Lulla Family

अंग 978

अंग
978
राग नट नारायण
राग: नट नारायण · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि हो हो हो मेलि निहाल ॥1॥ रहाउ ॥
हरि का मारगु गुर संति बताइओ गुरि चाल दिखाई हरि चाल ॥
अंतरि कपटु चुकावहु मेरे गुरसिखहु निहकपट कमावहु हरि की हरि घाल निहाल निहाल निहाल ॥1॥
ते गुर के सिख मेरे हरि प्रभि भाए जिना हरि प्रभु जानिओ मेरा नालि ॥
जन नानक कउ मति हरि प्रभि दीनी हरि देखि निकटि हदूरि निहाल निहाल निहाल निहाल ॥2॥3॥9॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (ऐसे मनुष्य की संगति में) मिला के परमात्मा (अनेकों को) निहाल करता है। 1। रहाउ। हे भाई ! संत-गुरू ने परमात्मा को मिलने का रास्ता बताया है। गुरू ने परमात्मा की राह पर चलने की जाच सिखाई है (और कहा है-) हे गुरसिखो ! अपने अंदर से छल-कपट दूर करो। निष्छल हो के परमात्मा के सिमरन की मेहनत करो। (इस तरह) निहाल निहाल होया जाता है। 1। हे भाई ! मेरे गुरू के वह सिख परमात्मा को प्यारे लगते हैं। जिन्होंने ये जान लिया है कि परमात्मा हमारे नजदीक बस रहा है। हे नानक ! जिन सेवकों को परमात्मा ने ये सूझ बख्शी दी। वह सेवक परमात्मा को अपने नजदीक बसता देख के अपने अंग-संग बसता देख के हर वक्त प्रसन्न-चित्त रहते हैं। 2। 3। 9।
रागु नट नाराइन महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम हउ किआ जाना किआ भावै ॥
मनि पिआस बहुतु दरसावै ॥1॥ रहाउ ॥
सोई गिआनी सोई जनु तेरा जिसु ऊपरि रुच आवै ॥
क्रिपा करहु जिसु पुरख बिधाते सो सदा सदा तुधु धिआवै ॥1॥
कवन जोग कवन गिआन धिआना कवन गुनी रीझावै ॥
सोई जनु सोई निज भगता जिसु ऊपरि रंगु लावै ॥2॥
साई मति साई बुधि सिआनप जितु निमख न प्रभु बिसरावै ॥
संतसंगि लगि एहु सुखु पाइओ हरि गुन सद ही गावै ॥3॥
देखिओ अचरजु महा मंगल रूप किछु आन नही दिसटावै ॥
कहु नानक मोरचा गुरि लाहिओ तह गरभ जोनि कह आवै ॥4॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रागु नट नाराइन महला 5 सतिगुर प्रसादि॥ हे परमात्मा ! मैं ये तो नहीं जानता कि आपको क्या अच्छा लगता है (भाव। आपको मेरी चाहत पसंद है अथवा नहीं। पर) मेरे मन में आपके दर्शनों की बहुत अभिलाशा है। 1। रहाउ। हे सर्व-व्यापक ! हे सृजनहार ! वही मनुष्य उच्च आत्मिक सूझवाला है। वही मनुष्य आपका सेवक है। जिस पर आपकी खुशी होती है। हे प्रभू ! जिस पर आप मेहर करता है। वह आपको सदा ही सिमरता रहता है। 1। हे भाई ! वह कौन से योग-साधन हैं। कौन सी ज्ञान की बातें हैं। कौन सी समाधियाँ हैं। कौन से गुण हैं जिनसे कोई मनुष्य परमात्मा को पसंद कर सकता है। (मनुष्य के अपने इस तरह के कोई प्रयत्न कामयाब नहीं होते)। वही मनुष्य प्रभू का सेवक है। वही मनुष्य प्रभू का प्यारा भक्त है। जिस पर वह स्वयं अपने प्यार का रंग चढ़ाता है। 2। हे भाई ! वही समझ (अच्छी है)। वही बुद्धि और समझदारी (ठीक है)। जिसके द्वारा मनुष्य परमात्मा को आँख झपकने जितने समय के लिए भी नहीं भुलाता। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने) गुरू के चरणों में बैठ के ये (हरी-नाम-सिमरन का) सुख हासिल कर लिया। वह सदा ही परमात्मा के गुण गाता रहता है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य ने आश्चर्य-रूप महा आनंदरूप परमात्मा के दर्शन कर लिए। उसको (उस जैसी) कोई और चीज नहीं दिखती। हे नानक ! कह- गुरू ने (जिस मनुष्य के मन से विकारों का) जंग उतार दिया वहाँ पैदा होने-मरने का चक्कर कभी नजदीक नहीं फटक सकता। 4। 1।
नट नाराइन महला 5 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उलाहनो मै काहू न दीओ ॥
मन मीठ तुहारो कीओ ॥1॥ रहाउ ॥
आगिआ मानि जानि सुखु पाइआ सुनि सुनि नामु तुहारो जीओ ॥
ईहां ऊहा हरि तुम ही तुम ही इहु गुर ते मंत्रु द्रिड़ीओ ॥1॥
जब ते जानि पाई एह बाता तब कुसल खेम सभ थीओ ॥
साधसंगि नानक परगासिओ आन नाही रे बीओ ॥2॥1॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: नट नाराइन महला 5 दुपदे सतिगुर प्रसादि॥ (हे प्रभू ! गुरू की किरपा से तब से) आपका किया हुआ (हरेक काम) मेरे मन को मीठा लगने लगा है। (जब से किसी की तरफ से किसी प्रकार के जोर-जब्र का) उलाहमा मैंने किसी को कभी नहीं दिया। 1। रहाउ। हे प्रभू ! आपकी रज़ा को (मीठी) मान के। आपकी रज़ा को समझ के मैंने सुख हासिल कर लिया है। आपका नाम सुन-सुन के मैंने ऊँचा आत्मिक जीवन हासिल कर लिया है। मैंने गुरू से ये उपदेश (ले के अपने मन में ये बात) दृढ़ कर ली है कि इस लोक में और परलोक में आप ही सिर्फ आप ही (मेरा सहायक है)। 1। हे भाई ! जब से (गुरू से) मैंने ये बात समझ ली है। तब से (मेरे अंदर) हरेक किस्म का सुख-आनंद बना रहता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) साध-संगति में (गुरू ने मेरे अंदर आत्मिक जीवन का यह) प्रकाश कर दिया है कि (परमात्मा के बिना) कोई और दूसरा (कुछ भी करने के योग्य) नहीं। 2। 1। 2।
नट महला 5 ॥
जा कउ भई तुमारी धीर ॥
जम की त्रास मिटी सुखु पाइआ निकसी हउमै पीर ॥1॥ रहाउ ॥
तपति बुझानी अंम्रित बानी त्रिपते जिउ बारिक खीर ॥
मात पिता साजन संत मेरे संत सहाई बीर ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आपका दिया हुआ धैर्य मिल गया। उसके अंदर से मौत का डर हर वक्त का सहम मिट गया। उसने आत्मिक आनन्द हासिल कर लिया। उसके मन में से अहंकार की चुभन भी निकल गई। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिन मनुष्यों के अंदर से) सतिगुरू की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी ने माया की तृष्णा की तपश बुझा दी। वह (माया से) इस प्रकार तृप्त हो गए। जैसे बालक दूध से संतुष्ट होते हैं। हे भाई ! मेरे वास्ते भी संत जन ही माता-पिता हैं। संत जन ही सज्जन-मित्र-भाई मददगार हैं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(ऐसे मनुष्य की संगति में) मिला के परमात्मा (अनेकों को) निहाल करता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।