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अंग ७१४ · टोडी

अंग
714
टोडी
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  1. जो मागहि सोई सोई पावहि सेवि हरि के चरण रसाइण ॥
  2. निंदकु गुर किरपा ते हाटिओ ॥
  3. टोडी मः 5 ॥
  4. हरि के चरन कमल मनि धिआउ ॥
  5. हरि हरि नामु सदा सद जापि ॥
  6. स्वामी सरनि परिओ दरबारे ॥

जो मागहि सोई सोई पावहि सेवि हरि के चरण रसाइण ॥

अंग ७१३ से चला आ रहा अंश

जो मागहि सोई सोई पावहि सेवि हरि के चरण रसाइण ॥
जनम मरण दुहहू ते छूटहि भवजलु जगतु तराइण ॥1॥
खोजत खोजत ततु बीचारिओ दास गोविंद पराइण ॥
अबिनासी खेम चाहहि जे नानक सदा सिमरि नाराइण ॥2॥5॥10॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! प्रभू सारे रसों का घर है उसके चरनों की सेवा करके (मनुष्य) जो कुछ (उसके दर से) माँगते हैं।वही कुछ प्राप्त कर लेते हैं। (निरा यही नहीं।प्रभू की सेवा-भक्ति करने वाले मनुष्य) जन्म और मौत दोनों से बच जाते हैं।संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। 1। हे भाई ! खोज करते-करते प्रभू के दास असल तत्व को समझ लेते हैं।और प्रभू के ही आसरे रहते हैं। हे नानक ! (कह, हे भाई !) अगर आप कभी ना खत्म होने वाला सुख चाहते हैं।तो सदा परमात्मा का सिमरन किया कर। 2। 5। 10।

निंदकु गुर किरपा ते हाटिओ ॥

टोडी महला 5 ॥
निंदकु गुर किरपा ते हाटिओ ॥
पारब्रहम प्रभ भए दइआला सिव कै बाणि सिरु काटिओ ॥1॥ रहाउ ॥
कालु जालु जमु जोहि न साकै सच का पंथा थाटिओ ॥
खात खरचत किछु निखुटत नाही राम रतनु धनु खाटिओ ॥1॥
भसमा भूत होआ खिन भीतरि अपना कीआ पाइआ ॥
आगम निगमु कहै जनु नानकु सभु देखै लोकु सबाइआ ॥2॥6॥11॥

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! जब गुरू कृपा करता है तो निंदा के स्वभाव वाला मनुष्य (निंदा करने से) हट जाता है। (जिस निंदक पर) प्रभू परमात्मा जी दयावान हो जाते हैं।कल्याण-रूवरूप हरी के नाम-तीर से (गुरू उसका) सिर काट देता है (उसका अहंकार नाश कर देता है)। 1।रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य पर गुरू प्रभू दयावान होते हैं) उस मनुष्य को आत्मिक मौत।माया का जाल।मौत का डर (कोई भी) देख नहीं सकता।(क्योंकि गुरू की कृपा से वह मनुष्य) सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन वाले रास्ते पर कब्जा कर लेता है। वह मनुष्य परमात्मा का रत्न (जैसा कीमती) नाम-धन कमा लेता है।खुद बरत के।औरों को बाँट के ये धन रक्ती भर भी नहीं खत्म होता। 1। हे भाई ! (जिस निंदा स्वभाव के कारण।जिस स्वै भाव के कारण।निंदक सदा) दुखी होता रहता था।(प्रभू के दयाल होने से।गुरू की कृपा से) एक छिन में ही उस स्वभाव का नामो-निशान मिट जाता है। (इस आश्चर्यजनक तब्दीली को) सारा जगत हैरान हो-हो के देखता है।दास नानक ये अगंमी-रॅबी खेल बयान करता है। 2। 6। 11।

टोडी मः 5 ॥

टोडी मः 5 ॥
किरपन तन मन किलविख भरे ॥
साधसंगि भजनु करि सुआमी ढाकन कउ इकु हरे ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक छिद्र बोहिथ के छुटकत थाम न जाही करे ॥
जिस का बोहिथु तिसु आराधे खोटे संगि खरे ॥1॥
गली सैल उठावत चाहै ओइ ऊहा ही है धरे ॥
जोरु सकति नानक किछु नाही प्रभ राखहु सरणि परे ॥2॥7॥12॥

हिन्दी अर्थ: टोडी मः 5 ॥ हे कंजूस ! (स्वासों की पूँजी सिमरन में ना खर्च करने के कारण आपका) मन और शरीर पापों से भरे पड़े हैं। हे कंजूस ! साध-संगति में टिक के मालिक प्रभू का भजन किया कर।सिर्फ वह प्रभू ही इन पापों पर पर्दा डालने में समर्थ है। 1।रहाउ। हे कंजूस ! (सिमरन से सूना रहने के कारण आपके शरीर-) जहाज में अनेकों छेद हो गए हैं।(सिमरन के बिना किसी भी और तरीके से) ये छेद बंद नहीं किए जा सकते। जिस परमात्मा का दिया हुआ ये (शरीर) जहाज है।उसकी आराधना किया कर।उसकी संगति में खोटी (हो चुकी ज्ञानेन्द्रियां) खरी हो जाएंगी। 1। पर मनुष्य निरी बातों से ही पहाड़ उठाना चाहता है (सिर्फ बातों से) वह पहाड़ वहीं के वहीं धरे रह जाते हैं। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! (इन छेदों से बचने के लिए हम जीवों में) कोई जोर कोई ताकत नहीं।हम आपकी शरण आ पड़े हैं।हमें आप खुद ही बचा ले। 2। 7। 12।

हरि के चरन कमल मनि धिआउ ॥

टोडी महला 5 ॥
हरि के चरन कमल मनि धिआउ ॥
काढि कुठारु पित बात हंता अउखधु हरि को नाउ ॥1॥ रहाउ ॥
तीने ताप निवारणहारा दुख हंता सुख रासि ॥
ता कउ बिघनु न कोऊ लागै जा की प्रभ आगै अरदासि ॥1॥
संत प्रसादि बैद नाराइण करण कारण प्रभ एक ॥
बाल बुधि पूरन सुखदाता नानक हरि हरि टेक ॥2॥8॥13॥

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! मैं तो अपने मन में परमात्मा के कोमल चरणों का ध्यान धरता हूँ। परमात्मा का नाम (एक ऐसी) दवाई है जो (मनुष्य के अंदर से) क्रोध और अहंकार (आदि रोगों को) पूरी तरह से निकाल देती है (जैसे।दवा शरीर में से गर्मी और वाई के रोग दूर करती है)। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा (का नाम मनुष्य के अंदर से आधि।व्याधि व उपाधि) तीनों ही ताप दूर करने वाला है।सारे दुखों का नाश करने वाला है।और सारे सुखों की राशि है। जिस मनुष्य की अरदास सदा प्रभू के दर पे जारी रहती है।उसके जीवन के रास्ते में कोई रुकावट नहीं आती। 1। हे भाई ! एक परमात्मा ही जगत का मूल है।(जीवों के रोग दूर करने वाला) हकीम है।ये प्रभू गुरू की कृपा से मिलता है। हे नानक ! जो मनुष्य अपने अंदर से चतुराई दूर कर देते हैं।सारे सुख देने वाला परमात्मा उन्हें मिल जाता है।उन (की जिंदगी) का सहारा बन जाता है। 2। 8। 13।

हरि हरि नामु सदा सद जापि ॥

टोडी महला 5 ॥
हरि हरि नामु सदा सद जापि ॥
धारि अनुग्रहु पारब्रहम सुआमी वसदी कीनी आपि ॥1॥ रहाउ ॥
जिस के से फिरि तिन ही सम॑ाले बिनसे सोग संताप ॥
हाथ देइ राखे जन अपने हरि होए माई बाप ॥1॥
जीअ जंत होए मिहरवाना दया धारी हरि नाथ ॥
नानक सरनि परे दुख भंजन जा का बड परताप ॥2॥9॥14॥

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! सदा ही परमात्मा का नाम जपा कर। (जिस भी मनुष्य ने परमात्मा का नाम जपा है) मालिक प्रभू ने अपनी मेहर कर के (उसकी सूनी पड़ी हृदय-नगरी को सुंदर आत्मिक गुणों से) खुद बसा दिया। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस प्रभू के हम पैदा किए हुए हैं।वह प्रभू (उन मनुष्यों की) खुद संभाल करता है (जो उसका नाम जपते हैं।उनके सारे) चिंता-फिक्र।दुख-कलेश नाश हो जाते हैं। परमात्मा अपना हाथ दे के अपने सेवकों को (चिंता-फिक्र।दुख-कलेशों से) आप बचाता है।उनका माँ-बाप बना रहता है। 1। हे भाई ! परमात्मा सारे ही जीवों पर मेहर करने वाला है।वह पति प्रभू सब पे दया करता है। हे नानक ! (कह) मैं उस प्रभू की शरण पड़ा हूँ।जो सारे दुखों का नाश करने वाला है।और।जिसका तेज-प्रताप बहुत है। 2। 9। 14।

स्वामी सरनि परिओ दरबारे ॥

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टोडी महला 5 ॥
स्वामी सरनि परिओ दरबारे ॥
कोटि अपराध खंडन के दाते तुझ बिनु कउनु उधारे ॥1॥ रहाउ ॥
खोजत खोजत बहु परकारे सरब अरथ बीचारे ॥
साधसंगि परम गति पाईऐ माइआ रचि बंधि हारे ॥1॥

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे मालिक प्रभू ! मैं आपकी शरण आ पड़ा हूँ।मैं आपके दर पर (आ गिरा हूँ)। हे करोड़ों भूलें नाश करने के समर्थ दातार ! आपके बिना और कौन मुझे भूलों से बचा सकता है। 1।रहाउ। हे भाई ! कई ढंगों से खोज कर करके मैंने सारी बातें विचारी हैं (और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ। कि) गुरू की संगति में टिकने से सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर ली जाती है।और माया के (मोह के) बँधनों में फंस के (मानस जन्म की बाजी) हार जाते हैं। 1।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७१४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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