ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ राग केदारा महला ५ घरु १ ॥ तेरो वसन वसन हम महल खिआली ॥ बैरागी मानी दीठ डंडे साधे सहिजिं ॥१॥रहाउ॥ जा को राम नाम हिरदै तजिओ ॥ ओहु भगवंतु संत संगि बसिओ ॥१॥
केदारा महला ५ ॥ प्रीतमु बसत रिद महि खोरि ॥ भरमु भइओ गुरि छिनकि बिनासिओ ता पाछै हम पाई ॥१॥रहाउ॥
“प्रीतमु बसत रिद महि खोरि।” “प्रीतम ‘रिद’ (हृदय) में ‘खोरि’ (एक corner, niche) में बसा है।”
सबसे specific spatial image। हृदय में एक “खोर” (niche, alcove) है, और प्रीतम वहाँ बैठा है।
दिल्ली के पुराने घरों में “खोर” होती थी, दीवार में एक छोटी जगह जहाँ दीया रखा जाता था, या मूर्ति। गुरु अर्जन उसी image को inner space पर apply कर रहे हैं। हमारे हृदय में एक “खोर” है, और प्रीतम वहाँ बैठा है।
“भरमु भइओ गुरि छिनकि बिनासिओ।” “भ्रम था, गुरु ने ‘छिनकि’ (क्षण में) ‘बिनासिओ’ (नष्ट)।”
भ्रम क्या? यह कि “प्रीतम कहीं और है।” यह भ्रम पल भर में टूटा, गुरु से।
“ता पाछै हम पाई।” “तब पीछे हम पाया।”
क्रम: पहले गुरु, फिर भ्रम-नाश, फिर प्रीतम का acknowledgment। यह specific sequence है।
दिल्ली में हम सब “self-discovery” books पढ़ते हैं। नानक का mechanism inverted है, “गुरु ने मुझे बताया, फिर मैंने ख़ुद को देखा।” अकेले की self-discovery limit-bound है।
[ इस अंग की गहरी चिंतना ]
गुरु अर्जन का केदारा। शुरू में ही एक warm image।
“तेरो वसन वसन हम महल खिआली।” “तेरा वसन (निवास), हम महल (दिल) में ‘खियाली’ (memory) रखते हैं।”
यह intimate है। हरि का निवास हमारे “महल” (दिल) में है, और हम उसकी memory carry करते हैं।
दिल्ली में हम सब अपने दिल में बहुत memories carry करते हैं, exes, passed-away parents, missed opportunities, regrets। गुरु अर्जन एक नई “खियाली” plant कर रहे हैं, हरि की।
और यह बाक़ी memories को displace नहीं करती; यह उनके साथ-साथ रहती है, मगर सबसे central position में।
“बैरागी मानी दीठ डंडे साधे सहिजिं।” “बैरागी मान कर, दीठ (vision) डंडे (बँधन) साध सहिजिं (सहज में)।”
mixed image। बैराग़ी की pride होती है (कि मैंने सब छोड़ा), मगर उसको साधना है। केदारा का यह subtle observation है, “बैराग” भी एक trap हो सकती है। ego से immune नहीं।
कबीर भी यही कहते हैं (अंग 1372): “मायाधारी संत न।” यानी जो “बैराग” का showpiece बना ले, वो भी genuine नहीं है।
“जा को राम नाम हिरदै तजिओ।” “जिसके हृदय में राम नाम है, उसका तजिओ (छूट गया)।”
यानी जिसके हृदय में राम नाम बस गया, उसकी बाक़ी सब चीज़ें “छूट गईं” अपने आप। यह forced renunciation नहीं, यह organic falling-away है।
“ओहु भगवंतु संत संगि बसिओ।” “वो भगवंत संत-संग में बसा।”
और यह सबसे subtle point है। genuine हरि-भक्त “भगवंत” बन जाता है, यानी अपने आप में देवता-स्वरूप। और वो “संत-संग” में बसता है, अकेले नहीं।
दिल्ली में हम सब “individualism” को virtue मानते हैं। नानक एक different vision बता रहे हैं, “भगवंत” बनने का रास्ता “संत-संग” है।
गुरु अर्जन का केदारा। शुरू में ही एक warm image।
“तेरो वसन वसन हम महल खिआली।” “तेरा ‘वसन’ (निवास, या वस्त्र) ही ‘वसन’, हम महल में ‘खियाली’ (memory) रखते हैं।”
यह intimate है। हरि का निवास हमारे “महल” (दिल) में है, और हम उसकी memory carry करते हैं।
दिल्ली में हम सब अपने दिल में बहुत memories carry करते हैं, exes, passed-away parents, missed opportunities, regrets। गुरु अर्जन एक नई “खियाली” plant कर रहे हैं, हरि की। और यह बाक़ी memories को displace नहीं करती; यह उनके साथ-साथ रहती है, मगर सबसे central position में।
“बैरागी मानी दीठ डंडे साधे सहिजिं।” “बैरागी मान कर, ‘दीठ’ (vision, सरग़र्मी) ‘डंडे’ (बँधन)’साध’ (साधित) ‘सहिजिं’ (सहज में)।”
mixed image, मगर meaning यह है: बैराग़ी की pride होती है (कि मैंने सब छोड़ा), मगर उसको साधना है। केदारा का यह subtle observation है, “बैराग” भी एक trap हो सकती है। ego से immune नहीं।
कबीर भी यही कहते हैं (अंग 1372): “मायाधारी संत न।” यानी जो “बैराग” का showpiece बना ले, वो भी genuine नहीं है।
“जा को राम नाम हिरदै तजिओ।” “जिसके हृदय में राम नाम है, उसका ‘तजिओ’ (छूट गया)।”
यानी जिसके हृदय में राम नाम बस गया, उसकी बाक़ी सब चीज़ें “छूट गईं” अपने आप। यह forced renunciation नहीं, यह organic falling-away है।
“ओहु भगवंतु संत संगि बसिओ।” “वो भगवंत संत-संग में बसा।”
और यह सबसे subtle point है। genuine हरि-भक्त “भगवंत” बन जाता है, यानी अपने आप में देवता-स्वरूप। और वो “संत-संग” में बसता है, अकेले नहीं।
दिल्ली में हम सब “individualism” को virtue मानते हैं। नानक एक different vision बता रहे हैं, “भगवंत” बनने का रास्ता “संत-संग” है। बैठो उन लोगों के साथ जिनके अंदर हरि बसा है।