पापीआ नो न देई थिरु रहणि चुणि नरक घोरि चालिअनु ॥
हरि भगता नो देइ पिआरु करि अंगु निसतारिअनु ॥19॥
कुबुधि डूमणी कुदइआ कसाइणि पर निंदा घट चूहड़ी मुठी क्रोधि चंडालि ॥
कारी कढी किआ थीऐ जां चारे बैठीआ नालि ॥
सचु संजमु करणी कारां नावणु नाउ जपेही ॥
नानक अगै ऊतम सेई जि पापां पंदि न देही ॥1॥
किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि करेइ ॥
जो तिसु भावै नानका कागहु हंसु करेइ ॥2॥
कीता लोड़ीऐ कंमु सु हरि पहि आखीऐ ॥
कारजु देइ सवारि सतिगुर सचु साखीऐ ॥
संता संगि निधानु अंम्रितु चाखीऐ ॥
भै भंजन मिहरवान दास की राखीऐ ॥
नानक हरि गुण गाइ अलखु प्रभु लाखीऐ ॥20॥
जीउ पिंडु सभु तिस का सभसै देइ अधारु ॥
नानक गुरमुखि सेवीऐ सदा सदा दातारु ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जिनि धिआइआ हरि निरंकारु ॥
ओना के मुख सद उजले ओना नो सभु जगतु करे नमसकारु ॥1॥
सतिगुर मिलिऐ उलटी भई नव निधि खरचिउ खाउ ॥
अठारह सिधी पिछै लगीआ फिरनि निज घरि वसै निज थाइ ॥
अनहद धुनी सद वजदे उनमनि हरि लिव लाइ ॥
नानक हरि भगति तिना कै मनि वसै जिन मसतकि लिखिआ धुरि पाइ ॥2॥
हउ ढाढी हरि प्रभ खसम का हरि कै दरि आइआ ॥
हरि अंदरि सुणी पूकार ढाढी मुखि लाइआ ॥
हरि पुछिआ ढाढी सदि कै कितु अरथि तूं आइआ ॥
नित देवहु दानु दइआल प्रभ हरि नामु धिआइआ ॥
हरि दातै हरि नामु जपाइआ नानकु पैनाइआ ॥21॥1॥ सुधु
सिरीरागु कबीर जीउ का ॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा
जननी जानत सुतु बडा होतु है इतना कु न जानै जि दिन दिन अवध घटतु है ॥
मोर मोर करि अधिक लाडु धरि पेखत ही जमराउ हसै ॥1॥
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(भगतों को अपने भजन का) आनंद (भी) स्वयं ही बख्शता है (और इस तरह उनको) हृदय में अडोल बैठा रखा है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।