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969
रामकली
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त्रिसना कामु क्रोधु मद मतसर काटि काटि कसु दीनु रे ॥1॥
त्रिसना कामु क्रोधु मद मतसर काटि काटि कसु दीनु रे ॥1॥
कोई है रे संतु सहज सुख अंतरि जा कउ जपु तपु देउ दलाली रे ॥
एक बूंद भरि तनु मनु देवउ जो मदु देइ कलाली रे ॥1॥ रहाउ ॥
भवन चतुर दस भाठी कीन॑ी ब्रहम अगनि तनि जारी रे ॥
मुद्रा मदक सहज धुनि लागी सुखमन पोचनहारी रे ॥2॥
तीरथ बरत नेम सुचि संजम रवि ससि गहनै देउ रे ॥
सुरति पिआल सुधा रसु अंम्रितु एहु महा रसु पेउ रे ॥3॥
निझर धार चुऐ अति निरमल इह रस मनूआ रातो रे ॥
कहि कबीर सगले मद छूछे इहै महा रसु साचो रे ॥4॥1॥
कोई है रे संतु सहज सुख अंतरि जा कउ जपु तपु देउ दलाली रे ॥
एक बूंद भरि तनु मनु देवउ जो मदु देइ कलाली रे ॥1॥ रहाउ ॥
भवन चतुर दस भाठी कीन॑ी ब्रहम अगनि तनि जारी रे ॥
मुद्रा मदक सहज धुनि लागी सुखमन पोचनहारी रे ॥2॥
तीरथ बरत नेम सुचि संजम रवि ससि गहनै देउ रे ॥
सुरति पिआल सुधा रसु अंम्रितु एहु महा रसु पेउ रे ॥3॥
निझर धार चुऐ अति निरमल इह रस मनूआ रातो रे ॥
कहि कबीर सगले मद छूछे इहै महा रसु साचो रे ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: तृष्णा-काम-क्रोध-अहंकार और ईष्या को काट-काट के सक्क (उस गुण में) मिला दिया है। 1। हे भाई ! क्या मुझे कोई ऐसा संत मिल जाएगा (भाव। मेरा मन चाहता है कि मुझे कोई ऐसा संत मिल जाए) जो खुद अडोल अवस्था में टिका हुआ हो। सुख में टिका हो। यदि कोई ऐसा साकी (-संत) मुझे (नाम-अमृत-रूपी) नशा पिलाए। तो मैं उस अमृत की एक बूँद के बदले अपना तन-मन उसके हवाले कर दूँ। मैं (जोगियों और पंडितों के बताए हुए) जप और तप उस संत को बतौर दलाली दे दूँ। 1। रहाउ। चौदह भवनों को मैंने भट्ठी बनाया है। अपने शरीर में ईश्वरीय-ज्योति रूपी आग जलाई है (भाव। सारे जगत के मोह को मैंने शरीर के अंदर की ब्रहमाग्नि से जला डाला है)। हे भाई ! मेरी सुरति (मेरी लिव) अडोल अवस्था में लग गई है। ये मैंने उस नाल का डाट बनाया है (जिसमें से शराब निकलती है)। मेरे मन की सुख अवस्था उस नाल पर पोचा दे रही है (ज्यों-ज्यों मेरा मन अडोल होता है। सुख अवस्था में पहुँचता है। त्यों-त्यों मेरे अंदरनाम-अमृत का प्रवाह चलता है)। 2। इस नाम-अमृत के बदले मैंने (पंडितों और जोगियों के बताए हुए) तीर्थ-स्नान, व्रत, नेम, सुच, संजम। प्राणायाम में श्वासों के चढ़ाने व उतारने- ये सब कुछ गिरवी रख दिए हैं। हे भाई ! प्रभू-चरणों में जुड़ी हुई अपनी सुरति को मैंने प्याला बना लिया है और (नाम-) अमृत पी रहा हूँ। ये नाम-अमृत सब रसों से श्रेष्ठ रस है। 3। (अब मेरे अंदर नाम-अमृत के) चश्मे की बहुत साफ धारा पड़ रही है। मेरा मन। हे भाई ! इसके स्वाद में रंगा हुआ है। कबीर कहता है- अन्य सारे नशे फोके हैं। एक यही सबसे श्रेष्ठ रस सदा कायम रहने वाला है। 4। 1।
गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि महूआ भउ भाठी मन धारा ॥
गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि महूआ भउ भाठी मन धारा ॥
सुखमन नारी सहज समानी पीवै पीवनहारा ॥1॥
अउधू मेरा मनु मतवारा ॥
उनमद चढा मदन रसु चाखिआ त्रिभवन भइआ उजिआरा ॥1॥ रहाउ ॥
दुइ पुर जोरि रसाई भाठी पीउ महा रसु भारी ॥
कामु क्रोधु दुइ कीए जलेता छूटि गई संसारी ॥2॥
प्रगट प्रगास गिआन गुर गंमित सतिगुर ते सुधि पाई ॥
दासु कबीरु तासु मद माता उचकि न कबहू जाई ॥3॥2॥
सुखमन नारी सहज समानी पीवै पीवनहारा ॥1॥
अउधू मेरा मनु मतवारा ॥
उनमद चढा मदन रसु चाखिआ त्रिभवन भइआ उजिआरा ॥1॥ रहाउ ॥
दुइ पुर जोरि रसाई भाठी पीउ महा रसु भारी ॥
कामु क्रोधु दुइ कीए जलेता छूटि गई संसारी ॥2॥
प्रगट प्रगास गिआन गुर गंमित सतिगुर ते सुधि पाई ॥
दासु कबीरु तासु मद माता उचकि न कबहू जाई ॥3॥2॥
हिन्दी अर्थ: (नाम-रस की शराब निकालने के लिए) मैंने आत्मिक-ज्ञान का गुड़। प्रभू चरणों में जुड़ी सुरति को महूए के फूल। और अपने मन में टिकाए हुए प्रभू के भय को भट्ठी बनाया है। (इस ज्ञान-ध्यान और भय से उपजा नाम-रस पी के। मेरा मन) अडोल अवस्था में लीन हो गया है (जैसे जोगी शराब पी के अपने प्राण) सुखमना नाड़ी में टिकाता है। अब मेरा मन नाम-रस को पीने के लायक हो के पी रहा है। हे जोगी ! मेरा (भी) मन मस्त होया हुआ है। मुझे (ऊँची आत्मिक अवस्था की) मस्ती चढ़ी हुई है। (पर) मैंने मस्त करने वाला (नाम-) रस चखा है। (उसकी बरकति से) सारे ही जगत में मुझे उसी की ही ज्योति जल रही दिखाई देती है। 1। रहाउ। माया के मोह को वश में करके मैंने (जोगी वाली) भट्ठी तपाई है। अब मैं बड़ा महान नाम-रस पी रहा हूँ। काम और क्रोध दोनों को मैंने ईधन बना दिया है (और। इस भट्ठी में जला डाला है। भाव। मोह को वश में करने से काम-क्रोध भी खत्म हो गए हैं)। इस तरह संसार में फंसने वाली बिरती खत्म हो गई है। 2। (प्रभू तक) पहुँच वाले गुरू के ज्ञान की बरकति से मेरे अंदर (नाम का) प्रकाश हो गया है। गुरू से मुझे (ऊँची) समझ मिली हुई है। प्रभू का दास कबीर उस नशे में मस्त है। उसकी मस्ती कभी समाप्त होने वाली नहीं। 3। 2।
तूं मेरो मेरु परबतु सुआमी ओट गही मै तेरी ॥
तूं मेरो मेरु परबतु सुआमी ओट गही मै तेरी ॥
ना तुम डोलहु ना हम गिरते रखि लीनी हरि मेरी ॥1॥
अब तब जब कब तुही तुही ॥
हम तुअ परसादि सुखी सद ही ॥1॥ रहाउ ॥
तोरे भरोसे मगहर बसिओ मेरे तन की तपति बुझाई ॥
पहिले दरसनु मगहर पाइओ फुनि कासी बसे आई ॥2॥
जैसा मगहरु तैसी कासी हम एकै करि जानी ॥
हम निरधन जिउ इहु धनु पाइआ मरते फूटि गुमानी ॥3॥
करै गुमानु चुभहि तिसु सूला को काढन कउ नाही ॥
अजै सु चोभ कउ बिलल बिलाते नरके घोर पचाही ॥4॥
कवनु नरकु किआ सुरगु बिचारा संतन दोऊ रादे ॥
हम काहू की काणि न कढते अपने गुर परसादे ॥5॥
अब तउ जाइ चढे सिंघासनि मिले है सारिंगपानी ॥
राम कबीरा एक भए है कोइ न सकै पछानी ॥6॥3॥
ना तुम डोलहु ना हम गिरते रखि लीनी हरि मेरी ॥1॥
अब तब जब कब तुही तुही ॥
हम तुअ परसादि सुखी सद ही ॥1॥ रहाउ ॥
तोरे भरोसे मगहर बसिओ मेरे तन की तपति बुझाई ॥
पहिले दरसनु मगहर पाइओ फुनि कासी बसे आई ॥2॥
जैसा मगहरु तैसी कासी हम एकै करि जानी ॥
हम निरधन जिउ इहु धनु पाइआ मरते फूटि गुमानी ॥3॥
करै गुमानु चुभहि तिसु सूला को काढन कउ नाही ॥
अजै सु चोभ कउ बिलल बिलाते नरके घोर पचाही ॥4॥
कवनु नरकु किआ सुरगु बिचारा संतन दोऊ रादे ॥
हम काहू की काणि न कढते अपने गुर परसादे ॥5॥
अब तउ जाइ चढे सिंघासनि मिले है सारिंगपानी ॥
राम कबीरा एक भए है कोइ न सकै पछानी ॥6॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! आप (ही) मेरा सबसे बड़ा आसरा हैं। मैंने आपकी ही ओट पकड़ी है (किसी तीर्थ पर बसने का तकिया आसरा मैंने नहीं ताका) आप सदा अडोल रहने वाले हैं (आपका पल्ला पकड़ के) मैं भी नहीं डोलता। क्योंकि आपने खुद मेरी लाज रख ली है। 1। हे प्रभू ! सदा के लिए आप ही आप ही मेरा सहारा हैं। आपकी मेहर से मैं सदा ही सुखी हूँ। 1। रहाउ। (लोग कहते हैं मगहर श्रापित धरती है। पर) मैं आपके पर भरोसा करके मगहर जा बसा। (आपने मेहर की और) मेरे शरीर की (विकारों की) तपस (मगहर में ही) बुझा दी। मैंने। हे प्रभू ! आपका दीदार पहले मगहर में ही रहते हुए किया था। और बाद में मैं काशी आ के बसा। 2। (उसकी बरकति से) मैंने मगहर और काशी दोनों को एक जैसा ही समझा है। पर। (जिन्हें काशी तीर्थ पर बसने का गर्व है वह) वे अहंकारी अहंकार में दुखी होते हैं। 3। जैसे किसी कंगाल को धन मिल जाए। (वैसे ही) मुझ कंगाल को आपका धन मिल गया है। जो मनुष्य गुमान करता है (गुमान चाहे किसी भी बात का क्यों ना हो) उसको (ऐसे होता है जैसे) शूलें चुभती हैं। कोई उनकी ये शूलें उखाड़ नहीं सकता। सारी उम्र (वह अहंकारी) उसकी चुभन से बिलखते हैं। मानो। घोर नर्क में जल रहे हैं। 4। (ये लोग कहते हैं कि काशी में रहने वाला स्वर्ग भोगता है। पर) नर्क क्या। और बेचारा स्वर्ग क्या। संतों ने दोनों ही रद्द कर दिए हैं; क्योंकि संत अपने गुरू की कृपा से (ना स्वर्ग और ना ही नर्क) किसी के भी मुथाज नहीं हैं। 5। (अपने गुरू की कृपा से) मैं अब उच्च आत्मिक ठिकाने पर पहुँच गया हूँ। जहाँ मुझे परमात्मा मिल गया है। मैं कबीर और मेरा राम एक-रूप हो गए हैं। कोई भी हमारे बीच में फर्क नहीं बता सकता। 6। 3।
संता मानउ दूता डानउ इह कुटवारी मेरी ॥
संता मानउ दूता डानउ इह कुटवारी मेरी ॥
दिवस रैनि तेरे पाउ पलोसउ केस चवर करि फेरी ॥1॥
हम कूकर तेरे दरबारि ॥
भउकहि आगै बदनु पसारि ॥1॥ रहाउ ॥
दिवस रैनि तेरे पाउ पलोसउ केस चवर करि फेरी ॥1॥
हम कूकर तेरे दरबारि ॥
भउकहि आगै बदनु पसारि ॥1॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: अपने इस शरीर-रूप शहर की रक्षा करने के लिए मेरा फर्ज ये है मैं भले गुणों का स्वागत करूँ और विकारों को मार निकालूँ। दिन-रात। हे प्रभू आपके चरण परसूँ और अपने केसों का चवर आपके ऊपर झुलाऊँ। 1। हे प्रभू ! मैं आपके दर पर (बैठा हुआ एक) कुक्ता हूँ। और मुँह आगे कर-करके भौंक रहा हूँ (भाव। आपके दर पे जो आपकी सिफत-सालाह कर रहा हूँ)। ये अपने शरीर को विकारी-कुक्तों से बचाने के लिए है। जैसे एक कुक्ता किसी पराई गली के कुक्तों से अपने-आप की रक्षा करने के लिए भौंकतास है। यही बात सतिगुरू नानक देव जी ने इस तरह कही है;ऐते कूकर हउ बेगाना भउका इसु तन ताई। 1। रहाउ।
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 969 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 969 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।