Lulla Family

अंग 470

अंग
470
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आसा-दी-वार का हिस्सा। पूरी 24 पउड़ियों की commentary /asa-di-vaar/ पर है।
सलोकु मः 1 ॥
नानक मेरु सरीर का इकु रथु इकु रथवाहु ॥
जुगु जुगु फेरि वटाईअहि गिआनी बुझहि ताहि ॥
सतजुगि रथु संतोख का धरमु अगै रथवाहु ॥
त्रेतै रथु जतै का जोरु अगै रथवाहु ॥
दुआपुरि रथु तपै का सतु अगै रथवाहु ॥
कलजुगि रथु अगनि का कूड़ु अगै रथवाहु ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे नानक ! चौरासी लाख जूनियों में से शिरोमणी मानस शरीर का एक रथ है और एक रथवाह है (भाव।ये जिंदगी का एक लंबा सफर है।मनुष्य मुसाफिर है;इस लंबे सफर को आसान करने के लिए जीव समय के प्रभाव में अपनी मति के अनुसार किसी ना किसी की अगुवाई में चल रहे हैं।किसी ना किसी का आसरा देख रहे हैं।पर।ज्यों-ज्यों समय गुजरता जा रहा है।जीवों के स्वभाव बदल रहे हैं।इस वास्ते जीवों की अपनी जिंदगी का निशाना।जिंदगी के उद्देश्य भी बदल रहे हैं; इसलिए) हरेक युग में ये रथ और रथवाह बार-बार बदलते रहते हैं।इस भेद को समझदार मनुष्य समझते हैं। सतियुग में मनुष्य के शरीर का रथ ‘संतोख’ होता है और सार्थी ‘धर्म’ है (भाव।जब मनुष्यों का आम तौर पर जिंदगी का निशाना ‘धर्म’ हो।धर्म जीवन उद्देश्य होने के कारण सहज ही ‘संतोख’ उनकी सवारी होता है।‘संतोख’ वाला स्वभाव जीवों के अंदर प्रबल होता है।ये जीव।मानो।सतिजुगी हैं।सतियुग में बस रहे हैं)। त्रेते युग में मनुष्य-शरीर का रथ ‘जत’ है और इस ‘जत’ रूपी रथ के आगे सारथी ‘जोर’ है (भाव।जब मनुष्य की जिंदगी का निशाना ‘शूरवीरता’ (Chivalary) हो।तब सहज ही ‘जत’ उनकी सवारी होता है।‘शूरबीरता’ के प्यारे मनुष्यों के अंदर ‘जती’ रहने का जोश सबसे प्रबल होता है। द्वापर युग में मानस-शरीर का रथ ‘तप’ है और इस ‘तप’ रूपी रथ के आगे रथवाही ‘सत’ होता है (भाव।जब मनुष्यों की जिंदगी का निशाना ऊँचा आचरण हो।तब सहज ही ‘तप’ उनकी सवारी होता है।‘उच्च आचरण’ के आशिक अपनी शारीरिक इन्द्रियों को विकारों से बचाने के लिए कई तरह के तप।कष्ट झेलते हैं)। कलियुग में मनुष्य के शरीर का रथ तृष्णा-आग है और इस ‘आग’ रूपी रथ के आगे रथवाह ‘झूठ’ है (भाव।जब जिंदगी का उद्देश्य ‘झूठ’ ठॅगी आदि हो तब सहज ही ‘तृष्णा रूपी आग उनकी सवारी होती है।झूठ-ठॅगी में लिप्त लोगों के अंदर तृष्णा की आग भड़कती रहती है)।
मः 1 ॥
साम कहै सेतंबरु सुआमी सच महि आछै साचि रहे ॥ सभु को सचि समावै ॥
रिगु कहै रहिआ भरपूरि ॥
राम नामु देवा महि सूरु ॥
नाइ लइऐ पराछत जाहि ॥
नानक तउ मोखंतरु पाहि ॥
जुज महि जोरि छली चंद्रावलि कान॑ क्रिसनु जादमु भइआ ॥
पारजातु गोपी लै आइआ बिंद्राबन महि रंगु कीआ ॥
कलि महि बेदु अथरबणु हूआ नाउ खुदाई अलहु भइआ ॥
नील बसत्र ले कपड़े पहिरे तुरक पठाणी अमलु कीआ ॥
चारे वेद होए सचिआर ॥
पड़हि गुणहि तिन॑ चार वीचार ॥
भाउ भगति करि नीचु सदाए ॥ तउ नानक मोखंतरु पाए ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ सामवेद कहता है कि (भाव।सतियुग में) जगत के मालिक (स्वामी) का नाम ‘सेतंबर’ प्रसिद्ध है (भाव।जब ईश्वर को ‘सेतंबर’ मान के पूजा हो रही थी)। जा सदा ‘सच’ में टिका रहता है; तब हरेक जीव सच में लीन होता है (‘सतजुगि रथु संतोख का धरमु अगै रथवाहु);(जब आम तौर पर हरेक जीव ‘सच’ में।‘धर्म’ में दृढ़ था।तब सतियुग ही था)। ऋगवेद (रिगवेद) कहता है कि (भाव।त्रेते युग में) (श्री) राम (जी) का नाम ही सारे देवताओं में सूर्य के समान चमकता है; वही हर जगह व्यापक है। हे नानक ! (ऋगवेद कहता है कि) (श्री) राम (जी) का नाम लेने से (ही) पाप दूर हो जाते हैं और (जीव) तब मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं। यजुर्वेद (में भाव।द्वापर में) जगत के मालिक का नाम साँवल ‘जादमु’ कृष्ण प्रसिद्ध हो गया।जो जबरन चंद्रावलि को छल के ले आया। जो अपनी गोपी (सत्यभामा) के लिए पारजात वृक्ष (इन्द्र के बाग में से) ले आया और जिसने वृंदावन में लीला की। कलियुग में अथर्वेद प्रधान हो गया है।जगत के मालिक का नाम ‘खुदाय’ और ‘अलहु’ कहा जाने लगा है। तुर्कों और पठानों का राज हो गया है जिन्होंने नीले रंग के वस्त्र ले के उनके कपड़े पहने हुए हैं। चारों वेद सच्चे हो गए हैं (भाव।चारों युगों में जगत के मालिक का नाम अलग-अलग पुकारा जाता रहा है।हरेक समय यही ख्याल बना रहा है कि जो जो मनुष्य ‘सेतंबर’।‘राम’।‘कृष्ण’ और ‘अल्लाह’ कह,कह के जपेगा।वही मुक्ति पाएगा); और जो जो मनुष्य इन वेदों को पढ़ते-विचारते हैं।(भाव।अपने-अपने समय में जो जो मनुष्य इस उपरोक्त विश्वास से अपनी धर्म-पुस्तक पढ़ते व विचारते रहे हैं) वह हुए भी अच्छी युक्तियों (चार-सुंदर; वीचार-दलील।युक्ति) वाले हैं। (पर) हे नानक ! जब मनुष्य प्रेमा भक्ति करके अपने आप को नीच कहलवाता है (विनम्र रहता है) (भाव।आडंबर अहंकार से बचा रहता है) तभी वह मुक्ति प्राप्त करता है। 2।
पउड़ी ॥
सतिगुर विटहु वारिआ जितु मिलिऐ खसमु समालिआ ॥
जिनि करि उपदेसु गिआन अंजनु दीआ इन॑ी नेत्री जगतु निहालिआ ॥
खसमु छोडि दूजै लगे डुबे से वणजारिआ ॥
सतिगुरू है बोहिथा विरलै किनै वीचारिआ ॥
करि किरपा पारि उतारिआ ॥13॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ मैं अपने सतिगुरू से सदके हूँ।जिसको मिलने के कारण मैं मालिक को याद करता हूँ। और जिसने अपनी शिक्षा दे के (मानो) ज्ञान का अंजन दे दिया है (जिसकी बरकति से) मैंने इन आँखों से जगत (की अस्लियत) को देख लिया है कि जो मनुष्य मालिक को बिसार के किसी और में चित्त जोड़ रहे हैं। वह इस संसार (सागर) में डूब गए हैं। सतगुरु नाविक है किसी विरले ने ही बात जनि है (मेरे सतिगुरू ने) मेहर करके मुझे (इस संसार समुंद्र से) पार कर दिया है। 13।
सलोकु मः 1 ॥
सिंमल रुखु सराइरा अति दीरघ अति मुचु ॥
ओइ जि आवहि आस करि जाहि निरासे कितु ॥
फल फिके फुल बकबके कंमि न आवहि पत ॥
मिठतु नीवी नानका गुण चंगिआईआ ततु ॥
सभु को निवै आप कउ पर कउ निवै न कोइ ॥
धरि ताराजू तोलीऐ निवै सु गउरा होइ ॥
अपराधी दूणा निवै जो हंता मिरगाहि ॥
सीसि निवाइऐ किआ थीऐ जा रिदै कुसुधे जाहि ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ सिमंल का वृक्ष कितना सीधा।लंबा और मोटा होता है। (पर) वह पंछी जो (फल खाने की) उम्मीद रख के (इस पर) आ के बैठते हैं।वे निराश हो के क्यों जाते हैं। इसके पीछे कारण ये है कि पेड़ चाहे इतना लंबा।ऊँचा और मोटा है।पर (इसके) फल फीके होते हैं।और फूल बेस्वादे हैं।पत्ते भी किसी काम नहीं आते। हे नानक ! नीचे रहने (विनम्रता) में मिठास है। गुण हैं।विनम्रता सारे गुणों का सार है।भाव।सब से अच्छा गुण है। (चाहे आम तौर पर जगत में) हरेक जीव अपने स्वार्थ के लिए झुकता है।किसी दूसरे की खातिर नहीं। (ये भी देख लो कि) अगर तराजू पर धर के तौला जाए (भाव।अगर अच्छी तरह परख की जाय फिर भी) नीचे वाला पलड़ा ही भारा होता है।(भाव।जो झुकता है वही बड़ा गिना जाता है)। (पर झुकने का भाव।मन से झुकना है।सिर्फ शरीर का झुकाना नहीं है; यदि शरीर के झुकने से कोई विनम्र व नीचा बन जाता होता तो) शिकारी जो मृग मारता है।झुक के दुहरा हो जाता है। पर अगर सिर ही निवा दिया जाए।और अंदर से जीव खोटे ही रहें।तो इस झुकने का कोई लाभ नहीं हो सकता। 1।
मः 1 ॥
पड़ि पुसतक संधिआ बादं ॥
सिल पूजसि बगुल समाधं ॥
मुखि झूठ बिभूखण सारं ॥
त्रैपाल तिहाल बिचारं ॥
गलि माला तिलकु लिलाटं ॥
दुइ धोती बसत्र कपाटं ॥
जे जाणसि ब्रहमं करमं ॥
सभि फोकट निसचउ करमं ॥
कहु नानक निहचउ धिआवै ॥
विणु सतिगुर वाट न पावै ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (पंडित।वेद आदि धार्मिक) पुस्तकें पढ़ के संध्या करता है और (औरों के साथ) चर्चा छेड़ता है। मूर्ति पूजता है और बगुले की तरह समाधि लगाता है; मुंह से झूठ बोलता है; (पर उस झूठ को) बड़े सुंदर गहनों की तरह चमका-चमका के दिखाता है; (हर रोज) तीनों वक्त गायत्री मंत्र को विचारता है। गले में माला रखता है।और माथे पर तिलक लगाता है; (सदा) दो धोतियां पास रखता है और (संध्या करने के वक्त) सिर पर एक वस्त्र रख लेता है। पर। अगर ये पंडित ईश्वर (की सिफत सालाह) का काम जानता हैं। तो निश्चित तौर पर जान लो कि ये सब काम फोके हैं। कह। हे नानक ! (मनुष्य) श्रद्धा धार के रॅब को सिमरे- केवल यही रास्ता गुणकारी है। (पर) ये रास्ता सतिगुरू के बिना नहीं मिलता। 2।
पउड़ी ॥
कपड़ु रूपु सुहावणा छडि दुनीआ अंदरि जावणा ॥
मंदा चंगा आपणा आपे ही कीता पावणा ॥
हुकम कीए मनि भावदे राहि भीड़ै अगै जावणा ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ ये सुंदर शरीर और सुंदर रूप (इसी जगत में) (जीवों को) छोड़ के चले जाना है। (हरेक जीव ने) अपने-अपने किए हुए अच्छे और बुरे कर्मों का फल खुद भोगना है। जिस मनुष्य ने मन-मानी हकूमतें की हैं।उसको आगे मुश्किल घाटियों में से गुजरना पड़ेगा (भाव।अपने किए हुए अत्याचारों के बदले में कष्ट सहने पड़ेंगे)।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 1॥ हे नानक ! चौरासी लाख जूनियों में से शिरोमणी मानस शरीर का एक रथ है और एक रथवाह है (भाव।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।