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710
जैतसरी
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· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
भाहि बलंदड़ी बुझि गई रखंदड़ो प्रभु आपि ॥
भाहि बलंदड़ी बुझि गई रखंदड़ो प्रभु आपि ॥
जिनि उपाई मेदनी नानक सो प्रभु जापि ॥2॥
जिनि उपाई मेदनी नानक सो प्रभु जापि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: (सिमरन करने से) वह प्रभू खुद जीव का रखवाला बनता है और उसके अंदर जलती हुई (तृष्णा की) आग बुझ जाती है। हे नानक! जिस प्रभू ने सारी दुनिया रची है उसका सिमरन करें। 2।
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
जा प्रभ भए दइआल न बिआपै माइआ ॥
पउड़ी ॥
जा प्रभ भए दइआल न बिआपै माइआ ॥
कोटि अघा गए नास हरि इकु धिआइआ ॥
निरमल भए सरीर जन धूरी नाइआ ॥
मन तन भए संतोख पूरन प्रभु पाइआ ॥
तरे कुटंब संगि लोग कुल सबाइआ ॥18॥
जा प्रभ भए दइआल न बिआपै माइआ ॥
कोटि अघा गए नास हरि इकु धिआइआ ॥
निरमल भए सरीर जन धूरी नाइआ ॥
मन तन भए संतोख पूरन प्रभु पाइआ ॥
तरे कुटंब संगि लोग कुल सबाइआ ॥18॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जब (जीव पर) प्रभू जी मेहरवान हों तो माया जोर नहीं डाल सकती। एक प्रभू को सिमरने से करोड़ों ही पाप नाश हो जाते हैं। सिमरन करने वाले बँदों की चरण-धूड़ में नहाने से शरीर पवित्र हो जाते हैं। (संतों की संगति में) पूर्ण प्रभू मिल जाता है और मन व तन दोनों को संतोष प्राप्त होता है। ऐसे मनुष्यों की संगति में उनके परिवार के लोग और सारी ही कुलों का उद्धार हो जाता है। 18।
· जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी
गुर गोबिंद गोपाल गुर गुर पूरन नाराइणह ॥
सलोक ॥
गुर गोबिंद गोपाल गुर गुर पूरन नाराइणह ॥
गुर दइआल समरथ गुर गुर नानक पतित उधारणह ॥1॥
भउजलु बिखमु असगाहु गुरि बोहिथै तारिअमु ॥
नानक पूर करंम सतिगुर चरणी लगिआ ॥2॥
गुर गोबिंद गोपाल गुर गुर पूरन नाराइणह ॥
गुर दइआल समरथ गुर गुर नानक पतित उधारणह ॥1॥
भउजलु बिखमु असगाहु गुरि बोहिथै तारिअमु ॥
नानक पूर करंम सतिगुर चरणी लगिआ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक! गुरू गोबिंद रूप है। गोपाल रूप है। सर्व व्यापक नारायण का रूप है। गुरू दया का घर है। समर्था वाला है और विकारियों का भी तारनहार है। संसार-समुंद्र बड़ा भयानक और अथाह है। पर गुरू जहाज ने मुझे इसमें से बचा लिया है। हे नानक! जो मनुष्य सतिगुरू के चरणों में लगते हैं। उनके भाग्य अच्छे होते हैं। 2।
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
धंनु धंनु गुरदेव जिसु संगि हरि जपे ॥
पउड़ी ॥
धंनु धंनु गुरदेव जिसु संगि हरि जपे ॥
गुर क्रिपाल जब भए त अवगुण सभि छपे ॥
पारब्रहम गुरदेव नीचहु उच थपे ॥
काटि सिलक दुख माइआ करि लीने अप दसे ॥
गुण गाए बेअंत रसना हरि जसे ॥19॥
धंनु धंनु गुरदेव जिसु संगि हरि जपे ॥
गुर क्रिपाल जब भए त अवगुण सभि छपे ॥
पारब्रहम गुरदेव नीचहु उच थपे ॥
काटि सिलक दुख माइआ करि लीने अप दसे ॥
गुण गाए बेअंत रसना हरि जसे ॥19॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ सदके हूँ उस गूरू से जिसकी संगति में रहने से प्रभू का भजन किया जा सकता है। जब सतिगुरू मेहरवान होता है तो सारे अवगुण दूर हो जाते हैं। प्रभू का रूप गुरू नीच से उच्च श्रेणी का बना देता है। माया और दुखों की फाही काट के अपने सेवक बना लेता है। (गुरू की संगति में रहने से) जीभ से बेअंत प्रभू के गुण गाए जा सकते हैं। प्रभू की सिफत सालाह की जा सकती है। 19।
· जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी
द्रिसटंत एको सुनीअंत एको वरतंत एको नरहरह ॥
सलोक ॥
द्रिसटंत एको सुनीअंत एको वरतंत एको नरहरह ॥
नाम दानु जाचंति नानक दइआल पुरख क्रिपा करह ॥1॥
हिकु सेवी हिकु संमला हरि इकसु पहि अरदासि ॥
नाम वखरु धनु संचिआ नानक सची रासि ॥2॥
द्रिसटंत एको सुनीअंत एको वरतंत एको नरहरह ॥
नाम दानु जाचंति नानक दइआल पुरख क्रिपा करह ॥1॥
हिकु सेवी हिकु संमला हरि इकसु पहि अरदासि ॥
नाम वखरु धनु संचिआ नानक सची रासि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ उन्हें हर जगह वह ख़लकत का मालिक ही दिखता है। सुनाई देता है। व्यापक प्रतीत होता है। हे नानक! जिन पर दयालु प्रभू मेहर करता है वह उसके पास से बँदगी की ख़ैर माँगते हैं। 1। मेरी एक प्रभू के पास ही आरजू है कि मैं प्रभू को ही सिमरूँ और प्रभू को ही हृदय में संभाल कर रखूँ। हे नानक! जिन लोगों ने नाम-रूप सौदा नाम-रूप् धन जोड़ा है। उनकी ये पूँजी सदा ही कायम रहती है। 2।
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
प्रभ दइआल बेअंत पूरन इकु एहु ॥
पउड़ी ॥
प्रभ दइआल बेअंत पूरन इकु एहु ॥
सभु किछु आपे आपि दूजा कहा केहु ॥
आपि करहु प्रभ दानु आपे आपि लेहु ॥
आवण जाणा हुकमु सभु निहचलु तुधु थेहु ॥
नानकु मंगै दानु करि किरपा नामु देहु ॥20॥1॥
प्रभ दइआल बेअंत पूरन इकु एहु ॥
सभु किछु आपे आपि दूजा कहा केहु ॥
आपि करहु प्रभ दानु आपे आपि लेहु ॥
आवण जाणा हुकमु सभु निहचलु तुधु थेहु ॥
नानकु मंगै दानु करि किरपा नामु देहु ॥20॥1॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सिर्फ ये दयालु और बेअंत प्रभू ही हर जगह मौजूद है। वह खुद ही खुद सब कुछ है। और दूसरा कौन सा कहूँ। (जो उस जैसा हो)। हे प्रभू! आप खुद ही दान करने वाले हैं और खुद ही वह दान लेने वाले हैं। (जीवों का) पैदा होना और मरना, ये आपका हुकम है (भाव आपकी खेल है)। आपका अपना ठिकाना सदा अटल है। नानक (आपसे) खैर माँगता है। मेहर करें और नाम बख्शें। 20। 1।
· शबद · राग जैतसरी
नाथ कछूअ न जानउ ॥
जैतसरी बाणी भगता की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाथ कछूअ न जानउ ॥
मनु माइआ कै हाथि बिकानउ ॥1॥ रहाउ ॥
तुम कहीअत हौ जगत गुर सुआमी ॥
हम कहीअत कलिजुग के कामी ॥1॥
इन पंचन मेरो मनु जु बिगारिओ ॥
पलु पलु हरि जी ते अंतरु पारिओ ॥2॥
जत देखउ तत दुख की रासी ॥
अजौं न पत्याइ निगम भए साखी ॥3॥
गोतम नारि उमापति स्वामी ॥ सीसु धरनि सहस भग गांमी ॥4॥
इन दूतन खलु बधु करि मारिओ ॥
बडो निलाजु अजहू नही हारिओ ॥5॥
कहि रविदास कहा कैसे कीजै ॥
बिनु रघुनाथ सरनि का की लीजै ॥6॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाथ कछूअ न जानउ ॥
मनु माइआ कै हाथि बिकानउ ॥1॥ रहाउ ॥
तुम कहीअत हौ जगत गुर सुआमी ॥
हम कहीअत कलिजुग के कामी ॥1॥
इन पंचन मेरो मनु जु बिगारिओ ॥
पलु पलु हरि जी ते अंतरु पारिओ ॥2॥
जत देखउ तत दुख की रासी ॥
अजौं न पत्याइ निगम भए साखी ॥3॥
गोतम नारि उमापति स्वामी ॥ सीसु धरनि सहस भग गांमी ॥4॥
इन दूतन खलु बधु करि मारिओ ॥
बडो निलाजु अजहू नही हारिओ ॥5॥
कहि रविदास कहा कैसे कीजै ॥
बिनु रघुनाथ सरनि का की लीजै ॥6॥1॥
हिन्दी अर्थ: जैतसरी बाणी भगता की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू! मेरी इसके आगे (अब) कोई पेश नहीं चलती। मैं अपना मन माया के हाथ में बेच चुका हूँ। 1। रहाउ। हे नाथ! आप जगत के पति कहलाते हैं। हम कलियुगी विषई जीव हैं (मेरी सहायता करें)। 1। (कामादिक) इन पाँचों ने ही मेरा मन इतना बिगाड़ दिया है कि हर दम मेरी परमात्मा से दूरियाँ डलवा रहे हैं। 2। (इन्होंने जगत को बहुत दुखी किया हुआ है) मैं जिधर देखता हूँ। उधर दुखों की राशि-पूँजी बनी हुई है। ये देख के भी (कि विकारों का नतीजा है दुख) मेरा मन नहीं माना। वेदादिक धर्म-पुस्तकें भी (कथाओं के माध्यम से) यही गवाही दे रहे हैं। 3। गौतम की पत्नी अहिल्या। पार्वती का पति शिव। ब्रहमा। हजारों भगों वाला इन्द्र, (इन सभी को इन पाँचों ने ही ख्वार किया)। 4। इन दुष्टों ने (विकारों ने) (मेरे) मूर्ख (मन) को बुरी तरह से मार रखा है। पर ये मन बड़ा बेशर्म है। अभी भी विकारों की ओर से नहीं मुड़ा। 5। रविदास कहता है, और कहाँ जाऊँ। और क्या करूँ। (इन विकारों से बचने के लिए) परमात्मा के बिना और किसी का आसरा लिया नहीं जा सकता। 6। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी; भगत रविदास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 710 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।