हरि का मारगु गुर संति बताइओ गुरि चाल दिखाई हरि चाल ॥
अंतरि कपटु चुकावहु मेरे गुरसिखहु निहकपट कमावहु हरि की हरि घाल निहाल निहाल निहाल ॥1॥
ते गुर के सिख मेरे हरि प्रभि भाए जिना हरि प्रभु जानिओ मेरा नालि ॥
जन नानक कउ मति हरि प्रभि दीनी हरि देखि निकटि हदूरि निहाल निहाल निहाल निहाल ॥2॥3॥9॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम हउ किआ जाना किआ भावै ॥
मनि पिआस बहुतु दरसावै ॥1॥ रहाउ ॥
सोई गिआनी सोई जनु तेरा जिसु ऊपरि रुच आवै ॥
क्रिपा करहु जिसु पुरख बिधाते सो सदा सदा तुधु धिआवै ॥1॥
कवन जोग कवन गिआन धिआना कवन गुनी रीझावै ॥
सोई जनु सोई निज भगता जिसु ऊपरि रंगु लावै ॥2॥
साई मति साई बुधि सिआनप जितु निमख न प्रभु बिसरावै ॥
संतसंगि लगि एहु सुखु पाइओ हरि गुन सद ही गावै ॥3॥
देखिओ अचरजु महा मंगल रूप किछु आन नही दिसटावै ॥
कहु नानक मोरचा गुरि लाहिओ तह गरभ जोनि कह आवै ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उलाहनो मै काहू न दीओ ॥
मन मीठ तुहारो कीओ ॥1॥ रहाउ ॥
आगिआ मानि जानि सुखु पाइआ सुनि सुनि नामु तुहारो जीओ ॥
ईहां ऊहा हरि तुम ही तुम ही इहु गुर ते मंत्रु द्रिड़ीओ ॥1॥
जब ते जानि पाई एह बाता तब कुसल खेम सभ थीओ ॥
साधसंगि नानक परगासिओ आन नाही रे बीओ ॥2॥1॥2॥
जा कउ भई तुमारी धीर ॥
जम की त्रास मिटी सुखु पाइआ निकसी हउमै पीर ॥1॥ रहाउ ॥
तपति बुझानी अंम्रित बानी त्रिपते जिउ बारिक खीर ॥
मात पिता साजन संत मेरे संत सहाई बीर ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(ऐसे मनुष्य की संगति में) मिला के परमात्मा (अनेकों को) निहाल करता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।