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707
जैतसरी
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- मनि वसंदड़ो सचु सहु नानक हभे डुखड़े उलाहि ॥2॥
- कोटि अघा सभि नास होहि सिमरत हरि नाउ ॥
- ग्रिह रचना अपारं मनि बिलास सुआदं रसह ॥
- सुंदर सेज अनेक सुख रस भोगण पूरे ॥
- चरन कमल बिरहं खोजंत बैरागी दह दिसह ॥
- बसता तूटी झुंपड़ी चीर सभि छिंना ॥
- अनिक लीला राज रस रूपं छत्र चमर तखत आसनं ॥
- सुपने सेती चितु मूरखि लाइआ ॥
- बसंति स्वरग लोकह जितते प्रिथवी नव खंडणह ॥
- महा भइआन उदिआन नगर करि मानिआ ॥
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
मनि वसंदड़ो सचु सहु नानक हभे डुखड़े उलाहि ॥2॥
मनि वसंदड़ो सचु सहु नानक हभे डुखड़े उलाहि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: इसी तरह) हे नानक! अगर मन में सच्चा साई बस जाए तो सारे कोझे दुख उतर जाते हैं। 2।
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
कोटि अघा सभि नास होहि सिमरत हरि नाउ ॥
पउड़ी ॥
कोटि अघा सभि नास होहि सिमरत हरि नाउ ॥
मन चिंदे फल पाईअहि हरि के गुण गाउ ॥
जनम मरण भै कटीअहि निहचल सचु थाउ ॥
पूरबि होवै लिखिआ हरि चरण समाउ ॥
करि किरपा प्रभ राखि लेहु नानक बलि जाउ ॥5॥
कोटि अघा सभि नास होहि सिमरत हरि नाउ ॥
मन चिंदे फल पाईअहि हरि के गुण गाउ ॥
जनम मरण भै कटीअहि निहचल सचु थाउ ॥
पूरबि होवै लिखिआ हरि चरण समाउ ॥
करि किरपा प्रभ राखि लेहु नानक बलि जाउ ॥5॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू का नाम सिमरने से करोड़ों पाप सारे के सारे नाश हो जाते हैं। प्रभू की सिफत सालाह करने से मन-इच्छित फल पा लेते हैं। पैदा होने से मरने तक के सारे सहम काटे जाते हैं और अटल सच्ची पदवी मिल जाती है। (पर) प्रभू के चरणों में समाई तब ही होती है अगर धुर से माथे पर भाग्य लिखे हों। (इस वास्ते) हे नानक! (प्रभू के आगे अरदास करें कि) हे प्रभू! मेहर करें। मुझे (पापों से) बचा लें। मैं आपसे कुर्बान हूँ। 5।
· जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी
ग्रिह रचना अपारं मनि बिलास सुआदं रसह ॥
सलोक ॥
ग्रिह रचना अपारं मनि बिलास सुआदं रसह ॥
कदांच नह सिमरंति नानक ते जंत बिसटा क्रिमह ॥1॥
मुचु अडंबरु हभु किहु मंझि मुहबति नेह ॥
सो सांई जैं विसरै नानक सो तनु खेह ॥2॥
ग्रिह रचना अपारं मनि बिलास सुआदं रसह ॥
कदांच नह सिमरंति नानक ते जंत बिसटा क्रिमह ॥1॥
मुचु अडंबरु हभु किहु मंझि मुहबति नेह ॥
सो सांई जैं विसरै नानक सो तनु खेह ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ घर की बेअंत सजावटें। मन के चाव उद्वेग। स्वादिष्ट पदार्थों के चस्के, (इनमें लग के) हे नानक! जो मनुष्य कभी परमात्मा को याद नहीं करते। वह (जैसे) विष्टा के कीड़े हैं। 1। बड़ी सज-धज हो। हरेक चीज (मिली हुई) हो। हृदय में (इन दुनियावी पदार्थों की) मुहब्बत और कसक हो, इनके कारण। हे नानक! जिसको साई (की याद) भूल गई है वह शरीर (जैसे) राख (ही) है। 2।
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
सुंदर सेज अनेक सुख रस भोगण पूरे ॥
पउड़ी ॥
सुंदर सेज अनेक सुख रस भोगण पूरे ॥
ग्रिह सोइन चंदन सुगंध लाइ मोती हीरे ॥
मन इछे सुख माणदा किछु नाहि विसूरे ॥
सो प्रभु चिति न आवई विसटा के कीरे ॥
बिनु हरि नाम न सांति होइ कितु बिधि मनु धीरे ॥6॥
सुंदर सेज अनेक सुख रस भोगण पूरे ॥
ग्रिह सोइन चंदन सुगंध लाइ मोती हीरे ॥
मन इछे सुख माणदा किछु नाहि विसूरे ॥
सो प्रभु चिति न आवई विसटा के कीरे ॥
बिनु हरि नाम न सांति होइ कितु बिधि मनु धीरे ॥6॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ अगर सुंदर सेज मिली हो। अनेकों सुख हों। सब किस्म के स्वादिष्ट भोग हों भोगने के लिए। अगर हीरे-मोती से जड़े हुए सोने के घर हों जिनमें चन्दन की सुगन्धि हो। अगर मनुष्य मन-मानी मौजें माणता हैं। और कोई चिंता-झोरा ना हो। (पर ये सब कुछ होते हुए) अगर (ये दातें देने वाला) वह प्रभू मन में याद नहीं है तो (इन भोगों को भोगने वाले को) गंदगी का कीड़ा समझें। क्योकि प्रभू के नाम के बिना शांति नहीं मिलती। किसी और तरह भी मन को धैर्य नहीं मिलता। 6।
· जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी
चरन कमल बिरहं खोजंत बैरागी दह दिसह ॥
सलोक ॥
चरन कमल बिरहं खोजंत बैरागी दह दिसह ॥
तिआगंत कपट रूप माइआ नानक आनंद रूप साध संगमह ॥1॥
मनि सांई मुखि उचरा वता हभे लोअ ॥
नानक हभि अडंबर कूड़िआ सुणि जीवा सची सोइ ॥2॥
चरन कमल बिरहं खोजंत बैरागी दह दिसह ॥
तिआगंत कपट रूप माइआ नानक आनंद रूप साध संगमह ॥1॥
मनि सांई मुखि उचरा वता हभे लोअ ॥
नानक हभि अडंबर कूड़िआ सुणि जीवा सची सोइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक! प्रभू का प्रेमी प्रभू के सुंदर चरनों से जुड़ने की कसक में दसों दिशाओं में भटकता है। (जब) छल-रूपी माया (को) छोड़ता है तब (ढूँढ-ढूँढ के उसे) आनंद-रूप साध-संगति प्राप्त होती है (जहाँ उसे प्रभू की सिफत सालाह सुनने का अवसर प्राप्त होता है)। 1। हे नानक! (जगत वाले) सारे दिखावे मुझे नाशवान दिख रहे हैं। मेरे मन में साई (की याद) है। मैं मुँह से उसका नाम उचारता हूँ और सारे जगत में चक्कर लगाता हॅूँ (कि कहीं उसकी सिफत सालाह सुन सकूँ) उसकी सदा-स्थिर रहने वाली शोभा सुन के मैं जी पड़ता हूँ। 2।
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
बसता तूटी झुंपड़ी चीर सभि छिंना ॥
पउड़ी ॥
बसता तूटी झुंपड़ी चीर सभि छिंना ॥
जाति न पति न आदरो उदिआन भ्रमिंना ॥
मित्र न इठ धन रूपहीण किछु साकु न सिंना ॥
राजा सगली स्रिसटि का हरि नामि मनु भिंना ॥
तिस की धूड़ि मनु उधरै प्रभु होइ सुप्रसंना ॥7॥
बसता तूटी झुंपड़ी चीर सभि छिंना ॥
जाति न पति न आदरो उदिआन भ्रमिंना ॥
मित्र न इठ धन रूपहीण किछु साकु न सिंना ॥
राजा सगली स्रिसटि का हरि नामि मनु भिंना ॥
तिस की धूड़ि मनु उधरै प्रभु होइ सुप्रसंना ॥7॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अगर कोई मनुष्य टूटी हुई कुल्ली में रहता हैं। उसके सारे कपड़े फटे हुए हों। ना उसकी ऊँची जाति हो। ना कोई इज्जत आदर करता हैं। और वह उजाड़ में भटकता हो (भाव, कहीं मान-सम्मान ना होने के कारण उसकी बाबत तो हर तरफ उजाड़ ही हुआ)। कोई उसका मित्र-प्यारा ना हो। ना धन ही हो। ना रूप ही हो। और कोई साक-संबंधी भी ना हों। (ऐसा निथावां होते हुए भी) अगर उसका मन प्रभू के नाम में भीगा हुआ है तो उसे सारी धरती का राजा समझें। उस मनुष्य के चरणों की धूड़ी ले के मन विकारों से बचता है और परमात्मा प्रसन्न होता है। 7।
· जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी
अनिक लीला राज रस रूपं छत्र चमर तखत आसनं ॥
सलोक ॥
अनिक लीला राज रस रूपं छत्र चमर तखत आसनं ॥
रचंति मूड़ अगिआन अंधह नानक सुपन मनोरथ माइआ ॥1॥
सुपनै हभि रंग माणिआ मिठा लगड़ा मोहु ॥
नानक नाम विहूणीआ सुंदरि माइआ ध्रोहु ॥2॥
अनिक लीला राज रस रूपं छत्र चमर तखत आसनं ॥
रचंति मूड़ अगिआन अंधह नानक सुपन मनोरथ माइआ ॥1॥
सुपनै हभि रंग माणिआ मिठा लगड़ा मोहु ॥
नानक नाम विहूणीआ सुंदरि माइआ ध्रोहु ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ अनेकों चोज तमाशे। राज की मौजें। सुंदरता। (सिर पर) छत्र-चउर। और बैठने के लिए शाही तख़्त, इन पदार्थों में। हे नानक! अंधे मूर्ख अज्ञानी बंदे ही मस्त होते हैं। माया के ये करिश्में तो स्वप्न की चीजों (के समान) हैं। 1। (ये ऐसे हैं जैसे) सपने में सारी मौजें लीं। उनके मोह की कसक डाल ली (पर जाग खुली तो पल्ले कुछ भी ना रहा)। 2। हे नानक! अगर प्रभू के नाम से वंचित रहे तो सुंदर माया धोखा ही है
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
सुपने सेती चितु मूरखि लाइआ ॥
पउड़ी ॥
सुपने सेती चितु मूरखि लाइआ ॥
बिसरे राज रस भोग जागत भखलाइआ ॥
आरजा गई विहाइ धंधै धाइआ ॥
पूरन भए न काम मोहिआ माइआ ॥
किआ वेचारा जंतु जा आपि भुलाइआ ॥8॥
सुपने सेती चितु मूरखि लाइआ ॥
बिसरे राज रस भोग जागत भखलाइआ ॥
आरजा गई विहाइ धंधै धाइआ ॥
पूरन भए न काम मोहिआ माइआ ॥
किआ वेचारा जंतु जा आपि भुलाइआ ॥8॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मूर्ख मनुष्य ने सपने से प्यार डाला हुआ है। इस राज व रसों के भोगों में प्रभू को विसार के जागते हुए ही बड़ बड़ाता है। दुनिया के धंधों में भटकते की सारी उम्र बीत जाती है। पर माया में मोहे हुए के काम खत्म होने में नहीं आते। विचारे जीव के भी क्या वश। उस प्रभू ने खुद ही इसको भुलेखे में डाला हुआ है। 8।
· जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी
बसंति स्वरग लोकह जितते प्रिथवी नव खंडणह ॥
सलोक ॥
बसंति स्वरग लोकह जितते प्रिथवी नव खंडणह ॥
बिसरंत हरि गोपालह नानक ते प्राणी उदिआन भरमणह ॥1॥
कउतक कोड तमासिआ चिति न आवसु नाउ ॥
नानक कोड़ी नरक बराबरे उजड़ु सोई थाउ ॥2॥
बसंति स्वरग लोकह जितते प्रिथवी नव खंडणह ॥
बिसरंत हरि गोपालह नानक ते प्राणी उदिआन भरमणह ॥1॥
कउतक कोड तमासिआ चिति न आवसु नाउ ॥
नानक कोड़ी नरक बराबरे उजड़ु सोई थाउ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ अगर स्वर्ग जैसे देश में बसते हों। अगर सारी धरती को जीत लें। पर, हे नानक! अगर जगत के रखवाले प्रभू को बिसार दे, तो वे मनुष्य (मानो) जंगल में भटक रहे हैं। 1। जगत के करोड़ों चोज-तमाशों के कारण अगर प्रभू का नाम चित्त में (याद) ना रहे, तो हे नानक! वह जगह तो उजाड़ ही समझें। वह जगह भयानक नर्क के बराबर है। 2।
· जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी
महा भइआन उदिआन नगर करि मानिआ ॥
पउड़ी ॥
महा भइआन उदिआन नगर करि मानिआ ॥
झूठ समग्री पेखि सचु करि जानिआ ॥
महा भइआन उदिआन नगर करि मानिआ ॥
झूठ समग्री पेखि सचु करि जानिआ ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ बड़े डरावने जंगल को जीवों ने शहर समझ लिया है। इन नाशवान पदार्थों को देख के सदा टिके रहने वाले समझ लिया है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 707 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।