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अंग 1119

अंग
1119
राग केदारा
राग: केदारा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अंतर का अभिमानु जोरु तू किछु किछु किछु जानता इहु दूरि करहु आपन गहु रे ॥
जन नानक कउ हरि दइआल होहु सुआमी हरि संतन की धूरि करि हरे ॥2॥1॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! अपने अंदर का ये गुमान-हैंकड़ दूर कर कि आप बहुत कुछ जानता है (कि आप बड़ा समझदार है)। हे भाई ! अपने आप को वश में रख। हे हरी ! हे स्वामी ! दास नानक पर दयावान हो। (दास नानक को) संत जनों के चरणों की धूड़ बनाए रख। 2। 1। 2।
केदारा महला 5 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माई संतसंगि जागी ॥
प्रिअ रंग देखै जपती नामु निधानी ॥ रहाउ ॥
दरसन पिआस लोचन तार लागी ॥
बिसरी तिआस बिडानी ॥1॥
अब गुरु पाइओ है सहज सुखदाइक दरसनु पेखत मनु लपटानी ॥
देखि दमोदर रहसु मनि उपजिओ नानक प्रिअ अंम्रित बानी ॥2॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5 घरु 2 वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे माँ ! (जो जीव-स्त्री) गुरू की संगति में (टिक के माया के मोह की नींद में से) जाग उठती है। (वह हर तरफ) प्यारे प्रभू के ही (किए) करिश्मे देखती है। (वह जीव-स्त्री परमात्मा का) नाम जपती सुखों के खजाने वाली बन जाती है। रहाउ। हे माँ ! (जो जीव-स्त्री गुरू की संगति में टिक के माया के मोह की नींद से जाग उठती है। उसके अंदर परमात्मा के) दर्शनों की तड़प बनी रहती है (दशर्नों के इन्तजार में उसकी) आँखों की तार बँधी रहती है। उसे और किसी की प्यास याद ही नहीं रहती। 1। हे माँ ! (मुझे भी) अब आत्मिक अडोलता वाला आनंद देने वाला गुरू मिल गया है। (उसके) दर्शन करके (मेरा) मन (उसके चरणों से) लिपट गया है। हे नानक ! (कह- हे माँ !) परमात्मा के दर्शन कर के मन में हुल्लास पैदा हो जाता है। हे माँ ! प्यारे प्रभू की सिफतसालाह की बाणी आत्मिक जीवन देने वाली है। 2। 1।
केदारा महला 5 घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दीन बिनउ सुनु दइआल ॥
पंच दास तीनि दोखी एक मनु अनाथ नाथ ॥
राखु हो किरपाल ॥ रहाउ ॥
अनिक जतन गवनु करउ ॥
खटु करम जुगति धिआनु धरउ ॥
उपाव सगल करि हारिओ नह नह हुटहि बिकराल ॥1॥
सरणि बंदन करुणा पते ॥
भव हरण हरि हरि हरि हरे ॥
एक तूही दीन दइआल ॥
प्रभ चरन नानक आसरो ॥
उधरे भ्रम मोह सागर ॥
लगि संतना पग पाल ॥2॥1॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5 घरु 3 वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे दयालु प्रभू ! हे अनाथों के नाथ ! मेरी गरीब की विनती सुन- (मेरा यह) एक मन है। (कामादिक) पाँचों (कामादिकों) का गुलाम (बना हुआ) है। माया के तीन गुण इसके वैरी हैं। हे कृपाल प्रभू ! (मुझे इनसे) बचा ले। रहाउ। हे प्रभू ! (इनसे बचने के लिए) मैं कई उपाय करता हूँ। मैं तीर्थों पर जाता हूँ। मैं छह (रोजाना) कर्मों की मर्यादा निभाता हूँ। मैं समाधियां लगाता हूँ। हे प्रभू ! मैं सारे उपाय कर के थक गया हॅूँ। पर ये डरावने विकार (मेरे ऊपर हमले करने से) थकते नहीं हैं। 1। हे दया के मालिक प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। हे जनम-मरण के चक्कर दूर करने वाले हरी ! मैं आपके दर पर सिर झुकाता हूँ। हे दीनों पर दया करने वाले !् (मेरा) सिर्फ आप ही (रखवाला) है। हे प्रभू ! नानक को आपके ही चरणों का आसरा है। हे प्रभू ! आपके संत जनों के चरणों में लग के। आपके संतजनों का पल्ला पकड़ के (अनेकों जीव) भरम के मोह के समुंद्र (में डूबने) से बच गए। 2। 1। 2।
केदारा महला 5 घरु 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सरनी आइओ नाथ निधान ॥
नाम प्रीति लागी मन भीतरि मागन कउ हरि दान ॥1॥ रहाउ ॥
सुखदाई पूरन परमेसुर करि किरपा राखहु मान ॥
देहु प्रीति साधू संगि सुआमी हरि गुन रसन बखान ॥1॥
गोपाल दइआल गोबिद दमोदर निरमल कथा गिआन ॥
नानक कउ हरि कै रंगि रागहु चरन कमल संगि धिआन ॥2॥1॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5 घरु 4 वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे नाथ ! हे (सुखों के) खजाने ! मेरे मन में आपके नाम का प्यार पैदा हैं गया है। हे हरी ! आपके नाम का दान माँगने के लिए मैं आपकी शरण आया हूँ। 1। रहाउ। हे सुखदाते ! हे सर्व गुण भरपूर ! हे सबसे ऊँचे मालिक ! मेहर कर। (मेरी। शरण आए की) लाज रख ले। हे स्वामी ! गुरू की संगति में (रख के मुझे अपना) प्यार बख्श। हे हरी ! मेरी जीभ आपके गुण उचारती रहे। 1। हे गोपाल ! हे दयाल ! हे गोबिंद ! हे दामोदर ! मुझे अपनी पवित्र सिफतसालाह की सूझ बख्श। हे हरी ! नानक को अपने (प्यार-) रंग में रंग दे। (नानक की) सुरति आपके सोहाने चरणों में टिकी रहे। 2। 1। 3।
केदारा महला 5 ॥
हरि के दरसन को मनि चाउ ॥
करि किरपा सतसंगि मिलावहु तुम देवहु अपनो नाउ ॥ रहाउ ॥
करउ सेवा सत पुरख पिआरे जत सुनीऐ तत मनि रहसाउ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! मेरे मन में हरी के दर्शनों की चाहत है। हे हरी ! मेहर करके मुझे साधु-संगति में मिलाए रख। (और। वहाँ रख के) मुझे अपना नाम बख्श। रहाउ। हे प्यारे हरी ! (मेहर कर) मैं गुरमुखों की सेवा करता रहूँ (क्योंकि गुरमुखों की संगति में) जहाँ भी आपका नाम सुना जाता है वहीं मन में खुशी पैदा होती है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! अपने अंदर का ये गुमान-हैंकड़ दूर कर कि आप बहुत कुछ जानता है (कि आप बड़ा समझदार है)।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।