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अंग 1122

अंग
1122
राग केदारा
राग: केदारा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि के नाम की मन रुचै ॥
कोटि सांति अनंद पूरन जलत छाती बुझै ॥ रहाउ ॥
संत मारगि चलत प्रानी पतित उधरे मुचै ॥
रेनु जन की लगी मसतकि अनिक तीरथ सुचै ॥1॥
चरन कमल धिआन भीतरि घटि घटहि सुआमी सुझै ॥
सरनि देव अपार नानक बहुरि जमु नही लुझै ॥2॥7॥15॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस मनुष्य के मन को परमात्मा के नाम की लगन लग जाती है। उसके हृदय में पूर्ण-शांति आनंद बना रहता है। उसके हृदय में (विकारों की पहले से) जल रही आग बुझ जाती है। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के बताए हुए रास्ते पर चलता है। (उसकी संगति में रह के) अनेकों विकारी मनुष्य (विकारों से) बच जाते हैं। जिस मनुष्य के माथे पर परमात्मा के सेवक की चरण-धूड़ लगती है। (उसके अंदर। मानो) अनेकों तीर्थों (के स्नान) की पवित्रता हैं जाती है। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य की सुररति प्रभू के सुंदर चरणों के ध्यान में टिकी रहती है। उसको मालिक-प्रभू हरेक शरीर में बसता दिख जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य प्रकाश-रूप बेअंत प्रभू की शरण में आ जाता है। जमदूत दोबारा उसके साथ कोई झगड़ा नहीं डालता। 2। 7। 15।
केदारा छंत महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मिलु मेरे प्रीतम पिआरिआ ॥ रहाउ ॥
पूरि रहिआ सरबत्र मै सो पुरखु बिधाता ॥
मारगु प्रभ का हरि कीआ संतन संगि जाता ॥
संतन संगि जाता पुरखु बिधाता घटि घटि नदरि निहालिआ ॥
जो सरनी आवै सरब सुख पावै तिलु नही भंनै घालिआ ॥
हरि गुण निधि गाए सहज सुभाए प्रेम महा रस माता ॥
नानक दास तेरी सरणाई तू पूरन पुरखु बिधाता ॥1॥
हरि प्रेम भगति जन बेधिआ से आन कत जाही ॥
मीनु बिछोहा ना सहै जल बिनु मरि पाही ॥
हरि बिनु किउ रहीऐ दूख किनि सहीऐ चात्रिक बूंद पिआसिआ ॥
कब रैनि बिहावै चकवी सुखु पावै सूरज किरणि प्रगासिआ ॥
हरि दरसि मनु लागा दिनसु सभागा अनदिनु हरि गुण गाही ॥
नानक दासु कहै बेनंती कत हरि बिनु प्राण टिकाही ॥2॥
सास बिना जिउ देहुरी कत सोभा पावै ॥
दरस बिहूना साध जनु खिनु टिकणु न आवै ॥
हरि बिनु जो रहणा नरकु सो सहणा चरन कमल मनु बेधिआ ॥
हरि रसिक बैरागी नामि लिव लागी कतहु न जाइ निखेधिआ ॥
हरि सिउ जाइ मिलणा साधसंगि रहणा सो सुखु अंकि न मावै ॥
होहु क्रिपाल नानक के सुआमी हरि चरनह संगि समावै ॥3॥
खोजत खोजत प्रभ मिले हरि करुणा धारे ॥
निरगुणु नीचु अनाथु मै नही दोख बीचारे ॥
नही दोख बीचारे पूरन सुख सारे पावन बिरदु बखानिआ ॥
भगति वछलु सुनि अंचलोु गहिआ घटि घटि पूर समानिआ ॥
सुख सागरोु पाइआ सहज सुभाइआ जनम मरन दुख हारे ॥
करु गहि लीने नानक दास अपने राम नाम उरि हारे ॥4॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: केदारा छंत महला 5 वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे मेरे प्यारे ! हे मेरे प्रीतम ! (मुझे) मिल। रहाउ। हे भाई ! वह सर्व-व्यापक सृजनहार हर जगह मौजूद है। हे भाई ! प्रभू (को मिलने) का रास्ता प्रभू ने स्वयं ही बनाया है (वह रास्ता यह है कि) संत-जनों की संगति में ही उसके साथ गहरी सांझ पड़ सकती है। हे भाई ! संत-जनों की संगति में ही सृजनहार अकाल-पुरख के साथ जान-पहचान हो सकती है। (संतजनों की संगति में रह के ही उसको) हरेक शरीर में आँखों से देखा जा सकता है। जो मनुष्य (संतजनों की संगति की बरकति से प्रभू की) शरण आता है। वह सारे सुख हासिल कर लेता है। प्रभू उस मनुष्य की की हुई मेहनत को रक्ती भर भी नहीं गवाता। हे भाई ! जो मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के प्यार से गुणों के खजाने प्रभू के गुण गाता है। वह सबसे ऊँचे प्रेम-रस में मस्त रहता है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) आपके दास आपकी शरण में रहते हैं। आप सब गुणों से भरपूर है। आप सर्व-व्यापक है। आप (सारे जगत का) रचनहार है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य हरी की प्रेमा-भक्ति में रम जाते हैं। वे (हरी को छोड़ के) किसी और जगह नहीं जा सकते। (जैसे) मछली (पानी का) विछोड़ा सह नहीं सकती। पानी के बिना मछलियाँ मर जाती हैं। हे भाई ! (जिन के मन प्रेमा-भक्ति में भेदे गए। उनसे किसी तरफ से भी) परमात्मा (की याद) के बिना नहीं रहा जा सकता। किसी भी तरह से विछोड़े का दुख सहा नहीं जा सकता। (जैसे) पपीहा हर वक्त स्वाति बूँद के लिए तरसता है (जैसे) जब तक रात खत्म ना हो। जब तक सूरज की रौशनी ना आ जाए। चकवी को सुख नहीं मिल सकता। हे भाई ! (प्रभू-प्रेम में भेदे हुए मनुष्यों के लिए) वह दिन भाग्यशाली होता है जब उनका मन प्रभू के दीदार में जुड़ता है। वह हर वक्त प्रभू के गुण गाते रहते हैं। दास नानक विनती करता है – (हे भाई ! जिनके मन प्रभू-प्रेम में भेदे हुए हैं। उनके) प्राण परमात्मा की याद के बिना कहीं भी धैर्य नहीं पा सकते। 2। हे भाई ! जैसे सांस (आए) बिना मनुष्य का शरीर कहीं शोभा नहीं पा सकता। (वैसे ही परमात्मा के) दर्शनों के बिना साधू-जन (शोभा नहीं पा सकते)। (प्रभू के दर्शनों के बिना मनुष्य का मन) एक छिन के लिए भी टिक नहीं सकता। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना जो जीना है। वह जीना नर्क (का दुख) सहने (के तुल्य) है। पर। जिस मनुष्य का मन परमात्मा के सुंदर चरणों में बिछ जाता है। वह परमात्मा के नाम का रसिया हैं जाता है। हरी-नाम का प्रेमी हो जाता है। हरी-नाम में उसकी लगन लगी रहती है। उसकी कहीं भी निरादरी नहीं होती। हे भाई ! साध-संगति में टिके रहना (और। साध-संगति की बरकति से) प्रभू के साथ मिलाप हो जाना (इससे ऐसा आत्मिक आनंद पैदा होता है कि) वह आनंद छुपा नहीं रह सकता। हे नानक के मालिक प्रभू ! जिस मनुष्य पर आप दयावान होता है। वह आपके चरणों में लीन रहता है। 3। हे भाई ! (प्रभू जी की) तलाश करते-करते (आखिर) प्रभू जी (स्वयं ही) दया कर के (मुझे) मिल गए (प्रभू का मिलाप प्रभू जी की मेहर से ही होता है)। मेरे में कोई गुण नहीं था। मैं नीच जीवन वाला था। मैं अनाथ था। पर। प्रभू जी ने मेरे अवगुणों की तरफ ध्यान नहीं दिया। हे भाई ! प्रभू ने मेरे अवगुण नहीं विचारे। मुझे पूर्ण सुख उसने दे दिए। (तभी तो यह) कहा जाता है कि (पतितों को) पवित्र करना (प्रभू जी का) मूल कदीमी स्वभाव (बिरद) है। ये सुन के कि प्रभू भक्ति को प्यार करने वाला है। मैंने उसका पल्ला पकड़ लिया (और भक्ति की दाति माँगी)। हे भाई ! प्रभू हरेक शरीर में पूरी तरह से व्यापक है। हे भाई ! जब मैंने उसका आँचल पकड़ लिया। तब वह सुखों का समुंद्र प्रभू मुझे स्वयं ही आगे हो के मिल गया। जनम से मरने तक के मेरे सारे ही दुख थक गए (हार गए। समाप्त हो गए)। हे नानक ! (कह- हे भाई !) प्रभू अपने दासों का हाथ पकड़ कर उनको अपने साथ मिला लेता है। परमात्मा का नाम (उन सेवकों के) हृदय में हार बना रहता है। 4। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस मनुष्य के मन को परमात्मा के नाम की लगन लग जाती है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।