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अंग 706 · जैतसरी

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अंग
706
जैतसरी
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  1. पेखन सुनन सुनावनो मन महि द्रिड़ीऐ साचु ॥
  2. हरि एकु निरंजनु गाईऐ सभ अंतरि सोई ॥
  3. रचंति जीअ रचना मात गरभ असथापनं ॥
  4. रकतु बिंदु करि निंमिआ अगनि उदर मझारि ॥
  5. मन इछा दान करणं सरबत्र आसा पूरनह ॥
  6. जीउ प्रान तनु धनु दीआ दीने रस भोग ॥
  7. कुटंब जतन करणं माइआ अनेक उदमह ॥
  8. जिसु बिसरत तनु भसम होइ कहते सभि प्रेतु ॥
  9. कोटि दान इसनानं अनिक सोधन पवित्रतह ॥

गुरु अर्जन देव जी · जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी

पेखन सुनन सुनावनो मन महि द्रिड़ीऐ साचु ॥

अंग 705 से चला आ रहा अंश

पेखन सुनन सुनावनो मन महि द्रिड़ीऐ साचु ॥
पूरि रहिओ सरबत्र मै नानक हरि रंगि राचु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: उस सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को मन में अच्छी तरह धारण करना चाहिए जो (हर जगह) खुद ही देखने वाला है। खुद ही सुनने वाला है और खुद ही सुनाने वाला है। हे नानक! उस हरी की प्यारी याद में लीन हो जा जो सब जगह मौजूद है। 2।

गुरु अर्जन देव जी · जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी

हरि एकु निरंजनु गाईऐ सभ अंतरि सोई ॥

पउड़ी ॥
हरि एकु निरंजनु गाईऐ सभ अंतरि सोई ॥
करण कारण समरथ प्रभु जो करे सु होई ॥
खिन महि थापि उथापदा तिसु बिनु नही कोई ॥
खंड ब्रहमंड पाताल दीप रविआ सभ लोई ॥
जिसु आपि बुझाए सो बुझसी निरमल जनु सोई ॥1॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो प्रभू माया से निर्लिप है सिर्फ उसकी ही सिफत सालाह करनी चाहिए। वही सबके अंदर मौजूद है। वह प्रभू सारे जगत का मूल है। सब किस्म की ताकत वाला है। (जगत में) वही कुछ होता है जो वह प्रभू करता है। एक पलक में (जीवों को) पैदा करके नाश कर देता है। उसके बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। सब देशों में। सारे ब्रहमण्ड में। जमीन के नीचे। द्वीपों में। सारे जगत में वह प्रभू व्यापक है। जिस मनुष्य को (ये) समझ खुद प्रभू देता है। उसे समझ आ जाता है और वह मनुष्य पवित्र हो जाता है। 1।

गुरु अर्जन देव जी · जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी

रचंति जीअ रचना मात गरभ असथापनं ॥

सलोक ॥
रचंति जीअ रचना मात गरभ असथापनं ॥
सासि सासि सिमरंति नानक महा अगनि न बिनासनं ॥1॥
मुखु तलै पैर उपरे वसंदो कुहथड़ै थाइ ॥
नानक सो धणी किउ विसारिओ उधरहि जिस दै नाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ जो परमात्मा जीवों की बनतर बनाता है उनको माँ के पेट में जगह देता है। हे नानक! जीव उसको हरेक सांस के साथ-साथ याद करते हैं और (माँ के पेट की) बड़ी (भयानक) आग उनका नाश नहीं कर सकती। 1। जब आपका मुँह नीचे को था। पैर ऊपर की तरफ थे। बड़ी मुश्किल जगह में आप बसते थे तब जिस प्रभू के नाम की बरकति से आप बचे रहे। हे नानक! (कहें, हे भाई!)अब उस मालिक को आपने क्यों भुला दिया। 2।

गुरु अर्जन देव जी · जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी

रकतु बिंदु करि निंमिआ अगनि उदर मझारि ॥

पउड़ी ॥
रकतु बिंदु करि निंमिआ अगनि उदर मझारि ॥
उरध मुखु कुचील बिकलु नरकि घोरि गुबारि ॥
हरि सिमरत तू ना जलहि मनि तनि उर धारि ॥
बिखम थानहु जिनि रखिआ तिसु तिलु न विसारि ॥
प्रभ बिसरत सुखु कदे नाहि जासहि जनमु हारि ॥2॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे जीव!) (माँ के) रक्त और (पिता के) वीर्य से (माँ के) पेट की आग में आप उगे। आपका मुँह नीचे को था। गंदा और डरावना था। (जैसे) एक अंधेरे घोर नर्क में पड़े हुए थे। जिस प्रभू को सिमर के आप जलते नहीं थे, उसको (अब भी) मन से तन से हृदय में याद करें। जिस प्रभू ने आपको मुश्किल जगह से बचाया। उसको रत्ती भर भी ना भुलाएँ। प्रभू को भुलाने से कभी सुख नहीं मिलता। (अगर भुलाएँगे तो) मानस जन्म (की बाजी) हार के जाएँगे। 2।

गुरु अर्जन देव जी · जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी

मन इछा दान करणं सरबत्र आसा पूरनह ॥

सलोक ॥
मन इछा दान करणं सरबत्र आसा पूरनह ॥
खंडणं कलि कलेसह प्रभ सिमरि नानक नह दूरणह ॥1॥
हभि रंग माणहि जिसु संगि तै सिउ लाईऐ नेहु ॥
सो सहु बिंद न विसरउ नानक जिनि सुंदरु रचिआ देहु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे नानक! जो प्रभू हमें मन-मांगी दातें देता है जो सब जगह (सब जीवों की) आशाएं पूरी करता है। जो हमारे झगड़े और कलेश नाश करने वाला है उसको याद करें। वह आपसे दूर नहीं। 1। हे नानक! जिस प्रभू की बरकति से आप सारी मौजें मनाते हैं। उससे प्रीत जोड़ें। जिस प्रभू ने आपका सोहणा शरीर बनाया है। रॅब करके वह आपको कभी भी ना भूले। 2।

गुरु अर्जन देव जी · जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी

जीउ प्रान तनु धनु दीआ दीने रस भोग ॥

पउड़ी ॥
जीउ प्रान तनु धनु दीआ दीने रस भोग ॥
ग्रिह मंदर रथ असु दीए रचि भले संजोग ॥
सुत बनिता साजन सेवक दीए प्रभ देवन जोग ॥
हरि सिमरत तनु मनु हरिआ लहि जाहि विजोग ॥
साधसंगि हरि गुण रमहु बिनसे सभि रोग ॥3॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (प्रभू ने आपको) जिंद, प्राण, शरीर और धन दिया। और स्वादिष्ट पदार्थ भोगने को दिए। आपके अच्छे भाग्य बना के, आपको उसने घर। सुंदर मकान, रथ, घोड़े दिए। सब कुछ देने वाले प्रभू ने आपको पुत्र। पत्नी, मित्र और नौकर दिए। उस प्रभू को सिमर के मन खिला रहता है। सारे दुख मिट जाते हैं। (हे भाई!) सत्संग में उस हरी के गुण चेते किया करें। सारे रोग (उसको सिमरने से) नाश हो जाते हैं। 3।

गुरु अर्जन देव जी · जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी

कुटंब जतन करणं माइआ अनेक उदमह ॥

सलोक ॥
कुटंब जतन करणं माइआ अनेक उदमह ॥
हरि भगति भाव हीणं नानक प्रभ बिसरत ते प्रेततह ॥1॥
तुटड़ीआ सा प्रीति जो लाई बिअंन सिउ ॥
नानक सची रीति सांई सेती रतिआ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ मनुष्य अपने परिवार के लिए कई कोशिशें करते हैं। माया की खातिर अनेकों उद्यम करते हैं। पर प्रभू की भक्ति की तमन्ना से वंचित रहते हैं। और हे नानक! जो जीव प्रभू को बिसारते हैं वे (मानो) जिंन भूत हैं। 1। जो प्रीति (प्रभू के बिना) किसी और के साथ लगाई जाती है। वह आखिर में टूट जाती है। पर, हे नानक! अगर सांई प्रभू में लीन रहें, तो ऐसी जीवन-जुगति सदा कायम रहती है। 2।

गुरु अर्जन देव जी · जैतसरी की वार, पउड़ी · राग जैतसरी

जिसु बिसरत तनु भसम होइ कहते सभि प्रेतु ॥

पउड़ी ॥
जिसु बिसरत तनु भसम होइ कहते सभि प्रेतु ॥
खिनु ग्रिह महि बसन न देवही जिन सिउ सोई हेतु ॥
करि अनरथ दरबु संचिआ सो कारजि केतु ॥
जैसा बीजै सो लुणै करम इहु खेतु ॥
अकिरतघणा हरि विसरिआ जोनी भरमेतु ॥4॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिस जिंद के विछुड़ने से (मनुष्य का) शरीर राख हो जाता है। सारे लोग (उस शरीर) को अपवित्र कहने लग जाते हैं; जिन संबन्धियों से इतना प्यार होता है। वे एक पलक के लिए भी घर में रहने नहीं देते। पाप कर करके धन एकत्र करता रहा। पर उस जिंद के किसी काम में ना आया। ये शरीर (किए) कर्मों की (जैसे) खेती है (इसमें) जैसा (कर्म रूपी बीज कोई) बीजता है है वही काटता है। जो मनुष्य (प्रभू के) किए (उपकारों) को भुलाते हैं वे उसको बिसार देते हैं (आखिर) जूनियों में भटकते हैं। 4।

गुरु अर्जन देव जी · जैतसरी की वार, सलोक और पउड़ी · राग जैतसरी

कोटि दान इसनानं अनिक सोधन पवित्रतह ॥

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सलोक ॥
कोटि दान इसनानं अनिक सोधन पवित्रतह ॥
उचरंति नानक हरि हरि रसना सरब पाप बिमुचते ॥1॥
ईधणु कीतोमू घणा भोरी दितीमु भाहि ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ सो उन्होंने। मानो करोड़ो (रुपए) दान कर लिए। करोड़ों बार तीर्थ स्नान कर लिए हैं और अनेकों स्वच्छता व पवित्रता के साधन कर लिए हैं। हे नानक! जो मनुष्य जीभ से प्रभू का नाम उचारते हैं। उनके सारे पाप नाश हो जाते हैं। 1। मैंने बहुत सारा ईधन एकत्र कर लिया और उसे थोड़ी सी आग लगा दी (वह सारा ईधन जल के राख हो गया।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 706 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।