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अंग 465

अंग
465
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आसा-दी-वार का हिस्सा। पूरी 24 पउड़ियों की commentary /asa-di-vaar/ पर है।
गिआनु न गलीई ढूढीऐ कथना करड़ा सारु ॥
करमि मिलै ता पाईऐ होर हिकमति हुकमु खुआरु ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: (और इस गाने-नाचने से।इन मुन्द्रियों व हारों से ज्ञान कैसे मिल सकता है।)। (प्रभू की) कृपा से ही उसे पाया जा सकता, अन्य चालाकियाँ आदि सब व्यर्थ है । 2 ।
पउड़ी ॥
नदरि करहि जे आपणी ता नदरी सतिगुरु पाइआ ॥
एहु जीउ बहुते जनम भरंमिआ ता सतिगुरि सबदु सुणाइआ ॥
सतिगुर जेवडु दाता को नही सभि सुणिअहु लोक सबाइआ ॥
सतिगुरि मिलिऐ सचु पाइआ जिन॑ी विचहु आपु गवाइआ ॥
जिनि सचो सचु बुझाइआ ॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! अगर आप (जीव पर) मेहर की नजर करे।तो उसे आपकी कृपा-दृष्टि से सतिगुरू मिल जाता है। ये (बेचारा) जीव (जब) बहुते जन्मों में भटक चुका (और आपकी मेहर की नजर हुई) तो इसे सतिगुरू ने अपना शबद सुनाया। हे सारे लोगो ! ध्यान दे के सुनो।सतिगुरू के बराबर का और कोई दाता नहीं। जिन मनुष्यों ने अपने अंदर से आपा-भाव गवा दिया है।उनको उस सतिगुरू के मिलने से सच्चे प्रभू की प्राप्ति हैं गई। जिस सतिगुरू ने निरोल सच्चे प्रभू की समझ पाई है (भाव।जो मनुष्य अपने अंदर से स्वैभाव गवाते हैं।उनको उस सतिगुरू के मिलने से सच्चे रॅब की प्राप्ति हो जाती है।जो सतिगुरू सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की सूझ देता है)। 4।
सलोक मः 1 ॥
घड़ीआ सभे गोपीआ पहर कंन॑ गोपाल ॥
गहणे पउणु पाणी बैसंतरु चंदु सूरजु अवतार ॥
सगली धरती मालु धनु वरतणि सरब जंजाल ॥
नानक मुसै गिआन विहूणी खाइ गइआ जमकालु ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1 ॥ (सारी) घड़ियां (जैसे) गोपियां हैं; (दिन के सारे) पहर (जैसे) कान्ह हैं; पवन पानी और आग (जैसे) गहने हैं (जो उन गोपियों ने डाले हुए हैं)। (रासों में रासधारिए अवतारों के स्वांग बना-बना के गाते हैं।कुदरति की रास में) चंद्रमा और सूर्य (जैसे) दो अवतार हैं।सारी धरती (रास डालने के लिए) माल धन है।और (जगत के धंधे) रास का वरतण-ववेला हैं। (माया की इस रास में) ज्ञान से वंचित दुनिया ठॅगी जा रही है।और इसको जमकाल खाए जा रहा है। 1।
मः 1 ॥
वाइनि चेले नचनि गुर ॥
पैर हलाइनि फेरनि॑ सिर ॥
उडि उडि रावा झाटै पाइ ॥
वेखै लोकु हसै घरि जाइ ॥
रोटीआ कारणि पूरहि ताल ॥
आपु पछाड़हि धरती नालि ॥
गावनि गोपीआ गावनि कान॑ ॥
गावनि सीता राजे राम ॥
निरभउ निरंकारु सचु नामु ॥
जा का कीआ सगल जहानु ॥
सेवक सेवहि करमि चड़ाउ ॥
भिंनी रैणि जिन॑ा मनि चाउ ॥
सिखी सिखिआ गुर वीचारि ॥
नदरी करमि लघाए पारि ॥
कोलू चरखा चकी चकु ॥
थल वारोले बहुतु अनंतु ॥
लाटू माधाणीआ अनगाह ॥
पंखी भउदीआ लैनि न साह ॥
सूऐ चाड़ि भवाईअहि जंत ॥
नानक भउदिआ गणत न अंत ॥
बंधन बंधि भवाए सोइ ॥
पइऐ किरति नचै सभु कोइ ॥
नचि नचि हसहि चलहि से रोइ ॥
उडि न जाही सिध न होहि ॥
नचणु कुदणु मन का चाउ ॥
नानक जिन॑ मनि भउ तिन॑ा मनि भाउ ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (जब रास डालते हैं) चेले साज बजाते हैं।और उन चेलों के गुरू नाचते हैं। (नाच के समय वे गुरू) पैरों को हिलाते हैं सिर फेरते हें। (उनके पैरों से) धूड़ उड़-उड़ के सिर में पड़ती है। (रास तमाशा देखने आए हुए) लोग (उनको नाचता) देखते हैं और हसते हैं (शब्दों में-लोक देखता है और हसता है)। (पर वह रासधारिए) रोजी की खातिर नाचते हैं और अपने आप को जमीन पे मारते हैं। गोपियों (के स्वांग बन-बन के) गाते हैं।कान्ह (के स्वांग बन के) गाते हैं। सीता राम जी व और राजाओं के स्वांग बन के गाते हैं। जो निडर है।आकार-रहित है और जिस का नाम सदा अटल है। जिस प्रभू का सारा जगत बनाया हुआ है। उसको (केवल वही) सेवक सिमरते हैं।जिनके अंदर (ईश्वर की) मेहर से चढ़दीकला है। जिन के मन में (सिमरन करने का) उत्साह है।उन सेवकों की जिंदगी रूपी रात अच्छी गुजरती है, ये शिक्षा जिन्होंने गुरू की मति से सीख ली है। मेहर की नजर वाला प्रभू अपनी बख्शिश द्वारा उनको संसार समुंद्र से पार लंघा देता है। (नाचने और फेरियां लेने वाले जीवन का उद्धार नहीं हो सकता।देखो बेअंत पदार्थ और जीव हमेशा भटकते रहते हैं) कोल्हू।चर्खा।चक्की। कुम्हार के चक थल के बेअंत चक्कर। लट्टू।मथानियां।फले। पंछी। भंभीरियां जो एक सांस में उड़ती रहती हैं, ये सब चक्कर खाते रहते हैं। सूल पर चढ़ा के कई जंतु घुमाए जाते हैं। हे नानक ! भटकने वाला जीवों का अंत नहीं पड़ सकता। (इसी तरह) वह प्रभू जीवों को (माया की) जंजीरों में जकड़ के घुमाता है। हरेक जीव अपने किए कर्मों के अनुसार नाच रहा है। जो जीव नाच-नाच के हसते हैं।वे (अंत में यहाँ से) रो के जाते हैं। (वैसे) भी नाचने-कूदने को उच्च अवस्था पर नहीं पहुँच सकता।ना ही वह सिद्ध बन जाता है। नचना-कूदना (केवल) मन का शौक है। हे नानक ! प्रेम केवल उनके मन में ही है जिनके मन में रॅब का डर है। 2।
पउड़ी ॥
नाउ तेरा निरंकारु है नाइ लइऐ नरकि न जाईऐ ॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा दे खाजै आखि गवाईऐ ॥
जे लोड़हि चंगा आपणा करि पुंनहु नीचु सदाईऐ ॥
जे जरवाणा परहरै जरु वेस करेदी आईऐ ॥
को रहै न भरीऐ पाईऐ ॥5॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे प्रभू !) आपका नाम निरंकार है।अगर आपका नाम सिमरें तो नर्क में नहीं पड़ते। ये जिंद और शरीर सब कुछ प्रभू का ही है।वही (जीवों को) खाने के लिए (भोजन) देता है।(कितना देता है) ये अंदाजा लगाना व्यर्थ का प्रयत्न है। हे जीव ! अगर आप अपनी भलाई चाहता है।तो अच्छे काम करके भी अपने आप को छोटा कहलवा। अगर (कोई जीव) बुढ़ापे को परे हटाना चाहे (भाव।बुढ़ापे से बचना चाहे।तो ये यत्न फजूल है) बुढ़ापा भेष धार के आ ही जाता है। जब स्वास पूरे हो जाते हैं।तो कोई जीव यहाँ रह नहीं सकता। 5।
सलोक मः 1 ॥
मुसलमाना सिफति सरीअति पड़ि पड़ि करहि बीचारु ॥
बंदे से जि पवहि विचि बंदी वेखण कउ दीदारु ॥
हिंदू सालाही सालाहनि दरसनि रूपि अपारु ॥
तीरथि नावहि अरचा पूजा अगर वासु बहकारु ॥
जोगी सुंनि धिआवनि॑ जेते अलख नामु करतारु ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ मुसलानों को शरह की महिमा (सबसे ज्यादा अच्छी लगती है)।वे शराह को पढ़-पढ़ के (ये) विचार करते हैं (कि) रॅब का दीदार देखने के लिए जो मनुष्य (शरह की) बंदिश में पड़ते हैं।वही रॅब के बंदे हैं। हिन्दू शास्त्र द्वारा सालाहने-योग्य सुंदर व बेअंत हरी को सालाहते हैं। हरेक तीर्थ पर नहाते हैं।(उनके मति के अनुसार जिसका वे समाधि में ध्यान धरते हैं वह) सूक्षम स्वरूप वाला है। योगी समाधि लगाकर निर्गुण प्रभु का ध्यान करते हैं और करतार को ‘अलख’ नाम से पुकारते हैं।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।