लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग केदारा

राग · M4-M5

राग केदारा

रात का राग, राजसी और धीमा।

केदारा रात का राग है, श्रेष्ठ, संगीत-गोष्ठियों में बहु-प्रिय। हिंदुस्तानी शास्त्रीय परम्परा में इसकी ऊँची-जगह है, और कई शास्त्रीय गायक-गायिकाएँ इसे अपनी मुख्य-निधि मानते हैं।

नाम का सम्बन्ध हिमालय के केदारनाथ-क्षेत्र से जुड़ा बताया जाता है, हालाँकि यह स्पष्ट नहीं। ग्रंथ में केदारा की रचनाएँ अंग ग्यारह-सौ-अठारह के क़रीब से शुरू होती हैं।

"मेरे मन राम नाम नित गावीऐ रे ॥" केदारा M4
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 4 (2)
  1. मेरे मन राम नाम नित गावीऐ रे ॥अंग 1118
  2. मेरे मन हरि हरि गुन कहु रे ॥अंग 1118
महला 5 (15)
  1. माई संतसंगि जागी ॥अंग 1119
  2. दीन बिनउ सुनु दइआल ॥अंग 1119
  3. सरनी आइओ नाथ निधान ॥अंग 1119
  4. हरि के दरसन को मनि चाउ ॥अंग 1119
  5. प्रिअ की प्रीति पिआरी ॥अंग 1120
  6. हरि हरि हरि गुन गावहु ॥अंग 1120
  7. हरि बिनु जनमु अकारथ जात ॥अंग 1120
  8. हरि बिनु कोइ न चालसि साथ ॥अंग 1120
  9. बिसरत नाहि मन ते हरी ॥अंग 1120
  10. प्रीतम बसत रिद महि खोर ॥अंग 1121
  11. रसना राम राम बखानु ॥अंग 1121
  12. हरि के नाम को आधारु ॥अंग 1121
  13. हरि के नाम बिनु ध्रिगु स्रोत ॥अंग 1121
  14. संतह धूरि ले मुखि मली ॥अंग 1121
  15. मिलु मेरे प्रीतम पिआरिआ ॥ रहाउ ॥अंग 1122
भगत कबीर जी (6)
  1. उसतति निंदा दोऊ बिबरजित तजहु मानु अभिमाना ॥अंग 1123
  2. किनही बनजिआ कांसी तांबा किनही लउग सुपारी ॥अंग 1123
  3. री कलवारि गवारि मूढ मति उलटो पवनु फिरावउ ॥अंग 1123
  4. काम क्रोध त्रिसना के लीने गति नही एकै जानी ॥अंग 1123
  5. टेढी पाग टेढे चले लागे बीरे खान ॥अंग 1124
  6. चारि दिन अपनी नउबति चले बजाइ ॥अंग 1124
भगत रविदास जी (1)
  1. खटु करम कुल संजुगतु है हरि भगति हिरदै नाहि ॥अंग 1124

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