अंग
347
आसा
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सो दरु तेरा केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब सम॑ाले ॥
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
रागु आसा महला 1 घरु 1 सो दरु ॥
सो दरु तेरा केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब सम॑ाले ॥
वाजे तेरे नाद अनेक असंखा केते तेरे वावणहारे ॥
केते तेरे राग परी सिउ कहीअहि केते तेरे गावणहारे ॥
गावनि॑ तुधनो पउणु पाणी बैसंतरु गावै राजा धरम दुआरे ॥
गावनि॑ तुधनो चितु गुपतु लिखि जाणनि लिखि लिखि धरमु वीचारे ॥
गावनि॑ तुधनो ईसरु ब्रहमा देवी सोहनि तेरे सदा सवारे ॥
गावनि॑ तुधनो इंद्र इंद्रासणि बैठे देवतिआ दरि नाले ॥
गावनि॑ तुधनो सिध समाधी अंदरि गावनि॑ तुधनो साध बीचारे ॥
गावनि॑ तुधनो जती सती संतोखी गावनि तुधनो वीर करारे ॥
गावनि तुधनो पंडित पड़े रखीसुर जुगु जुगु बेदा नाले ॥
गावनि तुधनो मोहणीआ मनु मोहनि सुरगु मछु पइआले ॥
गावनि॑ तुधनो रतन उपाए तेरे जेते अठसठि तीरथ नाले ॥
गावनि॑ तुधनो जोध महाबल सूरा गावनि॑ तुधनो खाणी चारे ॥
गावनि॑ तुधनो खंड मंडल ब्रहमंडा करि करि रखे तेरे धारे ॥
सेई तुधनो गावनि॑ जो तुधु भावनि॑ रते तेरे भगत रसाले ॥
होरि केते तुधनो गावनि से मै चिति न आवनि नानकु किआ बीचारे ॥
सोई सोई सदा सचु साहिबु साचा साची नाई ॥
है भी होसी जाइ न जासी रचना जिनि रचाई ॥
रंगी रंगी भाती जिनसी माइआ जिनि उपाई ॥
करि करि देखै कीता अपणा जिउ तिस दी वडिआई ॥
जो तिसु भावै सोई करसी फिरि हुकमु न करणा जाई ॥
रागु आसा महला 1 घरु 1 सो दरु ॥
सो दरु तेरा केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब सम॑ाले ॥
वाजे तेरे नाद अनेक असंखा केते तेरे वावणहारे ॥
केते तेरे राग परी सिउ कहीअहि केते तेरे गावणहारे ॥
गावनि॑ तुधनो पउणु पाणी बैसंतरु गावै राजा धरम दुआरे ॥
गावनि॑ तुधनो चितु गुपतु लिखि जाणनि लिखि लिखि धरमु वीचारे ॥
गावनि॑ तुधनो ईसरु ब्रहमा देवी सोहनि तेरे सदा सवारे ॥
गावनि॑ तुधनो इंद्र इंद्रासणि बैठे देवतिआ दरि नाले ॥
गावनि॑ तुधनो सिध समाधी अंदरि गावनि॑ तुधनो साध बीचारे ॥
गावनि॑ तुधनो जती सती संतोखी गावनि तुधनो वीर करारे ॥
गावनि तुधनो पंडित पड़े रखीसुर जुगु जुगु बेदा नाले ॥
गावनि तुधनो मोहणीआ मनु मोहनि सुरगु मछु पइआले ॥
गावनि॑ तुधनो रतन उपाए तेरे जेते अठसठि तीरथ नाले ॥
गावनि॑ तुधनो जोध महाबल सूरा गावनि॑ तुधनो खाणी चारे ॥
गावनि॑ तुधनो खंड मंडल ब्रहमंडा करि करि रखे तेरे धारे ॥
सेई तुधनो गावनि॑ जो तुधु भावनि॑ रते तेरे भगत रसाले ॥
होरि केते तुधनो गावनि से मै चिति न आवनि नानकु किआ बीचारे ॥
सोई सोई सदा सचु साहिबु साचा साची नाई ॥
है भी होसी जाइ न जासी रचना जिनि रचाई ॥
रंगी रंगी भाती जिनसी माइआ जिनि उपाई ॥
करि करि देखै कीता अपणा जिउ तिस दी वडिआई ॥
जो तिसु भावै सोई करसी फिरि हुकमु न करणा जाई ॥
हिन्दी अर्थ: परमात्मा एक हैं। उनका नाम ‘सत्’ है, यानी सदा अस्तित्व में रहने वाला। वे सृष्टि के रचयिता हैं और सबमें व्याप्त हैं। वे भय और वैर से रहित हैं। उनका स्वरूप काल से परे है। वे जन्म नहीं लेते और स्वयं प्रकाशमान हैं। उन्हें सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा महला 1 घरु 1 सो दरु ॥ वह दर बड़ा ही आश्चर्य भरा है। जहाँ बैठ के (हे निरंकार !) आप सारे जीवों की संभाल कर रहे हैं। (आपकी इस रची हुई कुदरति में) अनेकों व अनगिनत बाजे और राग हैं। बेअंत ही जीव (उन बाजों को) बजाने वाले हैं। रागनियों समेत बेअंत ही राग कहे जाते हैं और अनेकों ही जीव (इन रागों के) गाने वाले हैं (जो आपको गा रहे हैं)। अर्थ। (हे निरंकार !) हवा, पानी। आग आपके गुण गा रहे हैं। धर्मराज आपके दर पे (खड़ा हो के) आपकी उपमा गा रहा है। वह चित्रगुप्त भी जो (जीवों के अच्छे-बुरे कर्मों के लेख) लिखने जानते हैं और जिनके द्वारा लिखेलेख धर्मराज विचारता है। आपकी महिमा का गुणगान कर रहे हैं। अर्थ। (हे अकाल-पुरख !) देवियां, शिव और ब्रहमा जो आपके सवारे हुए हैं और शोभायमान हैं। आपको गा रहे हैं। कई इन्द्र अपने सिंहासन पर बैठे हुए देवताओं सहित आपके दर पे आपको सालाह रहे हैं। अर्थ। सिद्ध लोग समाधियां लगा के आपको गा रहे हैं। साधु विचार कर-कर के आपको सलाह रहे हैं। जटाधारी दानी और संतोषी पुरुष आपके गुण गा रहे हैं। और (बेअंत) महान शूरवीर आपकी महिमा गा रहे हैं। अर्थ। (हे अकाल पुरख !) पढ़े हुए पण्डित और महाऋषि वेदों समेत आपको गा रहे हैं। मन को मोहने वाली सुंदर सि्त्रयां आपको गा रही हैं। स्वर्ग लोक, मात लोक। पाताल लोक आपको गा रहे हैं। अर्थ। (हे निरंकार !) जितने भी आपके पैदा किए हुए रत्न हैं। वे अढ़सठ तीर्थों समेत आपको गा रहे हैं। महाबली योद्धे और शूरवीर आपकी सराहना कर रहे हैं। सारी सृष्टि। सृष्टि के सारे खण्ड और चक्र। जो आपने पैदा करके टिकाए हुए हैं; आपको गाते हैं। अर्थ। (हे अकाल पुरख !) (दरअसल तो) वही आपके प्रेम में रंगे हुए रसिए भगतजन आपको गाते हैं (भाव। उनका ही गाना सफल है) जो आपको अच्छे लगते हैं। अनेकों और जीव आपको गा रहे हैं। जो मुझसे गिने भी नहीं जा सकते। (भला) नानक (बिचारा) क्या विचार कर सकता है। अर्थ। ना वह पैदा हुआ है ना ही मरेगा। वह परमात्मा सदा स्थिर है। वह सच्चा मालिक है। जिस अकाल-पुरखु ने ये सृष्टि पैदा की है वह इस समय मौजूद है। सदा रहेगा। उसकी वडिआई महिमा भी सदा अटॅल है। अर्थ। जिस अकाल-पुरख ने कई रंग। किस्मों और जिनसों की माया रच दी है। वह वैसे उसकी रजा है (भाव। जितना बड़ा वह खुद है उतने बड़े जिगरे के साथ जगत को रच के) अपने पैदा किए हुए की संभाल भी कर रहा है। अर्थ। जो कुछ अकाल-पुरख को भाता है। वह ही वह करेगा। किसी जीव द्वारा परमात्मा को हुकम नहीं किया जा सकता (उसे ये नहीं कह सकता-ऐसे ना करो। ऐसे करो)।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 347 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।