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979
नट नारायण
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खुले भ्रम भीति मिले गोपाला हीरै बेधे हीर ॥
खुले भ्रम भीति मिले गोपाला हीरै बेधे हीर ॥
बिसम भए नानक जसु गावत ठाकुर गुनी गहीर ॥2॥2॥3॥
बिसम भए नानक जसु गावत ठाकुर गुनी गहीर ॥2॥2॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! गुणों के खजाने मालिक-प्रभू के गुण गाते-गाते (गुण गाने वाले मनुष्य) आनंद-मगन ही हो जाते हैं। (उनके अंदर से माया के पीछे) भटकते फिरने के कपाट खुल जाते हैं। उनको सृष्टि का पालनहार प्रभू मिल जाता है। (प्रभू उनकी जिंद को अपने चरणों में ऐसे जोड़ लेता है जैसे) हीरे को हीरा भेद लेता है। 2। 2। 3।
अपना जनु आपहि आपि उधारिओ ॥
नट महला 5 ॥
अपना जनु आपहि आपि उधारिओ ॥
आठ पहर जन कै संगि बसिओ मन ते नाहि बिसारिओ ॥1॥ रहाउ ॥
बरनु चिहनु नाही किछु पेखिओ दास का कुलु न बिचारिओ ॥
करि किरपा नामु हरि दीओ सहजि सुभाइ सवारिओ ॥1॥
महा बिखमु अगनि का सागरु तिस ते पारि उतारिओ ॥
पेखि पेखि नानक बिगसानो पुनह पुनह बलिहारिओ ॥2॥3॥4॥
अपना जनु आपहि आपि उधारिओ ॥
आठ पहर जन कै संगि बसिओ मन ते नाहि बिसारिओ ॥1॥ रहाउ ॥
बरनु चिहनु नाही किछु पेखिओ दास का कुलु न बिचारिओ ॥
करि किरपा नामु हरि दीओ सहजि सुभाइ सवारिओ ॥1॥
महा बिखमु अगनि का सागरु तिस ते पारि उतारिओ ॥
पेखि पेखि नानक बिगसानो पुनह पुनह बलिहारिओ ॥2॥3॥4॥
हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा ने सदा खुद ही अपने सेवक को विकारों से बचाया है। प्रभू अपने सेवक के साथ आठों पहर बसता है। (प्रभू ने अपने सेवक को अपने) मन से कभी भी नहीं भुलाया। 1। रहाउ। (हे भाई ! प्रभू ने अपने सेवक का बाहरी) रंग-रूप कुछ भी कभी नहीं देखा। सेवक के (ऊँचे-नीचे) कुल को भी नहीं विचारा। (सेवक को सदा ही) हरी ने मेहर कर के अपना नाम बख्शा है। (नाम की बरकति से उसको) आत्मिक अडोलता और प्रेम में टिका के उसका जीवन सुंदर बना दिया है। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई ! यह जगत तृष्णा की) आग का समुंद्र है (इसमें से पार लांघना) बहुत मुश्किल है। (परमात्मा ने सदा अपने सेवक को) इसमें से (खुद) पार लंघाया है। सेवक अपने परमात्मा के दर्शन कर-करके खुश होता है और उससे बार-बार बलिहार जाता है। 2। 3। 4।
हरि हरि मन महि नामु कहिओ ॥
नट महला 5 ॥
हरि हरि मन महि नामु कहिओ ॥
कोटि अप्राध मिटहि खिन भीतरि ता का दुखु न रहिओ ॥1॥ रहाउ ॥
खोजत खोजत भइओ बैरागी साधू संगि लहिओ ॥
सगल तिआगि एक लिव लागी हरि हरि चरन गहिओ ॥1॥
कहत मुकत सुनते निसतारे जो जो सरनि पइओ ॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपुना कहु नानक अनदु भइओ ॥2॥4॥5॥
हरि हरि मन महि नामु कहिओ ॥
कोटि अप्राध मिटहि खिन भीतरि ता का दुखु न रहिओ ॥1॥ रहाउ ॥
खोजत खोजत भइओ बैरागी साधू संगि लहिओ ॥
सगल तिआगि एक लिव लागी हरि हरि चरन गहिओ ॥1॥
कहत मुकत सुनते निसतारे जो जो सरनि पइओ ॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपुना कहु नानक अनदु भइओ ॥2॥4॥5॥
हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ हे भाई ! (जिस भी मनुष्य ने) परमात्मा का नाम अपने मन में सिमरा है। एक छिन में ही उसके करोड़ों पाप मिट जाते हैं। उसका कोई भी दुख रह नहीं जाता। 1। रहाउ। जो मनुष्य प्रभू की तलाश करते-करते (उसी का ही) मतवाला बन गया। उसने प्रभू को गुरू की संगति में पा लिया। हे भाई ! (और) सारे (ख्याल) छोड़ के जिस मनुष्य की लगन एक परमात्मा में लग गई। जिसने परमात्मा के चरण (अपने मन में कस के) पकड़ लिए।1। हे नानक ! कह- (हे भाई !) परमात्मा का नाम उचारने वाले माया के बँधनों से आजाद हो जाते हैं। नाम सुनने वालों को प्रभू संसार-समुंद्र से पार लंघा देता है; जो जो भी मनुष्य प्रभू की शरण पड़ता है (प्रभू उसको पार लंघा देता है)। हे भाई ! अपने मालिक प्रभू को बार-बार सिमर के आत्मिक आनंद बना रहता है। 2। 4। 5।
चरन कमल संगि लागी डोरी ॥
नट महला 5 ॥
चरन कमल संगि लागी डोरी ॥
सुख सागर करि परम गति मोरी ॥1॥ रहाउ ॥
अंचला गहाइओ जन अपुने कउ मनु बीधो प्रेम की खोरी ॥
जसु गावत भगति रसु उपजिओ माइआ की जाली तोरी ॥1॥
पूरन पूरि रहे किरपा निधि आन न पेखउ होरी ॥
नानक मेलि लीओ दासु अपुना प्रीति न कबहू थोरी ॥2॥5॥6॥
चरन कमल संगि लागी डोरी ॥
सुख सागर करि परम गति मोरी ॥1॥ रहाउ ॥
अंचला गहाइओ जन अपुने कउ मनु बीधो प्रेम की खोरी ॥
जसु गावत भगति रसु उपजिओ माइआ की जाली तोरी ॥1॥
पूरन पूरि रहे किरपा निधि आन न पेखउ होरी ॥
नानक मेलि लीओ दासु अपुना प्रीति न कबहू थोरी ॥2॥5॥6॥
हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ आपके सुंदर चरणों से मेरे प्रेम की तार लग गई है। हे सुखों के समुंद्र हरी ! मेरी आत्मिक अवस्था ऊँची बना दें। 1। रहाउ। हे सुख सागर ! आपने अपने सेवक को अपना पल्ला स्वयं पकड़वाया है। (आपके सेवक का) मन (आपके) प्यार की खुमारी में भेदा गया है। आपका यश गाते हुए (आपके सेवक के हृदय में आपकी) भगती का (ऐसा) स्वाद पैदा हो गया है (जिसने) माया के फंदे को तोड़ दिया है। 1। हे नानक ! (कह-) हे सर्व-व्यापक प्रभू ! हे कृपा के खजाने प्रभू ! आप हर जगह भरपूर हैं। मैं (कहीं भी आपके बिना) किसी और को नहीं देखता। अपने सेवक को (अपने चरणों में) आपने स्वयं जोड़ लिया है। (जिसके कारण आपके चरणों की) प्रीति (आपके सेवक के हृदय में) कभी कम नहीं होती। 2। 5। 6।
मेरे मन जपु जपि हरि नाराइण ॥
नट महला 5 ॥
मेरे मन जपु जपि हरि नाराइण ॥
कबहू न बिसरहु मन मेरे ते आठ पहर गुन गाइण ॥1॥ रहाउ ॥
साधू धूरि करउ नित मजनु सभ किलबिख पाप गवाइण ॥
पूरन पूरि रहे किरपा निधि घटि घटि दिसटि समाइणु ॥1॥
जाप ताप कोटि लख पूजा हरि सिमरण तुलि न लाइण ॥
दुइ कर जोड़ि नानकु दानु मांगै तेरे दासनि दास दसाइणु ॥2॥6॥7॥
मेरे मन जपु जपि हरि नाराइण ॥
कबहू न बिसरहु मन मेरे ते आठ पहर गुन गाइण ॥1॥ रहाउ ॥
साधू धूरि करउ नित मजनु सभ किलबिख पाप गवाइण ॥
पूरन पूरि रहे किरपा निधि घटि घटि दिसटि समाइणु ॥1॥
जाप ताप कोटि लख पूजा हरि सिमरण तुलि न लाइण ॥
दुइ कर जोड़ि नानकु दानु मांगै तेरे दासनि दास दसाइणु ॥2॥6॥7॥
हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ हे मेरे मन ! हरी नारायण के नाम का जाप जपा करें। हे प्रभू ! आप मेरे मन से कभी भी ना भूलें। (मेरा मन) आठों पहर आपके गुण गाता रहे। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! मेहर करें) मैं गुरू के चरणों की धूड़ में सदा स्नान करता रहूँ। (गुरू के चरणों की धूल) सारे पाप दूर करने के समर्थ है। हे सबमें बस रहे प्रभू ! हे कृपा के खजाने प्रभू ! आप मुझे हरेक शरीर में समाए हुए दिखते रहें। 1। हे प्रभू ! हे हरी ! करोड़ों जप-तप और लाखों पूजा (पाठ) आपके सिमरन की बराबरी नहीं कर सकते। (आपका दास) नानक दोनों हाथ जोड़ के (आपसे) ख़ैर माँगता है (कि मैं आपके) दासों के दासों का दास (बना रहूँ)। 2। 6। 7।
मेरै सरबसु नामु निधानु ॥
नट महला 5 ॥
मेरै सरबसु नामु निधानु ॥
करि किरपा साधू संगि मिलिओ सतिगुरि दीनो दानु ॥1॥ रहाउ ॥
सुखदाता दुख भंजनहारा गाउ कीरतनु पूरन गिआनु ॥
कामु क्रोधु लोभु खंड खंड कीन॑े बिनसिओ मूड़ अभिमानु ॥1॥
किआ गुण तेरे आखि वखाणा प्रभ अंतरजामी जानु ॥
चरन कमल सरनि सुख सागर नानकु सद कुरबानु ॥2॥7॥8॥
मेरै सरबसु नामु निधानु ॥
करि किरपा साधू संगि मिलिओ सतिगुरि दीनो दानु ॥1॥ रहाउ ॥
सुखदाता दुख भंजनहारा गाउ कीरतनु पूरन गिआनु ॥
कामु क्रोधु लोभु खंड खंड कीन॑े बिनसिओ मूड़ अभिमानु ॥1॥
किआ गुण तेरे आखि वखाणा प्रभ अंतरजामी जानु ॥
चरन कमल सरनि सुख सागर नानकु सद कुरबानु ॥2॥7॥8॥
हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम-खजाना मेरे वास्ते दुनिया का सारा धन पदार्थ है। (परमात्मा) ने कृपा करके (मुझे) गुरू की संगति में मिला दिया। (और) गुरू ने (मुझे परमात्मा के नाम का) दान दिया। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा सारे सुख देने वाला है। सारे दुखों को नाश करने वाला है (ज्यों-ज्यों) मैं उसकी सिफत सालाह के गीत गाता हूँ। (मुझे) आत्मिक जीवन की मुकम्मल सूझ (प्राप्त होती जाती है)। मैंने काम-क्रोध-लोभ (आदि विकारों के) टुकड़े-टुकड़े कर दिए। (जीवों को) मूर्ख (बना देने वाला) अहंकार (मेरे अंदर से) नाश हो गया। 1। हे प्रभू ! आप सुजान हैं। आप हरेक के दिल को जानने वाले हैं। मैं आपके कौन-कौन से गुण बता के गिनूँ। हे सुखों के सागर प्रभू ! (आपका दास) नानक आपके सुंदर चरणों की शरण आया है। और आपसे सदा सदके होता है। 2। 7। 8।
रचयिता और स्रोत
यह नट नारायण राग के क्रम का अंग 979 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 979 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।