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अंग 987 · माली गउड़ा

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अंग
987
माली गउड़ा
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  1. बूझत दीपक मिलत तिलत ॥
  2. इही हमारै सफल काज ॥
  3. सभ कै संगी नाही दूरि ॥
  4. हरि समरथ की सरना ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग माली गउड़ा

बूझत दीपक मिलत तिलत ॥

अंग 986 से चला आ रहा अंश

बूझत दीपक मिलत तिलत ॥
जलत अगनी मिलत नीर ॥
जैसे बारिक मुखहि खीर ॥1॥
जैसे रण महि सखा भ्रात ॥
जैसे भूखे भोजन मात ॥
जैसे किरखहि बरस मेघ ॥
जैसे पालन सरनि सेंघ ॥2॥
गरुड़ मुखि नही सरप त्रास ॥
सूआ पिंजरि नही खाइ बिलासु ॥
जैसो आंडो हिरदे माहि ॥
जैसो दानो चकी दराहि ॥3॥
बहुतु ओपमा थोर कही ॥
हरि अगम अगम अगाधि तुही ॥
ऊच मूचौ बहु अपार ॥
सिमरत नानक तरे सार ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: जैसे बुझ रहे दीए को तेल मिल जाए जैसे आग में जल रहे को पानी मिल जाए। जैसे (भूख से बिलख रहे) बच्चे के मुँह में दूध पड़ जाए। 1। (हे भाई! परमात्मा का नाम इस तरह सहायक होता है) जैसे युद्ध में भाई मददगार होता है। जैसे किसी भूखे को भोजन ही सहायक होता है। जैसे खेती को बादलों का बरसना। जैसे (किसी अनाथ को) शेर (बहादुर) की शरण में रक्षा मिलती है। 2। (हे भाई! परमात्मा का नाम इस तरह सहायक होता है) जैसे जिसके मुँह में गारुड़ मंत्र हो उसको साँप का डर नहीं होता। जैसे पिंजरे में बैठे तोते को बिल्ला नहीं खा सकता। जैसे कुँज की याद में टिके हुए उसके अण्डे (खराब नहीं होते)। जैसे दाने चक्के की किल्ली से (टिके हुए पिसने से बचे रहते हैं)। 3। हे भाई! मैंने तो ये थोड़े से ही दृष्टांत दिए हैं। बहुत सारे बताए जा सकते हैं (कि परमात्मा का नाम सहायता करता है)। हे अपहुँच हरी! हे अथाह हरी! आप ही (जीवों के रक्षक हैं)। हे हरी! आप ऊँचे हैं। आप बड़े हैं। आप बेअंत हैं। हे नानक! (कहें:) नाम सिमरने से पापों से लोहे की तरह भारे हो चुके जीव भी संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। 4। 3।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग माली गउड़ा

इही हमारै सफल काज ॥

माली गउड़ा महला 5 ॥
इही हमारै सफल काज ॥
अपुने दास कउ लेहु निवाजि ॥1॥ रहाउ ॥
चरन संतह माथ मोर ॥
नैनि दरसु पेखउ निसि भोर ॥
हसत हमरे संत टहल ॥
प्रान मनु धनु संत बहल ॥1॥
संतसंगि मेरे मन की प्रीति ॥
संत गुन बसहि मेरै चीति ॥
संत आगिआ मनहि मीठ ॥
मेरा कमलु बिगसै संत डीठ ॥2॥
संतसंगि मेरा होइ निवासु ॥
संतन की मोहि बहुतु पिआस ॥
संत बचन मेरे मनहि मंत ॥
संत प्रसादि मेरे बिखै हंत ॥3॥
मुकति जुगति एहा निधान ॥
प्रभ दइआल मोहि देवहु दान ॥
नानक कउ प्रभ दइआ धारि ॥
चरन संतन के मेरे रिदे मझारि ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 5। ये (संत-शरण) ही मेरे वास्ते मनोरथों को सफल करने वाली है। हे प्रभू! अपने दास (नानक) पर मेहर करें (और संत जनों की शरण बख्शें)। 1। रहाउ। (हे प्रभू! मेहर करें) मेरा माथा संतों के चरणों पर (पड़ा रहे)। आँखों से दिन-रात मैं संतों के दर्शन करता रहूँ। मेरे हाथ संतों की टहल करते रहें। मेरी जिंद मेरा मन मेरा धन संतों के अर्पण रहे। 1। (हे प्रभू! मेहर करें) संतों से मेरे मन का प्यार बना रहे। संतों के गुण मेरे चित्त में बसे रहें। संतों का हुकम मुझे मीठा लगे। संतों को देख के मेरा हृदय-कमल खिला रहे। 2। (हे प्रभू! मेहर करें) संतों से मेरा बैठना-उठना बना रहे। संतों के दर्शनों की तांघ मेरे अंदर टिकी रहे। संतों के बचन-मंत्र मेरे मन में टिके रहें। संतों की कृपा से मेरे सारे विकार नाश हो जाएँ। 3। हे दया के घर प्रभू! मुझे (संत जनों की संगति का) दान दें। संतों की संगति ही मेरे वास्ते सारे खजाने हैं। संतों का संग करना ही विकारों से मुक्ति प्राप्त करने का तरीका है। हे प्रभू! नानक पर दया करें कि संतों के चरण मुझ नानक के हृदय में बसते रहें। 4। 4।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग माली गउड़ा

सभ कै संगी नाही दूरि ॥

माली गउड़ा महला 5 ॥
सभ कै संगी नाही दूरि ॥
करन करावन हाजरा हजूरि ॥1॥ रहाउ ॥
सुनत जीओ जासु नामु ॥
दुख बिनसे सुख कीओ बिस्रामु ॥
सगल निधि हरि हरि हरे ॥
मुनि जन ता की सेव करे ॥1॥
जा कै घरि सगले समाहि ॥
जिस ते बिरथा कोइ नाहि ॥
जीअ जंत्र करे प्रतिपाल ॥
सदा सदा सेवहु किरपाल ॥2॥
सदा धरमु जा कै दीबाणि ॥
बेमुहताज नही किछु काणि ॥
सभ किछु करना आपन आपि ॥
रे मन मेरे तू ता कउ जापि ॥3॥
साधसंगति कउ हउ बलिहार ॥
जासु मिलि होवै उधारु ॥
नाम संगि मन तनहि रात ॥
नानक कउ प्रभि करी दाति ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 5। हे भाई! परमात्मा सब जीवों के साथ बसता है। किसी से भी दूर नहीं। परमात्मा स्वयं सब कुछ कर सकता है जीवों से करवा सकता है। वह हर जगह मौजूद है। 1। रहाउ। हे भाई! जिस परमात्मा का नाम सुनने से आत्मिक जीवन मिलता है। सारे दुख दूर हो जाते हैं और (हृदय में) सुख ठिकाना आ बनाते हैं। (संसार के) सारे ही खजाने उस परमात्मा के पास हैं। सब ऋषि-मुनि उसकी भक्ति करते हैं। 1। जिसके घर में सारे ही (खजाने) टिके हुए हैं। जिस (के दर) से कोई जीव खाली नहीं जाता। जो सब जीवों की पालना करता है। हे भाई! उस कृपाल प्रभू की भक्ति सदा ही करते रहें। 2। और जिसकी कचहरी में सदा न्याय होता है। जो बेमुहताज है जिसको किसी की मुहताजी नहीं। जो स्वयं ही सब कुछ करने के समर्थ है। हे मेरे मन! आप उस प्रभू का नाम जपा करें। 3। हे नानक! (कहें:) मैं गुरू की संगति से कुर्बान जाता हूँ जिसको मिल के (परमात्मा का नाम मिलता है। और संसार-समुंद्र से) पार-उतारा हो जाता है। प्रभू ने (गुरू के माध्यम से) जिस मनुष्य को (नाम की) दाति बख्शी। वह नाम से रंगा रहता है। उसके मन में तन में नाम (बसा रहता है)। 4। 5।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग माली गउड़ा

हरि समरथ की सरना ॥

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माली गउड़ा महला 5 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि समरथ की सरना ॥
जीउ पिंडु धनु रासि मेरी प्रभ एक कारन करना ॥1॥ रहाउ ॥
सिमरि सिमरि सदा सुखु पाईऐ जीवणै का मूलु ॥
रवि रहिआ सरबत ठाई सूखमो असथूल ॥1॥

हिन्दी अर्थ: माली गउड़ा महला 5 दुपदे। ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! मैं तो उस परमात्मा की शरण पड़ा हूँ जो सब ताकतों का मालिक है। मेरी जिंद, मेरा शरीर, मेरा धन, मेरा सरमाया, सब कुछ वह परमात्मा ही है जो सारे जगत का मूल है। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के सदा आत्मिक आनंद हासिल करता है। हरी-नाम ही जिंदगी का सहारा है। इन दिखाई देते-ना दिखाई देते पदार्थों में सब जगह परमात्मा ही मौजूद है। 1।

रचयिता और स्रोत

यह माली गउड़ा राग के क्रम का अंग 987 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 987 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।