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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 853 · बिलावल

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अंग
853
बिलावल
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  1. गुरमुखि सेवक भाइ हरि धनु मिलै तिथहु करमहीण लै न सकहि होर थै देस दिसंतरि हरि धनु नाहि ॥8॥
  2. गुरमुखि संसा मूलि न होवई चिंता विचहु जाइ ॥
  3. कालु मारि मनसा मनहि समाणी अंतरि निरमलु नाउ ॥
  4. हरि धनु रतन जवेहरी सो गुरि हरि धनु हरि पासहु देवाइआ ॥
  5. जगतु जलंदा रखि लै आपणी किरपा धारि ॥
  6. हउमै माइआ मोहणी दूजै लगै जाइ ॥
  7. सतिगुर की वडिआई सतिगुरि दिती धुरहु हुकमु बुझि नीसाणु ॥

गुरमुखि सेवक भाइ हरि धनु मिलै तिथहु करमहीण लै न सकहि होर थै देस दिसंतरि हरि धनु नाहि ॥8॥

अंग 852 से चला आ रहा अंश

गुरमुखि सेवक भाइ हरि धनु मिलै तिथहु करमहीण लै न सकहि होर थै देस दिसंतरि हरि धनु नाहि ॥8॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! सेवक-भावना से गुरू की शरण पड़ने पर ही परमात्मा का नाम-धन मिलता है; पर वह (निंदक) अभागे वहाँ से (गुरू के दर से) ये धन नहीं ले जा सकते (और। गुरू के दर के बिना) किसी और जगह किसी और देश में ये नाम-धन है ही नहीं। 8।

गुरमुखि संसा मूलि न होवई चिंता विचहु जाइ ॥

सलोक मः 3 ॥
गुरमुखि संसा मूलि न होवई चिंता विचहु जाइ ॥
जो किछु होइ सु सहजे होइ कहणा किछू न जाइ ॥
नानक तिन का आखिआ आपि सुणे जि लइअनु पंनै पाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहते हैं। उनको (किसी किस्म का) तौखला बिल्कुल ही नहीं होता। उनके अंदर से चिंता दूर हो जाती है। (उनको ये निष्चय हो जाता है कि संसार में) जो कुछ हो रहा है वह परमात्मा की रजा में हो रहा है। उस पर कोई एतराज नहीं किया जा सकता। हे नानक ! जिन मनुष्यों को परमात्मा अपने लड़ लगा लेता है उनकी आरजू (परमात्मा सदा) स्वयं सुनता है। 1।

कालु मारि मनसा मनहि समाणी अंतरि निरमलु नाउ ॥

मः 3 ॥
कालु मारि मनसा मनहि समाणी अंतरि निरमलु नाउ ॥
अनदिनु जागै कदे न सोवै सहजे अंम्रितु पिआउ ॥
मीठा बोले अंम्रित बाणी अनदिनु हरि गुण गाउ ॥
निज घरि वासा सदा सोहदे नानक तिन मिलिआ सुखु पाउ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का पवित्र नाम बसता है वह आत्मिक मौत को समाप्त करके मन के मायावी फुरने को मन में ही दबा देता है। वह मनुष्य (माया के हमलों की ओर से) हर वक्त सचेत रहता है। कभी वह (गफ़लत की नींद में) नहीं सोता। आत्मिक अडोलता में टिक के परमातमा नाम-अमृत (उसकी) खुराक होता है। वह मनुष्य (सदा) मीठा बोलता है। (सतिगुरू की) आत्मिक जीवन देने वाली बाणी के द्वारा वह हर वक्त परमात्मा के गुण गाता रहता है। ऐसे मनुष्य सदा परमात्मा के चरणों में टिके रहते हैं। उनका जीवन सुंदर बन जाता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) ऐसे मनुष्यों को मिल के मैं भी आत्मिक आनंद पाता हूँ। 2।

हरि धनु रतन जवेहरी सो गुरि हरि धनु हरि पासहु देवाइआ ॥

पउड़ी ॥
हरि धनु रतन जवेहरी सो गुरि हरि धनु हरि पासहु देवाइआ ॥
जे किसै किहु दिसि आवै ता कोई किहु मंगि लए अकै कोई किहु देवाए एहु हरि धनु जोरि कीतै किसै नालि न जाइ वंडाइआ ॥
जिस नो सतिगुर नालि हरि सरधा लाए तिसु हरि धन की वंड हथि आवै जिस नो करतै धुरि लिखि पाइआ ॥
इसु हरि धन का कोई सरीकु नाही किसै का खतु नाही किसै कै सीव बंनै रोलु नाही जे को हरि धन की बखीली करे तिस का मुहु हरि चहु कुंडा विचि काला कराइआ ॥
हरि के दिते नालि किसै जोरु बखीली न चलई दिहु दिहु नित नित चड़ै सवाइआ ॥9॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम-धन हीरे-जवाहरात हैं। यह हरी-नाम-धन (जिसको) परमात्मा के पास से दिलवाया है गुरू ने (ही) दिलवाया है। अगर किसी मनुष्य को (गुरू के बिना किसी और के पास) कुछ और दिख जाए तो (उससे कोई) कुछ भी मांग ले। अथवा। कोई कुछ दिला दे। पर यह नाम-धन पक्का करके (भी) किसी के साथ बांटा नहीं जा सकता (ये तो परमात्मा की मेहर से गुरू के द्वारा ही मिलता है)। हे भाई ! परमात्मा ने धुर से ही जिस मनुष्य के माथे पर लेख लिख दिए हैं। परमात्मा उस मनुष्य की गुरू में श्रद्धा बनाता है। और (गुरू के द्वारा) उस मनुष्य को नाम-धन का हिस्सा मिलता है। हे भाई ! ये नाम-धन (ऐसी जयदाद है कि) इसका कोई शरीक नहीं बन सकता (इसके ऊपर) कोई अपना हक नहीं बना सकता। किसी के पास इसकी मलकियत का पट्टा भी नहीं हो सकता। (जैसे जिमींदारों का ज़मीन की) हदबंदी का झगड़ा (हो सकता है।) इस हरी-नाम-धन का ऐसा कोई झगड़ा भी नहीं उठ सकता। (किसी गुरमुखि को देख के) अगर कोई मनुष्य इस नाम-धन की (खातिर) ईष्या करता है। उसको बल्कि हर तरफ से धिक्कारें ही पड़ती हैं। (हे भाई ! यह नाम-धन परमात्मा खुद ही गुरू के द्वारा देता हैं। और) अगर परमात्मा किसी को यह नाम-धन दे दे तो किसी और का ज़ोर नहीं चल सकता। किसी की ईष्या कुछ बिगाड़ नहीं सकती (यह एक ऐसी दाति है कि) यह हर रोज सदा बढ़ती ही जाती है। 9।

जगतु जलंदा रखि लै आपणी किरपा धारि ॥

सलोक मः 3 ॥
जगतु जलंदा रखि लै आपणी किरपा धारि ॥
जितु दुआरै उबरै तितै लैहु उबारि ॥
सतिगुरि सुखु वेखालिआ सचा सबदु बीचारि ॥
नानक अवरु न सुझई हरि बिनु बखसणहारु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे प्रभू ! (विकारों में) जल रहे संसार को अपनी मेहर से बचा लें। जिस भी तरीके से ये बच सकता है उसी तरह बचा ले। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी मन में बसा के (जिस मनुष्य को) सतिगुरू ने (सिमरन का) आत्मिक आनंद दिखा दिया। हे नानक ! उसको यह समझ आ जाती है कि परमात्मा के बिना कोई और ये बख्शिश करने वाला नहीं। 1।

हउमै माइआ मोहणी दूजै लगै जाइ ॥

मः 3 ॥
हउमै माइआ मोहणी दूजै लगै जाइ ॥
ना इह मारी न मरै ना इह हटि विकाइ ॥
गुर कै सबदि परजालीऐ ता इह विचहु जाइ ॥
तनु मनु होवै उजला नामु वसै मनि आइ ॥
नानक माइआ का मारणु सबदु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे भाई ! माया का अहंकार (सारे संसार को) अपने वश में करने की समर्थता रखने (की मानसिकता) वाला है। (इसके असर तले जीव परमात्मा को बिसार के) और (के मोह) में फसता है। ये अहंकार ना (किसी और से) मारा जा सकता है। ना ही ये खुद मरता है। ना ही यह किसी दुकान पर बेचा जा सकता है। जब इसको गुरू के शबद द्वारा अच्छी तरह जलाया जाता है। तब ही यह (जीव के) अंदर से समाप्त होता है। (हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर से माया का अहंकार खत्म हो जाता है उसका) तन (उसका) मन पवित्र हो जाता है। उसके मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। हे नानक ! गुरू का शबद ही माया के प्रभाव को (असर को) खत्म करने का एक मात्र) वसीला है। और। ये शबद गुरू की शरण पड़ने पर ही मिलता है। 2।

सतिगुर की वडिआई सतिगुरि दिती धुरहु हुकमु बुझि नीसाणु ॥

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पउड़ी ॥
सतिगुर की वडिआई सतिगुरि दिती धुरहु हुकमु बुझि नीसाणु ॥
पुती भातीई जावाई सकी अगहु पिछहु टोलि डिठा लाहिओनु सभना का अभिमानु ॥
जिथै को वेखै तिथै मेरा सतिगुरू हरि बखसिओसु सभु जहानु ॥
जि सतिगुर नो मिलि मंने सु हलति पलति सिझै जि वेमुखु होवै सु फिरै भरिसट थानु ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (जो) इज्जत गुरू (अमरदास जी) की (हुई। वह) गुरू (अंगद देव जी) ने परमात्मा की हजूरी से (मिला) हुकम समझ के परवाना समझ के (उनको) दी। पुत्रों ने, भतीजों ने। और साक-संबन्धियों ने अच्छी तरह परख के देख लिया था (गुरू ने) सबका गुमान दूर कर दिया। हे भाई ! परमात्मा ने (गुरू के माध्यम से) सारे संसार को (नाम की) बख्शिश की है; जहाँ भी कोई देखता है वहाँ ही प्यारा गुरू (नाम की दाति देने के लिए मौजूद) है। जो मनुष्य गुरू को मिल के पतीजता है वह इस लोक में और परलोक में कामयाब हो जाता है। पर जो मनुष्य गुरू की तरफ से मुँह मोड़ता है। वह भटकता फिरता है। उसका हृदय-स्थल (विकारों से) गंदा बना रहता है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 853 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।