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967
रामकली
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लंगरु चलै गुर सबदि हरि तोटि न आवी खटीऐ ॥
लंगरु चलै गुर सबदि हरि तोटि न आवी खटीऐ ॥
खरचे दिति खसंम दी आप खहदी खैरि दबटीऐ ॥
होवै सिफति खसंम दी नूरु अरसहु कुरसहु झटीऐ ॥
तुधु डिठे सचे पातिसाह मलु जनम जनम दी कटीऐ ॥
सचु जि गुरि फुरमाइआ किउ एदू बोलहु हटीऐ ॥
पुत्री कउलु न पालिओ करि पीरहु कंन॑ मुरटीऐ ॥
दिलि खोटै आकी फिरनि॑ बंनि॑ भारु उचाइनि॑ छटीऐ ॥
जिनि आखी सोई करे जिनि कीती तिनै थटीऐ ॥
कउणु हारे किनि उवटीऐ ॥2॥
खरचे दिति खसंम दी आप खहदी खैरि दबटीऐ ॥
होवै सिफति खसंम दी नूरु अरसहु कुरसहु झटीऐ ॥
तुधु डिठे सचे पातिसाह मलु जनम जनम दी कटीऐ ॥
सचु जि गुरि फुरमाइआ किउ एदू बोलहु हटीऐ ॥
पुत्री कउलु न पालिओ करि पीरहु कंन॑ मुरटीऐ ॥
दिलि खोटै आकी फिरनि॑ बंनि॑ भारु उचाइनि॑ छटीऐ ॥
जिनि आखी सोई करे जिनि कीती तिनै थटीऐ ॥
कउणु हारे किनि उवटीऐ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: (गुरू नानक की दुकान में) गुरू के शबद के द्वारा (नाम का) लंगर चल रहा है। (पर बाबा लहणा जी की) नाम-कमाई में कोई घाटा नहीं पड़ता। (बाबा लहिणा जी) अकाल-पुरख की दी हुई नाम-दाति बाँट रहे हैं। खुद भी इस्तेमाल करते हैं और (औरों को भी) दिल खोल के दान कर रहे हैं। (गुरू अंगद साहिब जी के दरबार में) मालिक अकाल-पुरख की सिफत सालाह हो रही है। रूहानी देशों से (उसके दर पर) नूर झड़ रहा है। हे सच्चे सतिगुरू (अंगद देव जी) ! आपका दीदार करने से कई जन्मों की (विकारों की) मैल काटी जा रही है। (हे गुरू अंगद साहिब जी !) गुरू (नानक साहिब) ने जो भी हुकम किया। आप ने सत्य (करके माना। और आप ने) उसे मानने से ना नहीं की; (सतिगुरू जी के) पुत्रों ने वचन नहीं माना। वे गुरू की ओर पीठ दे के ही (हुकम) मोड़ते रहे। जो लोग खोटा दिल होने के कारण (गुरू से) आकी हुए फिरते हैं। वे लोग (दुनिया के धंधों की) छॅट का भार बाँध के उठाए फिरते हैं। (पर। जीवों के क्या वश है। जिस गुरू नानक ने ये रजा-मानने का हुकम फरमाया। वह खुद ही कार करने वाला था। जिसने यह (हुकम-खेल) रची। उसने खुद ही बाबा लहिणा जी को (हुकम मानने के) समर्थ बनाया। अपनी सार्मथ्य के सहारे। इस हुकम-खेल में) ना कोई हारने वाला है और ना ही कोई जीतने-योग्य है। 2।
जिनि कीती सो मंनणा को सालु जिवाहे साली ॥
जिनि कीती सो मंनणा को सालु जिवाहे साली ॥
धरम राइ है देवता लै गला करे दलाली ॥
सतिगुरु आखै सचा करे सा बात होवै दरहाली ॥
गुर अंगद दी दोही फिरी सचु करतै बंधि बहाली ॥
नानकु काइआ पलटु करि मलि तखतु बैठा सै डाली ॥
दरु सेवे उमति खड़ी मसकलै होइ जंगाली ॥
दरि दरवेसु खसंम दै नाइ सचै बाणी लाली ॥
बलवंड खीवी नेक जन जिसु बहुती छाउ पत्राली ॥
लंगरि दउलति वंडीऐ रसु अंम्रितु खीरि घिआली ॥
गुरसिखा के मुख उजले मनमुख थीए पराली ॥
पए कबूलु खसंम नालि जां घाल मरदी घाली ॥
माता खीवी सहु सोइ जिनि गोइ उठाली ॥3॥
धरम राइ है देवता लै गला करे दलाली ॥
सतिगुरु आखै सचा करे सा बात होवै दरहाली ॥
गुर अंगद दी दोही फिरी सचु करतै बंधि बहाली ॥
नानकु काइआ पलटु करि मलि तखतु बैठा सै डाली ॥
दरु सेवे उमति खड़ी मसकलै होइ जंगाली ॥
दरि दरवेसु खसंम दै नाइ सचै बाणी लाली ॥
बलवंड खीवी नेक जन जिसु बहुती छाउ पत्राली ॥
लंगरि दउलति वंडीऐ रसु अंम्रितु खीरि घिआली ॥
गुरसिखा के मुख उजले मनमुख थीए पराली ॥
पए कबूलु खसंम नालि जां घाल मरदी घाली ॥
माता खीवी सहु सोइ जिनि गोइ उठाली ॥3॥
हिन्दी अर्थ: जिस (गुरू अंगद देव जी) ने (विनम्रता में रह के सतिगुरू का हुकम मानने की मेहनत कमाई) की। वह मानने योग्य (पूज्य) हो गया। (दोनों में से) श्रेष्ठ कौन है- जिवांह कि मूंजी। (मूंजी ही अच्छी है। जो नीची जगह पलती है। इसी तरह जो विनम्रता से हुकम मानता है वह आदर पा लेता है)। गुरू अंगद साहिब धरम का राजा हो गया है। धरम का देवता हो गया है। जीवों की आरजूएं सुन के परमात्मा के साथ जोड़ने वाला बिचौला-पन कर रहा है। (अब) सतिगुरू (अंगद देव) जो वचन बोलते हैं अकाल-पुरख वही करता है। वही बात तुरंत हो जाती है। गुरू अंगद देव (जी की) महिमा की धूम पड़ गई है। सच्चे करतार ने पक्की करके कायम कर दी है। सैकड़ों सेवकों वाला गुरू नानक शरीर बदल के (भाव। गुरू अंगद देव जी के स्वरूप में) गद्दी संभाल के बैठा हुआ है (गुरू अंगद देव जी के अंदर गुरू नानक साहिब वाली ही ज्योति है। केवल शरीर बदला है)। संगति (गुरू अंगद देव जी के) दर (पर आ कर) प्रेम से सेवा कर रही है (और अपनी आत्मा को पवित्र कर रही है। जैसे) जंग लगी हुई धातु (लोहा) मसकले से (साफ) हो जाती है। (गुरू नानक के) दर पर (गुरू अंगद) नाम की दाति का सवाली है। अकाल-पुरख का सच्चा नाम सिमरन की बरकति से (गुरू अंगद साहिब के मुँह पर) लाली बनी हुई है। हे बलवंड ! (गुरू अंगद देव जी की पत्नी) (माता) खीवी जी (भी अपने पति की तरह) बड़े भले हैं। माता खीवी जी की छाया बहुत पुत्रों वाली (सघन) है (भाव। माता खीवी जी के पास बैठने से भी हृदय में शांति पैदा होती है)। (जैसे गुरू अंगद देव जी के सत्संग-रूप) लंगर में (नाम की) दौलत बाँटी जा रही है। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस बाँटा जा रहा है (वैसे ही माता खीवी जी की सेवा सदका लंगर में सबको) घी वाली खीर बाँटी जा रही है। (गुरू अंगद देव जी के दर पर आकर) गुरसिखों के माथे खिले हुए हैं। पर गुरू की ओर से बेमुखों के मुँह (ईष्या के कारण) पीले पड़ते हैं। माता खीवी जी का वह पति (गुरू अंगद देव ऐसा था) जिस ने (सारी) धरती (का भार) उठाया हुआ था। जब (गुरू अंगद देव जी ने) मर्दों वाली मेहनत कमाई की तो वह अपने सतिगुरू (गुरू नानक) के दर पर कबूल हुए। 3।
होरिंओ गंग वहाईऐ दुनिआई आखै कि किओनु ॥
होरिंओ गंग वहाईऐ दुनिआई आखै कि किओनु ॥
नानक ईसरि जगनाथि उचहदी वैणु विरिकिओनु ॥
माधाणा परबतु करि नेत्रि बासकु सबदि रिड़किओनु ॥
चउदह रतन निकालिअनु करि आवा गउणु चिलकिओनु ॥
कुदरति अहि वेखालीअनु जिणि ऐवड पिड ठिणकिओनु ॥
लहणे धरिओनु छत्रु सिरि असमानि किआड़ा छिकिओनु ॥
जोति समाणी जोति माहि आपु आपै सेती मिकिओनु ॥
सिखां पुत्रां घोखि कै सभ उमति वेखहु जि किओनु ॥
जां सुधोसु तां लहणा टिकिओनु ॥4॥
नानक ईसरि जगनाथि उचहदी वैणु विरिकिओनु ॥
माधाणा परबतु करि नेत्रि बासकु सबदि रिड़किओनु ॥
चउदह रतन निकालिअनु करि आवा गउणु चिलकिओनु ॥
कुदरति अहि वेखालीअनु जिणि ऐवड पिड ठिणकिओनु ॥
लहणे धरिओनु छत्रु सिरि असमानि किआड़ा छिकिओनु ॥
जोति समाणी जोति माहि आपु आपै सेती मिकिओनु ॥
सिखां पुत्रां घोखि कै सभ उमति वेखहु जि किओनु ॥
जां सुधोसु तां लहणा टिकिओनु ॥4॥
हिन्दी अर्थ: गुरू नानक ने और ही तरफ से गंगा चला दी है। दुनिया कहती है ये उसने क्या किया है। जगत के नाथ गुरू नानक ने हद से ऊँचा वचन बोला है उस (गुरू नानक) ने ऊँची सुरति को मधाणी बना के। (मन रूप) बासक नाग को नेत्रे में डाल के (भाव। मन को काबू करके) 'शबद' में मथा (भाव। 'शबद' को विचारा; इस तरह) उस (गुरू नानक) ने (इस 'शबद' समुंद्र में से 'रॅबी-गुण' ईश्वरीय गुणों रूपी) चौदह रतन (जैसे समुंद्र में से देवताओं ने चौदह रतन निकाले थे) निकाले और (ये उद्यम करके) संसार को सुंदर बना दिया। उस (गुरू नानक) ने ऐसी समर्थता दिखाई कि (पहले बाबा लहिणा जी का मन) जीत के इतनी उच्च आत्मा को परखा। (फिर) बाबा लहिणा जी के सिर पर (गुरू-गद्दी का) छत्र धरा और (उनकी) शोभा आसमान तक पहुँचाई। (गुरू नानक साहिब दी) आत्मा (बाबा लहिणा जी की) आत्मा में इस तरह मिल गई कि गुरू नानक ने अपने आप को अपने 'आपे' (बाबा लहिणा जी) के साथ साथ एक-मेक कर लिया। हे सारी संगति ! देखो। जो उस (गुरू नानक) ने किया। अपने सिखों और पुत्रों को परख के जब उसने सुधाई की तब उसने (अपनी जगह के वास्ते बाबा) लहणा (जी को) चुना। 4।
फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ॥
फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ॥
जपु तपु संजमु नालि तुधु होरु मुचु गरूरु ॥
लबु विणाहे माणसा जिउ पाणी बूरु ॥
वर्हिऐ दरगह गुरू की कुदरती नूरु ॥
जितु सु हाथ न लभई तूं ओहु ठरूरु ॥
नउ निधि नामु निधानु है तुधु विचि भरपूरु ॥
निंदा तेरी जो करे सो वंञै चूरु ॥
नेड़ै दिसै मात लोक तुधु सुझै दूरु ॥
फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ॥5॥
जपु तपु संजमु नालि तुधु होरु मुचु गरूरु ॥
लबु विणाहे माणसा जिउ पाणी बूरु ॥
वर्हिऐ दरगह गुरू की कुदरती नूरु ॥
जितु सु हाथ न लभई तूं ओहु ठरूरु ॥
नउ निधि नामु निधानु है तुधु विचि भरपूरु ॥
निंदा तेरी जो करे सो वंञै चूरु ॥
नेड़ै दिसै मात लोक तुधु सुझै दूरु ॥
फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ॥5॥
हिन्दी अर्थ: फिर (जब बाबा लहिणा जी को गुरुता मिली तब) बाबा फेरू जी के पुत्र सतिगुरू ने खडूर की रौनक बढ़ाई (भाव। करतारपुर से खडूर आ के टिके)। (हे सतिगुरू !) और जगत तो बहुत अहंकार करता है। पर आपके पास जप-तप-संजम (आदि की बरकति होने के कारण आप पहले की ही तरह गरीबी स्वभाव में ही) रहा। जैसे पानी को बूर खराब करता है वैसे ही मनुष्यों को लोभ तबाह करता है। (पर) गुरू (नानक) की दरगाह में ('नाम' की) बरखा होने के कारण (हे गुरू अंगद ! आपके ऊपर) ईश्वरीय नूर (छलकें मार रहा) है। आप वह शीतल समुंद्र हैं जिसकी थाह नहीं पाई जा सकती। जो (जगत के) नौ ही खजाने-रूप प्रभू का नाम-खजाना है। (हे गुरू !) (वह खजाना) आपके हृदय में नाको-नाक भरा हुआ है। (हे गुरू अंगद !) जो मनुष्य आपकी निंदा करे वह (स्वयं ही) तबाह हो जाता है (वह खुद ही अपनी आत्मिक मौत सहेड़ लेता है); सांसारिक जीवों को तो नजदीक के ही पदार्थ दिखाई देते हैं (वे दुनियां की खातिर निंदा का पाप कर बैठते हैं। इसका नतीजा नहीं जानते। पर हे गुरू !) आपको आगे घटित होने वाले हाल का भी पता होता है। (हे भाई !) फिर बाबा फेरू जी के पुत्र सतिगुरू (अंगद देव जी) ने खडूर को भाग्य लगाए। 5।
रचयिता और स्रोत
यह रामकली राग के क्रम का अंग 967 है। रचना के भीतर दिए शीर्षक, महला और अन्य रचयिता-संकेत साथ पढ़िए।
इस अंग के रचयिता-संकेत: सत्ता और बलवंड।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 967 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।