लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 845 · बिलावल

इस पृष्ठ पर
अंग
845
बिलावल
अंग बदलें या अंश चुनें · 4 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. भगति वछलु हरि नामु है गुरमुखि हरि लीना राम ॥
  2. हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु मनि वसै वडभागु ॥
  3. छंत ॥
  4. मंगल साजु भइआ प्रभु अपना गाइआ राम ॥

भगति वछलु हरि नामु है गुरमुखि हरि लीना राम ॥

अंग 844 से चला आ रहा अंश

भगति वछलु हरि नामु है गुरमुखि हरि लीना राम ॥
बिनु हरि नाम न जीवदे जिउ जल बिनु मीना राम ॥
सफल जनमु हरि पाइआ नानक प्रभि कीना राम ॥4॥1॥3॥

हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ करउस परमात्मा में लीन रहता है जिसका नाम है 'भक्ति को प्यार करने वाला'। हे भाई ! जैसे मछली पानी के बिना नहीं रह सकती। वैसे ही (परमात्मा में लीन रहने वाले मनुष्य) परमात्मा (की याद) के बिना नहीं जी सकते। हे नानक ! (गुरू के द्वारा जिस मनुष्य ने) प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया। प्रभू ने उसकी जिंदगी कामयाब बना दी। 4। 1। 3।

हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु मनि वसै वडभागु ॥

बिलावलु महला 4 सलोकु ॥
हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु मनि वसै वडभागु ॥
गुरि पूरै वेखालिआ नानक हरि लिव लागु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोक। हे भाई ! (असल) मित्र परमात्मा को ढूँढ लो। (जिसके) मन में वह आ बसता है। वह मनुष्य भाग्यशाली हो जाता है। हे नानक ! (जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने परमात्मा के दर्शन करवा दिए उसकी सुरति परमात्मा में जुड़ गई। 1।

छंत ॥

छंत ॥
मेरा हरि प्रभु रावणि आईआ हउमै बिखु झागे राम ॥
गुरमति आपु मिटाइआ हरि हरि लिव लागे राम ॥
अंतरि कमलु परगासिआ गुर गिआनी जागे राम ॥
जन नानक हरि प्रभु पाइआ पूरै वडभागे राम ॥1॥
हरि प्रभु हरि मनि भाइआ हरि नामि वधाई राम ॥
गुरि पूरै प्रभु पाइआ हरि हरि लिव लाई राम ॥
अगिआनु अंधेरा कटिआ जोति परगटिआई राम ॥
जन नानक नामु अधारु है हरि नामि समाई राम ॥2॥
धन हरि प्रभि पिआरै रावीआ जां हरि प्रभ भाई राम ॥
अखी प्रेम कसाईआ जिउ बिलक मसाई राम ॥
गुरि पूरै हरि मेलिआ हरि रसि आघाई राम ॥
जन नानक नामि विगसिआ हरि हरि लिव लाई राम ॥3॥
हम मूरख मुगध मिलाइआ हरि किरपा धारी राम ॥
धनु धंनु गुरू साबासि है जिनि हउमै मारी राम ॥
जिन॑ वडभागीआ वडभागु है हरि हरि उर धारी राम ॥
जन नानक नामु सलाहि तू नामे बलिहारी राम ॥4॥2॥4॥

हिन्दी अर्थ: छंद ॥ हे सहेलिए ! (जो जीव-स्त्री) आत्मिक मौत लाने वाले अहंकार के जहर (से भरे हुए समुंद्र) को मुश्किल से पार करके प्रभू-पति को मिलने के लिए (गुरू की शरण) आती है। गुरू की मति पर चल कर वह (अपने अंदर से) स्वै भाव मिटाती है। (और। फिर) उसकी लगन परमात्मा में लग जाती है। गुरू से मिली आत्मिक जीवन की सूझ से वह (विकारों के हमलों की ओर से सदा) सचेत रहती है। उसके अंदर हृदय-कमल-पुष्प खिल उठता है। हे दास नानक ! पूर्ण सौभाग्य से ही परमात्मा मिलता है। 1। हे भाई ! (पूरे गुरू के द्वारा जिस मनुष्य के) मन में हरी-प्रभू प्यारा लगने लग जाता है। हरी-नाम की बरकति से (उसके अंदर) चढ़दीकला (उत्साह भरी आत्मिक अवस्था) बनी रहती है। पूरे गुरू के माध्यम से जिसे प्रभू मिल गया। वह हर वक्त परमात्मा में सुरति जोड़े रखता है। (उसके अंदर से) आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी (का) अंधकार मिट जाता है। (उसके अंदर) ईश्वरीय ज्योति जाग पड़ती है। हे दास नानक ! (कह-) उस मनुष्य के लिए परमात्मा का नाम (जिंदगी का) आसरा बन जाता है। परमात्मा के नाम में उसकी लीनता बनी रहती है। 2। हे भाई ! जब कोई (जीव-स्त्री) प्रभू को अच्छी लगी। (तब) प्यारे प्रभू ने (उस) जीव-स्त्री को अपने साथ मिला लिया। (उस जीव-स्त्री की) आँखें प्यार में ऐसे आकर्षित हुईं। जैसे बिल्ली (की आँखें) चूहे की ओर (खिंच जाती हैं)। हे दास नानक ! पूरे गुरू ने (जिस जीव-स्त्री को) परमात्मा के साथ मिला दिया। (वह जीव-स्त्री) हरी-नाम-रस के स्वाद की बरकति से (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो गई। हरी-नाम के कारण उसका हृदय-कमल खिल उठता है। वह सदा परमात्मा में सुरति जोड़े रखती है। 3। हे भाई ! परमात्मा ने (मेरे पर) मेहर की है। और मुझ मूर्ख को अंजान को (गुरू के द्वारा अपने चरणों में) जोड़ लिया है। (मेरा) गुरू सराहनीय है। गुरू को साबाश है। जिसने (मेरे अंदर से) अहंकार को दूर कर दिया है। हे भाई ! जिन बहुत भाग्यशालियों की किस्मत जागती है। वे परमात्मा को अपने हृदय में बसाती हैं। हे दास नानक ! (आप भी) परमात्मा का नाम सराहा करें। नाम से सदके हुआ करें। 4। 2। 4।

मंगल साजु भइआ प्रभु अपना गाइआ राम ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

बिलावलु महला 5 छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मंगल साजु भइआ प्रभु अपना गाइआ राम ॥
अबिनासी वरु सुणिआ मनि उपजिआ चाइआ राम ॥
मनि प्रीति लागै वडै भागै कब मिलीऐ पूरन पते ॥
सहजे समाईऐ गोविंदु पाईऐ देहु सखीए मोहि मते ॥
दिनु रैणि ठाढी करउ सेवा प्रभु कवन जुगती पाइआ ॥
बिनवंति नानक करहु किरपा लैहु मोहि लड़ि लाइआ ॥1॥
भइआ समाहड़ा हरि रतनु विसाहा राम ॥
खोजी खोजि लधा हरि संतन पाहा राम ॥
मिले संत पिआरे दइआ धारे कथहि अकथ बीचारो ॥
इक चिति इक मनि धिआइ सुआमी लाइ प्रीति पिआरो ॥
कर जोड़ि प्रभ पहि करि बिनंती मिलै हरि जसु लाहा ॥
बिनवंति नानक दासु तेरा मेरा प्रभु अगम अथाहा ॥2॥

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 छंत ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे सहेलिए ! प्यारे प्रभू की सिफत सालाह का गीत गाने से (मन में) खुशी का रंग-ढंग बन जाता है। उस कभी ना मरने वाले पति-प्रभू (का नाम) सुनने से मन में चाव पैदा हो जाता है। (जब) बहुत किस्मत से (किसी जीव-स्त्री के) मन में परमात्मा-पति का प्यार पैदा होता है। (तब वह उतावली हो-हो पड़ती है उस) सारे गुणों के मालिक प्रभू-पति को कब मिला जा सकेगा। (उसके आगे यह उक्तर मिलता है- अगर) आत्मिक अडोलता में लीन रहें तो परमात्मा पति मिल जाता है। (वह भाग्यशाली जीव-स्त्री बार-बार पूछती है-) हे सहेलिए ! मुझे बुद्धि दे कि किस तरीके से प्रभू-पति मिल सकता है (हे सहेलिए ! बता) मैं दिन-रात खड़ी हुई आपकी सेवा करूँगी। नानक (भी) विनती करता है- (हे प्रभू ! मेरे ऊपर) मेहर कर। (मुझे अपने) पल्ले से लगाए रख। 1। हे भाई ! (परमात्मा का नाम किमती रत्न है। जो मनुष्य यह) हरी-नाम का व्यापर करता है (उसके अंदर) धीरज पैदा हो जाता है। पर। ये नाम-रत्न (कोई दुर्लभ) खोज करने वाला मनुष्य तलाश करके संत-जनों से ही हासिल करता है। जिस भाग्यशाली मनुष्य को प्यारे संत-जन मिल जाते हैं। (वही) मेहर करके (उसको) अकथ प्रभू की सिफत सालाह की बातें सुनाते हैं। हे भाई ! (संत-जनों की संगति में रह के) सुरति जोड़ के। मन लगा के प्रभू-चरणों से प्यार डाल के (परमात्मा का) नाम सिमरा कर। प्रभू के दर पर (दोनों) हाथ जोड़ के अरदास किया कर। (जो मनुष्य नित्य अरदास करता रहता है। उसको मानस जीवन की) कमाई (के तौर पर) परमात्मा की सिफत-सालाह (की दाति) मिलती है। हे अपहुँच और अथाह प्रभू ! नानक (आपके दर पर) विनती करता है- मैं आपका दास हूँ। आप मेरे मालिक हैं (मुझे अपनी सिफत-सालाह की दाति बख्श)। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 845 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।