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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 91 · सिरी राग

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अंग
91
सिरी राग
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  1. हरि भगता नो देइ अनंदु थिरु घरी बहालिअनु ॥
  2. कुबुधि डूमणी कुदइआ कसाइणि पर निंदा घट चूहड़ी मुठी क्रोधि चंडालि ॥
  3. किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि करेइ ॥
  4. कीता लोड़ीऐ कंमु सु हरि पहि आखीऐ ॥
  5. जीउ पिंडु सभु तिस का सभसै देइ अधारु ॥
  6. सतिगुर मिलिऐ उलटी भई नव निधि खरचिउ खाउ ॥
  7. हउ ढाढी हरि प्रभ खसम का हरि कै दरि आइआ ॥
  8. सिरीरागु कबीर जीउ का ॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा

गुरु राम दास जी · सिरी राग की वार, पउड़ी · सिरी राग

हरि भगता नो देइ अनंदु थिरु घरी बहालिअनु ॥

अंग 90 से चला आ रहा अंश

हरि भगता नो देइ अनंदु थिरु घरी बहालिअनु ॥
पापीआ नो न देई थिरु रहणि चुणि नरक घोरि चालिअनु ॥
हरि भगता नो देइ पिआरु करि अंगु निसतारिअनु ॥19॥

हिन्दी अर्थ: (भगतों को अपने भजन का) आनंद (भी) स्वयं ही बख्शता है (और इस तरह उनको) हृदय में अडोल बैठा रखा है। (पर) पापियों को अडोल चित्त नहीं रहने देता, चुन के (उनको) घोर नर्क में डाल दिया है। भगत जनों को प्यार करता है, (उनका) पक्ष करके उसने खुद उनको (विकारों से) बचाया है। 19।

गुरु नानक देव जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

कुबुधि डूमणी कुदइआ कसाइणि पर निंदा घट चूहड़ी मुठी क्रोधि चंडालि ॥

सलोक मः 1 ॥
कुबुधि डूमणी कुदइआ कसाइणि पर निंदा घट चूहड़ी मुठी क्रोधि चंडालि ॥
कारी कढी किआ थीऐ जां चारे बैठीआ नालि ॥
सचु संजमु करणी कारां नावणु नाउ जपेही ॥
नानक अगै ऊतम सेई जि पापां पंदि न देही ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ कुबुद्धि (मनुष्य के अंदर की) मरासणि (डूमणी) है। बे-तरस कसाइण है पर निंदा अंदर की चूहड़ी (गंदगी) है, और क्रोध चण्डालण है (जिस) ने (जीव के शांत स्वभाव को) ठॅग रखा है। यदि ये चारों भीतर ही बैठी हों, तो (बाहर चौका स्वच्छ रखने के लिए) लकीरें खींचने का क्या लाभ? हे नानक! कुछ मनुष्य ‘सच’ को (चौका स्वच्छ करने की) जुगति बनाते हैं, उच्च आचरण को (चौके की) लकीरें बनाते हैं। वे नाम जपते हैं और इसको (तीर्थ) स्नान समझते हैं। वे औरों को भी पापों वाली शिक्षा नहीं देते। वह मनुष्य प्रभू की हजूरी में अच्छे गिने जाते हैं। 1।

गुरु नानक देव जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि करेइ ॥

मः 1 ॥
किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि करेइ ॥
जो तिसु भावै नानका कागहु हंसु करेइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जिस ओर (प्रभू) प्यार से देखे उसका बगुला (-पन, भाव, पाखण्ड दूर होना) क्या मुश्किल है और उसका हंस (भाव, उज्जवल मति) बनना क्या (मुश्किल है) ? हे नानक! अगर प्रभू चाहे (तो वह बाहर से अच्छे दिखने वाले की तो क्या बात) कौए को भी (अर्थात, अंदर से गंदे आचरण वाले को भी उज्जवल बुद्धि) हंस बना देता है। 2।

गुरु राम दास जी · सिरी राग की वार, पउड़ी · सिरी राग

कीता लोड़ीऐ कंमु सु हरि पहि आखीऐ ॥

पउड़ी ॥
कीता लोड़ीऐ कंमु सु हरि पहि आखीऐ ॥
कारजु देइ सवारि सतिगुर सचु साखीऐ ॥
संता संगि निधानु अंम्रितु चाखीऐ ॥
भै भंजन मिहरवान दास की राखीऐ ॥
नानक हरि गुण गाइ अलखु प्रभु लाखीऐ ॥20॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिस काम को सिरे चढ़ाने की इच्छा हो, उसकी (पूर्णता के लिए) प्रभू के पास विनती करनी चाहिए। (इस तरह) सतिगुरू की शिक्षा से सदा स्थिर प्रभू कार्य सवार देता है। संतों की संगति में नाम खजाना मिलता है, और आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल चख सकते हैं। (सो यह बिनती करनी चाहिए कि) हे डर नाश करने वाले और दया करने वाले हरी! दास की लाज रखें! दास की लाज रख लें! हे नानक! (इस तरह) प्रभू की सिफत सलाह करने से अलॅख प्रभू के साथ सांझ डाल लेते हैं। 20।

गुरु अमर दास जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

जीउ पिंडु सभु तिस का सभसै देइ अधारु ॥

सलोक मः 3 ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का सभसै देइ अधारु ॥
नानक गुरमुखि सेवीऐ सदा सदा दातारु ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जिनि धिआइआ हरि निरंकारु ॥
ओना के मुख सद उजले ओना नो सभु जगतु करे नमसकारु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जो हरी सब जीवों को धरवासा देता है, ये जिंद और शरीर सब कुछ उसी का (दिया हुआ) है। हे नानक! गुरू के सन्मुख रह के (ऐसे) दातार की नित्य सेवा करनी चाहिए। सदके हूँ उनसे, जिन्होंने निरंकार हरी का सिमरन किया है। उनके मुख सदा खिले रहते हैं और सारा संसार उनके आगे सिर निवाता है। 1।

गुरु अमर दास जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

सतिगुर मिलिऐ उलटी भई नव निधि खरचिउ खाउ ॥

मः 3 ॥
सतिगुर मिलिऐ उलटी भई नव निधि खरचिउ खाउ ॥
अठारह सिधी पिछै लगीआ फिरनि निज घरि वसै निज थाइ ॥
अनहद धुनी सद वजदे उनमनि हरि लिव लाइ ॥
नानक हरि भगति तिना कै मनि वसै जिन मसतकि लिखिआ धुरि पाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ अगर गुरू मिल जाए, तो मनुष्य की सुरति माया की ओर से हट जाती है। (ऐसे मनुष्य को) खाने-खरचने के लिए जैसे सारी ही माया मिल जाती है। अठारह (ही) सिद्धियां (भाव, आत्मिक शक्तियां) उसके पीछे लगी फिरती हैं (पर वह परवाह नहीं करता और) अपने हृदय में अडोल रहता है। सहज स्वभाव एक रस उसके अंदर सिमरन की रौंअ चलती रहती है और प्यार की तांघ में वह हरी के साथ बिरती जोड़े रखता है। हे नानक! हरी की (ऐसी) भगती उनके हृदय में बसती है जिनके मस्तक पे (पिछली भक्ति वाले किए कामों के संस्कारों के अनुसार) धुर से ही (भक्ति वाले संस्कार) लिखे पड़े हैं। 2।

गुरु राम दास जी · सिरी राग की वार, पउड़ी · सिरी राग

हउ ढाढी हरि प्रभ खसम का हरि कै दरि आइआ ॥

पउड़ी ॥
हउ ढाढी हरि प्रभ खसम का हरि कै दरि आइआ ॥
हरि अंदरि सुणी पूकार ढाढी मुखि लाइआ ॥
हरि पुछिआ ढाढी सदि कै कितु अरथि तूं आइआ ॥
नित देवहु दानु दइआल प्रभ हरि नामु धिआइआ ॥
हरि दातै हरि नामु जपाइआ नानकु पैनाइआ ॥21॥1॥ सुधु

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ मैं प्रभू पति का ढाढी प्रभू के दर पर पहुँचा, प्रभू के दरबार में मुझ ढाढी की पुकार सुनी गयी और मुझे दर्शन हुए। मुझ ढाढी को हरी ने बुला के, पूछा, हे ढाढी! आप किस काम के लिए आए हैं? (मैंने बेनती की) ‘हे दयालू प्रभू सदा (यही दान बख्शो कि) आपके नाम का सिमरन करूँ’। (विनती सुन के) दातार हरी ने अपना नाम मुझसे जपाया और मुझे नानक को आदर (भी) दी। 21। 1।सुधु।

भगत कबीर जी · शबद · सिरी राग

सिरीरागु कबीर जीउ का ॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा

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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिरीरागु कबीर जीउ का ॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा
जननी जानत सुतु बडा होतु है इतना कु न जानै जि दिन दिन अवध घटतु है ॥
मोर मोर करि अधिक लाडु धरि पेखत ही जमराउ हसै ॥1॥

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्रीरागु कबीर जीउ का ॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा मां समझती है कि मेरा पुत्र बड़ा हो रहा है। पर वह इतनी बात नहीं समझती कि ज्यों ज्यों दिन बीत रहे हैं इसकी उम्र घट रही है। वह ये कहती है “ये मेरा पुत्र है, ये मेरा पुत्र है” (और उसके साथ) बहुत लाड करती है। (मां की इस ममता को) देख देख के यमराज हसता है। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी। महला 3: गुरु अमर दास जी। महला 4: गुरु राम दास जी। भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 91 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।