Lulla Family

अंग 28

अंग
28
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
इहु जनमु पदारथु पाइ कै हरि नामु न चेतै लिव लाइ ॥
पगि खिसिऐ रहणा नही आगै ठउरु न पाइ ॥
ओह वेला हथि न आवई अंति गइआ पछुताइ ॥
जिसु नदरि करे सो उबरै हरि सेती लिव लाइ ॥4॥
देखा देखी सभ करे मनमुखि बूझ न पाइ ॥
जिन गुरमुखि हिरदा सुधु है सेव पई तिन थाइ ॥
हरि गुण गावहि हरि नित पड़हि हरि गुण गाइ समाइ ॥
नानक तिन की बाणी सदा सचु है जि नामि रहे लिव लाइ ॥5॥4॥37॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: यह कीमती मनुष्य जन्म हासिल करके भी (मूर्ख मनुष्य) सुरति जोड़ के परमात्मा का नाम नहीं सिमरता; पर जब पैर फिसल गया (जब शरीर ढह पड़ा) यहाँ जगत में टिका नहीं रह सकेगा (नाम से वंचित रहने के कारण) आगे दरगाह में भी जगह नहीं मिलती। (मौत आने से) सिमरन का समय नहीं मिल सकता, आखिर (मूर्ख जीव) पछताता जाता है। जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर की नजर करता है वह परमात्मा (के चरणों) में सुरति जोड़ के (माया के कुसंभ मोह से) बच जाता है।4। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सब कुछ दिखावे की खातिर करता है, उसे सही जीवन जीने की समझ नहीं आती। (पर) गुरू के सन्मुख हो के जिन मनुष्यों का हृदय पवित्र हो जाता है, उन की घाल-कमाई (प्रभू दर पे) कबूल हो जाती है। वह मनुष्य हरि के गुण गा के हरि के चरणों में लीन हो के नित्य हरि गुण गाते हैं, पढ़ते हैं। हे नानक! जो मनुष्य प्रभू के नाम में सुरति जोड़ के रखते हैं, सदा स्थिर प्रभू की सिफत सलाह ही उनकी जीभ पे सदा विराजमान रहती है।5।4।37।
सिरीरागु महला 3 ॥
जिनी इक मनि नामु धिआइआ गुरमती वीचारि ॥
तिन के मुख सद उजले तितु सचै दरबारि ॥
ओइ अंम्रितु पीवहि सदा सदा सचै नामि पिआरि ॥1॥
भाई रे गुरमुखि सदा पति होइ ॥
हरि हरि सदा धिआईऐ मलु हउमै कढै धोइ ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख नामु न जाणनी विणु नावै पति जाइ ॥
सबदै सादु न आइओ लागे दूजै भाइ ॥
विसटा के कीड़े पवहि विचि विसटा से विसटा माहि समाइ ॥2॥
तिन का जनमु सफलु है जो चलहि सतगुर भाइ ॥
कुलु उधारहि आपणा धंनु जणेदी माइ ॥
हरि हरि नामु धिआईऐ जिस नउ किरपा करे रजाइ ॥3॥
जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ विचहु आपु गवाइ ॥
ओइ अंदरहु बाहरहु निरमले सचे सचि समाइ ॥
नानक आए से परवाणु हहि जिन गुरमती हरि धिआइ ॥4॥5॥38॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ जिन लोगों ने गुरू की मति के द्वारा (परमात्मा के नाम को अपने सोच मंडल में टिका के) नाम को एकाग्र चित्त हो के सिमरा है, वे सदा ही स्थिर रहने वाले प्रभू के दरबार में सुर्खरू होते है। वह मनुष्य सदा स्थिर प्रभू के नाम में प्यार से सदा आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल पीते हैं।1। हे भाई! गुरू की शरण पड़ने से इज्जत मिलती है। (गुरू की शरण पड़ के) परमात्मा का नाम सदा सिमरना चाहिए। (गुरू मनुष्य के मन में से) अहंकार की मैल धो के निकाल देता है।1।रहाउ । (पर) अपने मन के पीछे चलने वाले लोग परमात्मा के नाम के साथ रिश्ता नहीं जोड़ पाते, और नाम के बग़ैर उनका आदर सत्कार जाता रहता है। उन्हें सत्गुरू के शबद का आनन्द नहीं आता। (इस वास्ते) वह (प्रभू को विसार के) किसी और प्यार में मस्त रहते हैं। वह लोग (विकारों के) गंद में लीन रह कर गंदगी के कीड़े की तरह (विकारों के) गंद में ही पड़े रहते हैं।2। जो मनुष्य गुरू के प्रेम में जीवन व्यतीत करते हैं उनका जीवन कामयाब हो जाता है, वह अपना सारा खानदान (ही विकारों से) बचा लेते हैं, उनको पैदा करने वाली माँ शोभा कमाती है। (इस वास्ते, हे भाई!) परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। (पर वही मनुष्य नाम सिमरता है) जिस पर परमात्मा अपनी रजा अनुसार मेहर करता है।3। जिन लोगों ने गुरू की शरण पड़ के अपने अंदर से अहम् भाव दूर कर के परमात्मा का नाम सिमरा है, वह लोग सदा स्थिर प्रभू में लीन हो के उसी का रूप बन के अंदर-बाहर से पवित्र हो जाते हैं। (भाव, उनका आत्मिक जीवन पवित्र हो जाता है, और वे खलकत के साथ भी प्यार-व्यवहार ठीक रखते हैं)। हे नानक ! जगत में आए (पैदा हुए) वही लोग कबूल हैं जिन्होंने गुरू की मति ले के परमात्मा का नाम सिमरा है।4।5।38।
सिरीरागु महला 3 ॥
हरि भगता हरि धनु रासि है गुर पूछि करहि वापारु ॥
हरि नामु सलाहनि सदा सदा वखरु हरि नामु अधारु ॥
गुरि पूरै हरि नामु द्रिड़ाइआ हरि भगता अतुटु भंडारु ॥1॥
भाई रे इसु मन कउ समझाइ ॥
ए मन आलसु किआ करहि गुरमुखि नामु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि भगति हरि का पिआरु है जे गुरमुखि करे बीचारु ॥
पाखंडि भगति न होवई दुबिधा बोलु खुआरु ॥
सो जनु रलाइआ ना रलै जिसु अंतरि बिबेक बीचारु ॥2॥
सो सेवकु हरि आखीऐ जो हरि राखै उरि धारि ॥
मनु तनु सउपे आगै धरे हउमै विचहु मारि ॥
धनु गुरमुखि सो परवाणु है जि कदे न आवै हारि ॥3॥
करमि मिलै ता पाईऐ विणु करमै पाइआ न जाइ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदों के पास परमात्मा का नाम ही धन है नाम ही सरमाया है, वह अपने गुरू की शिक्षा ले के (नाम का ही) व्यापार करते हैं। भक्तजन सदा परमात्मा का नाम की ही सराहना करते हैं। परमात्मा का नाम का व्यापार ही उनके जीवन का आसरा है। पूरे सत्गुरू ने परमात्मा का नामउनके हृदय में पक्का कर दिया है। परमात्मा का नाम ही उनके लिए ना समाप्त होने वाला खजाना है।1! हे भाई! (अपने) इस मन को समझा (और कह) हे मन ! क्यूँ आलस करता है? गुरू की शरण पड़ के (परमात्मा का) नाम सिमर ।1।रहाउ। अगर मनुष्य गुरू की शरण में पड़ के (गुरू की दी हुई शिक्षा की) विचार करते रहे तो उसके अंदर प्रमात्मा की भक्ति बस जाती है। परमात्मा का प्यार टिक जाता है। पर पाखण्ड करने से भक्ति नहीं हो सकती। पाखण्ड का बोल खुआर (नाश) ही करता है। जिस मनुष्य के अंदर (खरे-खोटे) परखने की सूझ पैदा हो जाती है, वह मनुष्य (पाखण्डियों में) मिलाने से मिल नही सकता।2। वही मनुष्य परमात्मा का सेवक कहा जा सकता है, जो परमात्मा को (की याद) अपने हृदय में टिकाई रखता है। जो अपने अंदर से अहम् दूर करके अपना मन अपना शरीर परमात्मा के हवाले कर देता है, परमात्मा के आगे रॅख देता है। जो मनुष्य (विकारों से टक्कर व मानव जनम की बाजी) कभी हार के नहीं आता, गुरू के सन्मुख हुआ वह मनुष्य भाग्यशाली है वह (प्रभू की हजूरी में) कबूल होता है।3। परमात्मा (मनुष्य को) अपनी मेहर से ही मिले तो मिलता है। मेहर के बगैर वह प्राप्त नहीं हो सकता।

श्री राग का सुर शाम के उतार पर बैठा है, जब दिन की चमक थक चुकी होती है। ग्रंथ साहिब की राग-व्यवस्था का यह पहला नाम है, और इसकी गम्भीरता उसी क्रम का संकेत है। पंजाब के पुराने सिख घरों में आज भी, सूर्यास्त के क़रीब, इसी राग की रचनाएँ कीर्तन-संगति का केन्द्र होती हैं। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “यह कीमती मनुष्य जन्म हासिल करके भी (मूर्ख मनुष्य) सुरति जोड़ के परमात्मा का नाम नहीं सिमरता; पर जब पैर फिसल गया (जब शरीर ढह पड़ा) यहाँ जगत में टिका नहीं रह सकेगा (नाम से वंचित रहने।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।