अंग 1123, राग केदारा (M5)

SGGS, Ang
1123
राग केदारा, महला 5
राग: राग केदारा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी · महला 5
पढ़ने का समय: लगभग 1 मिनट
ang-1123-shabad-1

केदारा महला ५ ॥ ब्रहम बिचारु बीचारी आपहु प्रापति होय ॥ दीनु संत बिराहा गिआनु आन रंग ल्यागै ॥१॥रहाउ॥ सर मन ब्रहम बिचार आरीआ अरथ अदाही ॥ गुर बानी प्रब बासि कीआ रहत ब्रहम नाम बसाही ॥१॥

“ब्रहम बिचारु बीचारी आपहु प्रापति होय।” “ब्रह्म-विचार ‘बीचारी’ (विचार करने वाला), अपने आप से प्राप्त होता है।”

genuine ब्रह्म-ज्ञान, यह self-generated है, gurus से import नहीं। मगर “अपने आप से” मतलब “अकेले” नहीं। मतलब genuinely engaged होने पर, यह spontaneously होता है।

दिल्ली में हम सब “spiritual content” consume करते हैं, lectures, books, talks. यह good starting point है। मगर असली “ब्रह्म-बीचार” तब होता है जब उस content पर बैठ कर, ख़ुद से उठा सवाल पूछा जाए। passive listening से नहीं।

“दीनु संत बिराहा गिआनु।” “दीन (humble) संतों की ‘विरह’ (separation) का ज्ञान।”

और यह key teaching है, असली “ज्ञान” विरह से आता है, comfort से नहीं।

दिल्ली में हम सब “comfortable spirituality” pursue करते हैं। हमारी जो कमी है, उसको हम avoid करते हैं। केदारा कह रहा है, थोड़ा “विरह” चाहिए। थोड़ा miss करना चाहिए। थोड़ा absence feel करना चाहिए।

“आन रंग ल्यागै।” “दूसरा रंग लगता है।”

जब genuine विरह आती है, “आन रंग” (दुनियावी रंग, materialistic colors) attractive लगने बंद हो जाते हैं।

“सर मन ब्रहम बिचार आरीआ अरथ अदाही।” “‘सर मन’ (head-mind) में ब्रह्म-बिचार ‘आरी’ (cut through), ‘अरथ’ (meaning) ‘अदाही’ (आदा कर)।”

imagery: ब्रह्म-बिचार एक “आरी” (saw) है जो mind को cut through करती है, और meaning generate करती है।

“गुर बानी प्रब बासि कीआ।” “गुर-बाणी से प्रभु को ‘बासि’ (basa, settled) किया।”

mechanism: गुर-बाणी ही the medium है जिससे प्रभु अंदर settle होते हैं।

“रहत ब्रहम नाम बसाही।” “रह कर ब्रह्म-नाम ‘बसाही’ (बसाया)।”

closing: यह permanent settle है, transient नहीं।

ang-1123-reflection

[ इस अंग की गहरी चिंतना ]

“ब्रहम बिचारु बीचारी आपहु प्रापति होय।” “ब्रह्म-विचार बीचारी (विचार करने वाला), अपने आप से प्राप्त होता है।”

genuine ब्रह्म-ज्ञान, यह self-generated है, gurus से import नहीं। मगर “अपने आप से” मतलब “अकेले” नहीं। मतलब genuinely engaged होने पर, यह spontaneously होता है।

दिल्ली में हम सब “spiritual content” consume करते हैं, lectures, books, talks। यह good starting point है। मगर असली “ब्रह्म-बीचार” तब होता है जब उस content पर बैठ कर, ख़ुद से उठा सवाल पूछा जाए। passive listening से नहीं।

“दीनु संत बिराहा गिआनु।” “दीन (humble) संतों की विरह (separation) का ज्ञान।”

और यह key teaching है, असली “ज्ञान” विरह से आता है, comfort से नहीं।

दिल्ली में हम सब “comfortable spirituality” pursue करते हैं। हमारी जो कमी है, उसको हम avoid करते हैं। केदारा कह रहा है, थोड़ा “विरह” चाहिए। थोड़ा miss करना चाहिए। थोड़ा absence feel करना चाहिए।

यह radical है, मगर consistent gurbani-teaching है। comfort में learning rare है। discomfort में, genuine।

“आन रंग ल्यागै।” “दूसरा रंग लगता है।”

जब genuine विरह आती है, “आन रंग” (दुनियावी रंग, materialistic colors) attractive लगने बंद हो जाते हैं।

दिल्ली के consumer culture में यह radical inversion है। हमको हर रोज़ “new” चीज़ें attract करती हैं, fashion, food, gadgets, entertainment। केदारा कह रही है, genuine spiritual maturity में यह “नयापन” का pull कम होता है।

“गुर बानी प्रब बासि कीआ।” “गुर-बाणी से प्रभु को बासि (basa, settled) किया।”

mechanism: गुर-बाणी ही the medium है जिससे प्रभु अंदर settle होते हैं।