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708
जैतसरी
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- काम क्रोधि अहंकारि फिरहि देवानिआ ॥
- राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥
- चलदिआ नालि न चलै सो किउ संजीऐ ॥
- नच राज सुख मिसटं नच भोग रस मिसटं नच मिसटं सुख माइआ ॥
- हरि बिनु कछू न लागई भगतन कउ मीठा ॥
- तिअकत जलं नह जीव मीनं नह तिआगि चात्रिक मेघ मंडलह ॥
- जिउ मछुली बिनु पाणीऐ किउ जीवणु पावै ॥
- चितवंति चरन कमलं सासि सासि अराधनह ॥
- आसावंती आस गुसाई पूरीऐ ॥
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
काम क्रोधि अहंकारि फिरहि देवानिआ ॥
काम क्रोधि अहंकारि फिरहि देवानिआ ॥
सिरि लगा जम डंडु ता पछुतानिआ ॥
बिनु पूरे गुरदेव फिरै सैतानिआ ॥9॥
सिरि लगा जम डंडु ता पछुतानिआ ॥
बिनु पूरे गुरदेव फिरै सैतानिआ ॥9॥
हिन्दी अर्थ: (इस वास्ते इनकी खातिर) काम में क्रोध में अहंकार में पागल हुए फिरते हैं। जब मौत का डण्डा सिर पे आ बजता है, तब पछताते हैं। (हे भाई! मनुष्य) पूरे गुरू की शरण के बिना शैतान के समान फिरता है। 9।
· जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी
राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥
सलोक ॥
राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥
संचंति बिखिआ छलं छिद्रं नानक बिनु हरि संगि न चालते ॥1॥
पेखंदड़ो की भुलु तुंमा दिसमु सोहणा ॥
अढु न लहंदड़ो मुलु नानक साथि न जुलई माइआ ॥2॥
राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥
संचंति बिखिआ छलं छिद्रं नानक बिनु हरि संगि न चालते ॥1॥
पेखंदड़ो की भुलु तुंमा दिसमु सोहणा ॥
अढु न लहंदड़ो मुलु नानक साथि न जुलई माइआ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक! ये राज, रूप, धन (ऊँची) कुल का माण, सब छल रूप है। जीव छल करके दूसरों पर दूषण लगा लगा के (कई ढंगों से) माया जोड़ते हैं। पर प्रभू के नाम के बिना कोई भी चीज यहाँ से साथ नहीं जाती। 1। (मुझसे) देखने में कहाँ भूल हो गई। तुंमा (धतूरे का फल) देखने में तो सुंदर दिखा। पर इसका तो आधी कौड़ी भी मूल्य नहीं मिलता। हे नानक! यही हाल माया का है। (जीव के लिए तो ये एक कौड़ी की भी नहीं क्योंकि यहाँ से चलने के वक्त) ये माया जीव के साथ नहीं जाती। 2।
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
चलदिआ नालि न चलै सो किउ संजीऐ ॥
पउड़ी ॥
चलदिआ नालि न चलै सो किउ संजीऐ ॥
तिस का कहु किआ जतनु जिस ते वंजीऐ ॥
हरि बिसरिऐ किउ त्रिपतावै ना मनु रंजीऐ ॥
प्रभू छोडि अन लागै नरकि समंजीऐ ॥
होहु क्रिपाल दइआल नानक भउ भंजीऐ ॥10॥
चलदिआ नालि न चलै सो किउ संजीऐ ॥
तिस का कहु किआ जतनु जिस ते वंजीऐ ॥
हरि बिसरिऐ किउ त्रिपतावै ना मनु रंजीऐ ॥
प्रभू छोडि अन लागै नरकि समंजीऐ ॥
होहु क्रिपाल दइआल नानक भउ भंजीऐ ॥10॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ उस माया को इकट्ठा करने का क्या लाभ। जो (जगत से चलने के वक्त) साथ नहीं जाती। जिसने आखिर विछुड़ ही जाना है। उसकी खातिर बताएँ क्या प्रयत्न करने हुए। प्रभू को बिसर के (निरी माया से) ना तो तृप्त हुआ जा सकता है ना ही मन प्रसन्न होता है। जो इन्सान प्रभु को छोड़करं सांसारिक प्रपंचों में लीन रहता है, आखिरकार वह नरक में ही बसेरा करता है। हे प्रभू! कृपा करें, दया करें। नानक का सहम दूर कर दें। 10।
· जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी
नच राज सुख मिसटं नच भोग रस मिसटं नच मिसटं सुख माइआ ॥
सलोक ॥
नच राज सुख मिसटं नच भोग रस मिसटं नच मिसटं सुख माइआ ॥
मिसटं साधसंगि हरि नानक दास मिसटं प्रभ दरसनं ॥1॥
लगड़ा सो नेहु मंन मझाहू रतिआ ॥
विधड़ो सच थोकि नानक मिठड़ा सो धणी ॥2॥
नच राज सुख मिसटं नच भोग रस मिसटं नच मिसटं सुख माइआ ॥
मिसटं साधसंगि हरि नानक दास मिसटं प्रभ दरसनं ॥1॥
लगड़ा सो नेहु मंन मझाहू रतिआ ॥
विधड़ो सच थोकि नानक मिठड़ा सो धणी ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ ना ही राज के सुख। ना ही भोगों के चस्के और ना ही माया की मौजें, ये कोई भी स्वादिष्ट नहीं हैं। हे नानक! सत्संग में (मिलने से) प्रभू का नाम मीठा है और सेवक को प्रभू के दीदार मीठे लगते हैं। 1। हे नानक! जिस मनुष्य को वह प्यारा लग जाए जिससे अंदर से मन (प्रभू के साथ) रंगा जाए। और जिसका मन सच्चे नाम-रूप पदार्थ (भाव, मोती) से परोया जाए उस मनुष्य को मालिक प्रभू प्यारा लगता है। 2।
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
हरि बिनु कछू न लागई भगतन कउ मीठा ॥
पउड़ी ॥
हरि बिनु कछू न लागई भगतन कउ मीठा ॥
आन सुआद सभि फीकिआ करि निरनउ डीठा ॥
अगिआनु भरमु दुखु कटिआ गुर भए बसीठा ॥
चरन कमल मनु बेधिआ जिउ रंगु मजीठा ॥
जीउ प्राण तनु मनु प्रभू बिनसे सभि झूठा ॥11॥
हरि बिनु कछू न लागई भगतन कउ मीठा ॥
आन सुआद सभि फीकिआ करि निरनउ डीठा ॥
अगिआनु भरमु दुखु कटिआ गुर भए बसीठा ॥
चरन कमल मनु बेधिआ जिउ रंगु मजीठा ॥
जीउ प्राण तनु मनु प्रभू बिनसे सभि झूठा ॥11॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ परमात्मा (के नाम) के बिना भक्तों को और कोई चीज मीठी नहीं लगती। उन्होंने खोज के देख लिया है कि (नाम के बिना) और सारे स्वाद फीके हैं। सतिगुरू (उनके लिए) वकील बना और (प्रभू को मिलने के कारण उनका) अज्ञान भटकना और दुख सब कुछ दूर हो गया है। जैसे मजीठे से (कपड़े पर पक्का) रंग चढ़ता है, वैसे ही उनका मन प्रभू के सुंदर चरणों में (पक्की तरह से) भेदित हो जाता है। प्रभू ही उनकी जिंद-प्राण है और तन-मन है। अन्य नाशवंत प्यार उनके अंदर से नाश हो गए हैं। 11।
· जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी
तिअकत जलं नह जीव मीनं नह तिआगि चात्रिक मेघ मंडलह ॥
सलोक ॥
तिअकत जलं नह जीव मीनं नह तिआगि चात्रिक मेघ मंडलह ॥
बाण बेधंच कुरंक नादं अलि बंधन कुसम बासनह ॥
चरन कमल रचंति संतह नानक आन न रुचते ॥1॥
मुखु डेखाऊ पलक छडि आन न डेऊ चितु ॥
जीवण संगमु तिसु धणी हरि नानक संतां मितु ॥2॥
तिअकत जलं नह जीव मीनं नह तिआगि चात्रिक मेघ मंडलह ॥
बाण बेधंच कुरंक नादं अलि बंधन कुसम बासनह ॥
चरन कमल रचंति संतह नानक आन न रुचते ॥1॥
मुखु डेखाऊ पलक छडि आन न डेऊ चितु ॥
जीवण संगमु तिसु धणी हरि नानक संतां मितु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ पानी को छोड़ के मछली जी नहीं सकती। बादलों के बिना पपीहे की भी जिंदगी नहीं। हिरन राग के तीर से भेदा जाता है और फूलों की सुगंधि भौरे के बँधन का कारण बन जाती है। इसी तरह। हे नानक! संत प्रभू के चरणों में मस्त रहते हैं। प्रभू-चरणों के बिना उन्हें और कुछ नहीं भाता। 1। अगर एक पलक मात्र ही मैं आपका मुख देख लूँ, तो आपको छोड़ के मैं किसी और की तरफ चित्त (की प्रीत) ना लगाऊँ। हे नानक! जीवन का जोड़ उस मालिक प्रभू के साथ ही हो सकता है। वह प्रभू संतों का मित्र है। 2।
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
जिउ मछुली बिनु पाणीऐ किउ जीवणु पावै ॥
पउड़ी ॥
जिउ मछुली बिनु पाणीऐ किउ जीवणु पावै ॥
बूंद विहूणा चात्रिको किउ करि त्रिपतावै ॥
नाद कुरंकहि बेधिआ सनमुख उठि धावै ॥
भवरु लोभी कुसम बासु का मिलि आपु बंधावै ॥
तिउ संत जना हरि प्रीति है देखि दरसु अघावै ॥12॥
जिउ मछुली बिनु पाणीऐ किउ जीवणु पावै ॥
बूंद विहूणा चात्रिको किउ करि त्रिपतावै ॥
नाद कुरंकहि बेधिआ सनमुख उठि धावै ॥
भवरु लोभी कुसम बासु का मिलि आपु बंधावै ॥
तिउ संत जना हरि प्रीति है देखि दरसु अघावै ॥12॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जैसे मछली पानी के बिना जी नहीं सकती। जैसे बासात की बॅूँद के बिना पपीहा तृप्त नहीं होता। जैसे (घण्डेहेड़े की) आवाज हिरन को मोहित कर लेती है। वह उधर को ही उठ दौड़ता है। जैसे भौरा फूल की सुगंधि का आशिक होता है। (फूल से) मिल के अपने आप को फसा लेता है। वैसे ही, संतों को प्रभू से प्रेम होता है। प्रभू दीदार करके वे तृप्त हो जाते हैं। 12।
· जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी
चितवंति चरन कमलं सासि सासि अराधनह ॥
सलोक ॥
चितवंति चरन कमलं सासि सासि अराधनह ॥
नह बिसरंति नाम अचुत नानक आस पूरन परमेसुरह ॥1॥
सीतड़ा मंन मंझाहि पलक न थीवै बाहरा ॥
नानक आसड़ी निबाहि सदा पेखंदो सचु धणी ॥2॥
चितवंति चरन कमलं सासि सासि अराधनह ॥
नह बिसरंति नाम अचुत नानक आस पूरन परमेसुरह ॥1॥
सीतड़ा मंन मंझाहि पलक न थीवै बाहरा ॥
नानक आसड़ी निबाहि सदा पेखंदो सचु धणी ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ जो मनुष्य प्रभू के चरण-कमलों का ध्यान धरते हैं और श्वास-श्वास उसका सिमरन करते हैं। जो अविनाशी प्रभू का नाम कभी नहीं भुलाते। हे नानक! परमेश्वर उनकी आशाएं पूरी करता है। 1। जिन मनुष्यों के मन में प्रभू (सदा) परोया रहता है। जिनसे एक छिन के लिए भी जुदा नहीं होता। हे नानक! उनकी वह सच्चा मालिक आशाएं पूरी करता है और सदा उनकी संभाल करता है। 2।
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
आसावंती आस गुसाई पूरीऐ ॥
पउड़ी ॥
आसावंती आस गुसाई पूरीऐ ॥
मिलि गोपाल गोबिंद न कबहू झूरीऐ ॥
देहु दरसु मनि चाउ लहि जाहि विसूरीऐ ॥
आसावंती आस गुसाई पूरीऐ ॥
मिलि गोपाल गोबिंद न कबहू झूरीऐ ॥
देहु दरसु मनि चाउ लहि जाहि विसूरीऐ ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे धरती के पति! हे धरती के रखवाले! हे गोबिंद! मुझ आसवंत की आशा पूरी करें। मुझे मिलें। ताकि मैं कभी तौखले चिंता ना करूँ। मेरे मन में कसक है। मुझे दीदार दें और मेरे झोरे मिट जाएं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 708 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।