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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 978 · नट नारायण

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अंग
978
नट नारायण
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  1. हरि हो हो हो मेलि निहाल ॥1॥ रहाउ ॥
  2. राम हउ किआ जाना किआ भावै ॥
  3. उलाहनो मै काहू न दीओ ॥
  4. जा कउ भई तुमारी धीर ॥

गुरु राम दास जी · शबद · राग नट नारायण

हरि हो हो हो मेलि निहाल ॥1॥ रहाउ ॥

अंग 977 से चला आ रहा अंश

हरि हो हो हो मेलि निहाल ॥1॥ रहाउ ॥
हरि का मारगु गुर संति बताइओ गुरि चाल दिखाई हरि चाल ॥
अंतरि कपटु चुकावहु मेरे गुरसिखहु निहकपट कमावहु हरि की हरि घाल निहाल निहाल निहाल ॥1॥
ते गुर के सिख मेरे हरि प्रभि भाए जिना हरि प्रभु जानिओ मेरा नालि ॥
जन नानक कउ मति हरि प्रभि दीनी हरि देखि निकटि हदूरि निहाल निहाल निहाल निहाल ॥2॥3॥9॥

हिन्दी अर्थ: (ऐसे मनुष्य की संगति में) मिला के परमात्मा (अनेकों को) निहाल करता है। 1। रहाउ। हे भाई! संत-गुरू ने परमात्मा को मिलने का रास्ता बताया है। गुरू ने परमात्मा की राह पर चलने की जाच सिखाई है (और कहा है-) हे गुरसिखो! अपने अंदर से छल-कपट दूर करें। निष्छल हो के परमात्मा के सिमरन की मेहनत करें। (इस तरह) निहाल निहाल होया जाता है। 1। हे भाई! मेरे गुरू के वह सिख परमात्मा को प्यारे लगते हैं। जिन्होंने ये जान लिया है कि परमात्मा हमारे नजदीक बस रहा है। हे नानक! जिन सेवकों को परमात्मा ने ये सूझ बख्शी दी। वह सेवक परमात्मा को अपने नजदीक बसता देख के अपने अंग-संग बसता देख के हर वक्त प्रसन्न-चित्त रहते हैं। 2। 3। 9।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग नट नारायण

राम हउ किआ जाना किआ भावै ॥

रागु नट नाराइन महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम हउ किआ जाना किआ भावै ॥
मनि पिआस बहुतु दरसावै ॥1॥ रहाउ ॥
सोई गिआनी सोई जनु तेरा जिसु ऊपरि रुच आवै ॥
क्रिपा करहु जिसु पुरख बिधाते सो सदा सदा तुधु धिआवै ॥1॥
कवन जोग कवन गिआन धिआना कवन गुनी रीझावै ॥
सोई जनु सोई निज भगता जिसु ऊपरि रंगु लावै ॥2॥
साई मति साई बुधि सिआनप जितु निमख न प्रभु बिसरावै ॥
संतसंगि लगि एहु सुखु पाइओ हरि गुन सद ही गावै ॥3॥
देखिओ अचरजु महा मंगल रूप किछु आन नही दिसटावै ॥
कहु नानक मोरचा गुरि लाहिओ तह गरभ जोनि कह आवै ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: रागु नट नाराइन महला 5 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे परमात्मा! मैं ये तो नहीं जानता कि आपको क्या अच्छा लगता है (भाव, आपको मेरी चाहत पसंद है अथवा नहीं। पर) मेरे मन में आपके दर्शनों की बहुत अभिलाशा है। 1। रहाउ। हे सर्व-व्यापक! हे सृजनहार! वही मनुष्य उच्च आत्मिक सूझवाला है। वही मनुष्य आपका सेवक है। जिस पर आपकी खुशी होती है। हे प्रभू! जिस पर आप मेहर करते हैं। वह आपको सदा ही सिमरता रहता है। 1। हे भाई! वह कौन से योग-साधन हैं। कौन सी ज्ञान की बातें हैं। कौन सी समाधियाँ हैं। कौन से गुण हैं जिनसे कोई मनुष्य परमात्मा को पसंद कर सकता है। (मनुष्य के अपने इस तरह के कोई प्रयत्न कामयाब नहीं होते)। वही मनुष्य प्रभू का सेवक है। वही मनुष्य प्रभू का प्यारा भक्त है। जिस पर वह स्वयं अपने प्यार का रंग चढ़ाता है। 2। हे भाई! वही समझ (अच्छी है)। वही बुद्धि और समझदारी (ठीक है)। जिसके द्वारा मनुष्य परमात्मा को आँख झपकने जितने समय के लिए भी नहीं भुलाता। (हे भाई! जिस मनुष्य ने) गुरू के चरणों में बैठ के ये (हरी-नाम-सिमरन का) सुख हासिल कर लिया। वह सदा ही परमात्मा के गुण गाता रहता है। 3। हे भाई! जिस मनुष्य ने आश्चर्य-रूप महा आनंदरूप परमात्मा के दर्शन कर लिए। उसको (उस जैसी) कोई और चीज नहीं दिखती। हे नानक! कहें: गुरू ने (जिस मनुष्य के मन से विकारों का) जंग उतार दिया वहाँ पैदा होने-मरने का चक्कर कभी नजदीक नहीं फटक सकता। 4। 1।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग नट नारायण

उलाहनो मै काहू न दीओ ॥

नट नाराइन महला 5 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उलाहनो मै काहू न दीओ ॥
मन मीठ तुहारो कीओ ॥1॥ रहाउ ॥
आगिआ मानि जानि सुखु पाइआ सुनि सुनि नामु तुहारो जीओ ॥
ईहां ऊहा हरि तुम ही तुम ही इहु गुर ते मंत्रु द्रिड़ीओ ॥1॥
जब ते जानि पाई एह बाता तब कुसल खेम सभ थीओ ॥
साधसंगि नानक परगासिओ आन नाही रे बीओ ॥2॥1॥2॥

हिन्दी अर्थ: नट नाराइन महला 5 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे प्रभू! गुरू की किरपा से तब से) आपका किया हुआ (हरेक काम) मेरे मन को मीठा लगने लगा है। (जब से किसी की तरफ से किसी प्रकार के जोर-जब्र का) उलाहमा मैंने किसी को कभी नहीं दिया। 1। रहाउ। हे प्रभू! आपकी रज़ा को (मीठी) मान के, आपकी रज़ा को समझ के मैंने सुख हासिल कर लिया है। आपका नाम सुन-सुन के मैंने ऊँचा आत्मिक जीवन हासिल कर लिया है। मैंने गुरू से ये उपदेश (ले के अपने मन में ये बात) दृढ़ कर ली है कि इस लोक में और परलोक में आप ही सिर्फ आप ही (मेरे सहायक हैं)। 1। हे भाई! जब से (गुरू से) मैंने ये बात समझ ली है, तब से (मेरे अंदर) हरेक किस्म का सुख-आनंद बना रहता है। हे नानक! (कहें: हे भाई!) साध-संगति में (गुरू ने मेरे अंदर आत्मिक जीवन का यह) प्रकाश कर दिया है कि (परमात्मा के बिना) कोई और दूसरा (कुछ भी करने के योग्य) नहीं। 2। 1। 2।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग नट नारायण

जा कउ भई तुमारी धीर ॥

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नट महला 5 ॥
जा कउ भई तुमारी धीर ॥
जम की त्रास मिटी सुखु पाइआ निकसी हउमै पीर ॥1॥ रहाउ ॥
तपति बुझानी अंम्रित बानी त्रिपते जिउ बारिक खीर ॥
मात पिता साजन संत मेरे संत सहाई बीर ॥1॥

हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ हे प्रभू! जिस मनुष्य को आपका दिया हुआ धैर्य मिल गया। उसके अंदर से मौत का डर हर वक्त का सहम मिट गया। उसने आत्मिक आनन्द हासिल कर लिया। उसके मन में से अहंकार की चुभन भी निकल गई। 1। रहाउ। (हे भाई! जिन मनुष्यों के अंदर से) सतिगुरू की आत्मिक जीवन देने वाली बाणी ने माया की तृष्णा की तपश बुझा दी। वह (माया से) इस प्रकार तृप्त हो गए। जैसे बालक दूध से संतुष्ट होते हैं। हे भाई! मेरे वास्ते भी संत जन ही माता-पिता हैं। संत जन ही सज्जन-मित्र-भाई मददगार हैं। 1।

रचयिता और स्रोत

यह नट नारायण राग के क्रम का अंग 978 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 978 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।