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1378
फ़रीद जी के सलोक
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- बंनि॑ उठाई पोटली किथै वंञा घति ॥2॥
- किझु न बुझै किझु न सुझै दुनीआ गुझी भाहि ॥
- फरीदा जे जाणा तिल थोड़ड़े संमलि बुकु भरी ॥
- जे जाणा लड़ु छिजणा पीडी पाईं गंढि ॥
- फरीदा जे तू अकलि लतीफु काले लिखु न लेख ॥
- फरीदा जो तै मारनि मुकीआं तिन॑ा न मारे घुंमि ॥
- फरीदा जां तउ खटण वेल तां तू रता दुनी सिउ ॥
- देखु फरीदा जु थीआ दाड़ी होई भूर ॥
- देखु फरीदा जि थीआ सकर होई विसु ॥
- फरीदा अखी देखि पतीणीआं सुणि सुणि रीणे कंन ॥
- फरीदा कालंी जिनी न राविआ धउली रावै कोइ ॥
- फरीदा काली धउली साहिबु सदा है जे को चिति करे ॥
- फरीदा जिन॑ लोइण जगु मोहिआ से लोइण मै डिठु ॥
- फरीदा कूकेदिआ चांगेदिआ मती देदिआ नित ॥
- फरीदा थीउ पवाही दभु ॥
- फरीदा खाकु न निंदीऐ खाकू जेडु न कोइ ॥
- फरीदा जा लबु ता नेहु किआ लबु त कूड़ा नेहु ॥
- फरीदा जंगलु जंगलु किआ भवहि वणि कंडा मोड़ेहि ॥
- फरीदा इनी निकी जंघीऐ थल डूंगर भविओमि॑ ॥
- फरीदा राती वडीआं धुखि धुखि उठनि पास ॥
· सलोक
बंनि॑ उठाई पोटली किथै वंञा घति ॥2॥
बंनि॑ उठाई पोटली किथै वंञा घति ॥2॥
हिन्दी अर्थ: ('दुनिया' वाली) छोटी सी पोटली (मैंने भी) बाँध के उठाई हुई है। इसको कहाँ फेंक के जाऊँ। (भाव, दुनिया के मोह को छोड़ना कोई आसान काम नहीं है)। 2।
· सलोक
किझु न बुझै किझु न सुझै दुनीआ गुझी भाहि ॥
किझु न बुझै किझु न सुझै दुनीआ गुझी भाहि ॥
सांईं मेरै चंगा कीता नाही त हं भी दझां आहि ॥3॥
सांईं मेरै चंगा कीता नाही त हं भी दझां आहि ॥3॥
हिन्दी अर्थ: दुनिया (देखने में तो गुलज़ार है। पर इसका मोह असल में) छुपी हुई गुप्त आग है (जो अंदर ही अंदर मन में धुखती रहती है; इसमें पड़े हुए जीवों को जिंदगी के सही रास्ते की) कुछ सूझ-बूझ नहीं पड़ती। मेरे सांई ने (मेरे ऊपर) मेहर की है (और मुझे इससे बचा लिया है) नहीं तो (बाकी लोगों की तरह) मैं भी (इसमें) जल जाता (भाव, माया के मोह से प्रभू स्वयं ही मेहर करके बचाता है। हमारे अपने वश की बात नहीं कि यह 'पोटली' सिर से उतार के फेंक सकें)। 3।
· सलोक
फरीदा जे जाणा तिल थोड़ड़े संमलि बुकु भरी ॥
फरीदा जे जाणा तिल थोड़ड़े संमलि बुकु भरी ॥
जे जाणा सहु नंढड़ा तां थोड़ा माणु करी ॥4॥
जे जाणा सहु नंढड़ा तां थोड़ा माणु करी ॥4॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! अगर मुझे पता हो कि (इस शरीर-रूपी बर्तन में) बहुत थोड़े से (श्वास रूप) तिल हैं तो मैं सोच-समझ के (इनकी) मुट्ठी भरूँ (भाव, बेपरवाही से जीवन की साँसें ना गुजारी जाऊँ)। अगर मुझे समझ आ जाए कि (मेरा) पति (-प्रभू) बाल-स्वभाव वाला है (भाव, भोले स्वभाव को प्यार करता है) तो मैं भी (इस दुनिया वाली 'पोटली' का) गुमान छोड़ दूँ। 4।
· सलोक
जे जाणा लड़ु छिजणा पीडी पाईं गंढि ॥
जे जाणा लड़ु छिजणा पीडी पाईं गंढि ॥
तै जेवडु मै नाहि को सभु जगु डिठा हंढि ॥5॥
तै जेवडु मै नाहि को सभु जगु डिठा हंढि ॥5॥
हिन्दी अर्थ: (हे पति-प्रभू!) यदि मुझे समझ हो कि (इस पोटली के कारण आपका पकड़ा हुआ) पल्ला छिज जाता है (भाव, आपसे दूरी बन जाती है) तो मैं (आपके पल्ले से ही) पक्की गाँठ डालूँ। (हे साई!) मैंने सारा जगत फिर के देख लिया है। आपके जैसा (साथी) मुझे और कोई नहीं मिला। 5।
· सलोक
फरीदा जे तू अकलि लतीफु काले लिखु न लेख ॥
फरीदा जे तू अकलि लतीफु काले लिखु न लेख ॥
आपनड़े गिरीवान महि सिरु नंीवां करि देखु ॥6॥
आपनड़े गिरीवान महि सिरु नंीवां करि देखु ॥6॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! यदि आप बारीक बुद्धि वाले (समझदार) हैं, तो और लोगों के बुरे कर्मों की पड़ताल ना करें; अपने गिरेबान में झाँक के देखें (कि आपके अपने कर्म कैसे हैं)। 6।
· सलोक
फरीदा जो तै मारनि मुकीआं तिन॑ा न मारे घुंमि ॥
फरीदा जो तै मारनि मुकीआं तिन॑ा न मारे घुंमि ॥
आपनड़ै घरि जाईऐ पैर तिन॑ा दे चुंमि ॥7॥
आपनड़ै घरि जाईऐ पैर तिन॑ा दे चुंमि ॥7॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! जो (मनुष्य) आपको मुक्के मारें (भाव, कोई दुख दें) उनको आप पलट के ना मारें (भाव, बदला ना लें। बल्कि) उनके पैर चूम के अपने घर में (शांत अवस्था में) टिके रहें। 7।
· सलोक
फरीदा जां तउ खटण वेल तां तू रता दुनी सिउ ॥
फरीदा जां तउ खटण वेल तां तू रता दुनी सिउ ॥
मरग सवाई नीहि जां भरिआ तां लदिआ ॥8॥
मरग सवाई नीहि जां भरिआ तां लदिआ ॥8॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! जब आपके (असल कमाई) कमाने की बेला थी तब आप दुनिया (की 'पोटली') के साथ मस्त रहे। (इसी तरह) मौत की नींव पक्की होती चली गई। (भाव, मौत का समय नजदीक आता चला गया) जब सारे श्वास पूरे हो गए, तब यहाँ से कूच करना पड़ा। 8।
· सलोक
देखु फरीदा जु थीआ दाड़ी होई भूर ॥
देखु फरीदा जु थीआ दाड़ी होई भूर ॥
अगहु नेड़ा आइआ पिछा रहिआ दूरि ॥9॥
अगहु नेड़ा आइआ पिछा रहिआ दूरि ॥9॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! देखिए। जो कुछ (अब तक) हो चुका है (वह ये है कि) दाढ़ी सफेद हो गई है। मौत की तरफ से वक्त नजदीक आता जा रहा है। और पिछला पासा (जब से पैदा हुआ था) दूर (पीछे को) रह गया है। (सो, अब अंजान वाले काम ना करें। और आगे की तैयारी के लिए कमाई करें)। 9।
· सलोक
देखु फरीदा जि थीआ सकर होई विसु ॥
देखु फरीदा जि थीआ सकर होई विसु ॥
सांई बाझहु आपणे वेदण कहीऐ किसु ॥10॥
सांई बाझहु आपणे वेदण कहीऐ किसु ॥10॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! देखिए। (अब तक) जो हुआ है (वह यह है कि 'दाढ़ी भूरी' हो जाने के कारण) दुनिया के मीठे पदार्थ (भी) दुख देते हैं (रास नहीं आते। कयोंकि अब शारीरिक इन्द्रियां कमजोर पड़ जाने के कारण उन भोगों को अच्छी तरह भोग नहीं सकते) यह दुखड़ा अपने साई के अलावा किस को कहें। (भाव, प्रभू के नियमों के अनुसार हो रही इस तब्दीली में कोई रोक नहीं डाल सकता)। 10।
· सलोक
फरीदा अखी देखि पतीणीआं सुणि सुणि रीणे कंन ॥
फरीदा अखी देखि पतीणीआं सुणि सुणि रीणे कंन ॥
साख पकंदी आईआ होर करेंदी वंन ॥11॥
साख पकंदी आईआ होर करेंदी वंन ॥11॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! ('सकर' के 'विसु' हो जाने का कारण ये है कि) आँखें (जगत के रंग-तमाशे) देख के (अब) कमजोर हो गई हैं (जगत के रंग-तमाशे तो उसी तरह मौजूद हैं। पर आँखों में अब देखने की ताकत नहीं रही)। कान (दुनिया के राग-रंग) सुन-सुन के (अब) बहरे हो गए हैं। (सिर्फ आँखें और कान ही नहीं। सारा) शरीर ही बिरध हो गया है। इसने और ही रंग बदल लिया है (अब भोग भोगने के लायक नहीं रहा। और इन आहों का कोई इलाज नहीं है)। 11।
· सलोक
फरीदा कालंी जिनी न राविआ धउली रावै कोइ ॥
फरीदा कालंी जिनी न राविआ धउली रावै कोइ ॥
करि सांई सिउ पिरहड़ी रंगु नवेला होइ ॥12॥
करि सांई सिउ पिरहड़ी रंगु नवेला होइ ॥12॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! काले केसों के होते हुए जिन्होंने पति-प्रभू के साथ प्यार नहीं किया। उनमें से कोई विरला ही धउले आने पर (भाव, विरध उम्र में) ईश्वर को याद कर सकता है। (हे फरीद!) आप साई प्रभू से प्यार करें। (यह) प्यार (नित्य) नया रहेगा (दुनिया की 'पोटली' वाला प्यार तो शरीर, 'साख' पकने पर टूट जाएगा)। 12।
· सलोक
फरीदा काली धउली साहिबु सदा है जे को चिति करे ॥
मः 3 ॥
फरीदा काली धउली साहिबु सदा है जे को चिति करे ॥
आपणा लाइआ पिरमु न लगई जे लोचै सभु कोइ ॥
एहु पिरमु पिआला खसम का जै भावै तै देइ ॥13॥
फरीदा काली धउली साहिबु सदा है जे को चिति करे ॥
आपणा लाइआ पिरमु न लगई जे लोचै सभु कोइ ॥
एहु पिरमु पिआला खसम का जै भावै तै देइ ॥13॥
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे फरीद! अगर कोई बँदा बँदगी करे, तो जवानी में भी और बुढ़ापे में भी मालिक (मिल सकता) है। पर बेशक कोई चाह व कोशिश करके देख ले। 'यह प्यार' अपने आप नहीं लगाया जा सकता। यह प्यार-रूपी प्याला तो मालिक का (अपना) है। जिसको उसकी मर्जी होती है देता है। 13।
· सलोक
फरीदा जिन॑ लोइण जगु मोहिआ से लोइण मै डिठु ॥
फरीदा जिन॑ लोइण जगु मोहिआ से लोइण मै डिठु ॥
कजल रेख न सहदिआ से पंखी सूइ बहिठु ॥14॥
कजल रेख न सहदिआ से पंखी सूइ बहिठु ॥14॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (इस दिखाई देती गुलजार। पर असल में। 'गुझी भाहि' अर्थात 'गुप्त आग' में मस्त जीव को कुछ सूझता-बूझता नहीं। खूब गुमान करता है। पर गुमान किस बात का।) जिन (सुंदर) आँखों ने जगत को मोह रखा था। वे आँखें मैंने भी देखीं। (पहले तो इतनी नाजुक थीं कि) काजल की धार नहीं सह सकती थीं। फिर वे पंछियों के बच्चों का घोंसला बनीं (भाव, हमारे सामने शारीरिक सुंदरता आखिर नित्य नाश हो जाती है। इस पर गुमान झूठा है)। 14।
· सलोक
फरीदा कूकेदिआ चांगेदिआ मती देदिआ नित ॥
फरीदा कूकेदिआ चांगेदिआ मती देदिआ नित ॥
जो सैतानि वंञाइआ से कित फेरहि चित ॥15॥
जो सैतानि वंञाइआ से कित फेरहि चित ॥15॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (चाहे कितना ही) पुकार-पुकार के कहें (कितना ही) नित्य समझाते रहें; पर, जिन लोगों को (मन-) शैतान ने बिगाड़ा हुआ है। वह कैसे ('दुनी' की तरफ से) चित्त फेर सकते हैं। 15।
· सलोक
फरीदा थीउ पवाही दभु ॥
फरीदा थीउ पवाही दभु ॥
जे सांई लोड़हि सभु ॥
इकु छिजहि बिआ लताड़ीअहि ॥
तां साई दै दरि वाड़ीअहि ॥16॥
जे सांई लोड़हि सभु ॥
इकु छिजहि बिआ लताड़ीअहि ॥
तां साई दै दरि वाड़ीअहि ॥16॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! अगर आप मालिक (-प्रभू) को हर जगह ढूँढते हैं (भाव, देखना चाहते हैं) तो रास्ते की दूब (जैसे) बन जाएँ (जिसके) एक पौधे को (लोग) तोड़ते हैं। तो कई और पौधे (उनके पैरों तले) लिताड़े जाते हैं। (यदि आप ऐसा स्वभाव बना लें) तो आप मालिक के दर पर कबूल होंगे। 16।
· सलोक
फरीदा खाकु न निंदीऐ खाकू जेडु न कोइ ॥
फरीदा खाकु न निंदीऐ खाकू जेडु न कोइ ॥
जीवदिआ पैरा तलै मुइआ उपरि होइ ॥17॥
जीवदिआ पैरा तलै मुइआ उपरि होइ ॥17॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! मिट्टी को बुरा नहीं कहना चाहिए। मिट्टी की बराबरी कोई नहीं कर सकता। (मनुष्य के) पैरों तले होती है। (पर मनुष्य के) मरने पर उसके ऊपर हो जाती है। (इसी तरह 'गरीबी-स्वभाव' की रीस नहीं हो सकती। 'गरीबी स्वभाव' वाला व्यक्ति जिंदगी में चाहे सबकी ज्यादती सहता है। पर मन को मारने के कारण आत्मिक अवस्था में सबसे ऊँचा होता है)। 17।
· सलोक
फरीदा जा लबु ता नेहु किआ लबु त कूड़ा नेहु ॥
फरीदा जा लबु ता नेहु किआ लबु त कूड़ा नेहु ॥
किचरु झति लघाईऐ छपरि तुटै मेहु ॥18॥
किचरु झति लघाईऐ छपरि तुटै मेहु ॥18॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! अगर (ईश्वर की बँदगी करते-करते बतौर इवज़ाने कोई दुनिया का) लालच है, तो (ईश्वर से) असल प्यार नहीं। (जब तक) लालच है, तब तक पयार झूठा है। टूटे हुए छप्पर पर वर्षा होने पर कितना समय निकल सकेगा। (भाव, जब दुनिया वाली गरज़ पूरी ना हुई। पयार टूटेगा)। 18।
· सलोक
फरीदा जंगलु जंगलु किआ भवहि वणि कंडा मोड़ेहि ॥
फरीदा जंगलु जंगलु किआ भवहि वणि कंडा मोड़ेहि ॥
वसी रबु हिआलीऐ जंगलु किआ ढूढेहि ॥19॥
वसी रबु हिआलीऐ जंगलु किआ ढूढेहि ॥19॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! हरेक जंगल को गाहने का क्या लाभ है। जंगल में काँटें क्यों लिताड़ते फिरते हैं। रॅब (तो आपके) हृदय में बसता है। जंगल को तलाशने का क्या फायदा। 19।
· सलोक
फरीदा इनी निकी जंघीऐ थल डूंगर भविओमि॑ ॥
फरीदा इनी निकी जंघीऐ थल डूंगर भविओमि॑ ॥
अजु फरीदै कूजड़ा सै कोहां थीओमि ॥20॥
अजु फरीदै कूजड़ा सै कोहां थीओमि ॥20॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! इन छोटी-छोटी टाँगों से (जवानी के वक्त) मैं थल और पहाड़ फिर आता रहा। पर आज (बुढ़ापे में) मुझ फरीद को (यह थोड़ी ही दूर रखा) लोटा सौ कोस दूर हो गया है (सो, बँदगी का वक्त भी जवानी ही है जब शरीर काम दे सकता है)। 20।
· सलोक
फरीदा राती वडीआं धुखि धुखि उठनि पास ॥
फरीदा राती वडीआं धुखि धुखि उठनि पास ॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (सर्दियों की) लंबी रातों में (सो-सो के) पासे (पसलियां) अकड़ जाते हैं (इसी तरह पराई आस ताकते हुए समय खत्म नहीं होता। पराए दर पर बैठ के बोर हो जाते हैं)। सो।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; शेख़ फ़रीद जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1378 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।