Lulla Family

अंग 1379

अंग
1379
राग Salok Fareed Jee
राग: Salok Fareed Jee · रचयिता: Bhagat Sheikh Fareed Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
धिगु तिन॑ा दा जीविआ जिना विडाणी आस ॥21॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: जो लोग दूसरों की आस देखते हैं उनके जीवन को धिककार है। (आस एक रॅब की रखो)। 21।
फरीदा जे मै होदा वारिआ मिता आइड़िआं ॥
हेड़ा जलै मजीठ जिउ उपरि अंगारा ॥22॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! अगर मैं आए सज्जनों से कभी कुछ छुपा के रखूँ। तो मेरा शरीर (ऐसे) जलता है जैसे जलते हुए कोयलों पर मजीठ (भाव। घर-आए किसी अभ्यागत की सेवा करने से अगर कहीं मन खिसके तो जिंद को बहुत दुख प्रतीत होता है)। 22।
फरीदा लोड़ै दाख बिजउरीआं किकरि बीजै जटु ॥
हंढै उंन कताइदा पैधा लोड़ै पटु ॥23॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (बँदगी के बिना सुखी जीवन की आस रखने वाला मनुष्य उस जॅट की तरह है) जो जॅट किक्करें बीजता है पर (उन किक्करों से) बिजौर के इलाके का छोटा अंगूर (खाना) चाहता है। (सारी उम्र) ऊन कातता फिरता है। पर रेशम पहनना चाहता है। 23।
फरीदा गलीए चिकड़ु दूरि घरु नालि पिआरे नेहु ॥
चला त भिजै कंबली रहां त तुटै नेहु ॥24॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (बरखा के कारण) गली में कीचड़ है। (यहाँ से प्यारे का) घर दूर है (पर) प्यारे के साथ (मेरा) प्यार (बहुत) है। अगर मैं (प्यारे को मिलने के लिए) जाऊँ तो मेरी कंबली भीगती है। जो (बरखा के कीचड़ से डरता) ना जाऊँ तो मेरा प्यार टूटता है। 24।
भिजउ सिजउ कंबली अलह वरसउ मेहु ॥
जाइ मिला तिना सजणा तुटउ नाही नेहु ॥25॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: (मेरी) कंबली भले ही अच्छी तरह भीग जाए। रॅब करे वर्षा (भी) होती रहे। (पर) मैं उन सज्जनों को अवश्य मिलूँगा। (ताकि कहीं) मेरा प्यार टूट ना जाए। 25।
फरीदा मै भोलावा पग दा मतु मैली होइ जाइ ॥
गहिला रूहु न जाणई सिरु भी मिटी खाइ ॥26॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! मुझे (अपनी) पगड़ी का फिकर (रहता) है (कि मिट्टी से मेरी पगड़ी) कहीं मैली ना हो जाए। पर कमली जिंद यह नहीं जानती कि मिट्टी (तो) सिर को भी खा जाती है। 26।
फरीदा सकर खंडु निवात गुड़ु माखिओु मांझा दुधु ॥
सभे वसतू मिठीआं रब न पुजनि तुधु ॥27॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! शक्कर। खंड। मिसरी। गुड़। शहद और माझा दूध- ये सारी चीजें मीठी हैं पर। हे रॅब ! (मिठास में यह चीजें) आपके (नाम की मिठास) तक नहीं पहुँच सकतीं। 27।
फरीदा रोटी मेरी काठ की लावणु मेरी भुख ॥
जिना खाधी चोपड़ी घणे सहनिगे दुख ॥28॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (अपने हाथों की कमाई हुई) मेरी रूखी-सूखी (भाव। सादी) रोटी है। मेरी भूख ही (इस रोटी के साथ) नमकीन है। जो लोग चुपड़ी खाते हैं। वे बड़े कष्ट सहते हैं (भाव। अपनी कमाई की सादी रोटी बेहतर है। चस्के मनुष्य को दुखी करते हैं)। 28।
रुखी सुखी खाइ कै ठंढा पाणी पीउ ॥
फरीदा देखि पराई चोपड़ी ना तरसाए जीउ ॥29॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (अपनी कमाई की) रूखी-सुखी ही खा के ठंडा पानी पी ले। पर पराई स्वादिष्ट रोटी देख के अपना मन ना तरसाना। 29।
अजु न सुती कंत सिउ अंगु मुड़े मुड़ि जाइ ॥
जाइ पुछहु डोहागणी तुम किउ रैणि विहाइ ॥30॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: मैं (तो केवल) आज (ही) प्यारे के साथ नहीं सोई (भाव। मैं तो केवल आज ही प्यारे पति-परमात्मा में लीन नहीं हुई। और अब) यूँ है जैसे मेरा शरीर टूट रहा है। जा के छुटॅड़ों (भाग्यहीन दोहागिनों) को पूछो कि आपकी (सदा ही) रात कैसे बीतती है (भाव। मुझे तो आज ही थोड़ा समय प्रभू बिसरा है और मैं दुखी हूँ। जिन्होंने कभी भी उसको याद ही नहीं किया। उनकी तो सारी उम्र ही दुख में गुजरती होगी)। 30।
साहुरै ढोई ना लहै पेईऐ नाही थाउ ॥
पिरु वातड़ी न पुछई धन सोहागणि नाउ ॥31॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: जिस स्त्री की थोड़ी सी बात भी पति नहीं पूछता। वह अपना नाम बेशक सोहागनि रखी रखे। पर उसको ना ससुराल और ना ही पेके घर कोई जगह कोई आसरा मिलता है (भाव। प्रभू की याद से टूटे हुए जीव लोक-परलोक दोनों जगह दुखी होते हें। बाहर से बँदगी वाला भेष कोई सहायता नहीं कर सकता)। 31।
साहुरै पेईऐ कंत की कंतु अगंमु अथाहु ॥
नानक सो सोहागणी जु भावै बेपरवाह ॥32॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! पति-परमात्मा जीवों की पहुँच से परे है। और बहुत गहरा है (भाव। वह इतना जिगरे वाला है कि भूलने वालों पर भी गुस्सा नहीं होता; पर) सोहागनि (जीव-स्त्री) वही है जो उस बेपरवाह प्रभू को प्यारी लगती है। जो इस लोक और परलोक में उस पति की बन के रहती है। 32।
नाती धोती संबही सुती आइ नचिंदु ॥
फरीदा रही सु बेड़ी हिंङु दी गई कथूरी गंधु ॥33॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: (जो जीव-स्त्री) नहा-धो के (पति मिलने की आस में) तैयार बैठी हो। (पर फिर) बे फिकर हो के सो गई। हे फरीद ! उसकी कस्तूरी वाली सुगंधि तो उड़ गई। वह हींग की (बदबू से) भरी रह गई (भाव। जो बाहरी धार्मिक साधन कर लिए। पर सिमरन से टूटे रहे तो भले गुण सब दूर हो जाते हैं। और पल्ले अवगुण ही रह जाते हैं)। 33।
जोबन जांदे ना डरां जे सह प्रीति न जाइ ॥
फरीदा कितंी जोबन प्रीति बिनु सुकि गए कुमलाइ ॥34॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: अगर पति (-प्रभू) के साथ मेरी प्रीति ना टूटे तो मेरी जवानी के (गुजर) जाने का डर नहीं। हे फरीद ! (प्रभू की) प्रीति से वंचित कितने ही जोबन कुम्हला के सूख गए (भाव। अगर प्रभू-चरनों के साथ प्यार नहीं बना तो मनुष्य-जीवन का जोबन व्यर्थ ही गया)। 34।
फरीदा चिंत खटोला वाणु दुखु बिरहि विछावण लेफु ॥
एहु हमारा जीवणा तू साहिब सचे वेखु ॥35॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (प्रभू की याद भुला के) चिंता (हमारी) छोटी सी खाट (बनी हुई है)। दुख (उस चारपाई का) वाण है (जिससे चारपाई बुनी हुई है) और विछोड़े के कारण (दुख की) तुलाई और लेफ है। हे सच्चे मालिक ! देख। (आपसे विछुड़ के) यह है हमारा जीवन (का हाल)। 35।
बिरहा बिरहा आखीऐ बिरहा तू सुलतानु ॥
फरीदा जितु तनि बिरहु न ऊपजै सो तनु जाणु मसानु ॥36॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हर कोई कहता है (हाय !) विछोड़ा (बुरा) (हाय !) विछोड़ा (बुरा)। पर। हे विछोड़े ! आप बादशाह है (भाव। आपको मैं सलाम करता हूँ। क्योंकि)। हे फरीद ! जिस शरीर में विछोड़े का दर्द नहीं पैदा होता (भाव। जिस मनुष्य को कभी ये चुभन नहीं लगी कि मैं प्रभू से विछुड़ा हुआ हूँ) उस शरीर को मसाण समझो (भाव। उस शरीर में रहने वाली रूह विकारों में जल रही है)। 36।
फरीदा ए विसु गंदला धरीआं खंडु लिवाड़ि ॥
इकि राहेदे रहि गए इकि राधी गए उजाड़ि ॥37॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! ये दुनिया के पदार्थ (मानो।) जहर-भरी गंदलें हैं। जो खंड के साथ लपेट के रखी हुई हैं। इन गंदलों को कई बीजते ही मर गए और। बीजे हुओं को (बीच में ही) छोड़ गए। 37।
फरीदा चारि गवाइआ हंढि कै चारि गवाइआ संमि ॥
लेखा रबु मंगेसीआ तू आंहो केर्हे कंमि ॥38॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! (इन विष-गंदलों के लिए। दुनिया के इन पदार्थों के लिए) चार (पहर दिन) तूने दौड़-भाग के व्यर्थ गुजार दी है। और चार (पहर रात) सो के गवा दी है। परमात्मा हिसाब माँगेगा कि (जगत में) आप किस काम के लिए आया था। 38।
फरीदा दरि दरवाजै जाइ कै किउ डिठो घड़ीआलु ॥
एहु निदोसां मारीऐ हम दोसां दा किआ हालु ॥39॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे फरीद ! क्या (किसी) दर पे (किसी) दरवाजे पर (कभी) घंटा (बजता) देखा है। ये (घड़ियाल या घंटा) बिना किसी दोष के (ही) मार खाता है। (भला।) हम दोषियों का क्या हाल।
घड़ीए घड़ीए मारीऐ पहरी लहै सजाइ ॥
सो हेड़ा घड़ीआल जिउ डुखी रैणि विहाइ ॥40॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: (घंटे को) हरेक घड़ी के बाद मार पड़ती है। हरेक पहर के बाद (यह) मार खाता है। घंटे की तरह ही है वह शरीर (जिसने ‘विसु गंदलों’ की खातिर ही उम्र गुजार दी)। उसकी (जिंदगी-रूप) रात दुखों में ही बीतती है। 40।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के अंतिम पन्ने, सलोक, स्वैये, और मुंदावनी। संकलन की अन्तिम परत, 1604 से 1706 तक की रचनाओं की।

बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। आज पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है, और हर साल हज़ारों लोग वहाँ जाते हैं।

इस अंग पर 20 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो लोग दूसरों की आस देखते हैं उनके जीवन को धिककार है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।