सभु आपे आपि वरतै करता जो भावै सो नाइ लाइआ ॥
जन नानकु नामु लए ता जीवै बिनु नावै खिनु मरि जाइआ ॥2॥
जो मिलिआ हरि दीबाण सिउ सो सभनी दीबाणी मिलिआ ॥
जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु सुरखरू उस कै मुहि डिठै सभ पापी तरिआ ॥
ओसु अंतरि नामु निधानु है नामो परवरिआ ॥
नाउ पूजीऐ नाउ मंनीऐ नाइ किलविख सभ हिरिआ ॥
जिनी नामु धिआइआ इक मनि इक चिति से असथिरु जगि रहिआ ॥11॥
आतमा देउ पूजीऐ गुर कै सहजि सुभाइ ॥
आतमे नो आतमे दी प्रतीति होइ ता घर ही परचा पाइ ॥
आतमा अडोलु न डोलई गुर कै भाइ सुभाइ ॥
गुर विणु सहजु न आवई लोभु मैलु न विचहु जाइ ॥
खिनु पलु हरि नामु मनि वसै सभ अठसठि तीरथ नाइ ॥
सचे मैलु न लगई मलु लागै दूजै भाइ ॥
धोती मूलि न उतरै जे अठसठि तीरथ नाइ ॥
मनमुख करम करे अहंकारी सभु दुखो दुखु कमाइ ॥
नानक मैला ऊजलु ता थीऐ जा सतिगुर माहि समाइ ॥1॥
मनमुखु लोकु समझाईऐ कदहु समझाइआ जाइ ॥
मनमुखु रलाइआ ना रलै पइऐ किरति फिराइ ॥
लिव धातु दुइ राह है हुकमी कार कमाइ ॥
गुरमुखि आपणा मनु मारिआ सबदि कसवटी लाइ ॥
मन ही नालि झगड़ा मन ही नालि सथ मन ही मंझि समाइ ॥
मनु जो इछे सो लहै सचै सबदि सुभाइ ॥
अंम्रित नामु सद भुंचीऐ गुरमुखि कार कमाइ ॥
विणु मनै जि होरी नालि लुझणा जासी जनमु गवाइ ॥
मनमुखी मनहठि हारिआ कूड़ु कुसतु कमाइ ॥
गुर परसादी मनु जिणै हरि सेती लिव लाइ ॥
नानक गुरमुखि सचु कमावै मनमुखि आवै जाइ ॥2॥
हरि के संत सुणहु जन भाई हरि सतिगुर की इक साखी ॥
जिसु धुरि भागु होवै मुखि मसतकि तिनि जनि लै हिरदै राखी ॥
हरि अंम्रित कथा सरेसट ऊतम गुर बचनी सहजे चाखी ॥
तह भइआ प्रगासु मिटिआ अंधिआरा जिउ सूरज रैणि किराखी ॥
अदिसटु अगोचरु अलखु निरंजनु सो देखिआ गुरमुखि आखी ॥12॥
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गुरू की बताए मार्ग पे चलने के कारण यम उन्हें घूर नहीं सकता, (क्योंकि) सच्चे नाम में उनकी बिरती जुड़ी होती है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।