विचि दुनीआ सेव कमाईऐ ॥
ता दरगह बैसणु पाईऐ ॥
कहु नानक बाह लुडाईऐ ॥4॥33॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हउ सतिगुरु सेवी आपणा इक मनि इक चिति भाइ ॥
सतिगुरु मन कामना तीरथु है जिस नो देइ बुझाइ ॥
मन चिंदिआ वरु पावणा जो इछै सो फलु पाइ ॥
नाउ धिआईऐ नाउ मंगीऐ नामे सहजि समाइ ॥1॥
मन मेरे हरि रसु चाखु तिख जाइ ॥
जिनी गुरमुखि चाखिआ सहजे रहे समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी पाइआ नामु निधानु ॥
अंतरि हरि रसु रवि रहिआ चूका मनि अभिमानु ॥
हिरदै कमलु प्रगासिआ लागा सहजि धिआनु ॥
मनु निरमलु हरि रवि रहिआ पाइआ दरगहि मानु ॥2॥
सतिगुरु सेवनि आपणा ते विरले संसारि ॥
हउमै ममता मारि कै हरि राखिआ उर धारि ॥
हउ तिन कै बलिहारणै जिना नामे लगा पिआरु ॥
सेई सुखीए चहु जुगी जिना नामु अखुटु अपारु ॥3॥
गुर मिलिऐ नामु पाईऐ चूकै मोह पिआस ॥
हरि सेती मनु रवि रहिआ घर ही माहि उदासु ॥
जिना हरि का सादु आइआ हउ तिन बलिहारै जासु ॥
नानक नदरी पाईऐ सचु नामु गुणतासु ॥4॥1॥34॥
बहु भेख करि भरमाईऐ मनि हिरदै कपटु कमाइ ॥
हरि का महलु न पावई मरि विसटा माहि समाइ ॥1॥
मन रे ग्रिह ही माहि उदासु ॥
सचु संजमु करणी सो करे गुरमुखि होइ परगासु ॥1॥ रहाउ ॥
गुर कै सबदि मनु जीतिआ गति मुकति घरै महि पाइ ॥
हरि का नामु धिआईऐ सतसंगति मेलि मिलाइ ॥2॥
जे लख इसतरीआ भोग करहि नव खंड राजु कमाहि ॥
बिनु सतिगुर सुखु न पावई फिरि फिरि जोनी पाहि ॥3॥
हरि हारु कंठि जिनी पहिरिआ गुर चरणी चितु लाइ ॥
तिना पिछै रिधि सिधि फिरै ओना तिलु न तमाइ ॥4॥
जो प्रभ भावै सो थीऐ अवरु न करणा जाइ ॥
जनु नानकु जीवै नामु लै हरि देवहु सहजि सुभाइ ॥5॥2॥35॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।