तंत मंत्र सभ अउखध जानहि अंति तऊ मरना ॥2॥ राज भोग अरु छत्र सिंघासन बहु सुंदरि रमना ॥ पान कपूर सुबासक चंदन अंति तऊ मरना ॥3॥ बेद पुरान सिंम्रिति सभ खोजे कहू न ऊबरना ॥ कहु कबीर इउ रामहि जंपउ मेटि जनम मरना ॥4॥5॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य जादू-टूणे मंत्र और दवाएं जानते हैं।उनका भी जनम-मरण का चक्कर नहीं खत्म होता। कई ऐसे हैं जो राज (पाट) की मौजें लेते हैं। सिंहासन पर बैठते हैं।जिनके सिर पर छत्र झूलते हैं।(महलों में) सुंदर नारियां हैं। जो पान-कपूर-सुगंधि देने वाले चंदन का प्रयोग करते हैं, मौत का चक्र उनके सिर पर भी मौजूद है। 3। हे कबीर ! कह, वेद-पुराण-स्मृतियां सारे खोज के देखे हैं (प्रभू के नाम की ओट के बिना और कहीं भी जनम-मरन के चक्र से बचाव नहीं मिलता; सो मैं तो परमात्मा का नाम सिमरता हूँ। प्रभू का नाम ही जनम-मरण मिटाता है। 4। 5।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: आसा ॥ (मन का) हाथी (वाला स्वभाव) रबाबी (बन गया है)।बैल (वाला स्वभाव) जोड़ी बजाने वाला (हो गया है) और कौए (वाला स्वभाव) ताल बजा रहा है। गधा (गधे वाला स्वभाव) (प्रेम रूपी) चोला पहन के नाच रहा है और भैंसा (अर्थात।भैंसे वाला स्वभाव) भक्ति करता है। 1। हे मेरे सुंदर राम ! धतूरे की खखड़ियां अब आम बन गई हैं। (पर खाई किसी विरले विचारवान ने है। भाव।जैसे धतूरे की खखड़ियां देखने में आमों की तरह प्रतीत होती हैं; वैसे ही मन पहले सारे काम दिखावे वाले करता था।अब सृजनहार की मेहर से सचमुच पके हुए आम बन गए हैं।भाव मन में स्वाद।मिठास और अस्लियत आ गई है।) ये स्वाद विरले भाग्यशाली मनुष्यों को मिलता है। 1।रहाउ। (मन-) सिंह अपने स्वै-स्वरूप में टिक के (अर्थात।मन का निर्दयता वाला स्वभाव हट के अब यह) सेवा के लिए तत्पर रहता है और (मन-) छछूंदर पानों के बीड़े बाँट रहा है (भाव।मन तृष्णा छोड़ के औरों की सेवा करता है)। सारी इन्द्रियां अपने-अपने घरों में रह के हरी-यश रूपी मंगल गा रही हैं और (वही) मन (जो पहले) कछुआ (था।अर्थात।जो पहले सत्संग से दूर भागता था।अब) औरों को उपदेश कर रहा है। 2। (जो पहिले) माया में ग्रसित (था।वह) मन (स्वच्छ बिरती) बयाहने चल पड़ा है।(अब) अंदर आनंद ही आनंद बन गया है। उस मन ने (हरी के साथ जुड़ी वह बिरती-रूपी) सुंदरी से विवाह कर लिया है जो विकारों से कवारी है (और अब वह मन जो पहले विकारों में पड़ने के कारण) सहिआ (था।भाव।सहमा हुआ था।अब) निर्भय हरी के गुण गाता है। 3। कबीर कहता है, हे संत जनो ! सुनो (अब मन की) विनम्रता ने अहंकार को मार दिया है।(मन का) कोरापन (हट गया है। और मन) कहता है।मुझे हमदर्दी (की तपश) चाहिए।(अब मन इमानदारी हमदर्दी के गुण का चाहवान है)।(मन की) अज्ञानता पलट के ज्ञान बन गई है और (अब मन औरों को) गुरू का शबद सुना रहा है। 4। 6।
आसा ॥ बटूआ एकु बहतरि आधारी एको जिसहि दुआरा ॥ नवै खंड की प्रिथमी मागै सो जोगी जगि सारा ॥1॥ ऐसा जोगी नउ निधि पावै ॥ तल का ब्रहमु ले गगनि चरावै ॥1॥ रहाउ ॥ खिंथा गिआन धिआन करि सूई सबदु तागा मथि घालै ॥ पंच ततु की करि मिरगाणी गुर कै मारगि चालै ॥2॥ दइआ फाहुरी काइआ करि धूई द्रिसटि की अगनि जलावै ॥ तिस का भाउ लए रिद अंतरि चहु जुग ताड़ी लावै ॥3॥ सभ जोगतण राम नामु है जिस का पिंडु पराना ॥ कहु कबीर जे किरपा धारै देइ सचा नीसाना ॥4॥7॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: आसा ॥ वह जोगी एक प्रभू नाम को अपना बटूआ बनाता है।बहत्तर बड़ी नाड़ियों वाले शरीर को झोली बनाता है।जिस शरीर में प्रभू को मिलने के लिए (दिमाग़ रूप) एक ही दरवाजा है। वह जोगी इस शरीर के अंदर ही टिक के (प्रभू के दर से नाम की) भिक्षा मांगता है (हमारी नजरों में तो) वह जोगी जगत में सबसे श्रेष्ठ है। 1। वह है असल जोगी।जिसे (मानो) नौ खजाने मिल जाते हैं। जो मनुष्य माया-ग्रसित आत्मा को उठा के माया के प्रभाव से ऊँचा ले जाता है। 1।रहाउ। असल जोगी ज्ञान की गोदड़ी बनाता है।प्रभू चरणों में जुड़ी हुई सुरति की सूई तैयार करता है।गुरू का शबद रूपी धागा वॅट के (भाव।बारंबार शबद की कमाई करके) उस सूई में डालता है। शरीर के मोह को पैरों के तले दे के सतिगुरू के बताए हुए राह पर चलता है। 2। असल जोगी अपने शरीर की धूणी बना के उस में (प्रभू को हर जगह देखने वाली) नजर की आग जलाता है (और इस शरीर रूपी धूएं में भले गुण एकत्र करने के लिए) दया को पहौड़ी बनाता है। उस परमात्मा का प्यार अपने हृदय में बसाता है और इस तरह सदा के लिए अपनी सुरति प्रभू-चरणों में जोड़े रखता है। 3। हे कबीर ! कह,जिस प्रभू का दिया हुआ ये शरीर और जीवात्मा है।उसका नाम सिमरना सबसे अच्छा योग का काम है। यदि प्रभू खुद मेहर करे तो वह ये सदा-स्थिर रहने वाला नूर बख्शता है। 4। 7।
आसा ॥ हिंदू तुरक कहा ते आए किनि एह राह चलाई ॥ दिल महि सोचि बिचारि कवादे भिसत दोजक किनि पाई ॥1॥ काजी तै कवन कतेब बखानी ॥ पड़्हत गुनत ऐसे सभ मारे किनहूं खबरि न जानी ॥1॥ रहाउ ॥ सकति सनेहु करि सुंनति करीऐ मै न बदउगा भाई ॥ जउ रे खुदाइ मोहि तुरकु करैगा आपन ही कटि जाई ॥2॥ सुंनति कीए तुरकु जे होइगा अउरत का किआ करीऐ ॥ अरध सरीरी नारि न छोडै ता ते हिंदू ही रहीऐ ॥3॥ छाडि कतेब रामु भजु बउरे जुलम करत है भारी ॥ कबीरै पकरी टेक राम की तुरक रहे पचिहारी ॥4॥8॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: आसा ॥ कोझे झगड़ालू (अपने मत को सच्चा साबित करने के लिए बहस करने की जगह।अस्लियत ढूँढने के लिए) अपने दिल में सोच और विचार कर कि हिन्दू और मुसलमान (एक परमात्मा के बिना और) कहाँ से पैदा हुए हैं।(प्रभू के बिना और) किस ने ये रास्ते चलाए; (जब दोनों मतों के बंदे रॅब ने ही पैदा किए हैं।तो वह किस तरह भेद-भाव कर सकता है।सिर्फ मुसलमान अथवा हिन्दू होने से ही) किसने बहिश्त पाया और किस ने दोजक।(भाव।सिर्फ मुसलमान कहलवाने से ही बहिश्त नहीं मिल जाता।और हिंदू रहने से दोजक नहीं मिलता)। 1। हे काजी ! आप कौन सी किताबों में से बता रहा है (कि मुसलमान को बहिश्त और हिन्दू को दोजक मिलेगा) । (हे काज़ी !) आपके जैसे पढ़ने और विचारने वाले (भाव।जो मनुष्य आपकी तरह तअॅसब की पट्टी आँखों के आगे बाँध के मज़हबी किताबें पढ़ते हैं) सब ख्वार होते हैं।किसी को अस्लियत की समझ नहीं पड़ी। 1।रहाउ। (यह) सुंन्नत (तो) औरत के प्यार की खातिर की जाती है।हे भाई ! मैं नहीं मान सकता (कि इसका रॅब से मिलने से कोई संबंध है)। यदि रॅब ने मुझे मुसलमान बनाना हुआ।तो मेरी सुन्नत अपने आप ही हैं जाएगी। 2। परअगर सिर्फ सुन्नत करके ही मुसलमान बन सकते हैं।तो औरत की सुन्नत तो हो ही नहीं सकती। पत्नी मनुष्य के जीवन की हर वक्त की सांझीवाल है।ये तो किसी भी वक्त साथ नहीं छोड़ती।सो।(आधा इधर आधा उधर रहने से बेहतर) हिन्दू बने रहना ही ठीक है। 3। हे भाई ! मज़हबी किताबों की बहसें छोड़ के परमात्मा का भजन कर (बंदगी छोड़ के।और बहसों में पड़ के) आप अपने आप पर बड़ा जुलम कर रहा है। कबीर ने तो एक परमात्मा (के सिमरन) का आसरा लिया है।(झगड़ालू) मुसलमान (बहिसों में ही) ख्वार हो रहे हैं। 4। 8।
आसा ॥ जब लगु तेलु दीवे मुखि बाती तब सूझै सभु कोई ॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: आसा ॥ (जैसे) जब तक दीपक में तेल है।और दीए के मुंह में बाती है।तब तक (घर में) हरेक चीज नजर आती है।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो मनुष्य जादू-टूणे मंत्र और दवाएं जानते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।