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अंग ७०४ · जैतसरी

अंग
704
जैतसरी
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  1. यार वे तै राविआ लालनु मू दसि दसंदा ॥
  2. ऊचा अगम अपार प्रभु कथनु न जाइ अकथु ॥
  3. छंतु ॥
  4. निरति न पवै असंख गुण ऊचा प्रभ का नाउ ॥
  5. छंतु ॥
  6. रे मन ता कउ धिआईऐ सभ बिधि जा कै हाथि ॥
  7. छंतु ॥

यार वे तै राविआ लालनु मू दसि दसंदा ॥

अंग ७०३ से चला आ रहा अंश

यार वे तै राविआ लालनु मू दसि दसंदा ॥
लालनु तै पाइआ आपु गवाइआ जै धन भाग मथाणे ॥
बांह पकड़ि ठाकुरि हउ घिधी गुण अवगण न पछाणे ॥
गुण हारु तै पाइआ रंगु लालु बणाइआ तिसु हभो किछु सुहंदा ॥
जन नानक धंनि सुहागणि साई जिसु संगि भतारु वसंदा ॥3॥
यार वे नित सुख सुखेदी सा मै पाई ॥
वरु लोड़ीदा आइआ वजी वाधाई ॥
महा मंगलु रहसु थीआ पिरु दइआलु सद नव रंगीआ ॥
वड भागि पाइआ गुरि मिलाइआ साध कै सतसंगीआ ॥
आसा मनसा सगल पूरी प्रिअ अंकि अंकु मिलाई ॥
बिनवंति नानकु सुख सुखेदी सा मै गुर मिलि पाई ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: हे सत्संगी सज्जन ! आपने सोहाने प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया है।मैं पूछता हूँ।मुझे भी उसके बारे में बता। आपने सोहणे लाल को ढूँढ लिया है।और (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लिया है।जिस जीव-स्त्री के माथे के भाग्य जागते हैं (उसे मिलाप होता है)। (हे सखी !) मालिक प्रभू ने (मेरी भी) बाँह पकड़ के मुझे अपनी बना लिया है।मेरा कोई गुण-अवगुण उसने नहीं परखा। हे प्रभु ! जिसे आप गुणों की माला से अलंकृत कर देते हैं और अपने लाल रंग से रंग देते हैं, उसे सबकुछ सुन्दर लगता है। हे दास नानक ! (कह) वह जीव-स्त्री भाग्यशाली है।जिसके साथ (जिसके हृदय में) पति-प्रभू बसता है। 3। हे सत्संगी सज्जन ! जो सुख की मन्नतें सदा मैं मनाती रहती थी।वह (सुखना।मुराद) मेरी पूरी हो गई है। जिस प्रभू-पति को मैं (चिरों से) ढूँढती आ रही थी वह (मेरे हृदय में) आ बसा है।अब मेरे अंदर आत्मिक उत्साह के बाजे बज रहे हैं। सदा नए प्रेम-रंग वाला और दया का सोमा प्रभू-पति (मेरे अंदर आ बसा है।अब मेरे अंदर) बड़ा आनंद और उत्साह बन रहा है। हे सत्संगी सज्जन ! बड़ी किस्मत से वह प्रभू-पति मुझे मिला है।गुरू ने मुझे साध-संगति में (उससे) मिला दिया है। (गुरू ने) मेरा स्वै प्यारे के अंक में मिला दिया है।मेरी हरेक आस-मुराद पूरी हो गई है। नानक विनती करता है,जो सुखना (सुख की मन्नत) मैं सुखती रहती थी।गुरू को मिल के वह (मुराद) मैंने हासिल कर ली है। 4।

ऊचा अगम अपार प्रभु कथनु न जाइ अकथु ॥

जैतसरी महला 5 घरु 2 छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु ॥
ऊचा अगम अपार प्रभु कथनु न जाइ अकथु ॥
नानक प्रभ सरणागती राखन कउ समरथु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 घरु 2 छंत ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। सलोकु। हे सबसे ऊँचे ! हे अपहुँच ! हे बेअंत ! आप सबके मालिक हैं।आपका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।बयान से परे हैं। 1। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ।आप (शरण आए की) रक्षा करने की ताकत रखते हैं।

छंतु ॥

छंतु ॥
जिउ जानहु तिउ राखु हरि प्रभ तेरिआ ॥
केते गनउ असंख अवगण मेरिआ ॥
असंख अवगण खते फेरे नितप्रति सद भूलीऐ ॥
मोह मगन बिकराल माइआ तउ प्रसादी घूलीऐ ॥
लूक करत बिकार बिखड़े प्रभ नेर हू ते नेरिआ ॥
बिनवंति नानक दइआ धारहु काढि भवजल फेरिआ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: छंतु। हे हरी ! हे प्रभू ! मैं आपका हूँ।जैसे ठीक समझो वैसे (माया के मोह से) मेरी रक्षा कर। मैं (अपने) कितने अवगुण गिनूँ।मेरे अंदर अनगिनत अवगुण हैं। हे प्रभू ! मेरे अनगिनत ही अवगुण हैं।पापों के चक्करों में फंसा रहता हूँ।नित्य ही हमेशा ही गलतियां करता रहता हँ (मात खा जाता हूँ)। (वैसे तो मनुष्य) भयानक माया के मोह में मस्त रहता है।आपकी कृपा से ही बचा जा सकता है। हम जीव दुखदाई विकार (अपनी ओर से) पर्दे में रह कर करते हैं।पर।हे प्रभू ! आप हमारे नजदीक से नजदीक (हमारे साथ ही) बसते हैं। नानक विनती करता है हे प्रभू ! हम पर मेहर कर।हम जीवों को संसार-समुंद्र के (विकारों के) चक्करों में से निकाल ले। 1।

निरति न पवै असंख गुण ऊचा प्रभ का नाउ ॥

सलोकु ॥
निरति न पवै असंख गुण ऊचा प्रभ का नाउ ॥
नानक की बेनंतीआ मिलै निथावे थाउ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे भाई ! परमात्मा के अनगिनत गुणों का निर्णय नहीं हो सकता।उसका बड़प्पन सबसे ऊँचा है। नानक की (उसके दर पर ही) अरदास है कि (मुझ) निआसरे को (उसके चरणों में) जगह मिल जाए। 2।

छंतु ॥

छंतु ॥
दूसर नाही ठाउ का पहि जाईऐ ॥
आठ पहर कर जोड़ि सो प्रभु धिआईऐ ॥
धिआइ सो प्रभु सदा अपुना मनहि चिंदिआ पाईऐ ॥
तजि मान मोहु विकारु दूजा एक सिउ लिव लाईऐ ॥
अरपि मनु तनु प्रभू आगै आपु सगल मिटाईऐ ॥
बिनवंति नानकु धारि किरपा साचि नामि समाईऐ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: छंतु। हे भाई ! हम जीवों के लिए परमात्मा के बिना और कोई जगह नहीं।(परमात्मा का दर छोड़ के) हम और किस के पास जा सकते हैं। दोनों हाथ जोड़ के आठों पहर (हर वक्त) प्रभू का ध्यान धरना चाहिए। हे भाई ! अपने उस प्रभू का ध्यान धर के (उसके दर से) मन मांगी मुरादें हासिल कर ली जाती हैं। (अपने अंदर से) अहंकार।मोह।और कई अन्य आसरे तलाशने की बुराई त्याग के एक परमात्मा के चरणों से ही सुरति जोड़नी चाहिए। हे भाई ! प्रभू की हजूरी में अपना मन अपना शरीर भेटा करके (अपने अंदर से) सारा स्वै भाव मिटा देना चाहिए। नानक (तो प्रभू के दर पर ही) बिनती करता है (और कहता है, हे प्रभू !) मेहर कर (आपकी मेहर से ही आपके) सदा-स्थिर रहने वाले नाम में लीन हुआ जा सकता है। 2।

रे मन ता कउ धिआईऐ सभ बिधि जा कै हाथि ॥

सलोकु ॥
रे मन ता कउ धिआईऐ सभ बिधि जा कै हाथि ॥
राम नाम धनु संचीऐ नानक निबहै साथि ॥3॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे (मेरे) मन ! जिस परमात्मा के हाथ में (हमारी) हरेक (जीवन-) जुगति है।उसका नाम सिमरना चाहिए। हे नानक ! परमात्मा का नाम-धन एकत्र करना चाहिए।(यही धन) हमारे साथ साथ निभाता है। 3।

छंतु ॥

छंतु ॥
साथीअड़ा प्रभु एकु दूसर नाहि कोइ ॥
थान थनंतरि आपि जलि थलि पूर सोइ ॥
जलि थलि महीअलि पूरि रहिआ सरब दाता प्रभु धनी ॥
गोपाल गोबिंद अंतु नाही बेअंत गुण ता के किआ गनी ॥
भजु सरणि सुआमी सुखह गामी तिसु बिना अन नाहि कोइ ॥
बिनवंति नानक दइआ धारहु तिसु परापति नामु होइ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: छंतु। हे भाई ! सिर्फ परमात्मा ही (सदा साथ निभने वाला) साथी है।उसके बिना और कोई (साथी) नहीं। वही परमात्मा पानी में।धरती पर।आकाश में बस रहा है। हे भाई ! वह मालिक प्रभू पानी में।धरती पर।आकाश में व्याप रहा है।सब जीवों को दातें देने वाला है। उस गोपाल गोबिंद (के गुणों) का अंत नहीं पाया जा सकता।उसके गुण बेअंत हैं।मैं उसके क्या गुण गिन सकता हूँ। हे भाई ! उस मालिक की शरण पड़ा रह।वह ही सारे सुख पहुँचाने वाला है।उसके बिना (हम जीवों का) और कोई (सहारा) नहीं। नानक विनती करता है, हे प्रभू ! जिस के ऊपर आप मेहर करते हैं।उसको आपका नाम हासिल हो जाता है। 3।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ७०४ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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