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सांति सहज सूख मनि उपजिओ कोटि सूर नानक परगास ॥2॥5॥24॥
सांति सहज सूख मनि उपजिओ कोटि सूर नानक परगास ॥2॥5॥24॥
हिन्दी अर्थ: (मेरे) मन में शांति पैदा हो गई है। आत्मिक अडोलता के सुख पैदा हो गए हैं। (मानो) करोड़ों सूरजों का (मेरे अंदर) उजाला पैदा हो गया है। 2। 5। 24।
हरि हरि पतित पावन ॥
टोडी महला 5 ॥
हरि हरि पतित पावन ॥
जीअ प्रान मान सुखदाता अंतरजामी मन को भावन ॥ रहाउ ॥
सुंदरु सुघड़ु चतुरु सभ बेता रिद दास निवास भगत गुन गावन ॥
निरमल रूप अनूप सुआमी करम भूमि बीजन सो खावन ॥1॥
बिसमन बिसम भए बिसमादा आन न बीओ दूसर लावन ॥
रसना सिमरि सिमरि जसु जीवा नानक दास सदा बलि जावन ॥2॥6॥25॥
हरि हरि पतित पावन ॥
जीअ प्रान मान सुखदाता अंतरजामी मन को भावन ॥ रहाउ ॥
सुंदरु सुघड़ु चतुरु सभ बेता रिद दास निवास भगत गुन गावन ॥
निरमल रूप अनूप सुआमी करम भूमि बीजन सो खावन ॥1॥
बिसमन बिसम भए बिसमादा आन न बीओ दूसर लावन ॥
रसना सिमरि सिमरि जसु जीवा नानक दास सदा बलि जावन ॥2॥6॥25॥
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा विकारियों को पवित्र करने वाला है। वह (सब जीवों के) जिंद-प्राणों का सहारा है। (सब को) सुख देने वाला है। (सबके) दिल की जानने वाला है। (सबके) मन का प्यारा है।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा सुंदर है। सुचॅजी घाड़त वाला है। सयाना है। सब कुछ जानने वाला है। अपने दासों के हृदय में निवास रखने वाला है। भगत उसके गुण गाते हैं। वह मालिक पवित्र-स्वरूप है। बेमिसाल है। उसका बनाया ये मानव-शरीर करम बीजने के लिए धरती है। जो कुछ जीव इसमें बीजते हैं। वही खाते हैं। 1। हे नानक ! (कह, हे भाई ! उस परमात्मा के बारे में सोच के) बहुत ही आश्चर्य होता है। कोई भी और दूसरा उसके बराबर का नहीं। उसके सेवक हमेशा उससे सदके जाते हैं। हे भाई ! उसकी सिफत-सालाह (अपनी) जीभ से कर-कर के मैं (भी) आत्मिक जीवन प्राप्त कर रहा हूँ। 2। 6। 25।
माई माइआ छलु ॥
टोडी महला 5 ॥
माई माइआ छलु ॥
त्रिण की अगनि मेघ की छाइआ गोबिद भजन बिनु हड़ का जलु ॥ रहाउ ॥
छोडि सिआनप बहु चतुराई दुइ कर जोड़ि साध मगि चलु ॥
सिमरि सुआमी अंतरजामी मानुख देह का इहु ऊतम फलु ॥1॥
बेद बखिआन करत साधू जन भागहीन समझत नही खलु ॥
प्रेम भगति राचे जन नानक हरि सिमरनि दहन भए मल ॥2॥7॥26॥
माई माइआ छलु ॥
त्रिण की अगनि मेघ की छाइआ गोबिद भजन बिनु हड़ का जलु ॥ रहाउ ॥
छोडि सिआनप बहु चतुराई दुइ कर जोड़ि साध मगि चलु ॥
सिमरि सुआमी अंतरजामी मानुख देह का इहु ऊतम फलु ॥1॥
बेद बखिआन करत साधू जन भागहीन समझत नही खलु ॥
प्रेम भगति राचे जन नानक हरि सिमरनि दहन भए मल ॥2॥7॥26॥
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे माँ ! माया एक छलावा है (जो कोई रूप दिखा के जल्दी ही गुम हो जाता है)। परमात्मा के भजन के बिना (इस माया की पाया इतनी है जैसे) तिनकों की आग है। बादलों की छाया है। (नदी) की बहाड़ का पानी है।रहाउ। हे भाई ! (माया के छलावे के धोखे से बचने के लिए) बहुती चालाकियां-समझदारियां छोड़ के। दोनों हाथ जोड़ के गुरू के (बताए हुए) रास्ते पर चला कर। अंतरजामी प्रभू का नाम सिमरा कर- मानस शरीर के लिए सबसे अच्छा फल यही है। 1। हे भाई ! भले मनुष्य आत्मिक जीवन की सूझ का यह उपदेश करते ही रहते हैं। पर अभागा मूर्ख मनुष्य (इस उपदेश) को नहीं समझता। हे नानक ! प्रभू के दास प्रभू की प्रेमा-भगती में मस्त रहते हैं। परमात्मा के सिमरन की बरकति से (उनके अंदर से कामादिक) पहलवान जल के राख हो जो जाते हैं। 2।7।26।
माई चरन गुर मीठे ॥
टोडी महला 5 ॥
माई चरन गुर मीठे ॥
वडै भागि देवै परमेसरु कोटि फला दरसन गुर डीठे ॥ रहाउ ॥
गुन गावत अचुत अबिनासी काम क्रोध बिनसे मद ढीठे ॥
असथिर भए साच रंगि राते जनम मरन बाहुरि नही पीठे ॥1॥
बिनु हरि भजन रंग रस जेते संत दइआल जाने सभि झूठे ॥
नाम रतनु पाइओ जन नानक नाम बिहून चले सभि मूठे ॥2॥8॥27॥
माई चरन गुर मीठे ॥
वडै भागि देवै परमेसरु कोटि फला दरसन गुर डीठे ॥ रहाउ ॥
गुन गावत अचुत अबिनासी काम क्रोध बिनसे मद ढीठे ॥
असथिर भए साच रंगि राते जनम मरन बाहुरि नही पीठे ॥1॥
बिनु हरि भजन रंग रस जेते संत दइआल जाने सभि झूठे ॥
नाम रतनु पाइओ जन नानक नाम बिहून चले सभि मूठे ॥2॥8॥27॥
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे माँ ! गुरू के चरण (मुझे) प्यारे लगते हैं। (जिस मनुष्य को) बड़ी किस्मत से परमात्मा (गुरू के चरणों का मिलाप) देता है। गुरू के दर्शन करने से (उस मनुष्य को) करोड़ों (पुन्यों के) फल प्राप्त हो जाते हैं।रहाउ। हे माँ ! (गुरू के चरणों में पड़ कर) अटल अविनाशी परमात्मा के गुण गाते-गाते बार-बार ढीठ बन कर आने वाले काम-क्रोध-अहंकार (आदि विकार) नाश हो जाते हैं। (गुरू के चरणों की बरकति से जो मनुष्य) सदा-स्थिर प्रभू के प्रेम-रंग में रंगे जाते हैं वह (वे विकारों के हमलों के मुकाबले में) अडोल हो जाते हैं। वे जनम-मरन (की चक्की) में बार बार नहीं पीसे जाते। 1। हे माँ ! (जो मनुष्य गुरू के चरणों में लगते हैं। वह) दया के घर गुरू की कृपा से परमात्मा के भजन (के आनंद) के बिना और सारे ही (दुनियावी) स्वादों व तमाशों को झूठे जानते हैं। हे नानक ! (कह,हे माँ !) परमात्मा के सेवक (गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का) रत्न (जैसा कीमती) नाम हासिल करते हैं। हरि नाम से टूटे हुए सारे ही जीव (अपना आत्मिक जीवन) लुटा के (जगत से) जाते हैं। 2। 8। 27।
साधसंगि हरि हरि नामु चितारा ॥
टोडी महला 5 ॥
साधसंगि हरि हरि नामु चितारा ॥
सहजि अनंदु होवै दिनु राती अंकुरु भलो हमारा ॥ रहाउ ॥
गुरु पूरा भेटिओ बडभागी जा को अंतु न पारावारा ॥
करु गहि काढि लीओ जनु अपुना बिखु सागर संसारा ॥1॥
जनम मरन काटे गुर बचनी बहुड़ि न संकट दुआरा ॥
नानक सरनि गही सुआमी की पुनह पुनह नमसकारा ॥2॥9॥28॥
साधसंगि हरि हरि नामु चितारा ॥
सहजि अनंदु होवै दिनु राती अंकुरु भलो हमारा ॥ रहाउ ॥
गुरु पूरा भेटिओ बडभागी जा को अंतु न पारावारा ॥
करु गहि काढि लीओ जनु अपुना बिखु सागर संसारा ॥1॥
जनम मरन काटे गुर बचनी बहुड़ि न संकट दुआरा ॥
नानक सरनि गही सुआमी की पुनह पुनह नमसकारा ॥2॥9॥28॥
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की संगति में टिक के परमात्मा का नाम सिमरता रहता है (उसके अंदर आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है। उस) आत्मिक अडोलता के कारण (उसके अंदर) दिन रात (हर वक्त) आनंद बना रहता है। (हे भाई ! साध-संगति की बरकति से) हम जीवों के पिछले किए कर्मों के भले अंकुर फूट पड़ते हैं।रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसकी हस्ती का इस पार उस पार का छोर नहीं मिल सकता। वह परमात्मा अपने उस सेवक को (उसका) हाथ पकड़ के संसार समुंद्र से बाहर निकाल लेता है। (जिस सेवक को) बड़ी किस्मत से पूरा गुरू मिल जाता है। 1। हे भाई ! गुरू के बचनों पर चलने से जनम-मरण में डालने वाली फाहियां कट जाती हैं। कष्टों भरे चौरासी के चक्करों का दरवाजा दोबारा नहीं देखना पड़ता। हे नानक ! (कह, हे भाई ! गुरू की संगति की बरकति से) मैंने भी मालिक-प्रभू का आसरा लिया है। मैं (उसके दर पर) बार बार सिर निवाता हूँ। 2।9।28।
माई मेरे मन को सुखु ॥
टोडी महला 5 ॥
माई मेरे मन को सुखु ॥
कोटि अनंद राज सुखु भुगवै हरि सिमरत बिनसै सभ दुखु ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि जनम के किलबिख नासहि सिमरत पावन तन मन सुख ॥
देखि सरूपु पूरनु भई आसा दरसनु भेटत उतरी भुख ॥1॥
चारि पदारथ असट महा सिधि कामधेनु पारजात हरि हरि रुखु ॥
नानक सरनि गही सुख सागर जनम मरन फिरि गरभ न धुखु ॥2॥10॥29॥
माई मेरे मन को सुखु ॥
कोटि अनंद राज सुखु भुगवै हरि सिमरत बिनसै सभ दुखु ॥1॥ रहाउ ॥
कोटि जनम के किलबिख नासहि सिमरत पावन तन मन सुख ॥
देखि सरूपु पूरनु भई आसा दरसनु भेटत उतरी भुख ॥1॥
चारि पदारथ असट महा सिधि कामधेनु पारजात हरि हरि रुखु ॥
नानक सरनि गही सुख सागर जनम मरन फिरि गरभ न धुखु ॥2॥10॥29॥
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे माँ ! (परमात्मा का नाम सिमरते हुए) मेरे मन का सुख (इतना ऊँचा हो जाता है कि ऐसा प्रतीत होता है। जैसे मेरा मन) करोड़ों आनंद भोग रहा है; करोड़ों बादशाहियों का सुख ले रहा है। हे माँ ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए सारा दुख नाश हो जाता है। 1।रहाउ। हे माँ ! परमात्मा का नाम सिमरने से तन-मन पवित्र हो जाते हैं। आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। करोड़ों जन्मों के (किए हुए) पाप नाश हो जाते हैं। (सिमरन की बरकति से) प्रभू के दीदार करके (मन की हरेक) मुराद पूरी हो जाती है। दर्शन करते हुए (माया की) भूख दूर हो जाती है। 1। हे माँ ! चार पदार्थ (देने वाला)।आठ बड़ी करामाती ताकतें (देने वाला) परमात्मा स्वयं ही है। परमात्मा खुद ही है कामधेनु; परमात्मा स्वयं ही है पारजात वृक्ष। हे नानक ! (कह, हे माँ ! जिस मनुष्य ने) सुखों के समुंद्र परमात्मा का आसरा ले लिया। उसको जनम-मरण के चक्कर का फिक्र। जूनियों में पड़ने की चिंता नहीं रहती। 2। 10। 29।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 717 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।