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माली गउड़ा
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· शबद · राग माली गउड़ा
आल जाल बिकार तजि सभि हरि गुना निति गाउ ॥
आल जाल बिकार तजि सभि हरि गुना निति गाउ ॥
कर जोड़ि नानकु दानु मांगै देहु अपना नाउ ॥2॥1॥6॥
कर जोड़ि नानकु दानु मांगै देहु अपना नाउ ॥2॥1॥6॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई! माया के मोह के जंजाल छोड़ के विकार त्याग के सदा परमात्मा के गुण गाया करें। दास नानक (तो अपने दोनों) हाथ जोड़ के (यही) दान माँगता है (कि हे प्रभू! मुझे) अपन नाम दें। 2। 1। 6।
· शबद · राग माली गउड़ा
प्रभ समरथ देव अपार ॥
माली गउड़ा महला 5 ॥
प्रभ समरथ देव अपार ॥
कउनु जानै चलित तेरे किछु अंतु नाही पार ॥1॥ रहाउ ॥
इक खिनहि थापि उथापदा घड़ि भंनि करनैहारु ॥
जेत कीन उपारजना प्रभु दानु देइ दातार ॥1॥
हरि सरनि आइओ दासु तेरा प्रभ ऊच अगम मुरार ॥
कढि लेहु भउजल बिखम ते जनु नानकु सद बलिहार ॥2॥2॥7॥
प्रभ समरथ देव अपार ॥
कउनु जानै चलित तेरे किछु अंतु नाही पार ॥1॥ रहाउ ॥
इक खिनहि थापि उथापदा घड़ि भंनि करनैहारु ॥
जेत कीन उपारजना प्रभु दानु देइ दातार ॥1॥
हरि सरनि आइओ दासु तेरा प्रभ ऊच अगम मुरार ॥
कढि लेहु भउजल बिखम ते जनु नानकु सद बलिहार ॥2॥2॥7॥
हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 5। हे प्रभू! हे सब ताकतों के मालिक! हे प्रकाश रूप! हे बेअंत! आपके करिश्मों को कोई भी नहीं जान सकता। आपके करिश्मों का अंत नहीं पाया जा सकता। परला छोर (उस पार को) नहीं पाया जा सकता। 1। रहाउ। हे भाई! सब कुछ कर सकने वाला परमात्मा घड़ के पैदा करके (उसको) एक छिन में तोड़ के नाश कर देता है। हे भाई! जितनी भी सृष्टि उसने पैदा की है। दातें देने वाला वह प्रभू (सारी सृष्टि को) दान देता है। 1। हे हरी! हे प्रभू! हे सबसे ऊँचे! हे अपहुँच! हे मुरारि! आपका दास (नानक) आपकी शरण आया है। (अपने दास को) मुश्किल संसार-समुंद्र में से बाहर निकाल लें। दास नानक आपसे सदा सदके जाता है। 2। 2। 7।
· शबद · राग माली गउड़ा
मनि तनि बसि रहे गोपाल ॥
माली गउड़ा महला 5 ॥
मनि तनि बसि रहे गोपाल ॥
दीन बांधव भगति वछल सदा सदा क्रिपाल ॥1॥ रहाउ ॥
आदि अंते मधि तूहै प्रभ बिना नाही कोइ ॥
पूरि रहिआ सगल मंडल एकु सुआमी सोइ ॥1॥
करनि हरि जसु नेत्र दरसनु रसनि हरि गुन गाउ ॥
बलिहारि जाए सदा नानकु देहु अपणा नाउ ॥2॥3॥8॥6॥14॥
मनि तनि बसि रहे गोपाल ॥
दीन बांधव भगति वछल सदा सदा क्रिपाल ॥1॥ रहाउ ॥
आदि अंते मधि तूहै प्रभ बिना नाही कोइ ॥
पूरि रहिआ सगल मंडल एकु सुआमी सोइ ॥1॥
करनि हरि जसु नेत्र दरसनु रसनि हरि गुन गाउ ॥
बलिहारि जाए सदा नानकु देहु अपणा नाउ ॥2॥3॥8॥6॥14॥
हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 5। आप ही मेरे मन में बस रहे हैं। हे सृष्टि के पालक! गरीबों के सहायक! हे भक्ति से प्यार करने वाले! हे सदा ही कृपालु! 1। रहाउ। हे प्रभू! (जगत रचना के) आरम्भ में आप ही थे। (जगत के) अंत में भी आप ही होंगे। अब भी आप ही हैं (सदा कायम रहने वाला)। हे भाई! प्रभू के बिना कोई और (सदा कायम रहने वाला) नहीं। हे भाई! एक मालिक प्रभू ही सारे भवनों में व्यापक है। 1। (हे भाई!) मैं कानों से हरी की सिफति-सालाह (सुनता हूँ)। आँखों से हरी के दर्शन (करता हूँ) जीभ से हरी के गुण गाता हूँ। (हे भाई! प्रभू का दास) नानक सदा उससे कुर्बान जाता है (और उसके दर पर अरदास करता है: हे प्रभू!) मुझे अपना नाम बख्शें। 2। 3। 8। 6। 14।
· शबद · राग माली गउड़ा
धनि धंनि ओ राम बेनु बाजै ॥
माली गउड़ा बाणी भगत नामदेव जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
धनि धंनि ओ राम बेनु बाजै ॥
मधुर मधुर धुनि अनहत गाजै ॥1॥ रहाउ ॥
धनि धनि मेघा रोमावली ॥
धनि धनि क्रिसन ओढै कांबली ॥1॥
धनि धनि तू माता देवकी ॥
जिह ग्रिह रमईआ कवलापती ॥2॥
धनि धनि बन खंड बिंद्राबना ॥
जह खेलै स्री नाराइना ॥3॥
बेनु बजावै गोधनु चरै ॥
नामे का सुआमी आनद करै ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
धनि धंनि ओ राम बेनु बाजै ॥
मधुर मधुर धुनि अनहत गाजै ॥1॥ रहाउ ॥
धनि धनि मेघा रोमावली ॥
धनि धनि क्रिसन ओढै कांबली ॥1॥
धनि धनि तू माता देवकी ॥
जिह ग्रिह रमईआ कवलापती ॥2॥
धनि धनि बन खंड बिंद्राबना ॥
जह खेलै स्री नाराइना ॥3॥
बेनु बजावै गोधनु चरै ॥
नामे का सुआमी आनद करै ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा बाणी भगत नामदेव जी की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। मैं सदके हूँ राम जी की बाँसुरी से जो बज रही है। बड़ी मीठी सुर से एक रस गुँजार डाल रही है। 1। रहाउ। सदके हूँ उस मेंढे की ऊन से। सदके हूँ उस कंबली से जो कृष्ण जी पहन रहे हैं। 1। हे माँ देवकी! आपसे (भी) कुर्बान हूँ। जिसके घर में सुंदर राम जी। कृष्ण जी (पैदा हुए)। 2। धन्य है जंगल का वह भाग। वह वृंदावन। जहाँ श्री नारायण जी (कृष्ण रूप में) खेलते हैं। 3। नामदेव का प्रभू (कृष्ण रूप में) बाँसुरी बजा रहा है। गाएं चरा रहा है। और (ऐसे ही और भी) रंग बना रहा है। 4। 1।
· शबद · राग माली गउड़ा
मेरो बापु माधउ तू धनु केसौ सांवलीओ बीठुलाइ ॥1॥ रहाउ ॥
मेरो बापु माधउ तू धनु केसौ सांवलीओ बीठुलाइ ॥1॥ रहाउ ॥
कर धरे चक्र बैकुंठ ते आए गज हसती के प्रान उधारीअले ॥
दुहसासन की सभा द्रोपती अंबर लेत उबारीअले ॥1॥
गोतम नारि अहलिआ तारी पावन केतक तारीअले ॥
ऐसा अधमु अजाति नामदेउ तउ सरनागति आईअले ॥2॥2॥
कर धरे चक्र बैकुंठ ते आए गज हसती के प्रान उधारीअले ॥
दुहसासन की सभा द्रोपती अंबर लेत उबारीअले ॥1॥
गोतम नारि अहलिआ तारी पावन केतक तारीअले ॥
ऐसा अधमु अजाति नामदेउ तउ सरनागति आईअले ॥2॥2॥
हिन्दी अर्थ: हे मेरे माधव! हे लंबे केसों वाले प्रभू! हे साँवले रंग वाले प्रभू! हे बीठुल! आप धन्य हैं। आप मेरे पिता हैं (भाव, आप ही मुझे पैदा करने वाले और रखवाले हैं)। 1। रहाउ। हे माधो! हाथों में चक्र पकड़ के बैकुंठ से (ही) आए थे और हाथी के प्राण (तंदुए नामक जलचर से) आपने ही बचाए थे। हे साँवले प्रभू! दुस्शासन की सभा में जब द्रोपदी के वस्त्र उतारे जा रहे थे तब उसकी इज्जत भी आपने ही बचाई थी। हे बीठल! गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या को (जो ऋषि के श्राप से शिला बन गई थी) आपने ही मुक्त किया था; हे माधव! आपने (अनेकों पतितों को) पवित्र किया और उनका उद्धार किया है। मैं नामदेव (भी) एक बहुत ही नीच हूँ और नीच जाति वाला हूँ। मैं आपकी शरण आया हूँ (मेरा भी उद्धार करें)। 2। 2।
· शबद · राग माली गउड़ा
सभै घट रामु बोलै रामा बोलै ॥
सभै घट रामु बोलै रामा बोलै ॥
राम बिना को बोलै रे ॥1॥ रहाउ ॥
एकल माटी कुंजर चीटी भाजन हैं बहु नाना रे ॥
असथावर जंगम कीट पतंगम घटि घटि रामु समाना रे ॥1॥
एकल चिंता राखु अनंता अउर तजहु सभ आसा रे ॥
प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुरु को दासा रे ॥2॥3॥
राम बिना को बोलै रे ॥1॥ रहाउ ॥
एकल माटी कुंजर चीटी भाजन हैं बहु नाना रे ॥
असथावर जंगम कीट पतंगम घटि घटि रामु समाना रे ॥1॥
एकल चिंता राखु अनंता अउर तजहु सभ आसा रे ॥
प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुरु को दासा रे ॥2॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई! सारे घटों (शरीरों) में परमात्मा बोलता है। परमात्मा ही बोलता है। परमात्मा के बिना और कोई नहीं बोलता। 1। रहाउ। हे भाई! जैसे एक ही मिट्टी से कई किस्मों के बर्तन बनाए जाते हैं, वैसे ही हाथी से ले के कीड़ी तक। निर्जीव और सजीव जीव। कीड़े-पतंगे हरेक घट में परमात्मा ही समाया हुआ है। 1। हे भाई! और सबकी आशा छोड़ें। एक बेअंत प्रभू का ध्यान धरें (जो सबमें मौजूद है)। नामदेव विनती करता है: जो मनुष्य (प्रभू का ध्यान धर के) निष्काम हो जाता है उसमें और प्रभू में कोई भिन्न-भेद नहीं रह जाता। 2। 3।
रचयिता और स्रोत
इस अंग पर महला 5 की रचनाओं के बाद भगत नामदेव जी की बाणी आती है। अंग के लिए एक ही रचयिता का नाम देना इन अलग शीर्षकों को छिपा देता है।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; भगत नामदेव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 988 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।