इस पृष्ठ पर
अंग
796
बिलावल
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश
ऐसा नामु निरंजन देउ ॥
ऐसा नामु निरंजन देउ ॥
हउ जाचिकु तू अलख अभेउ ॥1॥ रहाउ ॥
माइआ मोहु धरकटी नारि ॥ भूंडी कामणि कामणिआरि ॥
राजु रूपु झूठा दिन चारि ॥
नामु मिलै चानणु अंधिआरि ॥2॥
चखि छोडी सहसा नही कोइ ॥
बापु दिसै वेजाति न होइ ॥
एके कउ नाही भउ कोइ ॥
करता करे करावै सोइ ॥3॥
सबदि मुए मनु मन ते मारिआ ॥
ठाकि रहे मनु साचै धारिआ ॥
अवरु न सूझै गुर कउ वारिआ ॥
नानक नामि रते निसतारिआ ॥4॥3॥
हउ जाचिकु तू अलख अभेउ ॥1॥ रहाउ ॥
माइआ मोहु धरकटी नारि ॥ भूंडी कामणि कामणिआरि ॥
राजु रूपु झूठा दिन चारि ॥
नामु मिलै चानणु अंधिआरि ॥2॥
चखि छोडी सहसा नही कोइ ॥
बापु दिसै वेजाति न होइ ॥
एके कउ नाही भउ कोइ ॥
करता करे करावै सोइ ॥3॥
सबदि मुए मनु मन ते मारिआ ॥
ठाकि रहे मनु साचै धारिआ ॥
अवरु न सूझै गुर कउ वारिआ ॥
नानक नामि रते निसतारिआ ॥4॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे माया के प्रभाव-रहित प्रकाश-रूप प्रभू ! आपका नाम भी एैसा ही है (जैसा आप खुद हैं। भाव। आपका नाम भी माया के मोह से बचाता है)। हे प्रभू ! आपका कोई खास चिन्ह-चक्र नहीं मिल सकता। आपका भेद नहीं पाया जा सकता। मैं (आपके दर पर) मंगता हूँ (और आपसे आपके नाम की दाति माँगता हूँ)। 1।रहाउ। (नाम जपने वाले को ये समझ आ जाती है कि) माया का मोह एक व्यभिचारिन स्त्री के तुल्य है। माया एक टूणे करने वाली बुरी स्त्री के समान है। दुनियाँ की हकूमतें और सुंदरता नाशवंत हैं। थोड़े ही दिन रहने वाले हैं (पर इनके असर तले मनुष्य जहालत के अंधकार में जीवन में ठोकरें खाता फिरता है)। जिस मनुष्य को प्रभू का नाम मिल जाता है। उसको (माया के मोह के) अंधेरे में रोशनी मिल जाती है। 2। (ये बात अच्छी तरह) परख के देख ली है। जिसमें कोई शक नहीं कि जिसका पिता प्रत्यक्ष दिखता हो वह बुरे असल वाला नहीं कहलवाता (कि वह पिता के अलावा किसी और की औलाद है) (जो मनुष्य अपने सिर पर पिता-प्रभू को रखवाला मानता है वह विकारों की ओर नहीं पलटता)। एक प्रभू-पिता वाले को (किसी और से) कोई डर नहीं रहता (क्योंकि उसको यकीन बना रहता है कि) वह परमात्मा ही सब कुछ करता है और (जीवों से) करवाता है। 3। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के स्वैभाव को खत्म कर देते हैं अपने मन को मायावी फुरनों से रोक लेते हैं। वे विकारों की ओर से रुके रहते हैं क्योंकि सच्चा करतार उनके मन को (अपने नाम का) आसरा देता है। मैं गुरू से सदके हूँ। उसके बिना कोई और ऐसा नहीं (जो मन को प्रभू में जोड़ने में सहायक हो)। हे नानक ! प्रभू-नाम में रंगे हुए लोगों को प्रभू (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 4। 3।
गुर बचनी मनु सहज धिआने ॥
बिलावलु महला 1 ॥
गुर बचनी मनु सहज धिआने ॥
हरि कै रंगि रता मनु माने ॥
मनमुख भरमि भुले बउराने ॥
हरि बिनु किउ रहीऐ गुर सबदि पछाने ॥1॥
बिनु दरसन कैसे जीवउ मेरी माई ॥
हरि बिनु जीअरा रहि न सकै खिनु सतिगुरि बूझ बुझाई ॥1॥ रहाउ ॥
मेरा प्रभु बिसरै हउ मरउ दुखाली ॥
सासि गिरासि जपउ अपुने हरि भाली ॥
सद बैरागनि हरि नामु निहाली ॥
अब जाने गुरमुखि हरि नाली ॥2॥
अकथ कथा कहीऐ गुर भाइ ॥
प्रभु अगम अगोचरु देइ दिखाइ ॥
बिनु गुर करणी किआ कार कमाइ ॥
हउमै मेटि चलै गुर सबदि समाइ ॥3॥
मनमुखु विछुड़ै खोटी रासि ॥
गुरमुखि नामि मिलै साबासि ॥
हरि किरपा धारी दासनि दास ॥
जन नानक हरि नाम धनु रासि ॥4॥4॥
गुर बचनी मनु सहज धिआने ॥
हरि कै रंगि रता मनु माने ॥
मनमुख भरमि भुले बउराने ॥
हरि बिनु किउ रहीऐ गुर सबदि पछाने ॥1॥
बिनु दरसन कैसे जीवउ मेरी माई ॥
हरि बिनु जीअरा रहि न सकै खिनु सतिगुरि बूझ बुझाई ॥1॥ रहाउ ॥
मेरा प्रभु बिसरै हउ मरउ दुखाली ॥
सासि गिरासि जपउ अपुने हरि भाली ॥
सद बैरागनि हरि नामु निहाली ॥
अब जाने गुरमुखि हरि नाली ॥2॥
अकथ कथा कहीऐ गुर भाइ ॥
प्रभु अगम अगोचरु देइ दिखाइ ॥
बिनु गुर करणी किआ कार कमाइ ॥
हउमै मेटि चलै गुर सबदि समाइ ॥3॥
मनमुखु विछुड़ै खोटी रासि ॥
गुरमुखि नामि मिलै साबासि ॥
हरि किरपा धारी दासनि दास ॥
जन नानक हरि नाम धनु रासि ॥4॥4॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 1 ॥ गुरू के बचनों पर चल कर जिनका मन अडोलता की समाधि लगा लेता है (भाव। विकारों की ओर डोलने से हट जाता है) परमात्मा के प्रेम में रंगा हुआ वह मन (परमात्मा की याद में ही) परचा रहता है। (पर) अपने मन के पीछे चलने वाले बँदे बावले हुए भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं। गुरू के शबद के द्वारा जिन की सांझ (प्रभू से) बन जाती है वह प्रभू (की याद) के बिना नहीं रह सकते। 1। (जब से) सतिगुरू ने (मुझे) सद्बुद्धि दी है (तब से) मेरी जिंद प्रभू (की याद) के बिना नहीं रह सकती। हे मेरी माँ ! अब मैं प्रभू के दर्शनों के बिना व्याकुल हो जाती हूँ। 1।रहाउ। (अब जब कभी) मुझे मेरा प्रभू बिसर जाए तो मैं दुखी हो के मरने वाली हो जाती हूँ। मैं एक एक सांस से और ग्रास से (भी) अपने प्रभू को याद करती हूँ और उसी को तलाशती रहती हूँ। दुनिया के रसों से उदास हो के मैं प्रभू के नाम को ही (अपनी निगाह में) रखती हूँ। गुरू की शरण पड़ कर मुझे अब समझ आई है कि परमात्मा (हर वक्त) मेरे अंग-संग है।2। बेअंत प्रभू की सिफत सालाह गुरू के अनुसार रहने पर ही की जा सकती है। गुरू उस प्रभू का दीदार करा देता है जो इन्द्रियों की पहुँच से परे है। गुरू की बताई हुई जीवन-जुगति के बिना (आत्मिक जीवन के रास्ते की) कोई और कार करनी व्यर्थ है। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है। वह अपना अहंकार दूर करके (जीवन-राह पर) चलता है। 3। जो मनुष्य (गुरू के बताए राह पर चलने की जगह) अपने मन के पीछे चलता है। वह प्रभू से विछुड़ा रहता है। उसके पल्ले (आत्मिक जीवन-यात्रा के लिए) खोटी पूँजी है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह प्रभू के नाम में जुड़ा रहता है। उसको शोभा मिलती है। हे दास नानक ! प्रभू मेहर करके जिसको अपने सेवकों का दास बनाता है। उसे प्रभू का नाम-धन मिलता है। उसको हरी-नाम की पूँजी मिलती है। 4। 4।
ध्रिगु ध्रिगु खाइआ ध्रिगु ध्रिगु सोइआ ध्रिगु ध्रिगु कापड़ु अंगि चड़ाइआ ॥
बिलावलु महला 3 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ध्रिगु ध्रिगु खाइआ ध्रिगु ध्रिगु सोइआ ध्रिगु ध्रिगु कापड़ु अंगि चड़ाइआ ॥
ध्रिगु सरीरु कुटंब सहित सिउ जितु हुणि खसमु न पाइआ ॥
पउड़ी छुड़की फिरि हाथि न आवै अहिला जनमु गवाइआ ॥1॥
दूजा भाउ न देई लिव लागणि जिनि हरि के चरण विसारे ॥
जगजीवन दाता जन सेवक तेरे तिन के तै दूख निवारे ॥1॥ रहाउ ॥
तू दइआलु दइआपति दाता किआ एहि जंत विचारे ॥
मुकत बंध सभि तुझ ते होए ऐसा आखि वखाणे ॥
गुरमुखि होवै सो मुकतु कहीऐ मनमुख बंध विचारे ॥2॥
सो जनु मुकतु जिसु एक लिव लागी सदा रहै हरि नाले ॥
तिन की गहण गति कही न जाई सचै आपि सवारे ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ध्रिगु ध्रिगु खाइआ ध्रिगु ध्रिगु सोइआ ध्रिगु ध्रिगु कापड़ु अंगि चड़ाइआ ॥
ध्रिगु सरीरु कुटंब सहित सिउ जितु हुणि खसमु न पाइआ ॥
पउड़ी छुड़की फिरि हाथि न आवै अहिला जनमु गवाइआ ॥1॥
दूजा भाउ न देई लिव लागणि जिनि हरि के चरण विसारे ॥
जगजीवन दाता जन सेवक तेरे तिन के तै दूख निवारे ॥1॥ रहाउ ॥
तू दइआलु दइआपति दाता किआ एहि जंत विचारे ॥
मुकत बंध सभि तुझ ते होए ऐसा आखि वखाणे ॥
गुरमुखि होवै सो मुकतु कहीऐ मनमुख बंध विचारे ॥2॥
सो जनु मुकतु जिसु एक लिव लागी सदा रहै हरि नाले ॥
तिन की गहण गति कही न जाई सचै आपि सवारे ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 3 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (मनुष्य का सब कुछ) खाना धिक्कार-योग्य है। सोना (सुख-आराम) धिक्कार-योग्य है। शरीर पर कपड़ा पहनना धिक्कार-योग्य है। हे भाई ! अगर इस शरीर के द्वारा इस जनम में पति-प्रभू का मिलाप हासिल नहीं किया। तो यह शरीर धिक्कार-योग्य है। (नाक-कान-आँखों आदि सारे) परिवार समेत धिक्कार-योग्य है। (हे भाई ! यह मनुष्य का शरीर प्रभू के देश में पहुँचने के लिए सीढ़ी है) अगर यह सीढ़ी (हाथ से) निकल जाए तो दोबारा हाथ में नहीं आती। मनुष्य अपना बहुत ही कीमती जीवन गवा लेता है। 1। हे भाई ! माया का मोह। जिसने (जीवों को) परमात्मा के चरण (मन में बसाने) भुला दिए हैं। (परमात्मा के चरणों में) सुरति जोड़ने नहीं देता। हे प्रभू् ! आप खुद ही जगत को आत्मिक जीवन देने वाले हैं। जो बँदे आपके सेवक बनते हैं। उनके आपने (मोह से पैदा होने वाले सारे) दुख दूर कर दिए हैं। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आप (खुद ही) दया का घर हैं। दया के मालिक हैं। आप स्वयं ही (अपने चरणों की प्रीत) देने वाले हैं (आपके पैदा किए हुए) इन जीवों के वश में कुछ नहीं। आपके ही हुकम में ही कई जीव माया के मोह से आजाद हो जाते हैं। कई जीव मोह में बँधे रहते हैं- कोई विरला गुरमुख ही ये बात कह के समझाता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह माया के मोह से आजाद कहा जाता है। पर अपने मन के पीछे चलने वाले बिचारे मोह में बँधे रहते हैं। 2। जिस मनुष्य की सुरति एक प्रभू में जुड़ी रहती है वह मनुष्य मोह से आजाद हो जाता है। वह सदा प्रभू-चरणों में जुड़ा रहता है। ऐसे लोगों की गहरी आत्मिक अवस्था को बयान नहीं किया जा सकता। सदा स्थिर रहने वाले प्रभू ने खुद ही उनका जीवन सुंदर बना दिया होता है। पर।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 796 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।