पगि खिसिऐ रहणा नही आगै ठउरु न पाइ ॥
ओह वेला हथि न आवई अंति गइआ पछुताइ ॥
जिसु नदरि करे सो उबरै हरि सेती लिव लाइ ॥4॥
देखा देखी सभ करे मनमुखि बूझ न पाइ ॥
जिन गुरमुखि हिरदा सुधु है सेव पई तिन थाइ ॥
हरि गुण गावहि हरि नित पड़हि हरि गुण गाइ समाइ ॥
नानक तिन की बाणी सदा सचु है जि नामि रहे लिव लाइ ॥5॥4॥37॥
जिनी इक मनि नामु धिआइआ गुरमती वीचारि ॥
तिन के मुख सद उजले तितु सचै दरबारि ॥
ओइ अंम्रितु पीवहि सदा सदा सचै नामि पिआरि ॥1॥
भाई रे गुरमुखि सदा पति होइ ॥
हरि हरि सदा धिआईऐ मलु हउमै कढै धोइ ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख नामु न जाणनी विणु नावै पति जाइ ॥
सबदै सादु न आइओ लागे दूजै भाइ ॥
विसटा के कीड़े पवहि विचि विसटा से विसटा माहि समाइ ॥2॥
तिन का जनमु सफलु है जो चलहि सतगुर भाइ ॥
कुलु उधारहि आपणा धंनु जणेदी माइ ॥
हरि हरि नामु धिआईऐ जिस नउ किरपा करे रजाइ ॥3॥
जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ विचहु आपु गवाइ ॥
ओइ अंदरहु बाहरहु निरमले सचे सचि समाइ ॥
नानक आए से परवाणु हहि जिन गुरमती हरि धिआइ ॥4॥5॥38॥
हरि भगता हरि धनु रासि है गुर पूछि करहि वापारु ॥
हरि नामु सलाहनि सदा सदा वखरु हरि नामु अधारु ॥
गुरि पूरै हरि नामु द्रिड़ाइआ हरि भगता अतुटु भंडारु ॥1॥
भाई रे इसु मन कउ समझाइ ॥
ए मन आलसु किआ करहि गुरमुखि नामु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि भगति हरि का पिआरु है जे गुरमुखि करे बीचारु ॥
पाखंडि भगति न होवई दुबिधा बोलु खुआरु ॥
सो जनु रलाइआ ना रलै जिसु अंतरि बिबेक बीचारु ॥2॥
सो सेवकु हरि आखीऐ जो हरि राखै उरि धारि ॥
मनु तनु सउपे आगै धरे हउमै विचहु मारि ॥
धनु गुरमुखि सो परवाणु है जि कदे न आवै हारि ॥3॥
करमि मिलै ता पाईऐ विणु करमै पाइआ न जाइ ॥
श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “यह कीमती मनुष्य जन्म हासिल करके भी (मूर्ख मनुष्य) सुरति जोड़ के परमात्मा का नाम नहीं सिमरता; पर जब पैर फिसल गया (जब शरीर ढह पड़ा) यहाँ जगत में टिका नहीं रह सकेगा (नाम से वंचित रहने।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।