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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 88 · सिरी राग

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अंग
88
सिरी राग
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  1. सतिगुरु सेवे आपणा सो सिरु लेखै लाइ ॥
  2. मनु वेकारी वेड़िआ वेकारा करम कमाइ ॥
  3. हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सदा सुखु होवै दिनु राती ॥
  4. सतिगुरु जिनी न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥
  5. सो भगउती जोु भगवंतै जाणै ॥
  6. अंतरि कपटु भगउती कहाए ॥
  7. सतिगुरु जिनी धिआइआ से कड़ि न सवाही ॥

गुरु अमर दास जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

सतिगुरु सेवे आपणा सो सिरु लेखै लाइ ॥

अंग 87 से चला आ रहा अंश

सतिगुरु सेवे आपणा सो सिरु लेखै लाइ ॥
विचहु आपु गवाइ कै रहनि सचि लिव लाइ ॥
सतिगुरु जिनी न सेविओ तिना बिरथा जनमु गवाइ ॥
नानक जो तिसु भावै सो करे कहणा किछू न जाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य अपने सतिगुरू की बताई सेवा करता है, वह मनुष्य अपना सिर (भाव, मनुष्य जनम) सफल कर लेता है। ऐसे मनुष्य हृदय में से अहंकार दूर करके सच्चे नाम में बिरती जोड़े रखते हैं। जिन्होंने सतिगुरू की बताई हुई सेवा नहीं की, उन्होंने मानस जन्म व्यर्थ गवा लिया है। (पर) हे नानक! कुछ (अच्छा-बुरा) कहा नहीं जा सकता (क्योंकि) जो उस प्रभू को ठीक लगता है, स्वयं करता है। 1।

गुरु अमर दास जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

मनु वेकारी वेड़िआ वेकारा करम कमाइ ॥

मः 3 ॥
मनु वेकारी वेड़िआ वेकारा करम कमाइ ॥
दूजै भाइ अगिआनी पूजदे दरगह मिलै सजाइ ॥
आतम देउ पूजीऐ बिनु सतिगुर बूझ न पाइ ॥
जपु तपु संजमु भाणा सतिगुरू का करमी पलै पाइ ॥
नानक सेवा सुरति कमावणी जो हरि भावै सो थाइ पाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (ये कुदरत का तरीका है कि) विकारों में फंसा हुआ मन विकारों वाले कर्म ही करता है। (इस वास्ते) माया के प्यार में (फंसे रह के) जो मनुष्य पूजा करते हैं (इस पूजा का उनको कोई लाभ नहीं होता) दरगाह में सजा ही मिलती है। आत्मा को रौशन करने वाले प्रभू की ही पूजा करनी चाहिए, (पर) सतिगुरू के बगैर समझ नहीं आता। सतिगुरू का भाणा (रजा को) (मानना), यही जप, तप और संजम है, प्रभू मेहर करे तो ये (रजा मानने की स्मर्था) प्राप्त होती है। हे नानक! (वैसे तो) जो सेवा प्रभू को ठीक लगे वही परवान होती है। (पर) सेवा भी सुरति द्वारा ही (भाव, सुरति को सतिगुरू की रजा में टिका के ही) की जा सकती है। 2।

गुरु राम दास जी · सिरी राग की वार, पउड़ी · सिरी राग

हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सदा सुखु होवै दिनु राती ॥

पउड़ी ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सदा सुखु होवै दिनु राती ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सिमरत सभि किलविख पाप लहाती ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु दालदु दुख भुख सभ लहि जाती ॥
हरि हरि नामु जपहु मन मेरे मुखि गुरमुखि प्रीति लगाती ॥
जितु मुखि भागु लिखिआ धुरि साचै हरि तितु मुखि नामु जपाती ॥13॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे मेरे मन! हरी नाम का सिमरन करें, जिससे रात-दिन सदा सुख हो। हे मेरे मन! हरी नाम का सिमरन करके सब पाप दूर हो जाते हैं। हे मेरे मन! हरि नाम का सिमरन करें, जिससे सब दरिद्रता, दुख व भूख उतर जाएं। हे मेरे मन! हरि के नाम का सिमरन करें, (जिससे) सतिगुरू के सन्मुख रहके (आपके अंदर) उत्तम प्रीति (अर्थात हरी के नाम की प्रीति) बन जाए। धुर सच्ची दरगाह से जिसके मुंह पे भाग्य लिखा हो, प्रभू उसके मुंह से (ही) अपने नाम का सिमरन करवाता है। 13।

गुरु अमर दास जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

सतिगुरु जिनी न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥

सलोक मः 3 ॥
सतिगुरु जिनी न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥
अंतरि गिआनु न आइओ मिरतकु है संसारि ॥
लख चउरासीह फेरु पइआ मरि जंमै होइ खुआरु ॥
सतिगुर की सेवा सो करे जिस नो आपि कराए सोइ ॥
सतिगुर विचि नामु निधानु है करमि परापति होइ ॥
सचि रते गुर सबद सिउ तिन सची सदा लिव होइ ॥
नानक जिस नो मेले न विछुड़ै सहजि समावै सोइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (मनुष्य जन्म पा के भी) कुछ जीवों ने सतिगुरू जी की बतायी हुई सेवा नहीं की और सतिगुरू के शबद से (हरी नाम की) विचार नहीं की। (और इस तरह) हृदय में सच्चा प्रकाश नहीं हुआ, वह जीव संसार में (जीवित होते हुए भी) मरा हुआ है। (चौरासी लाख योनियों) में उसे चक्कर काटना पड़ता है, बारंबार पैदा होता मरता और ख्वार होता है। जिस जीव से प्रभू स्वयं कराए, वही सतिगुरू की बताई कार कर सकता है। सतिगुरू के पास ‘नाम’ का खजाना है, जो प्रभू की मेहर से प्राप्त हो सकता है। जो मनुष्य सतिगुरू के शबद द्वारा सच्चे नाम में रंगे हुये हैं, उनकी बिरती सदा इक तार रहती है। हे नानक! जिसको (एक बारी) मेल लेता है, वह सदा अडोल अवस्था में टिका रहता है। 1।

गुरु अमर दास जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

सो भगउती जोु भगवंतै जाणै ॥

मः 3 ॥
सो भगउती जोु भगवंतै जाणै ॥
गुर परसादी आपु पछाणै ॥
धावतु राखै इकतु घरि आणै ॥
जीवतु मरै हरि नामु वखाणै ॥
ऐसा भगउती उतमु होइ ॥
नानक सचि समावै सोइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ भगउती (सच्चा भक्त) वह है जो प्रभू को जानता है (प्रभू से गहरी सांझ डालता है)। और सतिगुरू की कृपा से (भाव, सतिगुरू की शिक्षा लेकर) अपने आप को पहचानता है। (वासना की ओर) दौड़ते (मन) को काबू में रखता है, और एक टिकाव में लाता है। और जीवित होते हुए भी (माया की ओर से) मरा रहता है। (अर्थात, संसार में विचरता हुआ भी मन को वासना से तोड़े रखता है)। ऐसा भगउती (भगत) उत्तम होता है, हे नानक! वह सदा स्थिर प्रभू में लीन हो जाता है (और फिर कभी नहीं विछुड़ता)। 2।

गुरु अमर दास जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

अंतरि कपटु भगउती कहाए ॥

मः 3 ॥
अंतरि कपटु भगउती कहाए ॥
पाखंडि पारब्रहमु कदे न पाए ॥
पर निंदा करे अंतरि मलु लाए ॥
बाहरि मलु धोवै मन की जूठि न जाए ॥
सतसंगति सिउ बादु रचाए ॥
अनदिनु दुखीआ दूजै भाइ रचाए ॥
हरि नामु न चेतै बहु करम कमाए ॥
पूरब लिखिआ सु मेटणा न जाए ॥
नानक बिनु सतिगुर सेवे मोखु न पाए ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ जो मनुष्य दिल में खोट रखे (पर अपने आप को) भगउती (सच्चा भगत) कहलाए, वह (इस) पाखण्ड से परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। (जीव) पराई निंदा करके हृदय पर मैल चढ़ाए जाये, (और) बाहर से (शरीर की) मैल (स्नान वगैरा से) धोता रहे, (इस तरह) मन की जूठ दूर नहीं होती। जो मनुष्य सतिसंगति के साथ टकराव डाले रखता है (भाव, जिसे सतसंगति अच्छी नहीं लगती) वह माया के प्यार में रंगा हुआ हमेशा दुखी रहता है। हरी नाम का सिमरन छोड़ के और चाहे जितने कर्म काण्ड करता रहे। (इस तरह) पहले (किए कर्मों के अच्छे बुरे संस्कार जो मन पर) लिखे गए (हैं, और जनम जनम में भटकाते फिरते हैं) मिट नहीं सकते। हे नानक! (सॅच तो ये है कि) सतिगुरू द्वारा बताए कर्मों को किए बिनां (माया के मोह से) छुटकारा हो ही नहीं सकता। 3।

गुरु राम दास जी · सिरी राग की वार, पउड़ी · सिरी राग

सतिगुरु जिनी धिआइआ से कड़ि न सवाही ॥

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पउड़ी ॥
सतिगुरु जिनी धिआइआ से कड़ि न सवाही ॥
सतिगुरु जिनी धिआइआ से त्रिपति अघाही ॥
सतिगुरु जिनी धिआइआ तिन जम डरु नाही ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिन्होंने सतिगुरू का ध्यान धरा है, वो नित्य नये सूरज दुखी नहीं होते। (क्योंकि) जिन्होंने सतिगुरू का ध्यान धारण किया है वे (दुनियावी पदार्थों की ओर से) पूरी तौर पे तृप्त रहते हैं। जिन्होंने सतिगुरू का ध्यान धरा है, (इस वास्ते) उन्हें मौत का भी डर नहीं रहता।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी। महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 88 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।