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अंग 91

अंग
91
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि भगता नो देइ अनंदु थिरु घरी बहालिअनु ॥
पापीआ नो न देई थिरु रहणि चुणि नरक घोरि चालिअनु ॥
हरि भगता नो देइ पिआरु करि अंगु निसतारिअनु ॥19॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: (भगतों को अपने भजन का) आनंद (भी) स्वयं ही बख्शता है (और इस तरह उनको) हृदय में अडोल बैठा रखा है। (पर) पापियों को अडोल चित्त नहीं रहने देता, चुन के (उनको) घोर नर्क में डाल दिया है। भगत जनों को प्यार करता है, (उनका) पक्ष करके उसने खुद उनको (विकारों से) बचाया है।19।
सलोक मः 1 ॥
कुबुधि डूमणी कुदइआ कसाइणि पर निंदा घट चूहड़ी मुठी क्रोधि चंडालि ॥
कारी कढी किआ थीऐ जां चारे बैठीआ नालि ॥
सचु संजमु करणी कारां नावणु नाउ जपेही ॥
नानक अगै ऊतम सेई जि पापां पंदि न देही ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ कुबुद्धि (मनुष्य के अंदर की) मरासणि (डूमणी) है। बे-तरस कसाइण है पर निंदा अंदर की चूहड़ी (गंदगी) है, और क्रोध चण्डालण है (जिस) ने (जीव के शांत स्वभाव को) ठॅग रखा है। यदि ये चारों भीतर ही बैठी हों, तो (बाहर चौका स्वच्छ रखने के लिए) लकीरें खींचने का क्या लाभ? हे नानक ! जो मनुष्य ‘सच’ को (चौका स्वच्छ करने की) जुगति बनाते हैं, उच्च आचरण को (चौके की) लकीरें बनाते हैं, जो नाम जपते हैं और इसको (तीर्थ) स्नान समझते हैं, जो औरों को भी पापों वाली शिक्षा नहीं देते, वह मनुष्य प्रभू की हजूरी में अच्छे गिने जाते हैं।1।
मः 1 ॥
किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि करेइ ॥
जो तिसु भावै नानका कागहु हंसु करेइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जिस ओर (प्रभू) प्यार से देखे उसका बगुला (-पन, भाव, पाखण्ड दूर होना) क्या मुश्किल है और उसका हंस (भाव, उज्जवल मति) बनना क्या (मुश्किल है) ? हे नानक ! अगर प्रभू चाहे (तो वह बाहर से अच्छे दिखने वाले की तो क्या बात) कौए को भी (अर्थात, अंदर से गंदे आचरण वाले को भी उज्जवल बुद्धि) हंस बना देता है।2।
पउड़ी ॥
कीता लोड़ीऐ कंमु सु हरि पहि आखीऐ ॥
कारजु देइ सवारि सतिगुर सचु साखीऐ ॥
संता संगि निधानु अंम्रितु चाखीऐ ॥
भै भंजन मिहरवान दास की राखीऐ ॥
नानक हरि गुण गाइ अलखु प्रभु लाखीऐ ॥20॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिस काम को सिरे चढ़ाने की इच्छा हो, उसकी (पूर्णता के लिए) प्रभू के पास विनती करनी चाहिए, (इस तरह) सतिगुरू की शिक्षा से सदा स्थिर प्रभू कार्य सवार देता है। संतों की संगति में नाम खजाना मिलता है, और आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल चख सकते हैं। (सो यह बिनती करनी चाहिए कि) हे डर नाश करने वाले और दया करने वाले हरी ! दास की लाज रख ! दास की लाज रख लो ! हे नानक ! (इस तरह) प्रभू की सिफत सलाह करने से अलॅख प्रभू के साथ सांझ डाल लेते हैं।20।
सलोक मः 3 ॥
जीउ पिंडु सभु तिस का सभसै देइ अधारु ॥
नानक गुरमुखि सेवीऐ सदा सदा दातारु ॥
हउ बलिहारी तिन कउ जिनि धिआइआ हरि निरंकारु ॥
ओना के मुख सद उजले ओना नो सभु जगतु करे नमसकारु ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ जो हरी सब जीवों को धरवासा देता है, ये जिंद और शरीर सब कुछ उसी का (दिया हुआ) है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख रह के (ऐसे) दातार की नित्य सेवा करनी चाहिए। सदके हूँ उनसे, जिन्होंने निरंकार हरी का सिमरन किया है। उनके मुख सदा खिले रहते हैं और सारा संसार उनके आगे सिर निवाता है।1।
मः 3 ॥
सतिगुर मिलिऐ उलटी भई नव निधि खरचिउ खाउ ॥
अठारह सिधी पिछै लगीआ फिरनि निज घरि वसै निज थाइ ॥
अनहद धुनी सद वजदे उनमनि हरि लिव लाइ ॥
नानक हरि भगति तिना कै मनि वसै जिन मसतकि लिखिआ धुरि पाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ अगर गुरू मिल जाए, तो मनुष्य की सुरति माया की ओर से हट जाती है। (ऐसे मनुष्य को) खाने-खरचने के लिए जैसे सारी ही माया मिल जाती है। अठारह (ही) सिद्धियां (भाव, आत्मिक शक्तियां) उसके पीछे लगी फिरती हैं (पर वह परवाह नहीं करता और) अपने हृदय में अडोल रहता है। सहज स्वभाव एक रस उसके अंदर सिमरन की रौंअ चलती रहती है और प्यार की तांघ मेंवह हरी के साथ बिरती जोड़े रखता है। हे नानक ! हरी की (ऐसी) भगती उनके हृदय में बसती है जिनके मस्तक पे (पिछली भक्ति वाले किए कामों के संस्कारों के अनुसार) धुर से ही (भक्ति वाले संस्कार) लिखे पड़े हैं।2।
पउड़ी ॥
हउ ढाढी हरि प्रभ खसम का हरि कै दरि आइआ ॥
हरि अंदरि सुणी पूकार ढाढी मुखि लाइआ ॥
हरि पुछिआ ढाढी सदि कै कितु अरथि तूं आइआ ॥
नित देवहु दानु दइआल प्रभ हरि नामु धिआइआ ॥
हरि दातै हरि नामु जपाइआ नानकु पैनाइआ ॥21॥1॥ सुधु
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ मैं प्रभू पति का ढाढी प्रभू के दर पर पहुँचा, प्रभू के दरबार में मुझ ढाढी की पुकार सुनी गयी और मुझे दर्शन हुए। मुझढाढी को हरी ने बुला के, पूछा, हे ढाढी ! आप किस काम के लिए आया है? (मैंने बेनती की) ‘हे दयालू प्रभू सदा (यही दान बख्शो कि) आपके नाम का सिमरन करूँ’। (विनती सुन के) दातार हरी ने अपना नाम मुझसे जपाया और मुझे नानक को आदर (भी) दी।21।1।सुधु।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिरीरागु कबीर जीउ का ॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा
जननी जानत सुतु बडा होतु है इतना कु न जानै जि दिन दिन अवध घटतु है ॥
मोर मोर करि अधिक लाडु धरि पेखत ही जमराउ हसै ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्रीरागु कबीर जीउ का ॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा मां समझती है कि मेरा पुत्र बड़ा हो रहा है, पर वह इतनी बात नहीं समझती कि ज्यों ज्यों दिन बीत रहे हैं इसकी उम्र घट रही है। वह ये कहती है “ये मेरा पुत्र है, ये मेरा पुत्र है” (और उसके साथ) बहुत लाड करती है। (मां की इस ममता को) देख देख के यमराज हसता है।1।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(भगतों को अपने भजन का) आनंद (भी) स्वयं ही बख्शता है (और इस तरह उनको) हृदय में अडोल बैठा रखा है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।