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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 28 · सिरी राग

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अंग
28
सिरी राग
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  1. इहु जनमु पदारथु पाइ कै हरि नामु न चेतै लिव लाइ ॥
  2. जिनी इक मनि नामु धिआइआ गुरमती वीचारि ॥
  3. हरि भगता हरि धनु रासि है गुर पूछि करहि वापारु ॥

गुरु अमर दास जी · शबद · सिरी राग

इहु जनमु पदारथु पाइ कै हरि नामु न चेतै लिव लाइ ॥

अंग 27 से चला आ रहा अंश

इहु जनमु पदारथु पाइ कै हरि नामु न चेतै लिव लाइ ॥
पगि खिसिऐ रहणा नही आगै ठउरु न पाइ ॥
ओह वेला हथि न आवई अंति गइआ पछुताइ ॥
जिसु नदरि करे सो उबरै हरि सेती लिव लाइ ॥4॥
देखा देखी सभ करे मनमुखि बूझ न पाइ ॥
जिन गुरमुखि हिरदा सुधु है सेव पई तिन थाइ ॥
हरि गुण गावहि हरि नित पड़हि हरि गुण गाइ समाइ ॥
नानक तिन की बाणी सदा सचु है जि नामि रहे लिव लाइ ॥5॥4॥37॥

हिन्दी अर्थ: यह कीमती मनुष्य जन्म हासिल करके भी (मूर्ख मनुष्य) सुरति जोड़ के परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। पर जब पैर फिसल गया (जब शरीर ढह पड़ा) यहाँ जगत में टिका नहीं रह सकेगा। (नाम से वंचित रहने के कारण) आगे दरगाह में भी जगह नहीं मिलती। (मौत आने से) सिमरन का समय नहीं मिल सकता, आखिर (मूर्ख जीव) पछताता जाता है। जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर की नजर करता है वह परमात्मा (के चरणों) में सुरति जोड़ के (माया के कुसंभ मोह से) बच जाता है। 4। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सब कुछ दिखावे की खातिर करता है, उसे सही जीवन जीने की समझ नहीं आती। (पर) गुरू के सन्मुख हो के जिन मनुष्यों का हृदय पवित्र हो जाता है, उन की घाल-कमाई (प्रभू दर पे) कबूल हो जाती है। वह मनुष्य हरि के गुण गा के हरि के चरणों में लीन हो के नित्य हरि गुण गाते हैं, पढ़ते हैं। हे नानक! जो मनुष्य प्रभू के नाम में सुरति जोड़ के रखते हैं, सदा स्थिर प्रभू की सिफत सलाह ही उनकी जीभ पे सदा विराजमान रहती है। 5। 4। 37।

गुरु अमर दास जी · शबद · सिरी राग

जिनी इक मनि नामु धिआइआ गुरमती वीचारि ॥

सिरीरागु महला 3 ॥
जिनी इक मनि नामु धिआइआ गुरमती वीचारि ॥
तिन के मुख सद उजले तितु सचै दरबारि ॥
ओइ अंम्रितु पीवहि सदा सदा सचै नामि पिआरि ॥1॥
भाई रे गुरमुखि सदा पति होइ ॥
हरि हरि सदा धिआईऐ मलु हउमै कढै धोइ ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख नामु न जाणनी विणु नावै पति जाइ ॥
सबदै सादु न आइओ लागे दूजै भाइ ॥
विसटा के कीड़े पवहि विचि विसटा से विसटा माहि समाइ ॥2॥
तिन का जनमु सफलु है जो चलहि सतगुर भाइ ॥
कुलु उधारहि आपणा धंनु जणेदी माइ ॥
हरि हरि नामु धिआईऐ जिस नउ किरपा करे रजाइ ॥3॥
जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ विचहु आपु गवाइ ॥
ओइ अंदरहु बाहरहु निरमले सचे सचि समाइ ॥
नानक आए से परवाणु हहि जिन गुरमती हरि धिआइ ॥4॥5॥38॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ कुछ लोगों ने गुरू की मति के द्वारा (परमात्मा के नाम को अपने सोच मंडल में टिका के) नाम को एकाग्र चित्त हो के सिमरा है। वे सदा ही स्थिर रहने वाले प्रभू के दरबार में सुर्खरू होते हैं। वह मनुष्य सदा स्थिर प्रभू के नाम में प्यार से सदा आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल पीते हैं। 1। हे भाई! गुरू की शरण पड़ने से इज्जत मिलती है। (गुरू की शरण पड़ के) परमात्मा का नाम सदा सिमरना चाहिए। (गुरू मनुष्य के मन में से) अहंकार की मैल धो के निकाल देता है। 1। रहाउ। (पर) अपने मन के पीछे चलने वाले लोग परमात्मा के नाम के साथ रिश्ता नहीं जोड़ पाते, और नाम के बग़ैर उनका आदर सत्कार जाता रहता है। उन्हें सत्गुरू के शबद का आनन्द नहीं आता। (इस वास्ते) वह (प्रभू को विसार के) किसी और प्यार में मस्त रहते हैं। वह लोग (विकारों के) गंद में लीन रह कर गंदगी के कीड़े की तरह (विकारों के) गंद में ही पड़े रहते हैं। 2। जो मनुष्य गुरू के प्रेम में जीवन व्यतीत करते हैं उनका जीवन कामयाब हो जाता है। वह अपना सारा खानदान (ही विकारों से) बचा लेते हैं, उनको पैदा करने वाली माँ शोभा कमाती है। (इस वास्ते, हे भाई!) परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। (पर वही मनुष्य नाम सिमरता है) जिस पर परमात्मा अपनी रजा अनुसार मेहर करता है। 3। कुछ लोगों ने गुरू की शरण पड़ के अपने अंदर से अहम् भाव दूर कर के परमात्मा का नाम सिमरा है। वह लोग सदा स्थिर प्रभू में लीन हो के उसी का रूप बन के अंदर-बाहर से पवित्र हो जाते हैं। (भाव, उनका आत्मिक जीवन पवित्र हो जाता है, और वे खलकत के साथ भी प्यार-व्यवहार ठीक रखते हैं)। हे नानक! जगत में आए (पैदा हुए) वही लोग कबूल हैं जिन्होंने गुरू की मति ले के परमात्मा का नाम सिमरा है। 4। 5। 38।

गुरु अमर दास जी · शबद · सिरी राग

हरि भगता हरि धनु रासि है गुर पूछि करहि वापारु ॥

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सिरीरागु महला 3 ॥
हरि भगता हरि धनु रासि है गुर पूछि करहि वापारु ॥
हरि नामु सलाहनि सदा सदा वखरु हरि नामु अधारु ॥
गुरि पूरै हरि नामु द्रिड़ाइआ हरि भगता अतुटु भंडारु ॥1॥
भाई रे इसु मन कउ समझाइ ॥
ए मन आलसु किआ करहि गुरमुखि नामु धिआइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि भगति हरि का पिआरु है जे गुरमुखि करे बीचारु ॥
पाखंडि भगति न होवई दुबिधा बोलु खुआरु ॥
सो जनु रलाइआ ना रलै जिसु अंतरि बिबेक बीचारु ॥2॥
सो सेवकु हरि आखीऐ जो हरि राखै उरि धारि ॥
मनु तनु सउपे आगै धरे हउमै विचहु मारि ॥
धनु गुरमुखि सो परवाणु है जि कदे न आवै हारि ॥3॥
करमि मिलै ता पाईऐ विणु करमै पाइआ न जाइ ॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदों के पास परमात्मा का नाम ही धन है नाम ही सरमाया है। वह अपने गुरू की शिक्षा ले के (नाम का ही) व्यापार करते हैं। भक्तजन सदा परमात्मा का नाम की ही सराहना करते हैं। परमात्मा का नाम का व्यापार ही उनके जीवन का आसरा है। पूरे सत्गुरू ने परमात्मा का नामउनके हृदय में पक्का कर दिया है। परमात्मा का नाम ही उनके लिए ना समाप्त होने वाला खजाना है।1! हे भाई! (अपने) इस मन को समझाएँ (और कहें) हे मन! क्यूँ आलस करते हैं? गुरू की शरण पड़ के (परमात्मा का) नाम सिमरें। 1। रहाउ। अगर मनुष्य गुरू की शरण में पड़ के (गुरू की दी हुई शिक्षा की) विचार करते रहे तो उसके अंदर प्रमात्मा की भक्ति बस जाती है। परमात्मा का प्यार टिक जाता है। पर पाखण्ड करने से भक्ति नहीं हो सकती। पाखण्ड का बोल खुआर (नाश) ही करता है। जिस मनुष्य के अंदर (खरे-खोटे) परखने की सूझ पैदा हो जाती है, वह मनुष्य (पाखण्डियों में) मिलाने से मिल नहीं सकता। 2। वही मनुष्य परमात्मा का सेवक कहा जा सकता है, जो परमात्मा को (की याद) अपने हृदय में टिकाई रखता है। जो अपने अंदर से अहम् दूर करके अपना मन अपना शरीर परमात्मा के हवाले कर देता है, परमात्मा के आगे रॅख देता है। जो मनुष्य (विकारों से टक्कर व मानव जनम की बाजी) कभी हार के नहीं आता, गुरू के सन्मुख हुआ वह मनुष्य भाग्यशाली है। वह (प्रभू की हजूरी में) कबूल होता है। 3। परमात्मा (मनुष्य को) अपनी मेहर से ही मिले तो मिलता है। मेहर के बगैर वह प्राप्त नहीं हो सकता।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 28 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।