हउ वारि वारि जाउ गुर गोपाल ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि निरगुन तुम पूरन दाते दीना नाथ दइआल ॥1॥
ऊठत बैठत सोवत जागत जीअ प्रान धन माल ॥2॥
दरसन पिआस बहुतु मनि मेरै नानक दरस निहाल ॥3॥8॥9॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोऊ है मेरो साजनु मीतु ॥
हरि नामु सुनावै नीत ॥
बिनसै दुखु बिपरीति ॥
सभु अरपउ मनु तनु चीतु ॥1॥ रहाउ ॥
कोई विरला आपन कीत ॥
संगि चरन कमल मनु सीत ॥
करि किरपा हरि जसु दीत ॥1॥
हरि भजि जनमु पदारथु जीत ॥
कोटि पतित होहि पुनीत ॥
नानक दास बलि बलि कीत ॥2॥1॥10॥19॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
राम मेरे मनि तनि नामु अधारे ॥
खिनु पलु रहि न सकउ बिनु सेवा मै गुरमति नामु सम॑ारे ॥1॥ रहाउ ॥
हरि हरि हरि हरि हरि मनि धिआवहु मै हरि हरि नामु पिआरे ॥
दीन दइआल भए प्रभ ठाकुर गुर कै सबदि सवारे ॥1॥
मधसूदन जगजीवन माधो मेरे ठाकुर अगम अपारे ॥
इक बिनउ बेनती करउ गुर आगै मै साधू चरन पखारे ॥2॥
सहस नेत्र नेत्र है प्रभ कउ प्रभ एको पुरखु निरारे ॥
सहस मूरति एको प्रभु ठाकुरु प्रभु एको गुरमति तारे ॥3॥
गुरमति नामु दमोदरु पाइआ हरि हरि नामु उरि धारे ॥
हरि हरि कथा बनी अति मीठी जिउ गूंगा गटक सम॑ारे ॥4॥
रसना साद चखै भाइ दूजै अति फीके लोभ बिकारे ॥
जो गुरमुखि साद चखहि राम नामा सभ अन रस साद बिसारे ॥5॥
गुरमति राम नामु धनु पाइआ सुणि कहतिआ पाप निवारे ॥
धरम राइ जमु नेड़ि न आवै मेरे ठाकुर के जन पिआरे ॥6॥
सास सास सास है जेते मै गुरमति नामु सम॑ारे ॥
सासु सासु जाइ नामै बिनु सो बिरथा सासु बिकारे ॥7॥
क्रिपा क्रिपा करि दीन प्रभ सरनी मो कउ हरि जन मेलि पिआरे ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “नट महला 5॥ हे सबसे बड़े सृष्टि के पालनहार ! मैं (आपसे) सदा सदके जाता हूँ।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।