जन नानक कउ हरि दइआल होहु सुआमी हरि संतन की धूरि करि हरे ॥2॥1॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
माई संतसंगि जागी ॥
प्रिअ रंग देखै जपती नामु निधानी ॥ रहाउ ॥
दरसन पिआस लोचन तार लागी ॥
बिसरी तिआस बिडानी ॥1॥
अब गुरु पाइओ है सहज सुखदाइक दरसनु पेखत मनु लपटानी ॥
देखि दमोदर रहसु मनि उपजिओ नानक प्रिअ अंम्रित बानी ॥2॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दीन बिनउ सुनु दइआल ॥
पंच दास तीनि दोखी एक मनु अनाथ नाथ ॥
राखु हो किरपाल ॥ रहाउ ॥
अनिक जतन गवनु करउ ॥
खटु करम जुगति धिआनु धरउ ॥
उपाव सगल करि हारिओ नह नह हुटहि बिकराल ॥1॥
सरणि बंदन करुणा पते ॥
भव हरण हरि हरि हरि हरे ॥
एक तूही दीन दइआल ॥
प्रभ चरन नानक आसरो ॥
उधरे भ्रम मोह सागर ॥
लगि संतना पग पाल ॥2॥1॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सरनी आइओ नाथ निधान ॥
नाम प्रीति लागी मन भीतरि मागन कउ हरि दान ॥1॥ रहाउ ॥
सुखदाई पूरन परमेसुर करि किरपा राखहु मान ॥
देहु प्रीति साधू संगि सुआमी हरि गुन रसन बखान ॥1॥
गोपाल दइआल गोबिद दमोदर निरमल कथा गिआन ॥
नानक कउ हरि कै रंगि रागहु चरन कमल संगि धिआन ॥2॥1॥3॥
हरि के दरसन को मनि चाउ ॥
करि किरपा सतसंगि मिलावहु तुम देवहु अपनो नाउ ॥ रहाउ ॥
करउ सेवा सत पुरख पिआरे जत सुनीऐ तत मनि रहसाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! अपने अंदर का ये गुमान-हैंकड़ दूर कर कि आप बहुत कुछ जानता है (कि आप बड़ा समझदार है)।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।