बसै मसकीनीआ”
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सलोक 8 ॥ कबीर ऐसा कोई जनमिओ अपनै घरि लावै आगि ॥ पांचउ लरिका जारि कै रहै राम लिव लागि ॥8॥

यह सलोक अंग 1365 के सलोक 42 की repetition है, अलग संख्या में। एक important सलोक को बार-बार रखा गया है।

पाँचों बच्चे, यानी पाँच विषय-इन्द्रियाँ या पाँच विकार। अपने घर (शरीर) में आग लगा कर, उन्हें जला कर, राम-लिव में रहना है।

कबीर repetition का use intentionally करते हैं। यह तकनीक मन्त्र-शैली में आम है, बार-बार एक ही point repeat करो, ताकि memory में बैठे।

और एक subtle point: पाँचों लड़कों को जलाना मतलब “no more children” किसी पाँच विषय-इन्द्रियों से। अब केवल राम-संग। यह exclusivity है।

जैसे कोई शादीशुदा आदमी अगर अपनी पत्नी के अलावा भी कई “रिश्ते” रखे, उस “विवाह” का कोई मतलब नहीं। राम-भक्ति भी ऐसी ही है, exclusive। यह कबीर का uncompromising stance है।

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सलोक 9 ॥ कबीर माटी के हम पुतले मानस राखिओ नाउ ॥ चारि दिवस के पाहुने बड बड रूंधहि ठाउ ॥9॥

कबीर हमें humbling करते हैं। “माटी के हम पुतले।” हम मिट्टी के पुतले हैं। “मानस राखिओ नाउ।” “मनुष्य” का नाम रख दिया।

यानी असलियत में मिट्टी के putle हैं। लेकिन हमने अपना नाम “मानस” (मनुष्य) रख लिया है। यह नाम सिर्फ़ designation है, असलियत नहीं।

“चारि दिवस के पाहुने।” चार दिन के पाहुने (मेहमान) हैं। “बड बड रूंधहि ठाउ।” मगर बड़ी-बड़ी जगहें घेर लेते हैं।

यह दिल्ली पर सबसे tight comment है। 4-दिन के मेहमान, मगर 4000 sq ft farmhouse, 6 बेडरूम, multiple cars। कबीर कह रहे हैं, “तुम तो मेहमान हो, इतनी जगह क्यों रोक रहे हो?”

और “बड बड रूंधहि ठाउ” का एक और reading: सिर्फ़ physical जगह नहीं, mental जगह भी। अपने ego से कितनी जगह घेरते हैं? हर meeting में, हर conversation में, अपने आप को कितना expand करते हैं?

फ़रीद कह रहे थे “ख़ाक की निन्दा मत करो।” कबीर वही point कर रहे हैं, मगर एक step पहले: “तू माटी का पुतला है, मत भूल।” यह foundational reminder है।

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सलोक 10 ॥ कबीर महिदी करि कै घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥ तै सह बात न पुछीआ कबहु न लाई पाइ ॥10॥

कबीर एक beautiful image use कर रहे हैं। मेहंदी (henna) की कहानी। “महिदी करि कै घालिआ।” मेहंदी बना कर घोल बनाया। “आपु पीसाइ पीसाइ।” ख़ुद को पीस-पीस कर।

मेहंदी कैसे बनती है? पत्तियों को पीस-पीस कर। कबीर ख़ुद को मेहंदी बनाने की प्रक्रिया से compare कर रहे हैं। मैंने अपने आप को पीसा, ज़िंदगी की रगड़ में, साधना में।

मगर twist अगली line में: “तै सह बात न पुछीआ।” मगर तू (साईं, हरि) ने मेरी बात नहीं पूछी। “कबहु न लाई पाइ।” कभी अपने पैर पर मेहंदी नहीं लगायी।

पंजाबी विवाह में दुल्हन की मेहंदी पैर पर लगती है, यह सजावट है। कबीर कह रहे हैं, मैंने अपने आप को मेहंदी बना कर रख दिया, मगर तूने मुझे अपने पैर पर लगाया नहीं। मैं वहीं घोल बन कर रखा हूँ।

यह सूफ़ी भक्त की anguish है। मैंने सब कुछ किया, साधना की, intense practice की। मगर मेरा “साईं” मुझे अब तक स्वीकार नहीं कर रहा। यह कमी सूफ़ी भक्ति का anguish है, जो उन्हें और गहरा खींचता है।

और implicit एक बात: कबीर शिकायत कर रहे हैं, मगर शिकायत भी प्रेम का रूप है। जो intimate है, वही complain करता है। यह “साईं” से उनका रिश्ता इतना close है कि वो ऐसी बात कह सकते हैं।

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सलोक 11 ॥ कबीर जिह दरि आवत जात हहि सो दरु काहे न जाइ ॥ जिह दरि आवत जात नहीं तिह दर खोजहु जाइ ॥11॥

कबीर एक paradoxical instruction दे रहे हैं। “जिह दरि आवत जात हहि सो दरु काहे न जाइ।” जिस दरवाज़े पर लोग आते-जाते हैं, उस दरवाज़े पर क्यों जाओ?

यानी जो रास्ता बहुत प्रसिद्ध है, बहुत crowded है, उस पर मत जाओ। वो लोगों का रास्ता है, हरि का नहीं।

“जिह दरि आवत जात नहीं तिह दर खोजहु जाइ।” जिस दरवाज़े पर कोई नहीं आता-जाता, वो दरवाज़ा खोजो।

यह कबीर का most defiant statement है। mainstream से दूर। जहाँ कोई नहीं, वहाँ खोजो।

सोचो: religious destinations आज crowded हैं, Vaishno Devi line, Tirupati queue, हज की भीड़। कबीर कह रहे हैं, यह दरवाज़ा नहीं है। असली दरवाज़ा वहाँ है जहाँ अकेला होना पड़ता है। शायद अपना दिल। शायद वो जगह जहाँ कोई social validation नहीं मिलती।

यह “off the beaten path” का सबसे पुराना instruction है। हर genuine seeker ने यह feel किया है। जब आप कुछ unique खोज रहे हैं, वो popular नहीं हो सकता। नहीं तो वो already जाना-पहचाना होता।

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सलोक 12 ॥ कबीर मरि गए मरै सिउ नउ निधि लगै हाथि ॥ जिह ऊपरि मरि सकीऐ अनदु लागि सहै साथि ॥12॥

“मरि गए मरै सिउ।” मरने वाले के साथ ख़ुद को भी मार दिया। “नउ निधि लगै हाथि।” तो नौ निधियाँ हाथ लगती हैं।

यह क्या है? “मरने वाले के साथ मरना” यानी जो dying हो, उसके साथ ख़ुद भी “मर” जाओ। यह physical नहीं है। यह ego-death है। जो भी “dying” है (false self), उसी के साथ अपने attachment को मरने दो।

“जिह ऊपरि मरि सकीऐ अनदु लागि सहै साथि।” जिस पर मर सकोगे (फ़िदा हो सकोगे), उसी पर आनंद साथ रहेगा।

कबीर “fida होने” का concept ला रहे हैं। पंजाबी / उर्दू में “जान न्यौछावर करना” बहुत common है। कबीर कह रहे हैं, अगर तुम सच में किसी पर “मर मिटोगे”, उसी के साथ हमेशा आनंद रहेगा।

किस पर मर मिटना है? Implicit है: हरि पर। अपने आप को छोड़ कर हरि पर fida हो जाना। तब आनंद रहता है।

मॉडर्न parallels: कोई कलाकार जो अपनी कला पर मर मिटा है, उसी कला में आनंद पाता है। कोई वैज्ञानिक जो अपने काम पर fida है, उसी में satisfaction। कबीर कह रहे हैं, यह principle अध्यात्म में भी same है। “मरो” अपने आप को, फिर असली ज़िंदगी मिलेगी।

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सलोक 13 ॥ कबीर राम कीओ चाहीऐ जो किछु कीआ होइ ॥ जो किछु कीआ ता नही जो किछु करिआ सोइ ॥13॥

कबीर एक conceptual sentence बना रहे हैं। “राम कीओ चाहीऐ।” राम जो करना चाहता है। “जो किछु कीआ होइ।” जो कुछ हो रहा है, वो करवा रहा है।

यह कर्तृत्व-विसर्जन है। तुम doer नहीं, हरि doer है। जो हो रहा है, उसने तय किया है।

“जो किछु कीआ ता नही।” जो “मैंने किया” यह नहीं। “जो किछु करिआ सोइ।” जो वो कर रहा है, वो ही असली।

यह simple sentence है मगर बहुत गहरा। हर action के बाद हम बोलते हैं “मैंने यह किया।” कबीर कह रहे हैं, “मैंने” नहीं किया, “उसने” किया।

practical implication: कुछ अच्छा हुआ, तो अहंकार नहीं, उसका शुक्र। कुछ बुरा हुआ, तो ख़ुद को मत कोसो, उसकी मर्ज़ी समझो। यह acceptance का formula है।

गीता का “नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्” (5.8) वही है। ज्ञानी मानता है “मैं कुछ नहीं कर रहा।” कबीर वही बात कह रहे हैं, मगर punjabi/bhojpuri ज़बान में।

देखें: गीता 5.8, “नैव किञ्चित्करोमीति”
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सलोक 14 ॥ कबीर ससि घर सूर बसै सूर घर ससी ॥ तिनि निरमाइ मन कीआ बंदगी हम लसी ॥14॥

कबीर तंत्र का imagery use कर रहे हैं। “ससि घर सूर बसै।” शशि (चन्द्र) के घर में सूर (सूर्य) बसता है। “सूर घर ससी।” सूर्य के घर में शशि।

यह योग का language है। मानव शरीर में दो nadis हैं, “इडा” (चन्द्र, बायाँ नथुना) और “पिंगला” (सूर्य, दायाँ नथुना)। प्राणायाम में इन्हें balance करना सीखते हैं।

कबीर कह रहे हैं, जब यह balance हो जाए, चन्द्र-सूर्य आपस में exchange हो जाएँ, तब असली काम शुरू।

“तिनि निरमाइ मन कीआ।” फिर मन निर्मल हो जाता है। “बंदगी हम लसी।” बन्दगी (समर्पण) हो जाती है।

यह दिखाता है कि कबीर सिर्फ़ “नाम जपो” वाले बाबा नहीं थे। वो yogic practices भी जानते थे। और उन्होंने इस knowledge को अपने सलोकों में डाला।

मगर कबीर का point यह नहीं है कि सब lazy हो जाओ और प्राणायाम सीखो। वो कह रहे हैं, अगर तुम योग का marg लेते हो, तो उसका अंत भी “बंदगी” है। समर्पण ही all roads का destination है।

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सलोक 15 ॥ कबीर हरि हीरा जन जौहरी ले कै मांडै हाटु ॥ जब ही पाईऐ बोरीआ तब ही पासी छाटु ॥15॥

कबीर एक beautiful trading-image। “हरि हीरा जन जौहरी।” हरि एक हीरा है, और जन (भक्त) जौहरी (jeweller) है। “ले कै मांडै हाटु।” वो जौहरी हीरा लेकर बाज़ार में अपनी दुकान खोलता है।

यानी भक्त एक jeweller है जो हरि-रूपी हीरे को रखता है, और दुनिया को बेचता है (शिक्षा, उदाहरण, संगति के रूप में)।

“जब ही पाईऐ बोरीआ।” जब “बोरीआ” (खरीदार, या बोरा-वाला आम आदमी) मिलता है। “तब ही पासी छाटु।” तभी पास से “छाँट” (बढ़िया हीरा) निकाला जाता है।

यानी हर एक को नहीं बेचना। समझदार ग्राहक (बोरीआ here interpreted as one who has bowed, surrendered) मिले तभी असली हीरा निकालो। ऐसे ही वेद-ग्रंथ कहते हैं कि अधिकारी (qualified seeker) के सामने ही ज्ञान देना है।

modern context: spiritual teaching हर एक को नहीं दी जाती। कुछ क्षण होते हैं, कुछ लोग होते हैं, जब “asli जौहरी” अपना असली stuff निकालता है। कबीर इस selectivity को honour कर रहे हैं।

और एक secondary reading: कबीर ख़ुद को जौहरी कहते हैं। और कह रहे हैं, मेरी “हाट” (दुकान) खुली है, मगर हर एक के लिए नहीं। जो असली ग्राहक है, उसी को असली हीरा मिलता है।