मै अवरु गिआनु न धिआनु पूजा हरि नामु अंतरि वसि रहे ॥ भेखु भवनी हठु न जाना नानका सचु गहि रहे ॥1॥ भिंनड़ी रैणि भली दिनस सुहाए राम ॥ निज घरि सूतड़ीए पिरमु जगाए राम ॥ नव हाणि नव धन सबदि जागी आपणे पिर भाणीआ ॥ तजि कूड़ु कपटु सुभाउ दूजा चाकरी लोकाणीआ ॥ मै नामु हरि का हारु कंठे साच सबदु नीसाणिआ ॥ कर जोड़ि नानकु साचु मागै नदरि करि तुधु भाणिआ ॥2॥ जागु सलोनड़ीए बोलै गुरबाणी राम ॥ जिनि सुणि मंनिअड़ी अकथ कहाणी राम ॥ अकथ कहाणी पदु निरबाणी को विरला गुरमुखि बूझए ॥ ओहु सबदि समाए आपु गवाए त्रिभवण सोझी सूझए ॥ रहै अतीतु अपरंपरि राता साचु मनि गुण सारिआ ॥ ओहु पूरि रहिआ सरब ठाई नानका उरि धारिआ ॥3॥ महलि बुलाइड़ीए भगति सनेही राम ॥ गुरमति मनि रहसी सीझसि देही राम ॥ मनु मारि रीझै सबदि सीझै त्रै लोक नाथु पछाणए ॥ मनु डीगि डोलि न जाइ कत ही आपणा पिरु जाणए ॥ मै आधारु तेरा तू खसमु मेरा मै ताणु तकीआ तेरओ ॥ साचि सूचा सदा नानक गुर सबदि झगरु निबेरओ ॥4॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: हे सहेली ! (मेरे) मन में परमात्मा का नाम बस रहा है (इस हरी-नाम के बराबर की) मुझे कोई धर्म-चर्चा। कोई समाधि। कोई देव-पूजा नहीं सूझती। हे नानक ! (कह-हे सहेलिए !) मैंने सदा कायम रहने वाले हरी-नाम को (अपने हृदय में) पक्की तरह टिका लिया है (इसके बराबर का) मैं कोई भेष। कोई तीर्थ-रटन। कोई हठ योग नहीं समझती। 1। हरी-नाम रस में भीगी हुई उस जीव-स्त्री को (जिंदगी की) रातें और दिन सब सुहावने लगते हैं। हे अपने आप में मस्त रहने वाली जीव-स्त्री ! (देख। जिस जीव-स्त्री को) परमात्मा का प्यार (माया के मोह से) सचेत करता है। जो जीव-स्त्री गुरू के शबद की बरकति से (माया के मोह से) सचेत होती है। वह जीव-स्त्री विकारों से बची रहती है। वह जीव-स्त्री नाशवंत पदार्थों का मोह। ठॅगी-फरेब। माया से प्यार डाले रखने वाली आदत। और लोगों की मुथाजी छोड़ के अपने प्रभू-पति को प्यारी लगने लग जाती है। हे सखिए ! (जैसे) गले में हार (डाला जाता है। वैसे ही) परमातमा का नाम मैंने (अपने गले में परो लिया है) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह (मेरी जिंदगी की अगवाई करने वाला) परवाना है। नानक (दोनों) हाथ जोड़ के (परमात्मा के दर से उसका) सदा-स्थिर रहने वाला नाम मांगता रहता है (अऔर कहता है- हे प्रभू !) अगर आपको अच्छा लगे (तो मेरे ऊपर) मेहर की निगाह कर (मुझे अपना नाम दे)। 2। हे सुंदर नेत्रों वाली जीव स्त्री ! (माया के हमलों की ओर से) सावधान रह। (आपको) गुरू की बाणी जगा रही है। जिस (जीव-स्त्री) ने (गुरू की बाणी) सुन के (उसमें) श्रद्धा बनाई है। वह अकथ परमात्मा की सिफतसालाह करने लग जाती है। अकथ प्रभू की सिफत सालाह की बरकति सेवह उस आत्मिक दर्जे पर पहुँच जाती है जहाँ कोई वासना छू नहीं सकती। पर गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला यह बात समझता है। वह (गुरमुख) मनुष्य गुरू के शबद में लीन रहता है। (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लेता है। जगत में व्यापक परमात्मा के साथ उसकी गहरी सांझ हो जाती है। वह मनुष्य माया के मोह से बचा रहता है। बेअंत प्रभू (के प्रेम) में मस्त रहता है। सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा (हर वक्त उसके) मन में (बसा रहता है)। वह (परमात्मा के) गुणों को अपने हृदय में बसाए रखता है। हे नानक ! वह मनुष्य उस प्रभू को अपने हृदय में बसाए रखता है जो सब जगह व्यापक हो रहा है। 3। हे प्रभू दर पर पहुँची हुई जीव-स्त्री ! (जिस प्रभू ने आपको अपने चरणों में जोड़ा है। वह) भक्ति से प्यार करने वाला है। (जो जीव-स्त्री) गुरू की मति पर चल के (प्रभू की भक्ति करती है। उसके) मन में आत्मिक आनंद बना रहता है। (उसका मानव) शरीर सफल हो जाता है। (जो जीव-स्त्री अपने) मन को वश में करके आत्मिक आनंद हासिल करती है। गुरू के शबद से वह (जीवन में) कामयाब होती है सारे जगत के मालिक प्रभू से वह सोझ डाल लेती है। (उसका मन) किसी भी और तरफ डोलता नहीं। वह (हर वक्त) अपने प्रभू-पति के साथ गहरी सांझ डाले रखती है। हे प्रभू ! मुझे आपका ही आसरा है। आप (ही) मेरा पति है। मुझे आपका ही आसरा आपका ही सहारा है। हे नानक ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में (सदा लीन रहता है) वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है। गुरू के शबद के द्वारा (वह मनुष्य माया के मोह की) चिक-चिक ख्खत्म कर लेता है। 4। 2।
छंत बिलावलु महला 4 मंगल ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ मेरा हरि प्रभु सेजै आइआ मनु सुखि समाणा राम ॥ गुरि तुठै हरि प्रभु पाइआ रंगि रलीआ माणा राम ॥ वडभागीआ सोहागणी हरि मसतकि माणा राम ॥ हरि प्रभु हरि सोहागु है नानक मनि भाणा राम ॥1॥ निंमाणिआ हरि माणु है हरि प्रभु हरि आपै राम ॥ गुरमुखि आपु गवाइआ नित हरि हरि जापै राम ॥ मेरे हरि प्रभ भावै सो करै हरि रंगि हरि रापै राम ॥ जनु नानकु सहजि मिलाइआ हरि रसि हरि ध्रापै राम ॥2॥ माणस जनमि हरि पाईऐ हरि रावण वेरा राम ॥ गुरमुखि मिलु सोहागणी रंगु होइ घणेरा राम ॥ जिन माणस जनमि न पाइआ तिन॑ भागु मंदेरा राम ॥ हरि हरि हरि हरि राखु प्रभ नानकु जनु तेरा राम ॥3॥ गुरि हरि प्रभु अगमु द्रिड़ाइआ मनु तनु रंगि भीना राम ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: छंत बिलावलु महला 4 मंगल सतिगुर प्रसादि ॥ हे सहेलिए ! (जिस भाग्यशाली जीव-स्त्री की हृदय-) सेज पर प्यारा हरी-प्रभू आ बैठा। उसका मन आत्मिक आनंद में मगन हो जाता है। गुरू के प्रसन्न होने पर जिस (जीव-स्त्री) को हरी-प्रभू मिल गया। वह प्रेम में (मस्त हो के प्रभू के मिलाप का) स्वाद भोगती है। हे नानक ! (कह- हे सहेलिए !) जिनके माथे पर हरी (-मिलाप का) मोती (चमक जाता) है। वे भाग्यशाली हो जाती हैं। वे सुहागनें बन जाती हैं। हरी-प्रभू-पति (उनके सिर पर) विद्यमान हो जाता है। उनको पति-प्रभू मन में प्यारा लगने लगता है। 1। जिनको कोई आदर नहीं देता। परमात्मा उनका आदर-सहारा बन जाता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लेता है। और सदा परमात्मा का नाम जपता रहता है। हरी-प्रभू उसके स्वै में (जिंद में) सदा टिका रहता है (गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य) सदा प्रभू के प्रेम रंग में रंगा रहता है (उसे यह विश्वास हो जाता है कि) मेरा प्रभू वही कुछ करता है जो उसको अच्छा लगता है। दास नानक (कहता है – हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य) आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। परमात्मा के नाम-रस की बरकति से वह (माया की ओर से) तृप्त रहता है। 2। हे भाई ! मानस जन्म में (ही) परमात्मा को मिल सकते हैं। (मनुष्य जन्म ही) परमात्मा का मिलाप पाने का वक्त है। हे सौभाग्यशाली जीव-सि्त्रऐ ! गुरू के द्वारा प्रभू को मिल। (गुरू की शरण पड़ने से मिलाप का प्रेम-) रंग बहुत चढ़ता है। हे भाई ! जिन्होंने मानस जन्म में परमात्मा का मिलाप हासिल ना किया। उनकी खोटी किस्मत जानो। हे हरी ! हे प्रभू ! नानक को (अपने चरणों में) जोड़े रख। नानक आपका दास है। 3। हे भाई ! (जिस मनुष्य के दिल में) गुरू ने अपहुँच हरी-प्रभू (का नाम) दृढ़ कर दिया। उसका मन उसका तन (परमात्मा के प्रेम-) रंग में भीगा रहता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे सहेली ! (मेरे) मन में परमात्मा का नाम बस रहा है (इस हरी-नाम के बराबर की) मुझे कोई धर्म-चर्चा।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।