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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 968 · रामकली

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अंग
968
रामकली
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  1. सो टिका सो बैहणा सोई दीबाणु ॥
  2. धंनु धंनु रामदास गुरु जिनि सिरिआ तिनै सवारिआ ॥
  3. चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ॥
  4. रामकली बाणी भगता की ॥

सो टिका सो बैहणा सोई दीबाणु ॥

सो टिका सो बैहणा सोई दीबाणु ॥
पियू दादे जेविहा पोता परवाणु ॥
जिनि बासकु नेत्रै घतिआ करि नेही ताणु ॥ जिनि समुंदु विरोलिआ करि मेरु मधाणु ॥
चउदह रतन निकालिअनु कीतोनु चानाणु ॥
घोड़ा कीतो सहज दा जतु कीओ पलाणु ॥
धणखु चड़ाइओ सत दा जस हंदा बाणु ॥
कलि विचि धू अंधारु सा चड़िआ रै भाणु ॥
सतहु खेतु जमाइओ सतहु छावाणु ॥
नित रसोई तेरीऐ घिउ मैदा खाणु ॥
चारे कुंडां सुझीओसु मन महि सबदु परवाणु ॥
आवा गउणु निवारिओ करि नदरि नीसाणु ॥
अउतरिआ अउतारु लै सो पुरखु सुजाणु ॥
झखड़ि वाउ न डोलई परबतु मेराणु ॥
जाणै बिरथा जीअ की जाणी हू जाणु ॥
किआ सालाही सचे पातिसाह जां तू सुघड़ु सुजाणु ॥
दानु जि सतिगुर भावसी सो सते दाणु ॥
नानक हंदा छत्रु सिरि उमति हैराणु ॥
सो टिका सो बैहणा सोई दीबाणु ॥
पियू दादे जेविहा पोत्रा परवाणु ॥6॥

हिन्दी अर्थ: (इसके माथे पर भी) वही नूर है। (इसका भी) वही तख़्त है। वही दरबार है (जो गुरू नानक और गुरू अंगद साहिब का था)। पौत्र-गुरू (गुरू अमरदास भी) जाना-माना हुआ (गुरू) है (क्योंकि वह भी) गुरू नानक और गुरू अंगद जैसा ही है; इस गुरू अमरदास जी ने भी आत्मिक बल को नेहणी बना के (मन-रूप) नाग को नेत्रे डाला है। (ऊँची सुरति रूप) सुमेर पर्वत को मथानी बना के (गुरू-शबद रूप) समुंद्र में बिलोया है (मथा है)। (उस 'शबद-समुंद्र' में से ईश्वरीय-गुण रूप) चौदह रतन निकाले (जिनसे) उसने (जगत में आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश पैदा किया। (गुरू अमरदास ने) सहज-अवस्था को घोड़ा बनाया। विकारों से इन्द्रियों को रोक के रखने की ताकत को काठी बनाया; सच्चे आचरण की कमान कसी और परमात्मा की सिफत सालाह का तीर (पकड़ा, चलाया)। संसार में (विकारों का) घोर अंधकार था। (गुरू अमरदास। जैसे) किरणों से भरा हुआ सूरज चढ़ आया। जिसने 'सत' के बल से ही (उजड़ी हुई) खेती जमाई (हरी भरी कर दी) और 'सत' से ही उसकी रक्षा की। (हे गुरू अमरदास !) आपके लंगर में (भी) नित्य घी, मैदा और खण्ड (आदि उत्तम पदार्थ) प्रयोग हो रहे हैं जिस मनुष्य ने अपने मन में आपका शबद टिका लिया है उसको चहु कुंटों (चारों कोनों) की सूझ आ गई है। (हे गुरू !) जिसको आपने मेहर की नजर करके (शबद रूप) राह-दारी बख्शी है उसके पैदा होने-मरने के चक्कर आपने समाप्त कर दिए हैं। वह अकाल पुरख (स्वयं गुरू अमरदास के रूप में) अवतार ले के जगत में आया है। (गुरू अमरदास विकारों के) झॅखड़ में नहीं डोलता। (विकारों की) अंधेरी भी झूल जाए तब भी नहीं डोलता। वह तो (जैसे) सुमेर पर्वत है; जीवों के दिल की पीड़ा जानता है। (दिलों की जानने वाला) जानी-जान है। हे सदा-स्थिर राज वाले पातशाह ! मैं आपकी क्या सिफत करूँ। आप सुंदर आत्मा वाले समझदार हैं। मुझ सॅते को आपकी वही बख्शिश अच्छी है जो (आपको) सतिगुरू को अच्छी लगती है। (गुरू अमरदास जी के) सिर पर गुरू नानक देव जी वाला छत्र संगति (देख के) आश्चर्य-चकित हो रही है। (इनके माथे पर भी) वही नूर है। (इनका भी) वही तख्त है। वही दरबार है (जो गुरू नानक और गुरू अंगद साहिब का था)। पौत्र-गुरू (गुरू अमरदास भी) जाने-माने गुरू हैं (क्योंकि वह भी) गुरू नानक और गुरू अंगद साहिब जैसे ही हैं। 6।

धंनु धंनु रामदास गुरु जिनि सिरिआ तिनै सवारिआ ॥

धंनु धंनु रामदास गुरु जिनि सिरिआ तिनै सवारिआ ॥
पूरी होई करामाति आपि सिरजणहारै धारिआ ॥
सिखी अतै संगती पारब्रहमु करि नमसकारिआ ॥
अटलु अथाहु अतोलु तू तेरा अंतु न पारावारिआ ॥
जिन॑ी तूं सेविआ भाउ करि से तुधु पारि उतारिआ ॥
लबु लोभु कामु क्रोधु मोहु मारि कढे तुधु सपरवारिआ ॥
धंनु सु तेरा थानु है सचु तेरा पैसकारिआ ॥
नानकु तू लहणा तूहै गुरु अमरु तू वीचारिआ ॥
गुरु डिठा तां मनु साधारिआ ॥7॥

हिन्दी अर्थ: गुरू रामदास जी धन्य हैं धन्य हैं ! जिस अकाल-पुरख ने (गुरू रामदास को) पैदा किया उसने उन्हें सुंदर भी बनाया। ये एक मुकम्मल करामात हुई है कि सृजनहार ने स्वयं (अपने आप को उसमें) टिकाया है। सब सिखों ने और संगतों ने उनको अकाल-पुरख का रूप जान के (उनकी) बँदना की है। (हे गुरू रामदास !) आप सदा कायम रहने वाले हैं। आप तोले नहीं जा सकते (भाव। आपके गुण गिने नहीं जा सकते; आप एक ऐसा समुंद्र हैं जिसकी) थाह नहीं पाई जा सकती। इस पार उस पार का अंत नहीं पाया जा सकता। जिन लोगों ने प्यार से आपका हुकम माना है आपने उनको (संसार-समुंद्र से) पार लंघा दिया है। उनके अंदर से आपने लालच। लोभ, काम, क्रोध, मोह व अन्य सारे विकार मार के निकाल दिए हैं। (हे गुरू रामदास !) मैं सदके हूँ उस जगह पर से। जहाँ आप बसे। आपकी संगति सदा अटल है। (हे गुरू रामदास जी !) आप ही गुरू नानक हैं। आप ही बाबा लहणा हैं। मैंने आपको ही गुरू अमरदास समझा है। (जिस किसी ने) गुरू (रामदास) का दीदार किया है उसी का मन तब से ठहराव में आ गया है। 7।

चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ॥

चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ॥
आपीन॑ै आपु साजिओनु आपे ही थंमि॑ खलोआ ॥
आपे पटी कलम आपि आपि लिखणहारा होआ ॥
सभ उमति आवण जावणी आपे ही नवा निरोआ ॥
तखति बैठा अरजन गुरू सतिगुर का खिवै चंदोआ ॥
उगवणहु तै आथवणहु चहु चकी कीअनु लोआ ॥
जिन॑ी गुरू न सेविओ मनमुखा पइआ मोआ ॥
दूणी चउणी करामाति सचे का सचा ढोआ ॥
चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ॥8॥1॥

हिन्दी अर्थ: चारों गुरू (साहिबान) अपने अपने समय में रौशन हुए हैं। अकाल-पुरख स्वयं ही (उनमें) प्रकट हुआ। अकाल-पुरख ने अपने आप ही अपने आप को (सृष्टि के रूप में) जाहिर किया और खुद ही (गुरू रूप हो के) सृष्टि को सहारा दे रहा है। (जीवों की अगुवाई के लिए। मार्ग दर्शन के लिए) प्रभू स्वयं ही तख्ती (स्लेट) है और खुद ही कलम है और (गुरू रूप हो के) खुद ही मार्ग दर्शन लिखने वाला है। सारी सृष्टि तो जनम-मरण के चक्कर में है। पर प्रभू स्वयं (सच्चा) नया है और निरोया (निरोग) है (भाव। हर नए रंग में है और निर्लिप भी है)। (उस नए-निरोए सतिगुरू के बख्शे) तख्त के ऊपर (जिस पर चारों गुरू अपने-अपने समय में रौशन हुए हैं। अब) गुरू अरजन बैठे हुए हैं। सतिगुरू का चंदोआ चमक रहा है (भाव। सतिगुरू अरजन साहिब का तेज-प्रताप हर तरफ पसर रहा है)। सूरज के उगने से (डूबने तक) और डूबने से (चढ़ने तक) चहुँ कुंटों में इस (गुरू अरजन देव जी) ने रौशनी कर दी है। अपने मन के पीछे चलने वाले जिन लोगों ने गुरू का हुकम ना माना वे मर गए (भाव। वे आत्मिक मौत मर गए)। गुरू अरजन की (दिन-) दुगनी और रात चौगुनी बुजुर्गी बढ़ रही है; (सृष्टि को) गुरू। सच्चे प्रभू की सच्ची सौगात है। चारों गुरू अपने-अपने समय में प्रकाशमान हुए। अकाल-पुरख (उनमें) प्रकट हुआ। 8। 1।

रामकली बाणी भगता की ॥

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रामकली बाणी भगता की ॥
कबीर जीउ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
काइआ कलालनि लाहनि मेलउ गुर का सबदु गुड़ु कीनु रे ॥

हिन्दी अर्थ: रामकली बाणी भगता की॥ कबीर जीउ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! मैंने बढ़िया शरीर को मटकी बनाया है। और इसमें (नाम-अमृत-रूप शराब तैयार करने के लिए) खमीर की सामग्री एकत्र कर रहा हूँ- सतिगुरू के शबद को मैंने गुड़ बनाया है।

रचयिता और स्रोत

यह रामकली राग के क्रम का अंग 968 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।

इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी; सत्ता और बलवंड।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 968 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।