कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: उसकी संगति से फल ये मिलता है कि दुनिया के ‘बाद-बिबाद’ से मुक्ति मिल जाती है। कोई भी विकार इस मुश्किल सफर के रास्ते में रोक नहीं डालता। 231।
कबीर एक घड़ी आधी घरी आधी हूं ते आध ॥ भगतन सेती गोसटे जो कीने सो लाभ ॥232॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (चुँकि दुनिया के ‘बाद बिबाद’ से मुक्ति साधू की संगति करने से ही मिलती है। इसलिए) एक घड़ी। आधी घड़ी। घड़ी का चौथा हिस्सा- जितना समय भी गुरमुखों की संगति की जाए। इससे (आत्मिक जीवन में) फायदा ही फायदा है। 232।
कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥ तीरथ बरत नेम कीए ते सभै रसातलि जांहि ॥233॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! अगर लोग ‘भगतन सेती गोसटे’ कर के तीर्थ-यात्रा व्रत नेम आदि भी करते हैं और वह शराबी लोग भांग-मछली भी खाते हैं (भाव। सत्संग में भी जाते हैं और शराब-कबाब भी खाते-पीते हैं। विकार भी करते हैं) उनके वह तीर्थ-व्रत आदि वाले सारे कर्म बिल्कुल व्यर्थ जाते हैं।
नीचे लोइन करि रहउ ले साजन घट माहि ॥ सभ रस खेलउ पीअ सउ किसी लखावउ नाहि ॥234॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: (हे मेरी सत्संगी सहेलिए ! जब से मुझे ‘साधू संगु परापती’ हुई है। मैं ‘भगतन सेती गोसटे’ ही करती हूँ। इस ‘साधू संग’ की बरकति से) प्यारे प्रभू-पति को अपने हृदय में संभाल के (इन ‘भांग माछुली सुरा’ आदि विकारों से) मैं अपनी आँखें नीची किए रखती हूँ। (दुनिया के इन रसों से खेल खेलने की जगह) मैं प्रभू-पति के साथ सारे रंग भोगती हूँ; पर मैं (यह भेद) किसी को नहीं बताती। 234।
आठ जाम चउसठि घरी तुअ निरखत रहै जीउ ॥ नीचे लोइन किउ करउ सभ घट देखउ पीउ ॥235॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: (हे सखी ! मैं सिर्फ प्रभू-पति को ही कहती हूँ कि हे पति !) आठों पहर हर घड़ी मेरी जीवात्मा आपको ही ताकती रहती है। (हे सखी !) मैं सभ शरीरों में प्रभू-पति को ही देखती हूं। इसलिए मुझे किसी प्राणी-मात्र से नफ़रत नहीं। 235।
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे सहेलिए ! (‘साधू संग’ की बरकति से मेरे अंदर एक आश्चर्यजनक खेल बन गई है। मुझे अब ये पता नहीं लगता कि) मेरी जिंद प्रभू-पति में बस रही है या जिंद में प्यारा आ बसा है। हे सहेलिए ! आप अब ये समझ ही नहीं सकती कि मेरे अंदर मेरी जिंद है या मेरा प्यारा प्रभू-पति। 236।
कबीर बामनु गुरू है जगत का भगतन का गुरु नाहि ॥ अरझि उरझि कै पचि मूआ चारउ बेदहु माहि ॥237॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! (कह- मुझे जो यह जीवन-दाति मिली है। जीवन-दाते सतिगुरू से मिली है जो स्वयं भी नाम का रसिया है; जनेऊ आदि दे के और कर्म-काण्ड का रास्ता बता के) ब्राहमण सिर्फ दुनियादारों का ही गुरू कहलवा सकता है। भगती करने वालों का उपदेश-दाता ब्राहमण नहीं बन सकता। क्योंकि यह तो आप ही चारों वेदों के यज्ञ आदि कर्म-काण्ड की उलझनों को सोच-सोच के इन में ही खप-खप के आत्मिक मौत मर चुका है (इसकी अपनी ही जिंद प्रभू-मिलाप का आनंद नहीं ले सकी। ये भगतों को वह स्वाद कैसे दे सकता है।)। 237।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: परमात्मा का नाम। मानो। खंड है जो रेत में बिखरी हुई है। हाथी से ये खंड रेत में से चुनी नहीं जा सकती। कबीर कहता है- पूरे सतिगुरू ने यह भली मति दी है कि मनुष्य कीड़ी बन के यह खंड खा सकता है। 238।
कबीर जउ तुहि साध पिरंम की सीसु काटि करि गोइ ॥ खेलत खेलत हाल करि जो किछु होइ त होइ ॥239॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! अगर आपको प्रभू-प्यार की खेल खेलने की चाहत है। तो अपना सिर काट के गेंद बना ले (इस तरह अहंकार दूर कर कि लोग बेशक ठोकरें मारें ‘कबीर रोड़ा होइ रहु बाट का। तजि मन का अभिमानु’) यह खेल खेलता-खेलता इतना मस्त हो जा कि (दुनिया की ओर से) जो (सलूक आपके साथ) हैं वह होता रहे। 239। पर।
कबीर जउ तुहि साध पिरंम की पाके सेती खेलु ॥ काची सरसउं पेलि कै ना खलि भई न तेलु ॥240॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: हे कबीर ! अगर आपको प्रभू-प्यार की ये खेल खेलने की उमंग है तो पूरे सतिगुरू की शरण पड़ के खेल; (कर्म-काण्डी ब्राहमण के पास यह चीज नहीं है)। कच्ची सरसों पीढ़ने से ना तेल निकलता है और ना ही खॅल बनती है (यही हाल जनेऊ आदि दे के बने कच्चे गुरूओं का है)। 240।
ढूंढत डोलहि अंध गति अरु चीनत नाही संत ॥ कहि नामा किउ पाईऐ बिनु भगतहु भगवंतु ॥241॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: नामदेव कहता है कि भगती करने वाले लोगों (की संगति) के बिना भगवान नहीं मिल सकता; जो मनुष्य (प्रभू की) तलाश करते हैं। पर भगत-जनों को पहचान नहीं सकते वह अंधों की तरह ही टटोलते रहते हैं। 241।
हरि सो हीरा छाडि कै करहि आन की आस ॥ ते नर दोजक जाहिगे सति भाखै रविदास ॥242॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: (सारे सुख प्रभू के सिमरन में हैं। पर) जो मनुष्य परमात्मा का नाम-हीरा छोड़ के और-और जगहों से सुखों की आस रखते हैं वे लोग सदा दुख ही सहते हैं- ये सच्ची बात रविदास बताता है। 242।
कबीर जउ ग्रिहु करहि त धरमु करु नाही त करु बैरागु ॥ बैरागी बंधनु करै ता को बडो अभागु ॥243॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि हमने उनकी बाणी पढ़ के देखी है वह भी हमारे साथ ही सहमति रखते हैं। हे कबीर ! अगर आप घर-बारी बनता है तो घर-बारी वाला फर्ज भी निभा (भाव। प्रभू का सिमरन कर। विकारों से बचा रह और किसी से नफरत ना कर। पर गृहस्ती में रह के) अगर तूने माया में ग़रके रहना है तो इसको त्यागना ही भला है। त्यागी बन के जो मनुष्य फिर भी साथ-साथ माया का जंजाल सहेड़ता है उसके बहुत दुभाग्य समझो (वह किसी जगह के लायक नहीं रहा)। 243।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: सलोक सेख फरीद के वह परब्रह्म केवल एक (ऑकार-स्वरूप) है, सतगुरु की कृपा से प्राप्ति होती है। जिस दिन (जीव-) स्त्री ब्याही जाएगी। वह समय (पहले ही) लिखा गया है (भाव। जीव के जगत में आने से पहले ही इसकी मौत का समय मिथा जाता है)। मौत का फरिश्ता जो कानों से सुना ही हुआ था। आ के मुँह दिखाता है (भाव। जिसके बारे में पहले औरों की मौत के समय सुना था। अब वह जीव-स्त्री को आ के मुँह दिखाता है जिसकी वारी आ जाती है)। हड्डियों को तोड़-तोड़ के (भाव। शरीर को रोग आदि से शिथिल कर के) बेचारी जीवात्मा (इसमें से) निकाल ली जाती है। (हे भाई !) जिंद को (ये बात) समझा कि (मौत का) ये निहित समय टल नहीं सकता। जीवात्मा। मानो। दुल्हन है। मौत (का फरिश्ता इसका) दूल्हा है (जीवात्मा को) ब्याह के अवश्य ले जाएगा। यह (काया जीवात्मा को) अपने हाथों से विदा करके किसके गले लगेगी। (भाव। निआसरी हो जाएगी)। हे फरीद ! तूने कभी ‘पुल सिरात’ का नाम नहीं सुना जो बाल से भी बारीक है। कानों में आवाजें पड़ने पर भी अपने आप को लुटाए ना जा (भाव। जगत में समुंद्र है जिसमें विकारों की लहरें उठ रही हैं। इसमें से सही सलामत पार लांघने के लिए ‘दरवेशी’। मानो। एक पुल है। जो है बहुत ही सँकरा और बारीक। अर्थात। दरवेशी कमानी बहुत कठिन है। पर दुनिया के विकारों से बचने के लिए रास्ता सिर्फ यही है। हे भाई ! धर्म-पुस्तकों के द्वारा गुरू-पैग़ंबर आपको विकारों की लहरों के खतरों से बचाने के लिए आवाजें मार रहे हैं; ध्यान से सुन और जीवन को व्यर्थ ना गवा)। 1।
फरीदा दर दरवेसी गाखड़ी चलां दुनीआं भति ॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (परमात्मा के) दर की फकीरी कठिन (कार) है। और मैं दुनियादारों की तरह चल रहा हूँ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 15 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उसकी संगति से फल ये मिलता है कि दुनिया के ‘बाद-बिबाद’ से मुक्ति मिल जाती है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।