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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 27 · सिरी राग

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अंग
27
सिरी राग
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  1. जिस ही की सिरकार है तिस ही का सभु कोइ ॥
  2. जिनी सुणि कै मंनिआ तिना निज घरि वासु ॥

जिस ही की सिरकार है तिस ही का सभु कोइ ॥

सिरीरागु महला 3 घरु 1 ॥
जिस ही की सिरकार है तिस ही का सभु कोइ ॥
गुरमुखि कार कमावणी सचु घटि परगटु होइ ॥
अंतरि जिस कै सचु वसै सचे सची सोइ ॥
सचि मिले से न विछुड़हि तिन निज घरि वासा होइ ॥1॥
मेरे राम मै हरि बिनु अवरु न कोइ ॥
सतगुरु सचु प्रभु निरमला सबदि मिलावा होइ ॥1॥ रहाउ ॥
सबदि मिलै सो मिलि रहै जिस नउ आपे लए मिलाइ ॥
दूजै भाइ को ना मिलै फिरि फिरि आवै जाइ ॥
सभ महि इकु वरतदा एको रहिआ समाइ ॥
जिस नउ आपि दइआलु होइ सो गुरमुखि नामि समाइ ॥2॥
पड़ि पड़ि पंडित जोतकी वाद करहि बीचारु ॥
मति बुधि भवी न बुझई अंतरि लोभ विकारु ॥
लख चउरासीह भरमदे भ्रमि भ्रमि होइ खुआरु ॥
पूरबि लिखिआ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥3॥
सतगुर की सेवा गाखड़ी सिरु दीजै आपु गवाइ ॥
सबदि मिलहि ता हरि मिलै सेवा पवै सभ थाइ ॥
पारसि परसिऐ पारसु होइ जोती जोति समाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सतगुरु मिलिआ आइ ॥4॥
मन भुखा भुखा मत करहि मत तू करहि पूकार ॥
लख चउरासीह जिनि सिरी सभसै देइ अधारु ॥
निरभउ सदा दइआलु है सभना करदा सार ॥
नानक गुरमुखि बुझीऐ पाईऐ मोख दुआरु ॥5॥3॥36॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 घरु 1 ॥ (जिस देश में) जिस (बादशाह) की हकूमत हो (उस देश का) हरेक जीव उसी (बादशाह) का हो के रहता है (इसी तरह अगर) गुरू के सन्मुख हो के कर्म किया जाए तो सदा स्थिर रहने रहने वाला प्रभू हृदय में प्रगट हो जाता है (और गुरू के सन्मुख हो के) जिस मनुष्य के हृदय में सदा स्थिर रहने वाला प्रभू प्रगट हो जाए वह सदा स्थिर प्रभू का रूप हो जाता है, और सदा स्थिर शोभा पाता है। जो लोग सदा स्थिर प्रभू से जुड़े रहते हैं,उनका निवास सदा अपने अंतरात्मे में रहता है।1। हे मेरे राम ! प्रभू के बिना मेरा और कोई आसरा नहीं। (हे भाई!) उस प्रभू के साथ मिलाप उस गुरू के शबद में जुड़ने से ही हो सकता है जो पवित्र स्वरूप है और जो सदा स्थिर प्रभू का रूप है।1।रहाउ। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है, वह प्रभू चरणों में जुड़ा रहता है (पर वही मनुष्य मिलता है) जिसे परमात्मा खुद ही (अपने चरणों में) मिलाता है। (प्रभू को विसार के) किसी और (माया आदि) के प्यार में रहने से कोई भी परमात्मा को नहीं मिल सकता। वह तो बार-बार पैदा होता और मरता रहता है। (यद्यपि) सभी जीवों में परमात्मा ही बसता है, और हर जगह परमात्मा ही मौजूद है, फिर भी वही मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के उस के नाम में लीन होता है जिसके ऊपर प्रभू खुद दयावान हो।2। पंडित और ज्योतिषी लोग (शास्त्र) पढ़-पढ़ के (सिर्फ) बहसें ही विचार करते हैं, (इस तरह) उनकी मति उनकी अक्ल कुराहे पड़ जाती है, वह (जीवन के सही रास्ते को) नहीं समझते। उनके अंदर लोभ-विकार (प्रबल होता) है। वह (माया के पीछे) भटक-भटक के (लोभ लहर में) खुआर हो हो के चौरासी लाख जोनियों के चक्कर में भटकते रहते हैं। पर उनके भी क्या वस? पूर्वले जीवन में किये करमों से अंकुरित संस्कारों के अनुसार ही कमाई करनी है। कोई (अपने उद्यम से उन संस्कारों को) मिटा नहीं सकता।3। (ये संस्कार मिटते हैं गुरू की शरण पड़ने से, पर) गुरू की बताई सेवा बहुत कठिन है, स्वै-भाव गवा के सिर देना पड़ता है। जब कोई जीव गुरू के शबद में जुड़ते हैं, तो उनको परमात्मा मिल जाता है, उनकी सेवा कबूल हो जाती है। (गुरू) पारस को मिलने से पारस ही हो जाते हैं। (गुरू की सहायता से) परमात्मा की ज्योति में मनुष्य की ज्योति मिल जाती है। पर, गुरू भी उनको ही मिलता है, जिनके भाग्य में धुर से ही (बख्शिश के लेख) लिखे हों।4। हे (मेरे) मन! हर वक्त तृष्णा के अधीन ना टिका रह, और गिले-शिकवे ना करता रह। जिस परमात्मा ने चौरासी लाख जूनें पैदा की हैं, वह हरेक जीव को (रोजी का) आसरा (भी) देता है। वह प्रभू जिसे किसी का डर नहीं और जो दया का स्रोत है सभ जीवों की संभाल करता है। हे नानक! गुरू की शरण पड़ने पर ये समझ आती है, और (माया के बंधनों से) खलासी का राह मिलता है।5।3।36।

जिनी सुणि कै मंनिआ तिना निज घरि वासु ॥

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सिरीरागु महला 3 ॥
जिनी सुणि कै मंनिआ तिना निज घरि वासु ॥
गुरमती सालाहि सचु हरि पाइआ गुणतासु ॥
सबदि रते से निरमले हउ सद बलिहारै जासु ॥
हिरदै जिन कै हरि वसै तितु घटि है परगासु ॥1॥
मन मेरे हरि हरि निरमलु धिआइ ॥
धुरि मसतकि जिन कउ लिखिआ से गुरमुखि रहे लिव लाइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि संतहु देखहु नदरि करि निकटि वसै भरपूरि ॥
गुरमति जिनी पछाणिआ से देखहि सदा हदूरि ॥
जिन गुण तिन सद मनि वसै अउगुणवंतिआ दूरि ॥
मनमुख गुण तै बाहरे बिनु नावै मरदे झूरि ॥2॥
जिन सबदि गुरू सुणि मंनिआ तिन मनि धिआइआ हरि सोइ ॥
अनदिनु भगती रतिआ मनु तनु निरमलु होइ ॥
कूड़ा रंगु कसुंभ का बिनसि जाइ दुखु रोइ ॥
जिसु अंदरि नाम प्रगासु है ओहु सदा सदा थिरु होइ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ जिन लोगों ने (परमात्मा का नाम) सुन के मान लिया (भाव, अपने मन को उस नाम सिमरन में डुबो लिया है) उनका अपने अंतरात्मे निवास बना रहता है (भाव, उनका मन बाहर भटकने से हट जाता है)। गुरू की शिक्षा मुताबिक सदा स्थिर प्रभू की सिफत सलाह करके वो गुणों के खजाने परमात्मा को ढूंढ लेते हैं। जो लोग गुरू के शबद में रंगे जाते हैं, वो पवित्र (आचरण) वाले हो जाते हैं, मैं उनके सदा सदके जाता हूं। जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा आ बसता है, (उनके) उस हृदय में प्रकाश हो जाता है। (भाव, सही जीवन जीने की उन्हें सूझ आ जाती है)।1। हे मेरे मन ! पवित्र हरि नाम सिमर। धुरों (परमात्मा की हजूरी में से) जिन लोगों को अपने माथे पे (सिमरन का लेख) लिखा (मिल जाता) है, वह गुरू की शरण पड़ के (परमात्मा की याद में) सुरति जोड़ के रखते हैं।1।रहाउ। हे प्रभू के संत जनो ! ध्यान से देखो, परमात्मा हर जगह व्यापक हरेक के नजदीक बसता है। जिन लोगों ने गुरू की मति ले के उस को (हर जगह व्यापक) पहचान लिया है, वह उसको सदा अपने अंग संग देखते हैं। जिन मनुष्यों ने गुण ग्रहण कर लिए हैं परमात्मा उनके मन में सदा बसता है। पर, जिन्होंने अवगुण इकट्ठे किये हैं, उन्हें कहीं दूर बसता प्रतीत होता है। अपने मन के पीछे चलने वाले लोगगुणों से वंचित रह जाते हैं, वह प्रभू के नाम के बिना (माया की तपष में) तप तप के आत्मिक मौत को आमंत्रित करते है।2। जिन मनुष्यों ने गुरू के शबद द्वारा परमात्मा का नाम सुन के मान लिया है (नाम में स्वयं को ढाल लिया है), उन्होंने अपने मन में उस हरि को (हर वक्त) सिमरा है। हर समय प्रभू भक्ति में रंगे हुए बंदों का मन पवित्र हो जाता है, शरीर भी पवित्र हो जाता है। कुसंभ का रंग जल्दी नाश होने वाला है वह नाश हो जाता है (इसी तरह माया का साथ भी चार दिनों का है, और उसके मोह में फंसा मनुष्य वियोग के) दुख में दुखी होता है। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा के नाम का प्रकाश है वह सदा अडोल चित्त रहता है।3।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 27 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।