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अंग 26

अंग
26
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
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सभ दुनीआ आवण जाणीआ ॥3॥
विचि दुनीआ सेव कमाईऐ ॥
ता दरगह बैसणु पाईऐ ॥
कहु नानक बाह लुडाईऐ ॥4॥33॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: जगत उसको नाशवंत दिखाई देता है।3। (हे भाई !) दुनिया में (आ के) प्रभू की सेवा (सिमरन) करना चाहिए तभी उसकी हजूरी में बैठने की जगह मिलती है। हे नानक! कह, (सिमरन की बरकति से) बे-फिक्र हो जाते हैं। (फिर कोई चिंता-सोग नही व्याप्त होता)।4।33।
सिरीरागु महला 3 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हउ सतिगुरु सेवी आपणा इक मनि इक चिति भाइ ॥
सतिगुरु मन कामना तीरथु है जिस नो देइ बुझाइ ॥
मन चिंदिआ वरु पावणा जो इछै सो फलु पाइ ॥
नाउ धिआईऐ नाउ मंगीऐ नामे सहजि समाइ ॥1॥
मन मेरे हरि रसु चाखु तिख जाइ ॥
जिनी गुरमुखि चाखिआ सहजे रहे समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी पाइआ नामु निधानु ॥
अंतरि हरि रसु रवि रहिआ चूका मनि अभिमानु ॥
हिरदै कमलु प्रगासिआ लागा सहजि धिआनु ॥
मनु निरमलु हरि रवि रहिआ पाइआ दरगहि मानु ॥2॥
सतिगुरु सेवनि आपणा ते विरले संसारि ॥
हउमै ममता मारि कै हरि राखिआ उर धारि ॥
हउ तिन कै बलिहारणै जिना नामे लगा पिआरु ॥
सेई सुखीए चहु जुगी जिना नामु अखुटु अपारु ॥3॥
गुर मिलिऐ नामु पाईऐ चूकै मोह पिआस ॥
हरि सेती मनु रवि रहिआ घर ही माहि उदासु ॥
जिना हरि का सादु आइआ हउ तिन बलिहारै जासु ॥
नानक नदरी पाईऐ सचु नामु गुणतासु ॥4॥1॥34॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। मैं एकाग्र मन हो के, एकाग्र चित्त हो के प्रेम से अपने सतिगुरू की शरण लेता हूँ। सत्गुरू मन की इच्छाएं पूरी करने वाला तीर्थ है (पर ये समझ उस मनुष्य को ही आता है) जिस को (गुरू स्वयं) समझाए। (गुरू के द्वारा) मन-इच्छित मांग मिल जाती है। मनुष्य जो इच्छा धारण करता है वही फल हासिल कर लेता है। (पर) परमात्मा का नाम ही सिमरना चाहिए और (गुरू की ओर से) नाम ही मांगना चाहिए। नाम में जुड़ा हुआ मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक जाता है।1। हे मेरे मन! परमात्मा (के नाम) का स्वाद चख, (आपकी माया वाली) तृष्णा दूर हैं जाएगी। जिन लोगों ने गुरू की शरण पड़ के ‘हरि जस’ चखा है, वे आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं।1।रहाउ। जिन लोगों ने सत्गुरू की शरण ली है, उन्होंने (सभ पदार्थों का) खजाना प्रभू नाम प्राप्त कर लिया है। उनके हृदय में नाम रस रच गया है, उनके मन से अहंकार दूर हो गया है। उनके हृदय में कमल फूल खिल गया है। उनकी सुरति आत्मिक अडोलता में लग गई है। उनका पवित्र (हो चुका) मन हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरता है, उनको परमात्मा की हजूरी में आदर मिलता है।2। (पर) जगत में वह लोग बिरले हैं जो सत्गुरू की शरण लेते हैं, जो अहंकार व मल्कियत की लालसा को मार के अपने हृदय में परमात्मा को टिकाते हैं। मैं उन लोगों के सदके हूँ जिनका सदा परमात्मा के नाम में ही प्रेम बना रहता है। वही लोग सदा सुखी रहते हैं जिनके पास कभी ना खत्म होने वाला बेअंत नाम (का खजाना) है।3। अगर गुरू मिल जाए तो परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाता है। (नाम की बरकति से) माया का मोह दूर हो जाता है, माया की तृष्णा खत्म हो जाती है। मनुष्य का मन परमात्मा (की याद) में एकमेक होया रहता है, दुनिया के काम काज करता हुआ ही (माया से) उपराम रहता है। मैं उन लोगों पर बलिहार जाता हूँ। जिन्हें परमात्मा के नाम का स्वाद आ गया है। हे नानक! परमात्मा की मेहर की नजर से ही परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाले व सारे गुणों का खजाना नाम प्राप्त होता है।4।1।34।
सिरीरागु महला 3 ॥
बहु भेख करि भरमाईऐ मनि हिरदै कपटु कमाइ ॥
हरि का महलु न पावई मरि विसटा माहि समाइ ॥1॥
मन रे ग्रिह ही माहि उदासु ॥
सचु संजमु करणी सो करे गुरमुखि होइ परगासु ॥1॥ रहाउ ॥
गुर कै सबदि मनु जीतिआ गति मुकति घरै महि पाइ ॥
हरि का नामु धिआईऐ सतसंगति मेलि मिलाइ ॥2॥
जे लख इसतरीआ भोग करहि नव खंड राजु कमाहि ॥
बिनु सतिगुर सुखु न पावई फिरि फिरि जोनी पाहि ॥3॥
हरि हारु कंठि जिनी पहिरिआ गुर चरणी चितु लाइ ॥
तिना पिछै रिधि सिधि फिरै ओना तिलु न तमाइ ॥4॥
जो प्रभ भावै सो थीऐ अवरु न करणा जाइ ॥
जनु नानकु जीवै नामु लै हरि देवहु सहजि सुभाइ ॥5॥2॥35॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ बहुत सारे धार्मिक पहरावे पहन के (दूसरों को ठगने के लिए अपने) मन में दिल में खोट कमा के (मनुष्य खुद ही) भटकन में उलझ के रह जाता है। (जो मनुष्य ये दिखावा ठगी करता है वह) परमात्मा की हजूरी प्राप्त नहीं कर सकता। (बल्कि वह) आत्मिक मौत मर कर (ठॅगी आदि) विकारों के गंद में फसा रहता है।1। हे (मेरे) मन! गृहस्थ में (रहते हुए) ही (माया के मोह से) निर्लिप (रह)। (पर जिस मनुष्य के हृदय में) गुरू की शरण पड़ के समझ पैदा होती है, वह मनुष्य (ही) सदा स्थिर प्रभू नाम सिमरन की कमाई करता है और विकारों से संकोच करता है (इस वास्ते, हे मन ! गुरू की शरण पड़ के ये करने योग्य कामों को करने का ढंग सीखो)।1।रहाउ। जिस मनुष्य ने गुरू के शबद में जुड़ के अपने मन को वस में कर लिया है, वह गृहस्थ में रहते हुए भी ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेता है, विकारों से खलासी पा लेता है। (इस वास्ते हे मन!) साध-संगति के एकत्र में मिल के परमात्मा के नाम का सिमरन करना चाहिए।2। (हे भाई!) अगर आप (काम-वासना पूरी करने के लिए) लाखों सि्त्रयां भी भोग ले, अगर आप सारी धरती का राज भी कर ले, तो भी सत्गुरू की शरण के बिना आत्मिक सुख नहीं मिल सकेगा, (बल्कि) बारम्बार योनियों में पड़ा रहेगा।3। जिन लोगों ने गुरू के चरणों में मन जोड़ के परमात्मा के नाम सिमरन का हार अपने गले में पहन लिया है, करामाती ताकतें उनके पीछे पीछे चलतीं हैं, पर उनहें उसका रत्ती मात्र भी लालच नहीं होता।4। (पर, हम जीवों के भी क्या बस?) हे प्रभू ! जो कुछ आपको ठीक लगता है वही होता है। (आपकी मर्जी के बग़ैर) और कुछ नहीं किया जा सकता। हे हरि! (मुझे) अपना नाम बख्श, ता कि आत्मिक अडोलता में टिक के, आपके प्रेम में जुड़ के (आपका) दास नानक (आपका) नाम सिमर के आत्मिक जीवन प्राप्त कर सके।5।2।35।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।