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अंग 980

अंग
980
राग नट नारायण
राग: नट नारायण · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नट महला 5 ॥
हउ वारि वारि जाउ गुर गोपाल ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि निरगुन तुम पूरन दाते दीना नाथ दइआल ॥1॥
ऊठत बैठत सोवत जागत जीअ प्रान धन माल ॥2॥
दरसन पिआस बहुतु मनि मेरै नानक दरस निहाल ॥3॥8॥9॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: नट महला 5॥ हे सबसे बड़े सृष्टि के पालनहार ! मैं (आपसे) सदा सदके जाता हूँ। बलिहार जाता हूँ। 1। रहाउ। हे दीनों के नाथ ! हे दया के घर प्रभू ! मैं गुण-हीन हूँ। आप सब दातें देने वाला है। 1। हे प्रभू ! उठते बैठते सोते जागते आप ही मेरी जिंद का मेरे प्राणों का आसरा है। 2। हे प्रभू ! मेरे मन में आपके दर्शनों की बहुत तमन्ना है। (मुझे) नानक को दर्शन दे के निहाल कर। 3। 8। 9।
नट पड़ताल महला 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोऊ है मेरो साजनु मीतु ॥
हरि नामु सुनावै नीत ॥
बिनसै दुखु बिपरीति ॥
सभु अरपउ मनु तनु चीतु ॥1॥ रहाउ ॥
कोई विरला आपन कीत ॥
संगि चरन कमल मनु सीत ॥
करि किरपा हरि जसु दीत ॥1॥
हरि भजि जनमु पदारथु जीत ॥
कोटि पतित होहि पुनीत ॥
नानक दास बलि बलि कीत ॥2॥1॥10॥19॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: नट पड़ताल महला 5 सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! कोई विरला ही (पाता) है ऐसा सज्जन-मित्र। जो सदा परमात्मा का नाम सुनाता रहे। (नाम की बरकति से) बुरी तरफ की प्रीति का दुख दूर हो जाता है। (हे भाई ! अगर कोई हरी-नाम सुनाने वाला सज्जन मिल जाए। तब उससे) मैं अपना मन अपना तन अपना चित्त सब कुछ सदके कर दूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! कोई विरला ही (पाता) है (इस तरह का जिसको प्रभू ने) अपना बना लिया होता है। जिसका मन प्रभू ने अपने सुंदर चरणों से जोड़ के रखा होता है। जिसको प्रभू ने कृपा करके अपनी सिफत-सालाह (की दाति) दी होती है। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम जप के कीमती मानस जनम को सफल बना लेना है। (नाम जप के) करोड़ों विकारी पवित्र हो जाते हैं। हे नानक ! (कह- नाम जपने वाले ऐसे) दास से मैं अपने आप को सदके करता हूँ कुर्बान करता हूँ। 2। 1। 10। 19।
नट असटपदीआ महला 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम मेरे मनि तनि नामु अधारे ॥
खिनु पलु रहि न सकउ बिनु सेवा मै गुरमति नामु सम॑ारे ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि हरि हरि हरि मनि धिआवहु मै हरि हरि नामु पिआरे ॥
दीन दइआल भए प्रभ ठाकुर गुर कै सबदि सवारे ॥1॥
मधसूदन जगजीवन माधो मेरे ठाकुर अगम अपारे ॥
इक बिनउ बेनती करउ गुर आगै मै साधू चरन पखारे ॥2॥
सहस नेत्र नेत्र है प्रभ कउ प्रभ एको पुरखु निरारे ॥
सहस मूरति एको प्रभु ठाकुरु प्रभु एको गुरमति तारे ॥3॥
गुरमति नामु दमोदरु पाइआ हरि हरि नामु उरि धारे ॥
हरि हरि कथा बनी अति मीठी जिउ गूंगा गटक सम॑ारे ॥4॥
रसना साद चखै भाइ दूजै अति फीके लोभ बिकारे ॥
जो गुरमुखि साद चखहि राम नामा सभ अन रस साद बिसारे ॥5॥
गुरमति राम नामु धनु पाइआ सुणि कहतिआ पाप निवारे ॥
धरम राइ जमु नेड़ि न आवै मेरे ठाकुर के जन पिआरे ॥6॥
सास सास सास है जेते मै गुरमति नामु सम॑ारे ॥
सासु सासु जाइ नामै बिनु सो बिरथा सासु बिकारे ॥7॥
क्रिपा क्रिपा करि दीन प्रभ सरनी मो कउ हरि जन मेलि पिआरे ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: नट असटपदीआ महला 4 सतिगुर प्रसादि॥ हे राम ! मेरे मन में मेरे तन में आपका नाम ही आसरा है। आपकी सेवा-भक्ति किए बिना मैं एक छिन एक पल भर भी नहीं रह सकता। गुरू की शरण पड़ कर मैं आपका नाम अपने हृदय में बसाता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! आप भी सदा परमात्मा का ध्यान धरा करो। मुझे तो हरी-नाम ही प्यारा लगता है। ठाकुर-प्रभू जिन कंगालों पर दयावान होते हैं। उनका जीवन गुरू के शबद के माध्यम से सुंदर बना देते हैं। 1। हे मधु सूदन ! हे जग जीवन ! हे माधो ! हे मेरे ठाकुर ! हे अपहुँच ! हे बेअंत ! (अगर आप मेहर करे। तो आपके नाम की प्राप्ति के लिए) मैं गुरू के पास सदा विनती करता रहूँ। मैं गुरू के चरण ही धोता रहूँ। 2। (हे भाई ! सर्व-व्यापक) प्रभू की हजारों आँखों हैं। (फिर भी) वह सर्व-व्यापक प्रभू सदा निर्लिप है। हे भाई ! वह मालिक प्रभू हजारों शरीरों वाला है। फिर भी वह अपने जैसा स्वयं ही एक है। वह खुद ही गुरू की मति के द्वारा जीवों को संसार-समुंद्र से पार लंघाता है। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य ने गुरू की मति के द्वारा परमात्मा का नाम प्राप्त कर लिया। वह उस नाम को सदा अपने हृदय में बसाए रखता है। परमात्मा की सिफत-सालाह उसको बहुत मीठी लगती है। उसको वह हर वक्त दिल में संभाल के रखता है (पर। किसी को बताता नहीं।) जैसे कोई गूँगा (कोई शर्बत आदि) बड़े स्वाद से पीता है (पर। स्वाद बता नहीं सकता)। 4। हे भाई ! जिस मनुष्य की जीभ माया के मोह के कारण (अन्य पदार्थों के) स्वाद चखती रहती है। वह मनुष्य लोभ आदिक अति फीके स्वादों में फंसा रहता है। गुरू के सन्मुख रहने वाले जो लोग परमात्मा के नाम का आनंद पाते हैं। वे अन्य रसों के स्वाद भुला देते हैं। 5। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू की मति ले के परमात्मा का नाम पा लिया है। वह सदा नाम सुन के और उचार के पाप दूर कर लेते हैं। ऐसे मनुष्य मालिक-प्रभू के प्यारे होते हैं। धर्मराज अथवा (उसका कोई) जम उनके नजदीक नहीं फटकता। 6। जो एक भी श्वास प्रभू के नाम के बिना जाता है। वह श्वास व्यर्थ जाता है। बेकार जाता है। हे भाई ! जिंदगी की जितनी भी सासें हैं (उनमें) मैं तो गुरू की मति के आसरे परमात्मा का नाम ही सिमरता हूँ। 7। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू ! मैं दीन आपकी शरण आया हूँ। मेरे पर मेहर कर। मेहर कर। मुझे अपने प्यारे भगत मिला।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “नट महला 5॥ हे सबसे बड़े सृष्टि के पालनहार ! मैं (आपसे) सदा सदके जाता हूँ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।