अंग 1122, राग केदारा (M5)

SGGS, Ang
1122
राग केदारा, महला 5
राग: राग केदारा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी · महला 5
पढ़ने का समय: लगभग 1 मिनट
ang-1122-shabad-1

केदारा महला ५ ॥ सुनहु जोग जुगति सरबसु ॥ चरण कमल नित निकाई बीआबनी पिआस ल्यासे ॥१॥रहाउ॥ ऊजल आजुलि नैन सेल्ही दीन दइआल हर्षी ॥ प्रब प्रसन्न होइ जब निधि साधसंग दुख डर्षी ॥१॥

“सुनहु जोग जुगति सरबसु।” “सुनो योग की ‘जुगति’ (technique), सर्वस्व।”

announcement। एक practical instruction आ रहा है। और गुरु अर्जन का “योग” योग-shastras का नहीं, यह practical योग है।

“चरण कमल नित निकाई।” “चरण-कमल नित निकट।” “बीआबनी पिआस ल्यासे।” “‘बियाबान’ (desert) में ‘प्यास’ लगी।”

metaphor: चरण-कमल पास हैं, मगर हम बियाबान में हैं, उससे प्यासे। पास होते हुए भी access mystery है।

यह सबसे subtle point है। हरि “close” है, हमारे ही दिल में। मगर हम “बियाबान में” हैं, उसके होते हुए भी।

दिल्ली में हम सब “spiritual access” ढूँढ़ रहे हैं। नानक कह रहे हैं, यह “access” close होता है, हम ही बियाबान में रहना select कर लेते हैं।

“ऊजल आजुलि नैन सेल्ही।” “उज्ज्वल ‘आजुलि’ (anjali, hand-cup) में नैन ‘सेल्ही’ (शीतल)।”

beautiful image। हाथों की अंजलि में, उज्ज्वल आँखें, शीतल। यह पूजा का pose है, मगर inner पूजा।

“दीन दइआल हर्षी।” “दीन-दयाल ‘हर्षी’ (हर्षित)।”

हरि “दीन-दयाल” है, और इसमें वो “हर्षित” है। यानी यह उसकी identity है, “दीनों पर दया करना।” हम सोचते हैं हरि कोई judging entity है। नानक कह रहे हैं, उसकी core एक है, “compassion to the humble।”

“प्रब प्रसन्न होइ जब निधि साधसंग दुख डर्षी।” “प्रभु प्रसन्न हो, तब ‘निधि’ (treasure) साधसंग में, दुख ‘डर्षी’ (नष्ट)।”

closing: साधसंग में दुख ख़त्म होते हैं, जब प्रभु प्रसन्न।

ang-1122-reflection

[ इस अंग की गहरी चिंतना ]

“सुनहु जोग जुगति सरबसु।” “सुनो योग की जुगति (technique), सर्वस्व।”

announcement। एक practical instruction आ रहा है। और गुरु अर्जन का “योग” योग-shastras का नहीं, यह practical योग है।

“चरण कमल नित निकाई।” “चरण-कमल नित निकट।” “बीआबनी पिआस ल्यासे।” “बियाबान (desert) में प्यास लगी।”

metaphor: चरण-कमल पास हैं, मगर हम बियाबान में हैं, उससे प्यासे। पास होते हुए भी access mystery है।

यह सबसे subtle point है। हरि “close” है, हमारे ही दिल में। मगर हम “बियाबान में” हैं, उसके होते हुए भी।

दिल्ली में हम सब “spiritual access” ढूँढ़ रहे हैं। नानक कह रहे हैं, यह “access” close होता है, हम ही बियाबान में रहना select कर लेते हैं।

“ऊजल आजुलि नैन सेल्ही।” “उज्ज्वल आजुलि (anjali, hand-cup) में नैन सेल्ही (शीतल)।”

beautiful image। हाथों की अंजलि में, उज्ज्वल आँखें, शीतल। यह पूजा का pose है, मगर inner पूजा।

“दीन दइआल हर्षी।” “दीन-दयाल हर्षी (हर्षित)।”

हरि “दीन-दयाल” है, और इसमें वो “हर्षित” है। यानी यह उसकी identity है, “compassion to the humble।”

हम सोचते हैं हरि कोई judging entity है। नानक कह रहे हैं, उसकी core एक है, “दीनों पर दया करना।”

“प्रब प्रसन्न होइ जब निधि साधसंग दुख डर्षी।” “प्रभु प्रसन्न हो, तब निधि (treasure) साधसंग में, दुख डर्षी (नष्ट)।”

closing: साधसंग में दुख ख़त्म होते हैं, जब प्रभु प्रसन्न।