लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 87 · सिरी राग

इस पृष्ठ पर
अंग
87
सिरी राग
अंग बदलें या अंश चुनें · 5 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. गुरमती जमु जोहि न साकै साचै नामि समाइआ ॥
  2. जो मिलिआ हरि दीबाण सिउ सो सभनी दीबाणी मिलिआ ॥
  3. आतमा देउ पूजीऐ गुर कै सहजि सुभाइ ॥
  4. मनमुखु लोकु समझाईऐ कदहु समझाइआ जाइ ॥
  5. हरि के संत सुणहु जन भाई हरि सतिगुर की इक साखी ॥

गुरु अमर दास जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

गुरमती जमु जोहि न साकै साचै नामि समाइआ ॥

अंग 86 से चला आ रहा अंश

गुरमती जमु जोहि न साकै साचै नामि समाइआ ॥
सभु आपे आपि वरतै करता जो भावै सो नाइ लाइआ ॥
जन नानकु नामु लए ता जीवै बिनु नावै खिनु मरि जाइआ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: गुरू की बताए मार्ग पे चलने के कारण यम उन्हें घूर नहीं सकता। (क्योंकि) सच्चे नाम में उनकी बिरती जुड़ी होती है। (पर) ये सब प्रभू का कौतक (लीला) है, जिस पे प्रसन्न होता है उस को नाम में जोड़ता है। (ये) दास नानक (भी) ‘नाम’ के आसरे है, एक पलक भर भी ‘नाम’ से वंचित रहे तो मरने के तुल्य लगता है। 2।

गुरु राम दास जी · सिरी राग की वार, पउड़ी · सिरी राग

जो मिलिआ हरि दीबाण सिउ सो सभनी दीबाणी मिलिआ ॥

पउड़ी ॥
जो मिलिआ हरि दीबाण सिउ सो सभनी दीबाणी मिलिआ ॥
जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु सुरखरू उस कै मुहि डिठै सभ पापी तरिआ ॥
ओसु अंतरि नामु निधानु है नामो परवरिआ ॥
नाउ पूजीऐ नाउ मंनीऐ नाइ किलविख सभ हिरिआ ॥
जिनी नामु धिआइआ इक मनि इक चिति से असथिरु जगि रहिआ ॥11॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जो मनुष्य हरि के दरबार में मिल चुका (आदर पाने योग्य हो गया) है, उसे (संसार के) सब दरबारों में आदर मिलता है। जहाँ वह जाता है, वहीं उसका माथा खिड़ा रहता है (उज्वल मुख ले के जाता है)। उसका मुंह देख के (उसके दर्शन करके) सभ पापी तर जाते हैं। (क्योंकि) उसके हृदय में नाम का खजाना है, और नाम ही उसका परिवार है। (भाव, नाम ही उसके सिर के चारों तरफ घूमने वाला रौशनी चक्र है)। (हे भाई!) नाम सिमरन करना चाहिए, और नाम का ही ध्यान धरना चाहिए। नाम (जपने) से सब पाप दूर हो जाते हैं। जिन्होंने एकाग्रचित्त हो के नाम जपा है, वे संसार में अटॅल हो गए हैं। (अर्थात, संसार में हमेशा के लिए उनकी शोभा और प्रतिष्ठा कायम हो गई है)। 11।

गुरु अमर दास जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

आतमा देउ पूजीऐ गुर कै सहजि सुभाइ ॥

सलोक मः 3 ॥
आतमा देउ पूजीऐ गुर कै सहजि सुभाइ ॥
आतमे नो आतमे दी प्रतीति होइ ता घर ही परचा पाइ ॥
आतमा अडोलु न डोलई गुर कै भाइ सुभाइ ॥
गुर विणु सहजु न आवई लोभु मैलु न विचहु जाइ ॥
खिनु पलु हरि नामु मनि वसै सभ अठसठि तीरथ नाइ ॥
सचे मैलु न लगई मलु लागै दूजै भाइ ॥
धोती मूलि न उतरै जे अठसठि तीरथ नाइ ॥
मनमुख करम करे अहंकारी सभु दुखो दुखु कमाइ ॥
नानक मैला ऊजलु ता थीऐ जा सतिगुर माहि समाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ गुरू की मति ले के और गुरू के स्वभाव में (अपना स्वभाव लीन करके) जीवात्मा का प्रकाश करने वाले (हरी) की सिफत सलाह करनी चाहिए। (इस तरह) जब जीव को प्रभू (का अस्तित्व और) सिदक दृढ़ हो जाए, तो हृदय में ही (प्रभू से) प्यार बन जाता है। (और तीर्थों आदि में जाने की जरूरत नहीं रहती)। क्योंकि सत्गुरू के प्यार में और स्वाभाव में (बरतने से) जीवात्मा (माया की और से) अटल हो के डोलने से हट जाती है। ये अडोल अवस्था सत्गुरू के बिना नहीं आती, और ना ही मन में से लोभ मैल दूर होती है। अगर एक पलक भर भी प्रभू का नाम मन में बस जाए। (अर्थात, अगर जीव एक मन हो के एक पलक भर भी नाम जप सके) तो, मानो, अढ़सठ तीर्थों का स्नान कर लेता है। (क्योंकि) सच्चे (प्रभू) में जुड़े हुए को मैल नहीं लगती। मैल सदा माया के प्यार में लगती है, और वह मैल कभी भी धोने से नहीं उतरती, चाहे अढ़सठ तीर्थों के स्नान रहें करते। (कारण ये है कि) मनुष्य (गुरू की ओर से) अहंकार के आसरे (तीर्थ स्नान आदिक) कर्म करता है, और दुख ही दुख एकत्र करता है। हे नानक! मैला (मन) तभी पवित्र होता है, अगर (जीव) सतिगुरू में लीन हो जाए (अर्थात, स्वैभाव मिटा दे)। 1।

गुरु अमर दास जी · सिरी राग की वार, सलोक · सिरी राग

मनमुखु लोकु समझाईऐ कदहु समझाइआ जाइ ॥

मः 3 ॥
मनमुखु लोकु समझाईऐ कदहु समझाइआ जाइ ॥
मनमुखु रलाइआ ना रलै पइऐ किरति फिराइ ॥
लिव धातु दुइ राह है हुकमी कार कमाइ ॥
गुरमुखि आपणा मनु मारिआ सबदि कसवटी लाइ ॥
मन ही नालि झगड़ा मन ही नालि सथ मन ही मंझि समाइ ॥
मनु जो इछे सो लहै सचै सबदि सुभाइ ॥
अंम्रित नामु सद भुंचीऐ गुरमुखि कार कमाइ ॥
विणु मनै जि होरी नालि लुझणा जासी जनमु गवाइ ॥
मनमुखी मनहठि हारिआ कूड़ु कुसतु कमाइ ॥
गुर परसादी मनु जिणै हरि सेती लिव लाइ ॥
नानक गुरमुखि सचु कमावै मनमुखि आवै जाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ जो मनुष्य सतिगुरू की ओर से मुख मोड़े बैठा है, वह समझाने से भी कभी नहीं समझता। अगर उसे (गुरमुखों में) मिला भी दें, तो भी (स्वभाव करके) उनके साथ नहीं मिलता और (पूर्बले किए) सिर पड़े कर्मों के मुताबिक भटकता फिरता है। (उस विचारे पर भी क्या रोस?) (संसार में) रास्ते ही दो हैं, (हरी से) प्यार और (माया से) प्यार। (और मनमुख) प्रभू के हुकम में (ही) (माया वाले) कर्म करता है। (दूसरी तरफ, हुकम में ही) गुरमुख मनुष्य सतिगुरू के शबद के द्वारा कसवटी लगा के (परख के) अपने मन को मार लेता है। (भाव, माया के प्यार की पकड़ पर काबू पा लेता है)। वह सदा मन (की विकार-बिरती) के साथ संघर्ष करता है। और पंचायत करता है (भाव, उसे समझाता है, और अंत में विकार बिरती को) मन (की शुभ-बिरती) में लीन कर देता है। (इस तरह सतिगुरू के) स्वभाव में (स्वै लीन करने वाला) मन जो इच्छा करता है सो प्राप्त करता है। (हे भाई!) गुरमुखों वाले कर्म करके सदा नाम अमृत पीएं। मन को छोड़ के जो जीव (शरीर आदि) औरों से झगड़ा करता है, वह जन्म व्यर्थ गवाता है। मनमुख मन के हठ में (बाजी) हार जाता है, और झूठ-तुफान (की कमाई) तौलता है। हे नानक! गुरमुख सतिगुरू की कृपा से मन पर विजय प्राप्त करता है, प्रभू से प्यार जोड़ता है और सदा स्थिर हरी नाम सिमरन की कमाई करता है। (पर) मनमुख भटकता फिरता है। 2।

गुरु राम दास जी · सिरी राग की वार, पउड़ी · सिरी राग

हरि के संत सुणहु जन भाई हरि सतिगुर की इक साखी ॥

पउड़ी ॥
हरि के संत सुणहु जन भाई हरि सतिगुर की इक साखी ॥
जिसु धुरि भागु होवै मुखि मसतकि तिनि जनि लै हिरदै राखी ॥
हरि अंम्रित कथा सरेसट ऊतम गुर बचनी सहजे चाखी ॥
तह भइआ प्रगासु मिटिआ अंधिआरा जिउ सूरज रैणि किराखी ॥
अदिसटु अगोचरु अलखु निरंजनु सो देखिआ गुरमुखि आखी ॥12॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी के संत जन प्यारो! अपने सतिगुरू की शिक्षा सुनें (भाव, शिक्षा पर चलें)। इस शिक्षा को मनुष्य ने हृदय में परो रखा है, जिसके माथे पर धुर से ही भाग्य हों। सतिगुरू की शिक्षा से ही अडोल अवस्था में पहुँच के प्रभू की उत्तम पवित्र और जीवन-किरण बख्शने वाली सिफत सलाह का आनंद लिया जा सकता है। (सतिगुरू की शिक्षा को जो हृदय एक बार धारण करता है) उस में (आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है। और (माया का) अंधेरा ऐसे दूर होता है जैसे सूरज रात (के अंधेरे) को खींच लेता है। जो प्रभू (इन आँखों से) नहीं दिखता, इन्द्रियों की पहुँच से परे है और अलख है वह सतिगुरू के सन्मुख होने से दिखने लगता है। 12।
सलोकु मः 3 ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी। महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 87 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।