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1379
फ़रीद जी के सलोक
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- धिगु तिन॑ा दा जीविआ जिना विडाणी आस ॥21॥
- फरीदा जे मै होदा वारिआ मिता आइड़िआं ॥
- फरीदा लोड़ै दाख बिजउरीआं किकरि बीजै जटु ॥
- फरीदा गलीए चिकड़ु दूरि घरु नालि पिआरे नेहु ॥
- भिजउ सिजउ कंबली अलह वरसउ मेहु ॥
- फरीदा मै भोलावा पग दा मतु मैली होइ जाइ ॥
- फरीदा सकर खंडु निवात गुड़ु माखिओु मांझा दुधु ॥
- फरीदा रोटी मेरी काठ की लावणु मेरी भुख ॥
- रुखी सुखी खाइ कै ठंढा पाणी पीउ ॥
- अजु न सुती कंत सिउ अंगु मुड़े मुड़ि जाइ ॥
- साहुरै ढोई ना लहै पेईऐ नाही थाउ ॥
- साहुरै पेईऐ कंत की कंतु अगंमु अथाहु ॥
- नाती धोती संबही सुती आइ नचिंदु ॥
- जोबन जांदे ना डरां जे सह प्रीति न जाइ ॥
- फरीदा चिंत खटोला वाणु दुखु बिरहि विछावण लेफु ॥
- बिरहा बिरहा आखीऐ बिरहा तू सुलतानु ॥
- फरीदा ए विसु गंदला धरीआं खंडु लिवाड़ि ॥
- फरीदा चारि गवाइआ हंढि कै चारि गवाइआ संमि ॥
- फरीदा दरि दरवाजै जाइ कै किउ डिठो घड़ीआलु ॥
- घड़ीए घड़ीए मारीऐ पहरी लहै सजाइ ॥
· सलोक
धिगु तिन॑ा दा जीविआ जिना विडाणी आस ॥21॥
धिगु तिन॑ा दा जीविआ जिना विडाणी आस ॥21॥
हिन्दी अर्थ: जो लोग दूसरों की आस देखते हैं उनके जीवन को धिककार है। (आस एक रॅब की रखें)। 21।
· सलोक
फरीदा जे मै होदा वारिआ मिता आइड़िआं ॥
फरीदा जे मै होदा वारिआ मिता आइड़िआं ॥
हेड़ा जलै मजीठ जिउ उपरि अंगारा ॥22॥
हेड़ा जलै मजीठ जिउ उपरि अंगारा ॥22॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! अगर मैं आए सज्जनों से कभी कुछ छुपा के रखूँ, तो मेरा शरीर (ऐसे) जलता है जैसे जलते हुए कोयलों पर मजीठ (भाव, घर-आए किसी अभ्यागत की सेवा करने से अगर कहीं मन खिसके तो जिंद को बहुत दुख प्रतीत होता है)। 22।
· सलोक
फरीदा लोड़ै दाख बिजउरीआं किकरि बीजै जटु ॥
फरीदा लोड़ै दाख बिजउरीआं किकरि बीजै जटु ॥
हंढै उंन कताइदा पैधा लोड़ै पटु ॥23॥
हंढै उंन कताइदा पैधा लोड़ै पटु ॥23॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (बँदगी के बिना सुखी जीवन की आस रखने वाला मनुष्य उस जॅट की तरह है) जो जॅट किक्करें बीजता है पर (उन किक्करों से) बिजौर के इलाके का छोटा अंगूर (खाना) चाहता है। (सारी उम्र) ऊन कातता फिरता है। पर रेशम पहनना चाहता है। 23।
· सलोक
फरीदा गलीए चिकड़ु दूरि घरु नालि पिआरे नेहु ॥
फरीदा गलीए चिकड़ु दूरि घरु नालि पिआरे नेहु ॥
चला त भिजै कंबली रहां त तुटै नेहु ॥24॥
चला त भिजै कंबली रहां त तुटै नेहु ॥24॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (बरखा के कारण) गली में कीचड़ है। (यहाँ से प्यारे का) घर दूर है (पर) प्यारे के साथ (मेरा) प्यार (बहुत) है। अगर मैं (प्यारे को मिलने के लिए) जाऊँ तो मेरी कंबली भीगती है। जो (बरखा के कीचड़ से डरता) ना जाऊँ तो मेरा प्यार टूटता है। 24।
· सलोक
भिजउ सिजउ कंबली अलह वरसउ मेहु ॥
भिजउ सिजउ कंबली अलह वरसउ मेहु ॥
जाइ मिला तिना सजणा तुटउ नाही नेहु ॥25॥
जाइ मिला तिना सजणा तुटउ नाही नेहु ॥25॥
हिन्दी अर्थ: (मेरी) कंबली भले ही अच्छी तरह भीग जाए। रॅब करे वर्षा (भी) होती रहे। (पर) मैं उन सज्जनों को अवश्य मिलूँगा। (ताकि कहीं) मेरा प्यार टूट ना जाए। 25।
· सलोक
फरीदा मै भोलावा पग दा मतु मैली होइ जाइ ॥
फरीदा मै भोलावा पग दा मतु मैली होइ जाइ ॥
गहिला रूहु न जाणई सिरु भी मिटी खाइ ॥26॥
गहिला रूहु न जाणई सिरु भी मिटी खाइ ॥26॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! मुझे (अपनी) पगड़ी का फिकर (रहता) है (कि मिट्टी से मेरी पगड़ी) कहीं मैली ना हो जाए। पर कमली जिंद यह नहीं जानती कि मिट्टी (तो) सिर को भी खा जाती है। 26।
· सलोक
फरीदा सकर खंडु निवात गुड़ु माखिओु मांझा दुधु ॥
फरीदा सकर खंडु निवात गुड़ु माखिओु मांझा दुधु ॥
सभे वसतू मिठीआं रब न पुजनि तुधु ॥27॥
सभे वसतू मिठीआं रब न पुजनि तुधु ॥27॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! शक्कर, खंड, मिसरी, गुड़, शहद और माझा दूध, ये सारी चीजें मीठी हैं पर। हे रॅब! (मिठास में यह चीजें) आपके (नाम की मिठास) तक नहीं पहुँच सकतीं। 27।
· सलोक
फरीदा रोटी मेरी काठ की लावणु मेरी भुख ॥
फरीदा रोटी मेरी काठ की लावणु मेरी भुख ॥
जिना खाधी चोपड़ी घणे सहनिगे दुख ॥28॥
जिना खाधी चोपड़ी घणे सहनिगे दुख ॥28॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (अपने हाथों की कमाई हुई) मेरी रूखी-सूखी (भाव, सादी) रोटी है। मेरी भूख ही (इस रोटी के साथ) नमकीन है। जो लोग चुपड़ी खाते हैं। वे बड़े कष्ट सहते हैं (भाव, अपनी कमाई की सादी रोटी बेहतर है। चस्के मनुष्य को दुखी करते हैं)। 28।
· सलोक
रुखी सुखी खाइ कै ठंढा पाणी पीउ ॥
रुखी सुखी खाइ कै ठंढा पाणी पीउ ॥
फरीदा देखि पराई चोपड़ी ना तरसाए जीउ ॥29॥
फरीदा देखि पराई चोपड़ी ना तरसाए जीउ ॥29॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (अपनी कमाई की) रूखी-सुखी ही खा के ठंडा पानी पी लें। पर पराई स्वादिष्ट रोटी देख के अपना मन ना तरसाना। 29।
· सलोक
अजु न सुती कंत सिउ अंगु मुड़े मुड़ि जाइ ॥
अजु न सुती कंत सिउ अंगु मुड़े मुड़ि जाइ ॥
जाइ पुछहु डोहागणी तुम किउ रैणि विहाइ ॥30॥
जाइ पुछहु डोहागणी तुम किउ रैणि विहाइ ॥30॥
हिन्दी अर्थ: मैं (तो केवल) आज (ही) प्यारे के साथ नहीं सोई (भाव, मैं तो केवल आज ही प्यारे पति-परमात्मा में लीन नहीं हुई। और अब) यूँ है जैसे मेरा शरीर टूट रहा है। जा के छुटॅड़ों (भाग्यहीन दोहागिनों) को पूछें कि आपकी (सदा ही) रात कैसे बीतती है (भाव, मुझे तो आज ही थोड़ा समय प्रभू बिसरा है और मैं दुखी हूँ। जिन्होंने कभी भी उसको याद ही नहीं किया। उनकी तो सारी उम्र ही दुख में गुजरती होगी)। 30।
· सलोक
साहुरै ढोई ना लहै पेईऐ नाही थाउ ॥
साहुरै ढोई ना लहै पेईऐ नाही थाउ ॥
पिरु वातड़ी न पुछई धन सोहागणि नाउ ॥31॥
पिरु वातड़ी न पुछई धन सोहागणि नाउ ॥31॥
हिन्दी अर्थ: जिस स्त्री की थोड़ी सी बात भी पति नहीं पूछता। वह अपना नाम बेशक सोहागनि रखी रखे। पर उसको ना ससुराल और ना ही पेके घर कोई जगह कोई आसरा मिलता है (भाव, प्रभू की याद से टूटे हुए जीव लोक-परलोक दोनों जगह दुखी होते हें। बाहर से बँदगी वाला भेष कोई सहायता नहीं कर सकता)। 31।
· सलोक
साहुरै पेईऐ कंत की कंतु अगंमु अथाहु ॥
साहुरै पेईऐ कंत की कंतु अगंमु अथाहु ॥
नानक सो सोहागणी जु भावै बेपरवाह ॥32॥
नानक सो सोहागणी जु भावै बेपरवाह ॥32॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक! पति-परमात्मा जीवों की पहुँच से परे है। और बहुत गहरा है (भाव, वह इतना जिगरे वाला है कि भूलने वालों पर भी गुस्सा नहीं होता; पर) सोहागनि (जीव-स्त्री) वही है जो उस बेपरवाह प्रभू को प्यारी लगती है। जो इस लोक और परलोक में उस पति की बन के रहती है। 32।
· सलोक
नाती धोती संबही सुती आइ नचिंदु ॥
नाती धोती संबही सुती आइ नचिंदु ॥
फरीदा रही सु बेड़ी हिंङु दी गई कथूरी गंधु ॥33॥
फरीदा रही सु बेड़ी हिंङु दी गई कथूरी गंधु ॥33॥
हिन्दी अर्थ: (जो जीव-स्त्री) नहा-धो के (पति मिलने की आस में) तैयार बैठी हो। (पर फिर) बे फिकर हो के सो गई। हे फरीद! उसकी कस्तूरी वाली सुगंधि तो उड़ गई। वह हींग की (बदबू से) भरी रह गई (भाव, जो बाहरी धार्मिक साधन कर लिए। पर सिमरन से टूटे रहे तो भले गुण सब दूर हो जाते हैं। और पल्ले अवगुण ही रह जाते हैं)। 33।
· सलोक
जोबन जांदे ना डरां जे सह प्रीति न जाइ ॥
जोबन जांदे ना डरां जे सह प्रीति न जाइ ॥
फरीदा कितंी जोबन प्रीति बिनु सुकि गए कुमलाइ ॥34॥
फरीदा कितंी जोबन प्रीति बिनु सुकि गए कुमलाइ ॥34॥
हिन्दी अर्थ: अगर पति (-प्रभू) के साथ मेरी प्रीति ना टूटे तो मेरी जवानी के (गुजर) जाने का डर नहीं। हे फरीद! (प्रभू की) प्रीति से वंचित कितने ही जोबन कुम्हला के सूख गए (भाव, अगर प्रभू-चरनों के साथ प्यार नहीं बना तो मनुष्य-जीवन का जोबन व्यर्थ ही गया)। 34।
· सलोक
फरीदा चिंत खटोला वाणु दुखु बिरहि विछावण लेफु ॥
फरीदा चिंत खटोला वाणु दुखु बिरहि विछावण लेफु ॥
एहु हमारा जीवणा तू साहिब सचे वेखु ॥35॥
एहु हमारा जीवणा तू साहिब सचे वेखु ॥35॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (प्रभू की याद भुला के) चिंता (हमारी) छोटी सी खाट (बनी हुई है)। दुख (उस चारपाई का) वाण है (जिससे चारपाई बुनी हुई है) और विछोड़े के कारण (दुख की) तुलाई और लेफ है। हे सच्चे मालिक! देखें, (आपसे विछुड़ के) यह है हमारा जीवन (का हाल)। 35।
· सलोक
बिरहा बिरहा आखीऐ बिरहा तू सुलतानु ॥
बिरहा बिरहा आखीऐ बिरहा तू सुलतानु ॥
फरीदा जितु तनि बिरहु न ऊपजै सो तनु जाणु मसानु ॥36॥
फरीदा जितु तनि बिरहु न ऊपजै सो तनु जाणु मसानु ॥36॥
हिन्दी अर्थ: हर कोई कहता है (हाय!) विछोड़ा (बुरा) (हाय!) विछोड़ा (बुरा)। पर, हे विछोड़े! आप बादशाह हैं (भाव, आपको मैं सलाम करता हूँ। क्योंकि)। हे फरीद! जिस शरीर में विछोड़े का दर्द नहीं पैदा होता (भाव, जिस मनुष्य को कभी ये चुभन नहीं लगी कि मैं प्रभू से विछुड़ा हुआ हूँ) उस शरीर को मसाण समझें (भाव, उस शरीर में रहने वाली रूह विकारों में जल रही है)। 36।
· सलोक
फरीदा ए विसु गंदला धरीआं खंडु लिवाड़ि ॥
फरीदा ए विसु गंदला धरीआं खंडु लिवाड़ि ॥
इकि राहेदे रहि गए इकि राधी गए उजाड़ि ॥37॥
इकि राहेदे रहि गए इकि राधी गए उजाड़ि ॥37॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! ये दुनिया के पदार्थ (मानो) जहर-भरी गंदलें हैं। जो खंड के साथ लपेट के रखी हुई हैं। इन गंदलों को कई बीजते ही मर गए और बीजे हुओं को (बीच में ही) छोड़ गए। 37।
· सलोक
फरीदा चारि गवाइआ हंढि कै चारि गवाइआ संमि ॥
फरीदा चारि गवाइआ हंढि कै चारि गवाइआ संमि ॥
लेखा रबु मंगेसीआ तू आंहो केर्हे कंमि ॥38॥
लेखा रबु मंगेसीआ तू आंहो केर्हे कंमि ॥38॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! (इन विष-गंदलों के लिए। दुनिया के इन पदार्थों के लिए) चार (पहर दिन) आपने दौड़-भाग के व्यर्थ गुजार दी है। और चार (पहर रात) सो के गवा दी है। परमात्मा हिसाब माँगेगा कि (जगत में) आप किस काम के लिए आए थे। 38।
· सलोक
फरीदा दरि दरवाजै जाइ कै किउ डिठो घड़ीआलु ॥
फरीदा दरि दरवाजै जाइ कै किउ डिठो घड़ीआलु ॥
एहु निदोसां मारीऐ हम दोसां दा किआ हालु ॥39॥
एहु निदोसां मारीऐ हम दोसां दा किआ हालु ॥39॥
हिन्दी अर्थ: हे फरीद! क्या (किसी) दर पे (किसी) दरवाजे पर (कभी) घंटा (बजता) देखा है। ये (घड़ियाल या घंटा) बिना किसी दोष के (ही) मार खाता है। (भला।) हम दोषियों का क्या हाल।
· सलोक
घड़ीए घड़ीए मारीऐ पहरी लहै सजाइ ॥
घड़ीए घड़ीए मारीऐ पहरी लहै सजाइ ॥
सो हेड़ा घड़ीआल जिउ डुखी रैणि विहाइ ॥40॥
सो हेड़ा घड़ीआल जिउ डुखी रैणि विहाइ ॥40॥
हिन्दी अर्थ: (घंटे को) हरेक घड़ी के बाद मार पड़ती है। हरेक पहर के बाद (यह) मार खाता है। घंटे की तरह ही है वह शरीर (जिसने 'विसु गंदलों' की खातिर ही उम्र गुजार दी)। उसकी (जिंदगी-रूप) रात दुखों में ही बीतती है। 40।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: शेख़ फ़रीद जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1379 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।