इस पृष्ठ पर
अंग
90
सिरी राग
अंग बदलें या अंश चुनें · 8 अंश
- सबदि रती सोहागणी सतिगुर कै भाइ पिआरि ॥
- हरि तेरी सभ करहि उसतति जिनि फाथे काढिआ ॥
- सतिगुर कै भाणै जो चलै तिसु वडिआई वडी होइ ॥
- नानक हरि नामु जिनी आराधिआ अनदिनु हरि लिव तार ॥
- हरि की भगता परतीति हरि सभ किछु जाणदा ॥
- आपणे प्रीतम मिलि रहा अंतरि रखा उरि धारि ॥
- गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥
- हरि आपणी भगति कराइ वडिआई वेखालीअनु ॥
सबदि रती सोहागणी सतिगुर कै भाइ पिआरि ॥
मः 3 ॥
सबदि रती सोहागणी सतिगुर कै भाइ पिआरि ॥
सदा रावे पिरु आपणा सचै प्रेमि पिआरि ॥
अति सुआलिउ सुंदरी सोभावंती नारि ॥
नानक नामि सोहागणी मेली मेलणहारि ॥2॥
सबदि रती सोहागणी सतिगुर कै भाइ पिआरि ॥
सदा रावे पिरु आपणा सचै प्रेमि पिआरि ॥
अति सुआलिउ सुंदरी सोभावंती नारि ॥
नानक नामि सोहागणी मेली मेलणहारि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जीवित पति वाली (गुरमुख जीव) स्त्री (वह है जो) गुरू के शबद द्वारा सतिगुरू के प्रेम प्यार में सदा अपने हरी पति (की याद) का आनन्द लेती है। वह सुंदर नारी बहुत सुहाने रूप वाली व शोभा वाली है। हे नानक ! नाम में (जुड़ी होने करके) (गुरमुख) सुहागन को मेलणहार हरी ने (अपने में) मिला लिया है।2।
हरि तेरी सभ करहि उसतति जिनि फाथे काढिआ ॥
पउड़ी ॥
हरि तेरी सभ करहि उसतति जिनि फाथे काढिआ ॥
हरि तुधनो करहि सभ नमसकारु जिनि पापै ते राखिआ ॥
हरि निमाणिआ तूं माणु हरि डाढी हूं तूं डाढिआ ॥
हरि अहंकारीआ मारि निवाए मनमुख मूड़ साधिआ ॥
हरि भगता देइ वडिआई गरीब अनाथिआ ॥17॥
हरि तेरी सभ करहि उसतति जिनि फाथे काढिआ ॥
हरि तुधनो करहि सभ नमसकारु जिनि पापै ते राखिआ ॥
हरि निमाणिआ तूं माणु हरि डाढी हूं तूं डाढिआ ॥
हरि अहंकारीआ मारि निवाए मनमुख मूड़ साधिआ ॥
हरि भगता देइ वडिआई गरीब अनाथिआ ॥17॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! सब जीव आपकी (ही) सिफत सलाह करते हैं, जिनको आपने (उन्हें माया में) फंसे हुओं को निकाला है। हे हरी ! सब जीव आपके आगे सिर निवाते हैं, जिसे आपने (उनको) पापों से बचाया है। हे हरी ! जिन्हें कहीं आदर नहीं मिलता, आप उनका मान बनते हैं। हे हरी ! आप सर्वश्रेष्ठ हैं। (हे भाई !) प्रभू अहंकारियों को मार के (भाव, विपता में डाल के) झुकाता है, और मूर्ख मनमुखों को सीधे राह डालता है। प्रभू गरीब व अनाथ भगतों को आदर बख्शता है।17।
सतिगुर कै भाणै जो चलै तिसु वडिआई वडी होइ ॥
सलोक मः 3 ॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै तिसु वडिआई वडी होइ ॥
हरि का नामु उतमु मनि वसै मेटि न सकै कोइ ॥
किरपा करे जिसु आपणी तिसु करमि परापति होइ ॥
नानक कारणु करते वसि है गुरमुखि बूझै कोइ ॥1॥
सतिगुर कै भाणै जो चलै तिसु वडिआई वडी होइ ॥
हरि का नामु उतमु मनि वसै मेटि न सकै कोइ ॥
किरपा करे जिसु आपणी तिसु करमि परापति होइ ॥
नानक कारणु करते वसि है गुरमुखि बूझै कोइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जो मनुष्य सतिगुरू के भाणे में जीवन व्यतीत करता है, उसका (हरी की दरगाह में) बड़ा आदर होता है, प्रभू का उत्तम नाम उस के मन में घर करता है (टिकता है)। और कोई (मायावी पदार्थ उत्तम ‘नाम’ के संस्कारों को उसके हृदय में से) दूर नहीं कर सकता। जिस पे (हरी खुद) अपनी मेहर करे, उस को उस मेहर सदका (उत्तम नाम) प्राप्त होता है (पर नाम प्राप्ति का कारण, भाव भाणा मानने का उद्यम, मनुष्य के अपने वश में नहीं), कोई गुरमुख जीव ही समझता है कि, हे नानक ! कारण सृजनहार के बस में है।1।
नानक हरि नामु जिनी आराधिआ अनदिनु हरि लिव तार ॥
मः 3 ॥
नानक हरि नामु जिनी आराधिआ अनदिनु हरि लिव तार ॥
माइआ बंदी खसम की तिन अगै कमावै कार ॥
पूरै पूरा करि छोडिआ हुकमि सवारणहार ॥
गुर परसादी जिनि बुझिआ तिनि पाइआ मोख दुआरु ॥
मनमुख हुकमु न जाणनी तिन मारे जम जंदारु ॥
गुरमुखि जिनी अराधिआ तिनी तरिआ भउजलु संसारु ॥
सभि अउगण गुणी मिटाइआ गुरु आपे बखसणहारु ॥2॥
नानक हरि नामु जिनी आराधिआ अनदिनु हरि लिव तार ॥
माइआ बंदी खसम की तिन अगै कमावै कार ॥
पूरै पूरा करि छोडिआ हुकमि सवारणहार ॥
गुर परसादी जिनि बुझिआ तिनि पाइआ मोख दुआरु ॥
मनमुख हुकमु न जाणनी तिन मारे जम जंदारु ॥
गुरमुखि जिनी अराधिआ तिनी तरिआ भउजलु संसारु ॥
सभि अउगण गुणी मिटाइआ गुरु आपे बखसणहारु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ हे नानक ! जिन्होंने हर रोज एक रस प्रभू के नाम का सिमरन किया है, पति प्रभू की दासी माया उनकी सेवा में रहती है (भाव, वे लोग माया के पीछे नही घूमते, माया उनकी सेवक बनती है), (क्योंकि) सवाँरनेवाले (प्रभू) के हुकम में पूरे (गुरू) ने उन्हें पूर्ण कर दिया है (और वे माया के पीछे डोलते नहीं) सतिगुरू की कृपा से जिसने (ये भेद) समझ लिया है, उसने मुक्ति का दर ढूँढ लिया है। मनमुख लोग (प्रभू का) हुकम नहीं पहचानते, (इस करके) उन्हें जालिम जम दंड देता है। गुरू के सन्मुख हो के जिन्होंने सिमरन किया, वे संसार सागर से तर गए हैं, (क्योंकि सतिगुरू ने) गुणों से (अर्थात, उनके हृदय में गुण प्रगट करके उनके) सारे अवगुण मिटा दिये हैं। गुरू बड़ा बख्शिंद है।2।
हरि की भगता परतीति हरि सभ किछु जाणदा ॥
पउड़ी ॥
हरि की भगता परतीति हरि सभ किछु जाणदा ॥
हरि जेवडु नाही कोई जाणु हरि धरमु बीचारदा ॥
काड़ा अंदेसा किउ कीजै जा नाही अधरमि मारदा ॥
सचा साहिबु सचु निआउ पापी नरु हारदा ॥
सालाहिहु भगतहु कर जोड़ि हरि भगत जन तारदा ॥18॥
हरि की भगता परतीति हरि सभ किछु जाणदा ॥
हरि जेवडु नाही कोई जाणु हरि धरमु बीचारदा ॥
काड़ा अंदेसा किउ कीजै जा नाही अधरमि मारदा ॥
सचा साहिबु सचु निआउ पापी नरु हारदा ॥
सालाहिहु भगतहु कर जोड़ि हरि भगत जन तारदा ॥18॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। भगत जनों को प्रभू पे (ये) भरोसा है कि प्रभू अंतरजामी है,(और इसलिए) प्रभू न्याय की विचार करता है। यदि (ये भरोसा हो कि) प्रभू अन्याय से नहीं मारता, तो कोई फिक्र डर नहीं रहता। प्रभू खुद अभॅुल है और उसका न्याय भी अभॅुल है, (इस ‘मार’ के सदके ही) पापी मनुष्य (पापों से) तौबा करता है। हे भगत जनों ! विनम्र हो के प्रभू की सिफत सलाह करो, प्रभू अपने भक्तों को विकारों से बचा लेता है।18।
आपणे प्रीतम मिलि रहा अंतरि रखा उरि धारि ॥
सलोक मः 3 ॥
आपणे प्रीतम मिलि रहा अंतरि रखा उरि धारि ॥
सालाही सो प्रभ सदा सदा गुर कै हेति पिआरि ॥
नानक जिसु नदरि करे तिसु मेलि लए साई सुहागणि नारि ॥1॥
आपणे प्रीतम मिलि रहा अंतरि रखा उरि धारि ॥
सालाही सो प्रभ सदा सदा गुर कै हेति पिआरि ॥
नानक जिसु नदरि करे तिसु मेलि लए साई सुहागणि नारि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (मन चाहता है कि) अपने प्यारे को (सदा) मिली रहूँ, अंदर दिल में परो के रखूँ और सतिगुरू के लगाए प्रेम में सदा उस प्रभू की सिफत सलाह करती रहूँ। (पर) हे नानक ! जिस तरफ (वह प्यारा प्यार से) देखता है, उस को (ही अपने साथ) मेलता है, और वही स्त्री सुहागन (जीवित पति वाली) कहलाती है।1।
गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥
मः 3 ॥
गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥
माणस ते देवते भए धिआइआ नामु हरे ॥
हउमै मारि मिलाइअनु गुर कै सबदि तरे ॥
नानक सहजि समाइअनु हरि आपणी क्रिपा करे ॥2॥
गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥
माणस ते देवते भए धिआइआ नामु हरे ॥
हउमै मारि मिलाइअनु गुर कै सबदि तरे ॥
नानक सहजि समाइअनु हरि आपणी क्रिपा करे ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ प्रभू जिस (जीव) पर मेहर की नजर करता है, वह (जीव) सतिगुरू की बतायी कृत करके प्रभू से मिल जाता है। हरी नाम का सिमरन करके जीव मनुष्य (-स्वभाव) से देवताबन जाते हैं। जिनका अहम् दूर करके उस प्रभू ने अपने साथ मिलाया है, वह गुरू के शबदों के द्वारा विकारों से बच जाते हैं। हे नानक ! प्रभू ने अपनी मेहर करके उन्हें अडोल अवस्था में टिका दिया।2।
हरि आपणी भगति कराइ वडिआई वेखालीअनु ॥
पउड़ी ॥
हरि आपणी भगति कराइ वडिआई वेखालीअनु ॥
आपणी आपि करे परतीति आपे सेव घालीअनु ॥
हरि आपणी भगति कराइ वडिआई वेखालीअनु ॥
आपणी आपि करे परतीति आपे सेव घालीअनु ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू ने (भगत जनों से) स्वयं ही अपनी भक्ति कराके (भगती की बरकति से उनको अपनी) वडिआई दिखाई है। प्रभू (भगतों के दिल में) अपना भरोसा स्वयं (उत्पन्न) करता है तथा उनसे स्वयं ही सेवा उसने कराई है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 90 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।