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अंग 1377 · कबीर जी के सलोक · फ़रीद जी के सलोक

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अंग
1377
कबीर जी के सलोक · फ़रीद जी के सलोक
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  1. मुकति पदारथु पाईऐ ठाक न अवघट घाट ॥231॥
  2. कबीर एक घड़ी आधी घरी आधी हूं ते आध ॥
  3. कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥
  4. नीचे लोइन करि रहउ ले साजन घट माहि ॥
  5. आठ जाम चउसठि घरी तुअ निरखत रहै जीउ ॥
  6. सुनु सखी पीअ महि जीउ बसै जीअ महि बसै कि पीउ ॥
  7. कबीर बामनु गुरू है जगत का भगतन का गुरु नाहि ॥
  8. हरि है खांडु रेतु महि बिखरी हाथी चुनी न जाइ ॥
  9. कबीर जउ तुहि साध पिरंम की सीसु काटि करि गोइ ॥
  10. कबीर जउ तुहि साध पिरंम की पाके सेती खेलु ॥
  11. ढूंढत डोलहि अंध गति अरु चीनत नाही संत ॥
  12. हरि सो हीरा छाडि कै करहि आन की आस ॥
  13. कबीर जउ ग्रिहु करहि त धरमु करु नाही त करु बैरागु ॥
  14. जितु दिहाड़ै धन वरी साहे लए लिखाइ ॥
  15. फरीदा दर दरवेसी गाखड़ी चलां दुनीआं भति ॥

भगत कबीर जी · सलोक

मुकति पदारथु पाईऐ ठाक न अवघट घाट ॥231॥

अंग 1376 से चला आ रहा अंश

मुकति पदारथु पाईऐ ठाक न अवघट घाट ॥231॥

हिन्दी अर्थ: उसकी संगति से फल ये मिलता है कि दुनिया के 'बाद-बिबाद' से मुक्ति मिल जाती है। कोई भी विकार इस मुश्किल सफर के रास्ते में रोक नहीं डालता। 231।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर एक घड़ी आधी घरी आधी हूं ते आध ॥

कबीर एक घड़ी आधी घरी आधी हूं ते आध ॥
भगतन सेती गोसटे जो कीने सो लाभ ॥232॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (चुँकि दुनिया के 'बाद बिबाद' से मुक्ति साधू की संगति करने से ही मिलती है। इसलिए) एक घड़ी, आधी घड़ी। घड़ी का चौथा हिस्सा, जितना समय भी गुरमुखों की संगति की जाए। इससे (आत्मिक जीवन में) फायदा ही फायदा है। 232।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥

कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥
तीरथ बरत नेम कीए ते सभै रसातलि जांहि ॥233॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! अगर लोग 'भगतन सेती गोसटे' कर के तीर्थ-यात्रा व्रत नेम आदि भी करते हैं और वह शराबी लोग भांग-मछली भी खाते हैं (भाव, सत्संग में भी जाते हैं और शराब-कबाब भी खाते-पीते हैं। विकार भी करते हैं) उनके वह तीर्थ-व्रत आदि वाले सारे कर्म बिल्कुल व्यर्थ जाते हैं।

भगत कबीर जी · सलोक

नीचे लोइन करि रहउ ले साजन घट माहि ॥

नीचे लोइन करि रहउ ले साजन घट माहि ॥
सभ रस खेलउ पीअ सउ किसी लखावउ नाहि ॥234॥

हिन्दी अर्थ: (हे मेरी सत्संगी सहेलिए! जब से मुझे 'साधू संगु परापती' हुई है। मैं 'भगतन सेती गोसटे' ही करती हूँ। इस 'साधू संग' की बरकति से) प्यारे प्रभू-पति को अपने हृदय में संभाल के (इन 'भांग माछुली सुरा' आदि विकारों से) मैं अपनी आँखें नीची किए रखती हूँ। (दुनिया के इन रसों से खेल खेलने की जगह) मैं प्रभू-पति के साथ सारे रंग भोगती हूँ; पर मैं (यह भेद) किसी को नहीं बताती। 234।

भगत कबीर जी · सलोक

आठ जाम चउसठि घरी तुअ निरखत रहै जीउ ॥

आठ जाम चउसठि घरी तुअ निरखत रहै जीउ ॥
नीचे लोइन किउ करउ सभ घट देखउ पीउ ॥235॥

हिन्दी अर्थ: (हे सखी! मैं सिर्फ प्रभू-पति को ही कहती हूँ कि हे पति!) आठों पहर हर घड़ी मेरी जीवात्मा आपको ही ताकती रहती है। (हे सखी!) मैं सभ शरीरों में प्रभू-पति को ही देखती हूं। इसलिए मुझे किसी प्राणी-मात्र से नफ़रत नहीं। 235।

भगत कबीर जी · सलोक

सुनु सखी पीअ महि जीउ बसै जीअ महि बसै कि पीउ ॥

सुनु सखी पीअ महि जीउ बसै जीअ महि बसै कि पीउ ॥
जीउ पीउ बूझउ नही घट महि जीउ कि पीउ ॥236॥

हिन्दी अर्थ: हे सहेलिए! ('साधू संग' की बरकति से मेरे अंदर एक आश्चर्यजनक खेल बन गई है। मुझे अब ये पता नहीं लगता कि) मेरी जिंद प्रभू-पति में बस रही है या जिंद में प्यारा आ बसा है। हे सहेलिए! आप अब ये समझ ही नहीं सकतीं कि मेरे अंदर मेरी जिंद है या मेरा प्यारा प्रभू-पति। 236।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर बामनु गुरू है जगत का भगतन का गुरु नाहि ॥

कबीर बामनु गुरू है जगत का भगतन का गुरु नाहि ॥
अरझि उरझि कै पचि मूआ चारउ बेदहु माहि ॥237॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! (कहें: मुझे जो यह जीवन-दाति मिली है। जीवन-दाते सतिगुरू से मिली है जो स्वयं भी नाम का रसिया है; जनेऊ आदि दे के और कर्म-काण्ड का रास्ता बता के) ब्राहमण सिर्फ दुनियादारों का ही गुरू कहलवा सकता है। भगती करने वालों का उपदेश-दाता ब्राहमण नहीं बन सकता। क्योंकि यह तो आप ही चारों वेदों के यज्ञ आदि कर्म-काण्ड की उलझनों को सोच-सोच के इन में ही खप-खप के आत्मिक मौत मर चुका है (इसकी अपनी ही जिंद प्रभू-मिलाप का आनंद नहीं ले सकी। ये भगतों को वह स्वाद कैसे दे सकता है।)। 237।

भगत कबीर जी · सलोक

हरि है खांडु रेतु महि बिखरी हाथी चुनी न जाइ ॥

हरि है खांडु रेतु महि बिखरी हाथी चुनी न जाइ ॥
कहि कबीर गुरि भली बुझाई कीटी होइ कै खाइ ॥238॥

हिन्दी अर्थ: परमात्मा का नाम। मानो, खंड है जो रेत में बिखरी हुई है। हाथी से ये खंड रेत में से चुनी नहीं जा सकती। कबीर कहता है: पूरे सतिगुरू ने यह भली मति दी है कि मनुष्य कीड़ी बन के यह खंड खा सकता है। 238।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर जउ तुहि साध पिरंम की सीसु काटि करि गोइ ॥

कबीर जउ तुहि साध पिरंम की सीसु काटि करि गोइ ॥
खेलत खेलत हाल करि जो किछु होइ त होइ ॥239॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! अगर आपको प्रभू-प्यार की खेल खेलने की चाहत है, तो अपना सिर काट के गेंद बना लें (इस तरह अहंकार दूर करें कि लोग बेशक ठोकरें मारें 'कबीर रोड़ा होइ रहु बाट का। तजि मन का अभिमानु') यह खेल खेलता-खेलता इतना मस्त हो जा कि (दुनिया की ओर से) जो (सलूक आपके साथ) हो वह होता रहे। 239। पर।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर जउ तुहि साध पिरंम की पाके सेती खेलु ॥

कबीर जउ तुहि साध पिरंम की पाके सेती खेलु ॥
काची सरसउं पेलि कै ना खलि भई न तेलु ॥240॥

हिन्दी अर्थ: हे कबीर! अगर आपको प्रभू-प्यार की ये खेल खेलने की उमंग है तो पूरे सतिगुरू की शरण पड़ के खेलें; (कर्म-काण्डी ब्राहमण के पास यह चीज नहीं है)। कच्ची सरसों पीढ़ने से ना तेल निकलता है और ना ही खॅल बनती है (यही हाल जनेऊ आदि दे के बने कच्चे गुरूओं का है)। 240।

भगत कबीर जी · सलोक

ढूंढत डोलहि अंध गति अरु चीनत नाही संत ॥

ढूंढत डोलहि अंध गति अरु चीनत नाही संत ॥
कहि नामा किउ पाईऐ बिनु भगतहु भगवंतु ॥241॥

हिन्दी अर्थ: नामदेव कहता है कि भगती करने वाले लोगों (की संगति) के बिना भगवान नहीं मिल सकता; जो मनुष्य (प्रभू की) तलाश करते हैं। पर भगत-जनों को पहचान नहीं सकते वह अंधों की तरह ही टटोलते रहते हैं। 241।

भगत कबीर जी · सलोक

हरि सो हीरा छाडि कै करहि आन की आस ॥

हरि सो हीरा छाडि कै करहि आन की आस ॥
ते नर दोजक जाहिगे सति भाखै रविदास ॥242॥

हिन्दी अर्थ: (सारे सुख प्रभू के सिमरन में हैं। पर) जो मनुष्य परमात्मा का नाम-हीरा छोड़ के और-और जगहों से सुखों की आस रखते हैं वे लोग सदा दुख ही सहते हैं, ये सच्ची बात रविदास बताता है। 242।

भगत कबीर जी · सलोक

कबीर जउ ग्रिहु करहि त धरमु करु नाही त करु बैरागु ॥

कबीर जउ ग्रिहु करहि त धरमु करु नाही त करु बैरागु ॥
बैरागी बंधनु करै ता को बडो अभागु ॥243॥

हिन्दी अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि हमने उनकी बाणी पढ़ के देखी है वह भी हमारे साथ ही सहमति रखते हैं। हे कबीर! अगर आप घर-बारी बनते हैं तो घर-बारी वाला फर्ज भी निभाएँ (भाव, प्रभू का सिमरन करें। विकारों से बचे रहें और किसी से नफरत ना करें। पर गृहस्ती में रह के) अगर आपने माया में ग़रके रहना है तो इसको त्यागना ही भला है। त्यागी बन के जो मनुष्य फिर भी साथ-साथ माया का जंजाल सहेड़ता है उसके बहुत दुभाग्य समझें (वह किसी जगह के लायक नहीं रहा)। 243।

शेख़ फ़रीद जी · सलोक

जितु दिहाड़ै धन वरी साहे लए लिखाइ ॥

सलोक सेख फरीद के
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जितु दिहाड़ै धन वरी साहे लए लिखाइ ॥
मलकु जि कंनी सुणीदा मुहु देखाले आइ ॥
जिंदु निमाणी कढीऐ हडा कू कड़काइ ॥
साहे लिखे न चलनी जिंदू कूं समझाइ ॥
जिंदु वहुटी मरणु वरु लै जासी परणाइ ॥
आपण हथी जोलि कै कै गलि लगै धाइ ॥
वालहु निकी पुरसलात कंनी न सुणी आइ ॥
फरीदा किड़ी पवंदीई खड़ा न आपु मुहाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: सलोक सेख फरीद के ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जिस दिन (जीव-) स्त्री ब्याही जाएगी। वह समय (पहले ही) लिखा गया है (भाव, जीव के जगत में आने से पहले ही इसकी मौत का समय मिथा जाता है)। मौत का फरिश्ता जो कानों से सुना ही हुआ था। आ के मुँह दिखाता है (भाव, जिसके बारे में पहले औरों की मौत के समय सुना था। अब वह जीव-स्त्री को आ के मुँह दिखाता है जिसकी वारी आ जाती है)। हड्डियों को तोड़-तोड़ के (भाव, शरीर को रोग आदि से शिथिल कर के) बेचारी जीवात्मा (इसमें से) निकाल ली जाती है। (हे भाई!) जिंद को (ये बात) समझा कि (मौत का) ये निहित समय टल नहीं सकता। जीवात्मा, मानो, दुल्हन है। मौत (का फरिश्ता इसका) दूल्हा है (जीवात्मा को) ब्याह के अवश्य ले जाएगा। यह (काया जीवात्मा को) अपने हाथों से विदा करके किसके गले लगेगी। (भाव, निआसरी हो जाएगी)। हे फरीद! आपने कभी 'पुल सिरात' का नाम नहीं सुना जो बाल से भी बारीक है। कानों में आवाजें पड़ने पर भी अपने आप को लुटाए ना जाएँ (भाव, जगत में समुंद्र है जिसमें विकारों की लहरें उठ रही हैं। इसमें से सही सलामत पार लांघने के लिए 'दरवेशी'। मानो, एक पुल है। जो है बहुत ही सँकरा और बारीक। अर्थात, दरवेशी कमानी बहुत कठिन है। पर दुनिया के विकारों से बचने के लिए रास्ता सिर्फ यही है। हे भाई! धर्म-पुस्तकों के द्वारा गुरू-पैग़ंबर आपको विकारों की लहरों के खतरों से बचाने के लिए आवाजें मार रहे हैं; ध्यान से सुनें और जीवन को व्यर्थ ना गवाएँ)। 1।

शेख़ फ़रीद जी · सलोक

फरीदा दर दरवेसी गाखड़ी चलां दुनीआं भति ॥

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फरीदा दर दरवेसी गाखड़ी चलां दुनीआं भति ॥

हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (परमात्मा के) दर की फकीरी कठिन (कार) है। और मैं दुनियादारों की तरह चल रहा हूँ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: भगत कबीर जी; शेख़ फ़रीद जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1377 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।